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ऐगिरी नंदिनी (Aigiri Nandini) - Mahishasura Mardini Stotram Navya Singh Baghel

नव्या सिंह बघेल के स्वर में ऐगिरी नंदिनी (महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम्) का पाठ करें। माँ दुर्गा की इस स्तुति के लिरिक्स और भावार्थ यहाँ उपलब्ध हैं।

माँ दुर्गा की स्तुति का सर्वोच्च स्वरूप "ऐगिरी नंदिनी" अर्थात् महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् भारतीय भक्ति परंपरा का एक अमूल्य रत्न है। यह स्तोत्र आदि शंकराचार्य जी द्वारा रचित माना जाता है और इसमें माँ दुर्गा के उस उग्र एवं करुणामयी स्वरूप का वर्णन है, जिसमें उन्होंने महिषासुर नामक असुर का वध करके देवताओं और समस्त सृष्टि की रक्षा की थी। "ऐगिरी नंदिनी" का अर्थ है — पर्वतराज हिमालय की पुत्री, अर्थात् पार्वती जी। इस स्तोत्र की प्रत्येक पंक्ति में माँ के चरणों में समर्पित भक्ति, उनकी महिमा का गान और शरणागति का भाव समाहित है। नव्या सिंह बघेल के सुमधुर स्वर में प्रस्तुत यह संस्करण भक्तों के हृदय में माँ के प्रति गहरी श्रद्धा और भक्ति भाव जागृत करता है। यह स्तोत्र नवरात्रि, दुर्गा पूजा, और प्रत्येक शुभ अवसर पर विशेष रूप से गाया जाता है। इसका पाठ मात्र धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि, भय से मुक्ति और माँ के आशीर्वाद की प्राप्ति का साधन है।

सम्पूर्ण स्तोत्र लिरिक्स | Complete Aigiri Nandini Stotram Lyrics

॥ ऐगिरी नंदिनी स्तोत्रम् ॥

(महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम्)

ऐगिरी नंदिनी नंदित मेदिनी विश्व विनोदिनी नंदनुते
गिरिवर विंध्य शिरोधि निवासिनी विष्णु विलासिनी जिष्णुनुते।
भगवती हे शितिकण्ठ कुटुम्बिनी भूरि कुटुम्बिनी भूरि कृते
जय जय हे महिषासुर मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ १॥

सुरवर वर्षिणि दुर्धर धर्षिणि दुर्मुख मर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवन पोषिणि शंकर तोषिणि किल्बिष मोषिणि घोषरते।
दनुज निरोषिणि दिति सुत रोषिणि दुर्मद शोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुर मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ २॥

अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वन प्रियवासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्ग हिमालय शृङ्ग निजालय मध्यगते।
मदमुगध मोहित मानव वंश निराश कर द्विज वंशकृते
जय जय हे महिषासुर मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ ३॥

शुलसुते सुरलोक धात्रि दयानिधे रिपुहन्त्रि त्रिलोकपते
सुरवर देवि दयानिधे रिपुहन्त्रि त्रिलोकपते।
सुरवर देवि दयानिधे रिपुहन्त्रि त्रिलोकपते
जय जय हे महिषासुर मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ ४॥

अयि निज हुङ्कृति मात्र निराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते
समर विशोषित शोणित बीज समुद्भव शोणित बीजलते।
शिव शिव शुम्भ निशुम्भ महाहव तर्पित भूत पिशाचरते
जय जय हे महिषासुर मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ ५॥

धनु रनु षङ्कु शताङ्कु शताङ्कु शताङ्कु शताङ्कु शते
करुणा करवाणि कृपाकरवाणि कृपापरवाणि कृपाकरवाणि।
धनु रनु षङ्कु शताङ्कु शताङ्कु शताङ्कु शताङ्कु शते
जय जय हे महिषासुर मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ ६॥

कनक सप्तघटी मण्डित मेखल मण्डित मेखल मण्डित मेखला
कनक सप्तघटी मण्डित मेखल मण्डित मेखल मण्डित मेखला।
कनक सप्तघटी मण्डित मेखल मण्डित मेखल मण्डित मेखला
जय जय हे महिषासुर मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ ७॥

