Punjabi Devi Bhajan गुरुवार विशेष (भगवान श्री हरि विष्णु व गुरुदेव)

देव्यपराधक्षमापन स्तोत्रम् (Devi Aparadha Kshamapana Stotram Lyrics in Hindi And English) - Devyaparadha Kshamapan Stotra

आदिशंकराचार्य रचित देव्यपराधक्षमापन स्तोत्रम् का हिंदी और अंग्रेजी में सम्पूर्ण पाठ पढ़ें। माता भगवती से क्षमा याचना हेतु यह स्तोत्र अत्यंत प्रभावशाली है।

देव्यपराधक्षमापन स्तोत्रम् (Devi Aparadha Kshamapana Stotram Lyrics in Hindi and English)

देव्यपराधक्षमापन स्तोत्रम् आदिशंकराचार्य जी द्वारा रचित एक अत्यंत पावन, प्रभावशाली और भक्तिरस से ओतप्रोत स्तोत्र है। इस दिव्य रचना में जगदम्बा माता भगवती दुर्गा की शरणागति, क्षमाशीलता और अनन्य प्रेम का अद्भुत वर्णन मिलता है। जब साधक सांसारिक मोह-माया, अज्ञानता, आलस्य या पूजा-विधि के अज्ञान के कारण भगवती की सेवा में असमर्थ रहता है, तब वह एक निष्कपट बच्चे की भांति अपनी माता के चरणों में अपने अपराधों के लिए क्षमा मांगता है। "कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति" (पुत्र कुपुत्र हो सकता है, परंतु माता कभी कुमाता नहीं हो सकती) इस स्तोत्र की वह जीवंत और अमर पंक्ति है जो हर साधक के हृदय को द्रवित कर देती है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम देव्यपराधक्षमापन स्तोत्रम् के संपूर्ण हिंदी व अंग्रेजी लिरिक्स, श्लोकों के पदच्छेद, विस्तृत भावार्थ, रचना के ऐतिहासिक व आध्यात्मिक पृष्ठभूमि, पाठ विधि और इससे जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों पर विस्तार से चर्चा करेंगे। यह स्तोत्र नवरात्रि, दुर्गा पूजा, और दैनिक साधना काल में माँ शक्ति की कृपा प्राप्त करने के लिए सर्वोत्तम माना गया है।

सम्पूर्ण स्तोत्र पाठ | Complete Devi Aparadha Kshamapana Stotram Lyrics

॥ देव्यपराधक्षमापन स्तोत्रम् ॥


न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः ।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥ १ ॥

विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् ।
तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ २ ॥

पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः ।
मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ ३ ॥

जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ ४ ॥

परित्यक्ता देवा विविधविधसेवाकुलतया मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि ।
इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥ ५ ॥

श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरानिरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः ।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥ ६ ॥

चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः ।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥ ७ ॥

न मोक्षस्याकांक्षा भवविभववाञ्छापि च न मे न विज्ञानापेक्षा भवति च न मे सुखनिमिषे ।
त्वत्पादाम्भोद्वन्द्वं मयि कुरु जननि तापिगतये कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ ८ ॥

दीनार्ताभित्राप्तोपसृष्टानां कारुण्येशि हरिष्यसि त्वमपरिहार्यमशुभं विभो ।
इदानीं मूढोऽहमपि च भवन्त्या समुपस्थितस्त्वत्पादाम्बुजं मयि कुरु जननि यथा तथा कुरु ॥ ९ ॥

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् ।
पूजाम् चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि ॥ १० ॥

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि ।
यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु तत् ॥ ११ ॥

मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद एवं श्लोकार्थ | Detailed Shlok Breakdown & Meaning

आदिशंकराचार्य द्वारा रचित प्रत्येक श्लोक का अर्थ गहन दार्शनिक और भावनात्मक धरातल पर है। आइए एक-एक श्लोक के भाव को समझें:

श्लोक 1: मन्त्र-यन्त्र अज्ञान और मातहत शरणागति

पदच्छेद: न मन्त्रं न च यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिम् अहो न च आह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः। न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं परं जाने मातः त्वद्-अनुसरणं क्लेशहरणम्॥

