भक्ति काव्य व भजन बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

ममता मई माँ हे जगदम्बे मेरे घर भी आ जाओ लिरिक्स भजन इन हिंदी

ममता मई माँ हे जगदम्बे मेरे घर भी आ जाओ भजन के भावपूर्ण लिरिक्स और अर्थ पढ़ें। माँ दुर्गा की भक्ति और कृपा पाने के लिए इस पावन भजन का पाठ करें।

ममता मई माँ हे जगदम्बे मेरे घर भी आ जाओ भजन परिचय एवं आध्यात्मिक महत्व

भक्ति और समर्पण की अनूठी सरिता में गोता लगाते हुए, 'ममता मई माँ हे जगदम्बे मेरे घर भी आ जाओ' भजन जगत जननी माँ आदिशक्ति अम्बे भवानी की असीम कृपा प्राप्त करने का एक अत्यंत पावन और भावपूर्ण माध्यम है। हिंदू सनातन परंपरा में आदिशक्ति माँ दुर्गा को संपूर्ण चराचर जगत की माता, करुणा की मूरत और भक्तों के सभी संकटों को हरने वाली महामाया के रूप में पूजा जाता है। यह भजन साधक के हृदय की उस अकुलाहट और व्याकुलता को व्यक्त करता है, जो अपनी माता के दर्शन और उनके सानिध्य को पाने के लिए निरंतर लालायित रहता है। जब भक्त संसार के दुखों और प्रपंचों से विरक्त होकर अपनी करुण पुकार माँ के चरणों में अर्पित करता है, तो माँ जगदम्बे अवश्य ही उसकी पुकार सुनती हैं। इस भजन का मुख्य भाव विरह, अगाध प्रेम, अटूट विश्वास और शरणागति (शरणागति भाव) का है, जो सुनने वाले के मन को पूरी तरह से निर्मल और भक्तिमय बना देता है। नवरात्रि, विशेष पूजा, माता के जागरण, संडे सत्संग या दैनिक संध्या वंदन के समय इस भजन का गायन या श्रवण करने से घर-परिवार में सकारात्मक ऊर्जा, सुख-शांति और महालक्ष्मी-महाकाली-महासरस्वती की संयुक्त कृपा का वास होता है। इस लेख में हम इस पावन भजन के सम्पूर्ण लिरिक्स, शब्दार्थ, भावार्थ और इसके गायन से मिलने वाले आध्यात्मिक लाभों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ माँ जगदम्बे के इस पावन भजन का स्मरण करें:


ममता मई माँ हे जगदम्बे, मेरे घर भी आ जाओ,
भाग्य उदय हो जाये हमारा, अपने दरश दिखा जाओ।
ममता मई माँ हे जगदम्बे, मेरे घर भी आ जाओ......॥

देर करो ना आज भवानी, सफल करो माता जिंदगानी,
मेरे मन को निर्मल कर दो, भक्ति भाव जगा जाओ।
ममता मई माँ हे जगदम्बे, मेरे घर भी आ जाओ......॥

तरस रहे हैं नैन हमारे, बाट निहारत साँझ सकारे,
दीप द्वारे रख मै बैठी, अपनी ज्योत जगा जाओ।
ममता मई माँ हे जगदम्बे, मेरे घर भी आ जाओ......॥

ये बेनाम शरण तेरी आई, हम पर भी माँ हो करुनायी,
आँगन बिन माता लागे सूना, अमृत रास बरसा जाओ।
ममता मई माँ हे जगदम्बे, मेरे घर भी आ जाओ......॥

ममता मई माँ हे जगदम्बे, मेरे घर भी आ जाओ,
भाग्य उदय हो जाये हमारा, अपने दरश दिखा जाओ।
ममता मई माँ हे जगदम्बे, मेरे घर भी आ जाओ......!!

