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नवग्रह शांति मंत्र लिरिक्स ( Navgrah Shanti Mantra Lyrics in Hindi ) - Brahma Murari Tripurantkari

पढ़ें नवग्रह शांति मंत्र लिरिक्स ( Navgrah Shanti Mantra Lyrics in Hindi ) - Brahma Murari Tripurantkari - Bhaktilok का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भा

भारतीय वैदिक ज्योतिष और सनातन धर्मग्रंथों में नवग्रहों की अनुकूलता और शांति के लिए 'ब्रह्मा मुरारी त्रिपुरान्तकारी' मंत्र को अत्यंत प्रभावशाली और कल्याणकारी माना गया है। यह दिव्य मंत्र न केवल कुंडली के ग्रह दोषों को शांत करता है, बल्कि साधक के जीवन में सुख, समृद्धि, मानसिक शांति और आध्यात्मिक चेतना का संचार भी करता है। जब हमारे जीवन में ग्रहों की स्थिति प्रतिकूल होती है, तो हमें विभिन्न प्रकार के शारीरिक, मानसिक और आर्थिक कष्टों का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में, इस महामंत्र का श्रद्धापूर्वक जप करने से नवग्रहों—सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु—की कृपा प्राप्त होती है। यह मंत्र हमें सृष्टि के त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) की शरण में ले जाकर समस्त ब्रह्मांडीय ऊर्जाओं को हमारे अनुकूल बनाने का मार्ग प्रशस्त करता है। इस विस्तृत लेख में हम इस मंत्र के शुद्ध पाठ, अर्थ, शास्त्रीय महत्व और जप की प्रामाणिक विधि का अध्ययन करेंगे।

मूल मंत्र एवं शुद्ध पाठ | Complete Mantra

ब्रह्मा मुरारी त्रिपुरान्तकारी भानुः शशि भूमि-सुतो बुधश्च।
गुरुश्च शुक्रः शनि राहु केतवः सर्वे ग्रहाः शान्ति करा भवन्तु॥

मंत्र उच्चारण एवं पद-विच्छेद | Mantra Pronunciation

संस्कृत मंत्रों के पूर्ण फल की प्राप्ति के लिए उनका शुद्ध उच्चारण अत्यंत आवश्यक है। इस मंत्र का पद-विच्छेद और उच्चारण निर्देश नीचे दिए गए हैं ताकि साधक बिना किसी त्रुटि के इसका पाठ कर सकें:

  • ब्रह्मा (Brah-ma): सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा का उच्चारण स्पष्ट और दीर्घ होना चाहिए।
  • मुरारी (Mu-raa-ree): भगवान विष्णु (मुर दैत्य के शत्रु) का नाम।
  • त्रिपुरान्तकारी (Tri-pu-raan-ta-kaa-ree): त्रिपुरासुर का वध करने वाले भगवान शिव।
  • भानुः (Bhaa-nuh): विसर्ग का उच्चारण हल्के 'ह' की ध्वनि के साथ करें।
  • शशि (Sha-shi): तालव्य 'श' का स्पष्ट उच्चारण करें।
  • भूमि-सुतो (Bhoo-mi Su-to): भूमि के पुत्र अर्थात् मंगल देव।
  • बुधश्च (Bu-dhash-cha): बुध और ('श्च' का उच्चारण संयुक्त रूप से करें)।
  • गुरुश्च शुक्रः (Gu-rush-cha Shuk-rah): देवगुरु बृहस्पति और दैत्यगुरु शुक्र।
  • शनि राहु केतवः (Sha-ni Raa-hu Ke-ta-vah): शनि, राहु और केतु देव।
  • सर्वे ग्रहाः (Sar-ve Gra-haah): सभी ग्रह।
  • शान्ति करा भवन्तु (Shaan-ti Ka-raa Bha-van-tu): मेरे लिए शांति प्रदान करने वाले हों।

विस्तृत शब्दार्थ एवं पद-विच्छेद | Word-by-word Meaning

मंत्र के प्रत्येक शब्द का गहन अर्थ समझने से साधक की श्रद्धा और एकाग्रता में वृद्धि होती है। नीचे दी गई तालिका में प्रत्येक पद का विस्तृत अर्थ प्रस्तुत किया गया है:

संस्कृत शब्द पद-विच्छेद सरल हिंदी अर्थ संदर्भगत आध्यात्मिक अर्थ
ब्रह्मा ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता रजोगुण के अधिष्ठाता देव जो नवग्रहों की उत्पत्ति के मूल कारण हैं।
मुरारी मुर + अरि भगवान विष्णु सत्वगुण के अधिष्ठाता, जो ग्रहों की गति और संसार का पालन करते हैं।
त्रिपुरान्तकारी त्रिपुर + अन्तकारी भगवान शिव तमोगुण के नियंता, जो समस्त विघ्नों और नकारात्मक ऊर्जा का संहार करते हैं।
भानुः भानुः सूर्य देव आत्मा, तेज, आरोग्य और पिता के कारक ग्रह।
शशि शशि चंद्र देव मन, शांति, माता और भावनाओं के अधिपति ग्रह।
भूमि-सुतो भूमि + सुतः मंगल देव भूमि, साहस, पराक्रम और ऊर्जा के कारक ग्रह।
बुधश्च बुधः + च और बुध देव बुद्धि, वाणी, व्यापार और तार्किक क्षमता के स्वामी।
गुरुश्च गुरुः + च और गुरु देव ज्ञान, धर्म, संतान और सौभाग्य के प्रदाता देवगुरु बृहस्पति।
शुक्रः शुक्रः शुक्र देव ऐश्वर्य, कला, सौंदर्य और वैवाहिक सुख के स्वामी।
शनि शनिः शनि देव कर्मफल दाता, न्यायप्रिय और अनुशासन के प्रतीक ग्रह।
राहु राहुः राहु देव भ्रम, अचानक होने वाली घटनाएं और छाया ग्रह।
केतवः केतवः केतु देव मोक्ष, अध्यात्म, वैराग्य और अंतर्ज्ञान के कारक ग्रह।
सर्वे ग्रहाः सर्वे + ग्रहाः सभी नौ ग्रह ब्रह्मांड की वे समस्त शक्तियां जो मानव जीवन को प्रभावित करती हैं।
शान्ति करा शान्ति + कराः शांति प्रदान करने वाले नकारात्मक प्रभावों को दूर कर शुभ फल देने वाले।
भवन्तु भवन्तु होवें / बनें साधक की ओर से की गई विनम्र प्रार्थना और आशीर्वाद की कामना।

सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Hindi Meaning & Bhavarth

इस महामंत्र का सरल और भावपूर्ण अर्थ इस प्रकार है:

"सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा, मधु-कैटभ और मुर दैत्य का संहार करने वाले भगवान विष्णु (मुरारी), और त्रिपुर दैत्य का अंत करने वाले महादेव शिव (त्रिपुरांतकारी); तथा सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु—ये सभी ग्रह मेरे जीवन की समस्त बाधाओं को दूर कर मुझे शांति प्रदान करें।"

विस्तृत भावार्थ: यह मंत्र सनातन धर्म की उस महान समन्वयवादी सोच का प्रतीक है, जहां त्रिदेवों और नवग्रहों की वंदना एक साथ की गई है। भारतीय दर्शन के अनुसार, नवग्रह स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं करते, बल्कि वे परमेश्वर की इच्छा और जीव के संचित कर्मों के अनुसार ही फल प्रदान करते हैं। जब हम ब्रह्मा, विष्णु और महेश की शरण में जाकर नवग्रहों की शांति की प्रार्थना करते हैं, तो ग्रहों की क्रूरता शांत हो जाती है। यह मंत्र हमें सिखाता है कि ब्रह्मांड की प्रत्येक ऊर्जा अंततः एक ही परम सत्य से जुड़ी हुई है। इस मंत्र के नियमित पाठ से साधक के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है, जिससे उसके प्रारब्ध के बुरे प्रभाव भी धीरे-धीरे क्षीण होने लगते हैं और जीवन में सुख-शांति का मार्ग प्रशस्त होता है।