भावार्थ: हे माता! मैं न तो किसी प्रकार के मंत्र को जानता हूँ, न यंत्र को और न ही आपकी स्तुति करने की कला से परिचित हूँ। मुझे न तो आपका आह्वान करना आता है, न ध्यान लगाना और न ही स्तुति की कथाएँ याद हैं। न मैं आपकी मुद्राओं को जानता हूँ और न ही करुणापूर्ण विलाप करना आता है। मैं तो केवल इतना जानता हूँ कि हे मात! आपकी शरण में आना ही मेरे समस्त क्लेशों और दुखों का नाश करने वाला है। (अधिक जानकारी के लिए हमारे देवी स्तोत्र संग्रह लेख को पढ़ें)।

श्लोक 2: अज्ञान और आलस्य जनित अपराधों के लिए क्षमा

पदच्छेद: विधेः अज्ञानेन द्रविण-विरहेण आलसतया विधेय-अशक्यत्वात् तव चरणयोः या च्युतिः अभूत। तद् एतत् क्षन्तव्यं जननि सकल-उद्धारिणि शिवे कुपुत्रः जायेत क्वचिद् अपि कुमाता न भवति॥

भावार्थ: हे समस्त संसार का उद्धार करने वाली और कल्याणकारी शिवे (माता पार्वती)! विधिके अज्ञान के कारण, धन के अभाव के कारण, आलस्य के कारण अथवा सेवा कार्य में असमर्थता के कारण आपके चरणों की सेवा में जो भूल (च्युति) हुई है, हे जननी! उस सबको क्षमा कीजिए। पुत्र कुपुत्र हो सकता है, परंतु माता कभी भी कुमाता नहीं हो सकती।

श्लोक 3: संतानों में चंचलता और माता की ममता

पदच्छेद: पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः परं तेषां मध्ये विरलतरलः अहं तव सुतः। मदीयः अयं त्यागः समुचितम् इदं नो तव शिवे कुपुत्रः जायेत क्वचिद् अपि कुमाता न भवति॥

भावार्थ: हे माता! इस पृथ्वी पर आपके बहुत से सीधे-सादे पुत्र हैं, परंतु उन सबकी तुलना में आपका यह पुत्र कुछ अधिक ही चंचल और हठीला है। ऐसी स्थिति में हे शिवे! यदि आप मेरा त्याग कर दें, तो क्या यह आपके लिए उचित होगा? कदापि नहीं! क्योंकि पुत्र चाहे कितना भी बुरा हो जाए, माता कभी कुमाता नहीं बनती।

श्लोक 4: सेवा और धनहीनता का निवेदन

पदच्छेद: जगन्मातः मातः तव चरणसेवा न रचिता न च दत्तं देवि द्रविणम् अपि भूयः तव मया। तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत् प्रकुरुषे कुपुत्रः जायेत क्वचिद् अपि कुमाता न भवति॥

भावार्थ: हे जगत् की माता! मैंने न तो कभी आपके चरणों की विधिपूर्वक सेवा की है और न ही आपको कभी अधिक धन या भेंट अर्पित की है। इसके बावजूद आप मुझ पर जो अनुपम स्नेह बरसाती हैं, उसका कारण यही है कि पुत्र कुपुत्र हो सकता है, लेकिन माता कभी कुमाता नहीं होती।

श्लोक 5: वृद्धावस्था और निरालंब अवस्था की पुकार

पदच्छेद: परित्यक्ता देवा विविध-विध-सेवा-कुलतया मया पञ्चाशीतेः अधिकम् अपनीते तु वयसि। इदानीं चेत् मातः तव यदि कृपा न अपि भविता निरालम्बः लम्बोदर-जननि कं यामि शरणम्॥

भावार्थ: हे लम्बोदर (गणेश) की जननी! पचासी वर्ष से अधिक आयु हो जाने पर जीवन की विभिन्न व्यस्तताओं और असमर्थता के कारण मैंने अन्य देवी-देवताओं की उपासना छोड़ दी है। अब यदि इस अवस्था में भी हे माता! आपकी मुझ पर कृपा नहीं हुई, तो इस निरालंब अवस्था में मैं किसकी शरण में जाऊँगा?