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि एक दुखी और आर्त भक्त की अपनी जननी के प्रति लगाई गई पुकार है। पहले पद में भक्त माँ को 'ममतामयी' कहकर संबोधित करता है, जिसका अर्थ है कि हे माँ, आप ममता और वात्सल्य की सागर हैं। संसार के सभी रिश्तों में स्वार्थ हो सकता है, परंतु माँ का प्रेम निस्वार्थ होता है। भक्त प्रार्थना करता है कि हे जगदम्बे! आप मेरे घर भी पधारिए, जिससे मेरा सोया हुआ भाग्य जागृत हो जाए और मुझे आपके अलौकिक दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हो सके।

दूसरे और तीसरे अंतरे में भक्त अपनी उत्कण्ठा को प्रकट करते हुए कहता है कि हे भवानी! अब आने में और अधिक देर मत कीजिए। मेरी इस नश्वर जिंदगी को सफल बना दीजिए। मेरे मन के विकारों, अहंकार और मैल को दूर करके इसे पूरी तरह से निर्मल कर दीजिए और मेरे भीतर अपनी भक्ति का अखंड दीप प्रज्वलित कर दीजिए। भक्त की आँखें माँ के दर्शन के लिए तरस रही हैं और वह सुबह-शाम (साँझ सकारे) निरंतर माँ की राह देख रहा है। उसने अपने घर की देहरी पर श्रद्धा का दीप जला रखा है और विनती कर रहा है कि हे माँ! आकर अपनी ज्योति से मेरे जीवन को प्रकाशित कर दीजिए।

अंतिम चरण में भक्त अपने आपको 'बेनाम' (अज्ञात, शरणार्थी, या समर्पित दीन-हीन) बताते हुए कहता है कि मैं आपकी शरण में आया हूँ। हे माँ अम्बे! हम जैसे पापी और दीन-हीन बालकों पर अपनी करुणा की वर्षा कीजिए। आपके बिना मेरा यह गृह-आँगन बिल्कुल सूना और वीरान सा प्रतीत होता है। मेरे जीवन में अपनी कृपा का अमृत रस बरसाकर इसे तृप्त कर दीजिए।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सरलता, मार्मिकता और सहज भावभंगिमा है। कोई भी साधारण गृहस्थ, महिला या बच्चा इसे बहुत ही आसानी से सुर-ताल में गा सकता है। इस भजन का महत्व इस बात में है कि यह व्यक्ति को भौतिक संसार की चिंताओं से मुक्त करके आंतरिक शांति और माँ के प्रति समर्पण की भावना से भर देता है। सनातन संस्कृति में माँ के आगमन को समृद्धि, पवित्रता और शुभता का प्रतीक माना जाता है। नियमित रूप से इस भजन को गाने से मन का संताप दूर होता है और घर का वातावरण पवित्र बनता है। इसके साथ ही आप आध्यात्मिक ऊर्जा को और अधिक गहरा करने के लिए श्री हनुमान चालीसा और दुर्गा सप्तशती के पावन पाठ का भी स्मरण कर सकते हैं।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस दिव्य भजन का गायन विशेष अवसरों के साथ-साथ दैनिक जीवन में भी किया जा सकता है:

  • प्रातःकाल एवं संध्या वंदन: सुबह स्नान के पश्चात पूजा घर में दीप प्रज्वलित करते समय या संध्या बेला में माँ की आरती के पूर्व इस भजन को गाना अत्यंत फलदायी होता है।
  • नवरात्रि के पावन दिन: शारदीय और चैत्र नवरात्रि के नौ दिनों में माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों के आह्वान के समय इस भजन का सामूहिक या एकांत गान विशेष रूप से लाभकारी है।
  • माता का जागरण एवं चौकी: घर पर होने वाले देवी अनुष्ठान, माता की चौकी या संकीर्तन के समय मुख्य वंदना के रूप में इसे गाया जाता है।
  • शुक्रवार या मंगलवार की पूजा: माँ भगवती को समर्पित इन वारों पर विशेष रूप से इस भजन का अभ्यास मन को एकाग्र करता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन की केंद्र बिंदु माँ जगदम्बे यानी आदिशक्ति माँ दुर्गा हैं, जिन्हें वेदों और पुराणों में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का समन्वित स्वरूप माना गया है। वह ब्रह्मांड की रचना, पालन और संहार करने वाली शक्ति हैं। इस प्रकार के पारंपरिक भजन पीढ़ियों से मौखिक परंपरा और संतों के संकीर्तन के माध्यम से आगे बढ़ते आए हैं, जो आम जनमानस को भक्ति मार्ग से जोड़ने का कार्य करते हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