मंत्र का भाव एवं आध्यात्मिक संदेश | Spiritual Message

इस मंत्र का मुख्य आध्यात्मिक संदेश समर्पण और ब्रह्मांडीय संतुलन है। जब हम 'सर्वे ग्रहाः शान्ति करा भवन्तु' कहते हैं, तो हम केवल अपने व्यक्तिगत लाभ की कामना नहीं कर रहे होते, बल्कि हम संपूर्ण ब्रह्मांड की शक्तियों के साथ तादात्म्य स्थापित करने का प्रयास करते हैं। यह मंत्र हमें सिखाता है कि:

  • कर्मों की अनिवार्यता: ग्रह हमारे कर्मों के दर्पण हैं। इस मंत्र के माध्यम से हम अपने पूर्व जन्मों के बुरे कर्मों के लिए क्षमा मांगते हैं।
  • त्रिदेवों की सर्वोच्चता: ग्रहों के अधिपति स्वयं त्रिदेव हैं। इसलिए, त्रिदेवों की आराधना से ग्रहों के अशुभ प्रभाव स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं।
  • मानसिक संतुलन: जब हम ग्रहों को शत्रु न मानकर उन्हें पूजनीय मानते हैं, तो हमारे भीतर का भय समाप्त हो जाता है और हम विपरीत परिस्थितियों का सामना धैर्यपूर्वक करने में सक्षम होते हैं।

शास्त्रीय संदर्भ, ऋषि, छंद एवं देवता | Scriptural Origin

यह मंत्र महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित प्रसिद्ध 'नवग्रह स्तोत्रम्' का प्रथम श्लोक है। व्यास देव ने महाभारत और पुराणों की रचना के साथ-साथ मानव कल्याण के लिए इस स्तोत्र की रचना की थी ताकि कलयुग में मनुष्य ग्रहों के दुष्प्रभाव से बच सकें।

  • ग्रंथ: नवग्रह स्तोत्र (व्यास प्रोक्त)।
  • ऋषि: वेदव्यास।
  • छंद: अनुष्टुप छंद (यह मंत्र गेय और लयबद्ध है)।
  • देवता: नवग्रह (सूर्य आदि नौ ग्रह) और त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, शिव)।

मंत्र जप विधि, नियम एवं शुभ मुहूर्त | Chanting Method, Rules & Vidhi

मंत्र का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए शास्त्रों में वर्णित विधि का पालन करना अत्यंत आवश्यक है। नीचे दी गई विधि के अनुसार जप करने से शीघ्र फल की प्राप्ति होती है:

  1. शुभ मुहूर्त: इस मंत्र का जप प्रतिदिन प्रातःकाल सूर्योदय के समय करना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसके अतिरिक्त, किसी भी शुभ तिथि जैसे पूर्णिमा, संक्रांति, या शनिवार के दिन से इसका प्रारंभ किया जा सकता है।
  2. आसन और दिशा: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।
  3. पूजा की तैयारी: अपने सामने नवग्रह यंत्र या त्रिदेवों का चित्र स्थापित करें। एक शुद्ध घी का दीपक जलाएं और धूप-अगरबत्ती अर्पित करें।
  4. जप संख्या: प्रतिदिन कम से कम 108 बार (एक माला) जप करना अत्यंत फलदायी होता है। यदि समय का अभाव हो, तो 11, 21 या 51 बार भी श्रद्धापूर्वक जप किया जा सकता है।
  5. माला: इस मंत्र के जप के लिए रुद्राक्ष की माला या स्फटिक की माला का उपयोग करना चाहिए।
  6. नियम व सावधानियां: जप के दौरान मन को शांत रखें, वाणी में शुद्धता बनाए रखें और तामसिक भोजन (प्याज, लहसुन, मदिरा आदि) से परहेज करें।