अयि सुमनः सुमनः सुमनः सुमनोहर कान्तियुते
श्रित रजनी रजनी रजनी रजनी रजनी कर वक्त्रवृते।
सुनयन विभ्रमर भ्रमर भ्रमर भ्रमर भ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुर मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ ८॥

सकल सुरासुर देव मुनीश्वर मानव वंश नुते
सकल सुरासुर देव मुनीश्वर मानव वंश नुते।
सकल सुरासुर देव मुनीश्वर मानव वंश नुते
जय जय हे महिषासुर मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ ९॥

शरणागत वैरि वधू वर वीर वराभय दायकरे
शरणागत वैरि वधू वर वीर वराभय दायकरे।
शरणागत वैरि वधू वर वीर वराभय दायकरे
जय जय हे महिषासुर मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ १०॥

त्रिभुवन मातर मातर मातर मातर मातर मातर मातः
त्रिभुवन मातर मातर मातर मातर मातर मातर मातः।
त्रिभुवन मातर मातर मातर मातर मातर मातर मातः
जय जय हे महिषासुर मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ ११॥

सुरवर वर्षिणि दुर्धर धर्षिणि दुर्मुख मर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवन पोषिणि शंकर तोषिणि किल्बिष मोषिणि घोषरते।
दनुज निरोषिणि दिति सुत रोषिणि दुर्मद शोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुर मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ १२॥

अयि शरणागत वत्सल दुर्लभ दुर्गम दुर्ग निवासिनि
अयि शरणागत वत्सल दुर्लभ दुर्गम दुर्ग निवासिनि।
अयि शरणागत वत्सल दुर्लभ दुर्गम दुर्ग निवासिनि
जय जय हे महिषासुर मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ १३॥

अयि शरणागत वत्सल दुर्लभ दुर्गम दुर्ग निवासिनि
अयि शरणागत वत्सल दुर्लभ दुर्गम दुर्ग निवासिनि।
अयि शरणागत वत्सल दुर्लभ दुर्गम दुर्ग निवासिनि
जय जय हे महिषासुर मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ १४॥

अयि शरणागत वत्सल दुर्लभ दुर्गम दुर्ग निवासिनि
अयि शरणागत वत्सल दुर्लभ दुर्गम दुर्ग निवासिनि।
अयि शरणागत वत्सल दुर्लभ दुर्गम दुर्ग निवासिनि
जय जय हे महिषासुर मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ १५॥

अयि शरणागत वत्सल दुर्लभ दुर्गम दुर्ग निवासिनि
अयि शरणागत वत्सल दुर्लभ दुर्गम दुर्ग निवासिनि।
अयि शरणागत वत्सल दुर्लभ दुर्गम दुर्ग निवासिनि
जय जय हे महिषासुर मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ १६॥

अयि शरणागत वत्सल दुर्लभ दुर्गम दुर्ग निवासिनि
अयि शरणागत वत्सल दुर्लभ दुर्गम दुर्ग निवासिनि।
अयि शरणागत वत्सल दुर्लभ दुर्गम दुर्ग निवासिनि
जय जय हे महिषासुर मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ १७॥

अयि शरणागत वत्सल दुर्लभ दुर्गम दुर्ग निवासिनि
अयि शरणागत वत्सल दुर्लभ दुर्गम दुर्ग निवासिनि।
अयि शरणागत वत्सल दुर्लभ दुर्गम दुर्ग निवासिनि
जय जय हे महिषासुर मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ १८॥

अयि शरणागत वत्सल दुर्लभ दुर्गम दुर्ग निवासिनि
अयि शरणागत वत्सल दुर्लभ दुर्गम दुर्ग निवासिनि।
अयि शरणागत वत्सल दुर्लभ दुर्गम दुर्ग निवासिनि
जय जय हे महिषासुर मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ १९॥

अयि शरणागत वत्सल दुर्लभ दुर्गम दुर्ग निवासिनि
अयि शरणागत वत्सल दुर्लभ दुर्गम दुर्ग निवासिनि।
अयि शरणागत वत्सल दुर्लभ दुर्गम दुर्ग निवासिनि
जय जय हे महिषासुर मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ २०॥

अयि शरणागत वत्सल दुर्लभ दुर्गम दुर्ग निवासिनि
अयि शरणागत वत्सल दुर्लभ दुर्गम दुर्ग निवासिनि।
अयि शरणागत वत्सल दुर्लभ दुर्गम दुर्ग निवासिनि
जय जय हे महिषासुर मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ २१॥

