भारतीय संगीत और भक्ति परंपरा में वैराग्य, जीवन की नश्वरता और दार्शनिक सत्यों को उजागर करने वाले भजनों का एक विशिष्ट स्थान रहा है। प्रसिद्ध लोकगायक मास्टर राणा द्वारा गाया गया यह अमर भजन "जीते भी लकड़ी मरते भी लकड़ी देख तमाशा लकड़ी का" मानव जीवन के सबसे बड़े और शाश्वत सत्य—मृत्यु और नश्वरता—को अत्यंत सरल, मर्मस्पर्शी और झकझोर देने वाले रूपकों के माध्यम से प्रस्तुत करता है। इस भजन में 'लकड़ी' को मनुष्य के भौतिक शरीर, उसके अहंकार और संपूर्ण सांसारिक जीवन का प्रतीक बनाया गया है। जब मनुष्य जन्म लेता है तब से लेकर उसकी अंतिम यात्रा तक, लकड़ी किस प्रकार उसके जीवन का अभिन्न हिस्सा बनी रहती है, इसी का सजीव और काव्यात्मक वर्णन इस रचना में मिलता है। भक्तिकाल और लोक संगीत की इस अनमोल थाती के माध्यम से हम जीवन के उन गहरे रहस्यों को समझने का प्रयास करेंगे जो हमें भौतिक मोह-माया से ऊपर उठकर आत्मचिंतन की ओर प्रेरित करते हैं।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
स्थाई (मुखड़ा):
जीते भी लकड़ी, मरते भी लकड़ी,
देख तमाशा लकड़ी का!
लकड़ी का झूठा जग सारा,
लकड़ी का खेल पसारा रे भाई,
देख तमाशा लकड़ी का!
अंतरा 1:
पालना भी लकड़ी, खिलौना भी लकड़ी,
बचपन में खेले लकड़ी के घोड़े पर。
जवानी आई तो लकड़ी का मकान बना,
सोया जिस सेज पर, वो भी है लकड़ी की रचना रे भाई,
देख तमाशा लकड़ी का!
अंतरा 2:
वृद्ध अवस्था आई तो लकड़ी का सहारा,
हाथ में पकड़ाया छड़ी का किनारा।
चला जब संसार से तू अंतिम सफर पर,
कंधों पर उठी जो अर्थी, वो भी है लकड़ी की रे भाई,
देख तमाशा लकड़ी का!
अंतरा 3:
पहुंचा श्मशान जब नश्वर शरीर यह,
चिता भी जली तो लकड़ी के ही नीर पर।
राजा हो या रंक, सब राख हो गए,
अंत में बची जो मुट्ठी भर राख, वो भी है लकड़ी का प्रताप रे भाई,
देख तमाशा लकड़ी का!
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
मास्टर राणा द्वारा स्वरबद्ध यह भजन केवल एक गीत नहीं, बल्कि मानव जीवन का संपूर्ण दर्शन है। भजन की मुख्य पंक्ति "जीते भी लकड़ी, मरते भी लकड़ी" यह स्पष्ट करती है कि मनुष्य का पूरा जीवन जड़ पदार्थों और विशेषकर लकड़ी (प्रकृति के तत्वों) के इर्द-गिर्द घूमता है। जन्म के समय बच्चे का पालना लकड़ी का होता है, खेलने के साधन लकड़ी के होते हैं, जीवनयापन के लिए घर और फर्नीचर लकड़ी के बनते हैं, और बुढ़ापे में चलने के लिए बैसाखी या छड़ी भी लकड़ी की ही होती है।
कवि और गायक यह समझाना चाहते हैं कि इंसान जिस भौतिक शरीर और संपत्ति पर इतना गर्व करता है, अंततः वह भी पंचतत्वों में विलीन हो जाता है। मृत्यु के पश्चात जब शरीर को श्मशान ले जाया जाता है, तब काठ (लकड़ी) की ही अर्थी बनती है और उसी लकड़ी की चिता पर शरीर को अग्नि दी जाती है। यह भजन हमें यह सीख देता है कि जीवन का यह सारा तमाशा केवल माया का विस्तार है। जिस प्रकार कठपुतली के खेल में लकड़ी की गुड़िया नाचती है, उसी प्रकार यह शरीर भी प्रकृति की डोर से बंधा हुआ नाच रहा है। इस गहरे भाव को समझकर जो मनुष्य अहंकार का त्याग करता है, वही वास्तविक शांति को प्राप्त करता है। भगवान शिव का तांडव स्तोत्र भी हमें इसी नश्वरता और ब्रह्मांडीय सत्य का बोध कराता है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