मंत्र का दार्शनिक एवं आध्यात्मिक महत्व | Philosophical Significance

वैदिक दर्शन के अनुसार, 'यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे' अर्थात् जो इस ब्रह्मांड में है, वही हमारे शरीर के भीतर भी विद्यमान है। हमारे शरीर के विभिन्न चक्र और ऊर्जा केंद्र नवग्रहों से जुड़े हुए हैं। उदाहरण के लिए, सूर्य हमारे अनाहत चक्र और आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि चंद्रमा हमारे मन और आज्ञा चक्र को प्रभावित करता है। जब हम इस मंत्र का उच्चारण करते हैं, तो उत्पन्न होने वाली ध्वनि तरंगें हमारे शरीर के इन ऊर्जा केंद्रों को सक्रिय और संतुलित करती हैं। यह मंत्र केवल एक प्रार्थना नहीं है, बल्कि यह एक वैज्ञानिक ध्वनि-विज्ञान (Sound Therapy) भी है जो हमारे मस्तिष्क की तरंगों को शांत कर तनाव को दूर करती है।

मंत्र के आध्यात्मिक लाभ | Spiritual Benefits

सनातन परंपरा में इस मंत्र के नियमित पाठ से निम्नलिखित लाभों का उल्लेख मिलता है:

  • ग्रह दोषों से मुक्ति: कुंडली में स्थित साढ़ेसाती, ढैय्या, कालसर्प दोष या अन्य क्रूर ग्रहों की महादशा के दुष्प्रभावों को कम करता है।
  • मानसिक शांति: चंद्रमा और राहु के अशुभ प्रभाव दूर होने से मानसिक तनाव, अवसाद और अनिद्रा जैसी समस्याओं से राहत मिलती है।
  • स्वास्थ्य लाभ: सूर्य और मंगल की अनुकूलता से शारीरिक ऊर्जा, आत्मविश्वास और आरोग्य की प्राप्ति होती है।
  • कार्यक्षेत्र में प्रगति: बुध और गुरु की कृपा से बुद्धि कुशाग्र होती है, व्यापार में उन्नति होती है और सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित होती है।
  • पारिवारिक सामंजस्य: शुक्र की अनुकूलता से वैवाहिक जीवन में मधुरता आती है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।

मंत्र का दैनिक जीवन में महत्व | Daily Life Relevance

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर व्यक्ति किसी न किसी अज्ञात भय, तनाव या असफलता से जूझ रहा है। ऐसे में यह मंत्र एक सुरक्षा कवच की तरह कार्य करता है। सुबह घर से निकलने से पहले केवल तीन बार इस मंत्र का पाठ करने से पूरे दिन सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और दुर्घटनाओं तथा अनपेक्षित बाधाओं से रक्षा होती है। यह विद्यार्थियों के लिए एकाग्रता बढ़ाने और कामकाजी पेशेवरों के लिए कार्यस्थल पर अनुकूल माहौल बनाने में सहायक है।

Quick Information Table | एक नजर में जानकारी

मंत्र का नाम नवग्रह शांति मंत्र (ब्रह्मा मुरारी त्रिपुरान्तकारी)
मुख्य देवता नवग्रह (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु) एवं त्रिदेव
रचयिता महर्षि वेदव्यास
मूल स्रोत नवग्रह स्तोत्रम्
सर्वश्रेष्ठ समय प्रातःकाल (सूर्योदय के समय)
अनुशंसित जप संख्या 108 बार प्रतिदिन
उपयुक्त माला रुद्राक्ष या तुलसी की माला
मुख्य उद्देश्य ग्रह दोष निवारण, मानसिक शांति और सर्वविघ्न विनाश

मुख्य आध्यात्मिक संदेश | Key Takeaways

  • यह मंत्र त्रिदेवों की शक्ति के माध्यम से नवग्रहों को अनुकूल बनाने का सबसे सरल और प्रामाणिक साधन है।
  • मंत्र का शुद्ध उच्चारण और श्रद्धा भाव इसके प्रभाव को कई गुना बढ़ा देते हैं।
  • यह केवल ज्योतिषीय उपाय नहीं, बल्कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का एक वैज्ञानिक तरीका भी है।
  • नियमित जप से जीवन में आने वाली अचानक बाधाएं और दुर्घटनाएं टल जाती हैं।
  • यह मंत्र हमें सिखाता है कि संपूर्ण ब्रह्मांड एक सूत्र में बंधा हुआ है और हमें सभी प्राकृतिक शक्तियों का सम्मान करना चाहिए।