भक्ति साहित्य की यह रचना लोक-संगीत और पारंपरिक हिंदी भजन शैली पर आधारित है। इसे किसी एक प्रसिद्ध रचनाकार की बपौती न मानकर जन-साधारण की उस परम भक्ति भावना का परिणाम माना जाता है जहाँ एक भक्त अपनी आराध्य देवी को अपने घर आने का निमंत्रण देता है। ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में महिलाओं द्वारा नवरात्रि के दिनों में या घरों में देवी स्थापना के समय इस प्रकार के भावपूर्ण गीतों को अत्यंत श्रद्धा के साथ गाया जाता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

यह भजन सरल, सुबोध और प्रवाहमयी सामान्य हिंदी और खड़ी बोली के संमिश्रण में रचा गया है। इसमें ब्रज और अवधी लोक-संस्कृति के प्रभाव भी स्पष्ट झलकता है। काव्य शैली के दृष्टिकोण से इसमें 'अनुप्रास' और 'रूपक' अलंकारों का सहज प्रयोग हुआ है जैसे 'ममतामयी माँ', 'अमृत रास' और 'ज्योत जगा जाओ'। शब्दों की सरलता ही इस भजन की सबसे बड़ी ताकत है जो सीधे हृदय को स्पर्श करती है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

इस भजन से हमें कई अमूल्य जीवन सीख मिलती हैं:

  1. निस्वार्थ शरणागति: भगवान या शक्ति के सामने अपने अहंकार को त्यागकर पूरी तरह से समर्पित हो जाना ही सच्ची भक्ति है।
  2. मन की निर्मलता: भौतिक सुख-सुविधाओं से अधिक आवश्यक है कि हमारा मन ईर्ष्या, द्वेष और विकारों से मुक्त होकर निर्मल बने।
  3. धैर्य और निरंतरता: जैसे भक्त 'साँझ सकारे' माँ की बाट जोहता है, वैसे ही हमें भी जीवन की कठिनाइयों में धैर्य नहीं खोना चाहिए और निरंतर अपने कर्म व ईश्वर स्मरण में लगे रहना चाहिए।
  4. परिवार में दिव्यता का वास: जब हम अपने घर को भक्तिमय बनाते हैं, तो वहाँ नकारात्मकता स्वतः समाप्त हो जाती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ संधर्भ / प्रसंग
ममतामयी प्रेम और वात्सल्य से परिपूर्ण माता का स्वभाव जो अपने बच्चों पर स्नेह बरसाता है
जगदम्बे जगत की अम्बा या माता माँ दुर्गा का संबोधन
जिंदगानी जीवन या मनुष्य योनि इस दुर्लभ मानव जीवन को सफल बनाने के संदर्भ में
बाट निहारत रास्ता देखना या प्रतीक्षा करना भक्त का माँ के दर्शन के लिए उत्सुक रहना
करुनायी कृपा करने वाली / दयालु माता की करुणा का गुणगान
अमृत रास अमृत का आनंद / रस आध्यात्मिक शांति और आनंद की प्राप्ति

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

पंक्ति: ममता मई माँ हे जगदम्बे मेरे घर भी आ जाओ...
भावार्थ: भक्त अपनी करुणा की सागर माँ से आर्त पुकार लगा रहा है कि हे संपूर्ण जगत की माँ, आप मेरे साधारण से घर को भी अपने चरणों की धूल से पवित्र कर दीजिए। आपके आगमन से मेरा भाग्य चमक उठेगा और मुझे आपके साक्षात दर्शन का सौभाग्य मिलेगा।

पंक्ति: देर करो ना आज भवानी, सफल करो माता जिंदगानी...
भावार्थ: भक्त कहता है कि हे भवानी! अब मेरी परीक्षा और अधिक मत लीजिए। मेरे इस जीवन को अपने सानिध्य से सार्थक कर दीजिए और मेरे मन के सभी मैल धोकर वहाँ अपनी शुद्ध भक्ति का दीप जला दीजिए।