श्लोक 6: भगवती के नाम जप का अचिंत्य प्रभाव

पदच्छेद: श्वपाकः जल्पाकः भवति मधुपाकोपम-गिरा निरातङ्कः रङ्कः विहरति चिरं कोटि-कनकैः। तव अपर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलम् इदं जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ॥

भावार्थ: हे अपर्णा! आपके बीज मंत्र या नाम के कान में पड़ते ही चाण्डाल भी शहद जैसी मीठी वाणी बोलने वाला वक्ता बन जाता है, और दरिद्र व्यक्ति भी करोड़ों स्वर्ण मुद्राओं के साथ निर्भय होकर विचरता है। हे जननी! आपके जप-विधान में जपनीय मंत्र का वास्तविक प्रभाव कितना महान है, इसे कौन जान सकता है?

श्लोक 7: भगवान शिव के कल्याणकारी स्वरूप की महिमा

पदच्छेद: चिताभस्म-आलेपो गरलम् अशनं दिक्पटधरः जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः। कपाली भूतेषो भजति जगदीशैक-पदवीं भवानि त्वत्-पाणिग्रहण-परिपाटी-फलम् इदम्॥

भावार्थ: हे भवानी! जो पशुपति शिव अपने अंगों में चिता की भस्म लगाए रहते हैं, विष जिनका भोजन है, जो दिशाओं को ही वस्त्र मानते हैं, जटाधारी हैं, जिनके गले में सर्पराज का हार है और जो कपाल धारण करने वाले तथा भूतों के ईश हैं—वे भी आज जो 'जगदीश' की पदवी पर सुशोभित हैं, यह सब आपकी पाणिग्रहण (विवाह) की पवित्र परंपरा और प्रभाव का ही फल है। (इस प्रसंग की गहराई को समझने के लिए हमारे शिव तांडव स्तोत्र पाठ का संदर्भ लें)।

श्लोक 8: मोक्ष और वैभव की अभिलाषा से परे केवल भक्ति की कामना

पदच्छेद: न मोक्षस्य आकांक्षा भव-विभव-वाञ्छा अपि च न मे न विज्ञान-अपेक्षा भवति च न मे सुख-निमिषे। त्वत्-पाद-अम्बुज-द्वन्द्वं मयि कुरु जननि ताप-हरतये कुपुत्रः जायेत क्वचिद् अपि कुमाता न भवति॥

भावार्थ: हे माता! न तो मुझे मोक्ष की कोई आकांक्षा है, न ही संसार के ऐश्वर्य और वैभव की कोई इच्छा है। न ही मुझे ज्ञान की कोई विशेष अपेक्षा है और न ही पल भर के सुख की कामना है। हे जननी! मेरे समस्त संतापों को हरने के लिए आप बस अपने दोनों चरण-कमल मेरे हृदय में स्थापित कर दीजिए, क्योंकि पुत्र कुपुत्र हो सकता है पर माता कभी कुमाता नहीं होती।

श्लोक 9: शरणागत की रक्षा और करुणामयी पुकार

पदच्छेद: दीन-आर्त-भित्त-प्राप्त-उपसृष्टानां कारुण्येशि हरिष्यसि त्वम् अपरिहार्यम् अशुभं विभो। इदानीं मूढः अहम् अपि च भवन्त्या समुपस्थितः त्वत्-पाद-अम्बुजं मयि कुरु जननि यथा तथा कुरु॥

भावार्थ: हे करुणा की स्वामिनी! दीन, दुखी, भयभीत और संकट में पड़े लोगों के अपरिहार्य अशुभ और दुखों को आप हर लेती हैं। अब मैं भी अज्ञान और मूढ़ता से घिरा हुआ आपकी शरण में उपस्थित हूँ। हे जननी! मेरे इन चरणों में अपने कमलवत चरण रख दीजिए, अब आप जैसा उचित समझें वैसा करें।

श्लोक 10 और 11: क्षमा प्रार्थना और समर्पण

पदच्छेद: आह्वानं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजाम् चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि॥ मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि। यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु तत्॥