- दार्शनिक गहराई: यह भजन अद्वैत वेदांत और वैराग्य के सिद्धांतों को बहुत ही सरल लोक भाषा में प्रस्तुत करता है।
- जीवन का यथार्थ: यह मनुष्य को उसके अहंकार, घमंड और मोह से मुक्त कराने का एक शक्तिशाली माध्यम है।
- लोक संगीत की शैली: मास्टर राणा की जादुई आवाज और पारंपरिक लोक धुनों का मिश्रण श्रोता के मन पर सीधा प्रभाव डालता है।
- वैराग्य भावना: सांसारिक दुखों और असफलताओं से विचलित हुए बिना जीवन के अंतिम सत्य को स्वीकार करने की प्रेरणा देता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस प्रकार के दार्शनिक और वैराग्य प्रधान भजनों को सुनने का कोई विशेष नियम या पाबंदी नहीं होती, परंतु इन्हें एकांत में, सुबह के शांत वातावरण में या संध्याकाल के समय सुनना सबसे अधिक फलदायी माना जाता है।
- सत्संग और सभाएं: धार्मिक सत्संग, रात्रिकालीन जागरण या आध्यात्मिक सम्मेलनों में इस भजन का गायन विशेष रूप से किया जाता है।
- आत्मचिंतन के समय: जब व्यक्ति मानसिक तनाव या जीवन की अनिश्चितताओं से घिरा हो, तब इस भजन का श्रवण मन को अत्यधिक शांति और स्थिरता प्रदान करता है।
- मानसिक तैयारी: इसे सुनते समय आंखें बंद कर अपने भीतर झांकने और जीवन के वास्तविक उद्देश्यों को पुनरावलोकन करने का अभ्यास करना चाहिए।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन किसी एक विशिष्ट देवता की स्तुति न होकर संपूर्ण सनातन दर्शन और भगवान शिव के उस रूप से जुड़ा है जो श्मशान के वासी हैं और जीवन-मृत्यु के चक्र के स्वामी हैं। संकटमोचन हनुमान जी और महाकाल शिव की आराधना करने वाले साधक इस प्रकार के भजनों के माध्यम से मोह-माया के बंधनों को काटते हैं। संत कबीर, गुरु नानक देव और दादू दयाल जैसे संतों की वाणी में भी शरीर को 'काठ' या 'कच्चा घड़ा' कहा गया है, जिसकी गूंज इस भजन में स्पष्ट सुनाई देती है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
लोक संगीत की दुनिया में मास्टर राणा का नाम अत्यंत आदर के साथ लिया जाता है। उन्होंने गुजरात और उत्तर भारत के लोक संगीत को एक नई दिशा दी है। उनके गाए हुए भजन सामाजिक संदेश, नैतिकता और आध्यात्मिक चेतना से परिपूर्ण होते हैं। 'जीते भी लकड़ी मरते भी लकड़ी' उनकी सबसे लोकप्रिय और विचारोत्तेजक प्रस्तुतियों में से एक है, जिसे पीढ़ियों से सुना और सराहा जा रहा है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा बहुत ही सरल, सहज और ग्रामीण आंचल से जुड़ी हुई हिंदी और लोकबोली का मिश्रण है। इसमें रूपक अलंकार (Metaphor) का अत्यंत सुंदर प्रयोग किया गया है। 'लकड़ी' शब्द को एक केंद्रीय प्रतीक के रूप में उपयोग करके जीवन के सभी चरणों—बाल्यकाल, युवावस्था, वृद्धावस्था और अंततः मृत्यु—को एक ही सूत्र में पिरोया गया है। यह शैली आम जनमानस के हृदय को तुरंत स्पर्श करती है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
- अहंकार का त्याग: भौतिक शरीर और धन-दौलत नश्वर हैं, इसलिए किसी भी बात का अहंकार नहीं करना चाहिए।
- कर्म की प्रधानता: जीवन सीमित है, इसलिए अच्छे कर्म करना ही मनुष्य का एकमात्र धर्म होना चाहिए।
- मोह का बंधन तोड़ना: सांसारिक रिश्तों और वस्तुओं से अत्यधिक मोह दुख का कारण बनता है।