संबंधित मंत्र, श्लोक, स्तोत्र एवं प्रार्थनाएं

नवग्रह शांति के लिए इस मंत्र के साथ-साथ निम्नलिखित स्तोत्रों और भजनों का पाठ भी अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है:

  • श्री शनि देव आराधना: शनि देव की शांति के लिए आप हमारी वेबसाइट पर श्री शनि देव आरती का पाठ कर सकते हैं।
  • गुरु कृपा के लिए: जीवन में ज्ञान और विवेक की प्राप्ति के लिए गुरुदेव भजन का श्रवण करें।
  • शनिदेव के विशेष भजन: शनि की साढ़ेसाती के प्रभाव को कम करने के लिए शनिदेव भजन का नियमित पाठ करें।
  • महादेव की स्तुति: समस्त ग्रहों के स्वामी भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए शिव तांडव स्तोत्र का पाठ भी अत्यंत प्रभावी है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस मंत्र का जप किसी भी शुभ दिन जैसे रविवार, सोमवार, या गुरुवार से शुरू किया जा सकता है। यदि आप विशेष रूप से शनि या राहु-केतु की शांति चाहते हैं, तो शनिवार का दिन उत्तम रहता है।

हां, सनातन धर्म में मंत्र साधना पर सभी का समान अधिकार है। महिलाएं भी पूर्ण पवित्रता और श्रद्धा के साथ इस मंत्र का जप कर सकती हैं।

नियमित साधना के लिए प्रतिदिन 108 बार (एक माला) जप करना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। यदि समय कम हो, तो आप सुबह उठकर या पूजा के समय 11 या 21 बार भी इसका पाठ कर सकते हैं।

नहीं, यह एक सात्विक और प्रार्थना रूपी मंत्र है। इसके लिए किसी विशेष तांत्रिक दीक्षा की आवश्यकता नहीं है। कोई भी गृहस्थ व्यक्ति इसे श्रद्धापूर्वक पढ़ सकता है।

जी हां, इस मंत्र में शनि देव का भी नाम सम्मिलित है और यह त्रिदेवों की स्तुति से प्रारंभ होता है। इसलिए शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या के कष्टों को कम करने में यह मंत्र अत्यंत सहायक है।

जप करते समय साधक का मुख पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर होना चाहिए। इन दिशाओं को सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह क्षेत्र माना जाता है।

हां, बच्चों द्वारा इस मंत्र का पाठ करने से उनकी बुद्धि कुशाग्र होती है, एकाग्रता बढ़ती है और उनका मानसिक विकास सही दिशा में होता है।

इसका मुख्य आधार यह है कि ब्रह्मांड के सभी ग्रह ईश्वर की ही विभूतियां हैं। जब हम परमेश्वर की शरण में जाते हैं, तो सभी प्राकृतिक और खगोलीय शक्तियां हमारे अनुकूल हो जाती हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख Bhaktilok के विद्वान संपादकों और संस्कृत विशेषज्ञों द्वारा तैयार किया गया है। मंत्र के श्लोकों की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए पारंपरिक वैदिक ग्रंथों और महर्षि वेदव्यास रचित 'नवग्रह स्तोत्रम्' के मूल पाठों का संदर्भ लिया गया है। यह सामग्री पूरी तरह से शोध परक और संदर्भ सहित व्याख्या के साथ प्रस्तुत की गई है ताकि पाठकों को सटीक और प्रामाणिक जानकारी प्राप्त हो सके। (संपादकीय रूप से तैयार सामग्री)

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • व्यास प्रोक्त नवग्रह स्तोत्रम्: मूल संस्कृत श्लोक और पाठ।
  • विष्णु पुराण एवं शिव पुराण: त्रिदेवों और ग्रहों के अंतर्संबंधों की कथाएं।
  • वैदिक ज्योतिष संहिता: ग्रहों के गोचर और शांति के शास्त्रीय उपाय।

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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