॥ इति श्री ऐगिरी नंदिनी स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

स्तोत्र का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Aigiri Nandini Meaning & Bhavarth

ऐगिरी नंदिनी स्तोत्र का प्रत्येक शब्द माँ दुर्गा की स्तुति और उनके प्रति समर्पण का भाव प्रकट करता है। "ऐगिरी नंदिनी" का अर्थ है — पर्वतराज हिमालय की पुत्री, अर्थात् माँ पार्वती। "नंदित मेदिनी" का अर्थ है — जिनसे पृथ्वी आनंदित होती है। "विश्व विनोदिनी" अर्थात् समस्त विश्व का मनोरंजन करने वाली। "नंदनुते" का अर्थ है — जिनकी स्तुति देवता और ऋषि-मुनि करते हैं। इस प्रकार प्रत्येक पंक्ति में माँ के विभिन्न स्वरूपों और गुणों का वर्णन किया गया है।

स्तोत्र का मुख्य भाव शरणागति का है। जब भक्त समस्त सांसारिक कष्टों, भय और अशांति से थककर माँ के चरणों में शरण लेता है, तो माँ उसकी रक्षा करती हैं। "जय जय हे महिषासुर मर्दिनि" का निरंतर उच्चारण भक्त के हृदय में वीरता, आत्मविश्वास और माँ के प्रति अटूट विश्वास जगाता है। यह स्तोत्र बताता है कि जब-जब पृथ्वी पर अधर्म और अत्याचार बढ़ता है, तब-तब माँ दुर्गा प्रकट होकर धर्म की रक्षा करती हैं। महिषासुर का वध केवल एक असुर का वध नहीं, बल्कि भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ और मोह का वध है। माँ की कृपा से भक्त को आत्मिक शांति, भय से मुक्ति और जीवन में सफलता प्राप्त होती है।

स्तोत्र में माँ को "दयानिधे", "कृपाकरवाणि", "शरणागत वत्सल" कहा गया है, जो यह दर्शाता है कि माँ अपने भक्तों पर सदैव करुणा बरसाती हैं। "त्रिभुवन मातर" कहकर माँ को तीनों लोकों की जननी कहा गया है। यह स्तोत्र भक्त को यह सिखाता है कि माँ के चरणों में पूर्ण समर्पण ही सच्ची भक्ति है। जो भक्त श्रद्धा और भक्ति भाव से इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसके सभी दुःख, कष्ट और बाधाएं दूर होती हैं। माँ उसकी रक्षा करती हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति कराती हैं।

स्तोत्र की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

ऐगिरी नंदिनी स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें माँ दुर्गा के वीरता और करुणा दोनों स्वरूपों का सुंदर समन्वय है। यह स्तोत्र आदि शंकराचार्य जी द्वारा रचित माना जाता है, जो भारतीय अद्वैत वेदांत के प्रणेता थे। इस स्तोत्र में संस्कृत के अलंकारों, छंदों और शब्दों का अत्यंत सुंदर प्रयोग किया गया है। प्रत्येक श्लोक के अंत में "जय जय हे महिषासुर मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते" का निरंतर पुनरावृत्ति भक्त को माँ के चरणों में बांधे रखती है।

इस स्तोत्र का पाठ नवरात्रि, दुर्गा पूजा, और विशेष रूप से अष्टमी और नवमी तिथि पर अत्यंत फलदायी माना जाता है। मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा से इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसके जीवन से सभी प्रकार के भय, रोग, शत्रु बाधा और नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं। यह स्तोत्र माँ दुर्गा के प्रति भक्ति और समर्पण का सर्वोच्च उदाहरण है। इसके नियमित पाठ से मन में स्थिरता, आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

यह स्तोत्र केवल स्तुति नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना है। इसका पाठ करने से भक्त का अंतःकरण शुद्ध होता है और उसे माँ की कृपा का अनुभव होता है। स्तोत्र में वर्णित माँ के स्वरूप — जैसे "गिरिवर विंध्य शिरोधि निवासिनी", "विष्णु विलासिनी", "शितिकण्ठ कुटुम्बिनी" — भक्त को यह बताते हैं कि माँ समस्त देवताओं की शक्ति का स्रोत हैं। वे ब्रह्मा, विष्णु और महेश की भी पूजनीया हैं। इस प्रकार यह स्तोत्र सनातन धर्म की शक्ति उपासना परंपरा का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।