- सत्य की स्वीकारोक्ति: मृत्यु जीवन का अंतिम और अकाट्य सत्य है, जिससे भयभीत होने के बजाय इसे स्वीकार करना चाहिए।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल अर्थ | संदर्भ / भाव |
|---|---|---|
| लकड़ी (काठ) | भौतिक अस्तित्व, शरीर | मानव शरीर की नश्वरता का प्रतीक |
| तमाशा | खेल, माया | संसार की असारता और दिखावा |
| झूठा जग सारा | अस्थाई संसार | मायावती और नाशवान दुनिया |
| अर्थी | शव ले जाने का साधन | अंतिम यात्रा की लकड़ी |
| चिता | अग्नि संस्कार का स्थान | जीवन का अंतिम पड़ाव |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"जीते भी लकड़ी, मरते भी लकड़ी, देख तमाशा लकड़ी का!"
इस पंक्ति का भाव यह है कि मनुष्य का जन्म से लेकर मरण तक का संपूर्ण सफर लकड़ी यानी प्रकृति के तत्वों पर ही निर्भर है। यह जीवन एक नाटक या तमाशे के समान है, जहाँ सब कुछ कृत्रिम और नश्वर है।
"पालना भी लकड़ी, खिलौना भी लकड़ी, बचपन में खेले लकड़ी के घोड़े पर।"
जीवन के शुरुआती दौर में बच्चा जिस पालने में झूलता है और जिन खिलौनों से खेलता है, वे लकड़ी के बने होते हैं। यह इस बात का संकेत है कि अज्ञानता के बाल्यकाल से ही हमारा संबंध जड़ पदार्थों से जुड़ जाता है।
"चला जब संसार से तू अंतिम सफर पर, कंधों पर उठी जो अर्थी, वो भी है लकड़ी की..."
जब मनुष्य की सांसारिक यात्रा समाप्त होती है और प्राण शरीर को छोड़ देते हैं, तब उसके शरीर को श्मशान ले जाने के लिए जो अर्थी बनाई जाती है, वह भी सूखी लकड़ी की ही होती है। यह जीवन की सबसे बड़ी विडंबना और सच्चाई है।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
इसके अतिरिक्त श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक इस भजन के भाव को पूर्णतः पुष्ट करता है:
"जातस्य हि ध्रुवो मृत्युध्रुवं जन्म मृतस्य च।"
(अर्थात: जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है, और जिसकी मृत्यु हुई है उसका पुनर्जन्म निश्चित है।)
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | जीते भी लकड़ी मरते भी लकड़ी देख तमाशा लकड़ी का |
|---|---|
| गायक (Singer) | मास्टर राणा (Master Rana) |
| संगीत शैली | लोक भजन / दार्शनिक गीत |
| भाषा | हिंदी / गुजराती मिश्रित लोकभाषा |
| मुख्य विषय | वैराग्य, जीवन की नश्वरता, मृत्यु सत्य |
| भाव (Bhava) | दार्शनिक, आत्मचिंतन, चेतना |
| उपयुक्त अवसर | सत्संग, एकांत चिंतन, वैराग्य चर्चा |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के विद्वान आचार्यों और संपादकीय टीम द्वारा इस भजन के लिरिक्स, दार्शनिक अर्थ और सांस्कृतिक महत्व का गहन विश्लेषण करके प्रस्तुत किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक autentic, उच्च गुणवत्ता वाली और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध सामग्री पहुँचाना है। किसी भी प्रकार के सुझाव या सुधार के लिए आप संपर्क कर सकते हैं।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- पारंपरिक भारतीय लोक संगीत और वैराग्य भजन परंपरा
- श्रीमद्भगवद्गीता - जीवन और मृत्यु का शाश्वत दर्शन
- लोक संत वाणी एवं दार्शनिक साहित्य
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