भावार्थ: हे परमेश्वरि! मैं न तो आपको बुलाना (आह्वान) जानता हूँ, न विदा करना (विसर्जन) और न ही पूजा की विधि जानता हूँ। मेरे इन सभी अपराधों को क्षमा करें। हे सुरेश्वरि! मंत्रहीन, क्रियाहीन और भक्तिहीन जो कुछ भी पूजा मैंने की है, हे देवी! वह आपकी कृपा से परिपूर्ण हो जाए।

शंकराचार्य रचित देव्यपराधक्षमापन स्तोत्रम् का आध्यात्मिक महत्व एवं दर्शन

आदिशंकराचार्य जी केवल अद्वैत वेदांत के महान प्रणेता ही नहीं थे, बल्कि वे माँ जगदंबा के अनन्य उपासक भी थे। उनके द्वारा रचित इस स्तोत्र में अद्वैत दर्शन और भक्ति का एक अद्वितीय समन्वय देखने को मिलता है। यद्यपि ज्ञानी पुरुष ब्रह्म को निर्गुण निराकार मानते हैं, परंतु जब वह साधक के रूप में माँ के चरणों में आते हैं, तो संपूर्ण दार्शनिक औपचारिकताएं प्रेम और समर्पण के आगे नतमस्तक हो जाती हैं।

इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह साधक को आत्म-स्वीकृति (Self-Acceptance) की प्रेरणा देता है। मनुष्य अपनी कमियों, अज्ञान और कमजोरियों को बिना किसी संकोच के माँ के सामने स्वीकार करता है। यह मनोवैज्ञानिक रूप से भी बहुत शक्तिशाली है, क्योंकि जब कोई व्यक्ति अपनी गलतियों को पूरी ईमानदारी से स्वीकार कर लेता है, तो उसके भीतर का अहंकार पूरी तरह समाप्त हो जाता है और भगवती की करुणा का अवतरण सहज रूप से होने लगता है।

संस्कृत शब्द / पंक्ति पद-विच्छेद सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
न मन्त्रं नो यन्त्रम् न मन्त्रं न च यन्त्रम् न मंत्र जानता हूँ, न यंत्र बाह्य कर्मकांडों से परे शुद्ध आंतरिक भाव की प्रधानता
कुपुत्रो जायेत कुपुत्रः जायेत पुत्र कुपुत्र हो सकता है साधक की अपनी कमियों और भूलों की स्वीकृति
कुमाता न भवति कुमाता न भवति माता कभी कुमाता नहीं होती माँ की अहेतुकी करुणा और वात्सल्य
त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् त्वद्-अनुसरणं क्लेश-हरणम् आपका अनुसरण ही क्लेशों का नाशक है शरणागति (Surrender) का सर्वोच्च मार्ग
चिदाभस्मालेपो चिताभस्म-आलेपो चिता की भस्म लगाने वाले भगवान शिव के वैराग्यमय स्वरूप की महिमा

पाठ विधि, नियम एवं शुभ मुहूर्त

देव्यपराधक्षमापन स्तोत्रम् का पाठ किसी भी दिन विशेषकर मंगलवार, शुक्रवार, अष्टमी, नवमी अथवा नवरात्रि के पावन दिनों में अत्यंत फलदायी माना जाता है। इसकी पाठ विधि निम्नलिखित है:

  • शुद्धता एवं आसन: प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत्त होकर लाल या पीले रंग के आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • दीप प्रज्वलन: माँ दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर के समक्ष शुद्ध घी का दीपक और धूप प्रज्वलित करें।
  • संकल्प: माँ को कुमकुम, अक्षत, लाल पुष्प और श्रृंगार सामग्री अर्पित करें। अपने मन में अपनी भूलों के लिए क्षमा मांगते हुए पाठ का संकल्प लें।
  • नियमित पाठ: इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन कम से कम एक बार या नवरात्रि के दिनों में तीन से ग्यारह बार अवश्य करना चाहिए। पाठ के अंत में दुर्गा माता की आरती अवश्य गाएं (विस्तृत विधि के लिए श्री दुर्गा चालीसा मार्गदर्शिका देखें)।