स्तोत्र गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

ऐगिरी नंदिनी स्तोत्र का पाठ विशेष रूप से नवरात्रि के नौ दिनों में, दुर्गा पूजा के अवसर पर, और प्रत्येक मंगलवार एवं शुक्रवार को किया जाता है। इसके अतिरिक्त, अष्टमी, नवमी, और चैत्र नवरात्रि में इसका विशेष महत्व है। सर्वोत्तम समय प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में या संध्या काल में दीप प्रज्वलित करके पाठ करना माना जाता है।

पाठ करने से पूर्व स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। माँ दुर्गा की प्रतिमा या चित्र के समक्ष घी का दीपक और धूप प्रज्वलित करें। लाल पुष्प, कुमकुम, और मिष्ठान्न का भोग अर्पित करें। फिर श्रद्धा और भक्ति भाव से इस स्तोत्र का पाठ करें। पाठ करते समय मन को माँ के चरणों में एकाग्र रखें। प्रत्येक श्लोक के बाद "जय जय हे महिषासुर मर्दिनि" का उच्चारण विशेष भक्ति भाव से करें। पाठ के पश्चात माँ की आरती करें और प्रसाद वितरित करें।

यदि संभव हो तो इस स्तोत्र का पाठ ११, २१ या १०८ बार करें। नियमित पाठ से माँ की विशेष कृपा प्राप्त होती है। स्तोत्र का श्रवण भी उतना ही फलदायी है जितना पाठ। नव्या सिंह बघेल के स्वर में प्रस्तुत यह संस्करण भक्तों को माँ के चरणों में आत्मिक शांति और भक्ति का अनुभव कराता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न १: ऐगिरी नंदिनी स्तोत्र किसने रचा?

उत्तर: परंपरा के अनुसार इस स्तोत्र की रचना आदि शंकराचार्य जी द्वारा की गई मानी जाती है। यह महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् के नाम से भी प्रसिद्ध है।

प्रश्न २: इस स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?

उत्तर: नवरात्रि, दुर्गा पूजा, मंगलवार, शुक्रवार, अष्टमी और नवमी तिथि पर इसका पाठ विशेष फलदायी माना जाता है। प्रातःकाल या संध्या काल में पाठ करना उत्तम है।

प्रश्न ३: क्या इस स्तोत्र का पाठ घर पर कर सकते हैं?

उत्तर: हाँ, कोई भी भक्त श्रद्धा और भक्ति भाव से घर पर इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। इसके लिए किसी विशेष दीक्षा की आवश्यकता नहीं होती।

प्रश्न ४: इस स्तोत्र के पाठ से क्या लाभ होते हैं?

उत्तर: मान्यता है कि इस स्तोत्र के नियमित पाठ से भय, रोग, शत्रु बाधा और नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं। मन में शांति, आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

प्रश्न ५: क्या इस स्तोत्र का पाठ करते समय किसी विशेष नियम का पालन करना चाहिए?

उत्तर: पाठ करने से पूर्व स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। माँ के समक्ष दीपक और धूप प्रज्वलित करें। पाठ के दौरान मन को एकाग्र रखें और श्रद्धा भाव बनाए रखें।

प्रश्न ६: क्या इस स्तोत्र का पाठ केवल नवरात्रि में ही किया जाता है?

उत्तर: नहीं, यह स्तोत्र किसी भी शुभ दिन, मंगलवार, शुक्रवार या किसी भी शुभ अवसर पर पढ़ा जा सकता है। नवरात्रि में इसका विशेष महत्व है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख भक्तिलोक.इन के लिए संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इसमें ऐगिरी नंदिनी स्तोत्र के मूल पाठ, सरल हिंदी भावार्थ, महत्व और पाठ विधि को शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। सामग्री को तैयार करते समय दुर्गा सप्तशती, शक्ति उपासना परंपरा और आदि शंकराचार्य जी की स्तोत्र रचनाओं का अध्ययन किया गया है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इस स्तोत्र का पाठ श्रद्धा और भक्ति भाव से करें और माँ दुर्गा की कृपा प्राप्त करें।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 04 Nov 2026

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