पंक्ति: तरस रहे हैं नैन हमारे, बाट निहारत साँझ सकारे...
भावार्थ: मेरी आँखें आपके रूप की एक झलक पाने के लिए व्याकुल हैं। मैं सुबह और शाम निरंतर आपके आने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। मैंने अपने द्वार पर आपकी आराधना का दीप रख दिया है, हे माँ! आकर अपनी ज्योति से मेरे जीवन को प्रकाशित कर दो।

पंक्ति: ये बेनाम शरण तेरी आई, हम पर भी माँ हो करुनायी...
भावार्थ: यह अनाथ या संसार में अपनी पहचान खो चुका यह भक्त आपकी शरण में आया है। हम जैसे दीन-दुखियों पर भी अपनी कृपा की दृष्टि डालिए। आपके बिना मेरा यह घर-आँगन सूना और वीरान है, इस पर अपनी कृपा का अमृत बरसा दीजिए।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के साथ-साथ निम्नलिखित पावन मंत्र का स्मरण करना अत्यंत फलदायी होता है:

ॐ सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

अर्थात्: हे नारायणी! आप सब प्रकार का मंगल करने वाली मंगलमयी हैं, आप ही कल्याणकारी शिवरूपा हैं, सब प्रकार के पुरुषों को सिद्ध करने वाली तथा शरणागत की रक्षा करने वाली तीन नेत्रों वाली गौरी हैं, आपको हमारा नमस्कार है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम ममता मई माँ हे जगदम्बे मेरे घर भी आ जाओ
आराध्य देवी माँ जगदम्बे / माँ दुर्गा / आदिशक्ति
रचनाकार / परंपरा पारंपरिक भक्ति साहित्य / लोक भजन
भाषा सरल हिंदी / खड़ी बोली
मुख्य थीम भक्ति, वात्सल्य, शरणागति और दर्शन की लालसा
प्रमुख भाव विरह, समर्पण और विनय
उपयुक्त अवसर नवरात्रि, माता की चौकी, संध्या आरती और दैनिक पूजा

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन जगत जननी, आदिशक्ति, महामाया माँ दुर्गा (जगदम्बे) को समर्पित है।

इस भजन को प्रातःकाल पूजा के समय, संध्या वंदन के दौरान, या विशेषकर नवरात्रि के दिनों में गाना सबसे उत्तम माना जाता है।

इस भजन का मुख्य संदेश माँ के प्रति निस्वार्थ प्रेम, मन की निर्मलता और अपनी संपूर्ण अहंभाव को छोड़कर माता की शरण में जाना है।

हाँ, यह भजन माता की चौकी, जागरण और संकीर्तन के लिए अत्यंत लोकप्रिय और उपयुक्त है।

इसके निरंतर गायन और श्रवण से मानसिक शांति मिलती है, घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और माँ जगदम्बे की असीम कृपा प्राप्त होती है।

नहीं, इस भजन की भाषा अत्यंत सरल हिंदी और लोक-बोली है, जिसे हर उम्र के लोग आसानी से समझ सकते हैं।

भजन में 'तरस रहे हैं नैन हमारे, बाट निहारत साँझ सकारे' पंक्तियों के माध्यम से दर्शन की व्याकुलता को बहुत ही सुंदर ढंग से दर्शाया गया है।

बिल्कुल, आप इस भजन के साथ दुर्गा चालीसा, महिषासुरमर्दिनि स्तोत्र या अर्गला स्तोत्र का पाठ भी कर सकते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख भक्तिलोक (Bhaktilok) के संपादकीय मानकों के अनुरूप पारंपरिक स्रोतों, लोक-साहित्य और सनातन धर्म की मान्यताओं के आधार पर तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों को शुद्ध लिरिक्स, प्रामाणिक अर्थ और गहरा आध्यात्मिक दृष्टिकोण प्रदान करना है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत इस प्रविष्टि को नियमित रूप से अपडेट किया जाता है ताकि उपयोगकर्ताओं को सर्वोत्तम अनुभव मिल सके।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • सनातन पौराणिक ग्रंथ एवं दुर्गा सप्तशती परंपरा
  • पारंपरिक लोक भजन एवं संकीर्तन संग्रह
  • वैदिक एवं पौराणिक देवी स्तुति ग्रंथ

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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