एक नजर में देव्यपराधक्षमापन स्तोत्रम् की जानकारी (Quick Information)

विवरण तथ्य
स्तोत्र का नाम देव्यपराधक्षमापन स्तोत्रम् (Devi Aparadha Kshamapana Stotram)
रचियता आदिगुरु शंकराचार्य (Adi Shankaracharya)
मुख्य देवता माँ दुर्गा / भगवती जगदम्बा / आदिशक्ति
भाषा संस्कृत (देवनागरी लिपि)
प्रमुख रस / भाव भक्ति, वात्सल्य, शरणागति, दैन्य भाव एवं क्षमा प्रार्थना
उपयोग का अवसर नवरात्रि, दुर्गा पूजा, दैनिक संध्या वंदना एवं संकट निवारण
मुख्य संदेश माँ की असीम ममता और साधक की निष्कपट शरणागति

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

देव्यपराधक्षमापन स्तोत्रम् के रचयिता अद्वैत वेदांत के महान संस्थापक और प्रकाण्ड विद्वान आदिगुरु शंकराचार्य जी हैं।

इस प्रसिद्ध पंक्ति का अर्थ है कि पुत्र चाहे कितना भी दुष्ट, नासमझ या कुपुत्र क्यों न हो जाए, परंतु माता कभी भी अपने बच्चे के प्रति कुमाता (क्रूर या त्यागने वाली) नहीं होती। माँ का हृदय हमेशा क्षमाशील और वात्सल्य से परिपूर्ण रहता है।

इस स्तोत्र के पाठ से जाने-अनजाने में हुए पापों और पूजा की त्रुटियों से मुक्ति मिलती है, मन को असीम शांति प्राप्त होती है, और माता भगवती की विशेष कृपा तथा करुणा की प्राप्ति होती है।

हाँ, इस स्तोत्र का पाठ दैनिक पूजा के समय या विशेषकर संध्या वंदना के दौरान करना अत्यंत कल्याणकारी और मानसिक शांति प्रदान करने वाला माना गया है।

नहीं, इस स्तोत्र के पाठ के लिए किसी भी प्रकार की कठिन दीक्षा की आवश्यकता नहीं है। इसे कोई भी भक्त शुद्ध भाव, श्रद्धा और भक्ति के साथ पढ़ सकता है।

नवरात्रि के नौ दिनों में माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की आराधना की जाती है। इस दौरान यदि पूजा में कोई त्रुटि रह जाए, तो उसकी पूर्णता और क्षमा के लिए इस स्तोत्र का पाठ अनिवार्य माना जाता है।

हाँ, स्तोत्र के अंतिम श्लोकों में "आवाहनं न जानामि..." कहकर अपनी समस्त भूलों के लिए क्षमा मांगना पूजा की संपूर्णता के लिए आवश्यक माना गया है।

सातवें श्लोक में आचार्य शंकराचार्य ने बताया है कि चिता भस्म लगाने वाले और वैरागी भगवान शिव को जो 'जगदीश' की पदवी प्राप्त हुई है, वह माता भवानी के साथ उनके पाणिग्रहण (विवाह) और माँ की कृपा का ही फल है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह सामग्री वैदिक परंपरा, सनातन ग्रंथों और आदिगुरु शंकराचार्य की स्तोत्र परंपरा के अध्ययन पर आधारित है। पाठकों की सुविधा के लिए इसमें मूल संस्कृत पाठ के साथ पदच्छेद, सरल हिंदी अर्थ और दार्शनिक व्याख्या को जोड़ा गया है ताकि हर साधक इसका सही उच्चारण और भाव समझ सके। यह पेज संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत प्रकाशित किया गया है।

स्रोत एवं संदर्भ

  • आदिगुरु शंकराचार्य कृत - बृहत्स्तोत्ररत्नाकर
  • देवी भागवत पुराण एवं मार्कण्डेय पुराण (दुर्गा सप्तशती संदर्भ)
  • सनातन धर्म की मौखिक एवं पारंपरिक स्तोत्र पाठ परंपरा

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 04 Nov 2026

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