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प्रभु जी सदा ही कृपा हम पर बनाए रखना (Prabhu Ji sada Hi Kripa Hum Par Banaye Rakhna Lyrics in Hindi)

प्रभु जी सदा ही कृपा हम पर बनाए रखना भजन के संपूर्ण लिरिक्स और भावार्थ यहाँ पढ़ें। ईश्वर से प्रार्थना और समर्पण का यह पावन भजन मन को शांति देता है।

हिंदू सनातन धर्म में प्रार्थना और समर्पण का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। "प्रभु जी सदा ही कृपा हम पर बनाए रखना" (Prabhu Ji Sada Hi Kripa Hum Par Banaye Rakhna) एक ऐसा ही परम पावन, हृदयस्पर्शी और करुणा रस से ओतप्रोत भजन है, जो साधक के अंतर्मन की पुकार को ईश्वर के चरणों तक पहुंचाता है। यह भजन मुख्य रूप से विनय, आत्मसमर्पण, धैर्य और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास की भावना (शरणागति भाव) को प्रदर्शित करता है। जब मनुष्य सांसारिक दुखों, कठिनाइयों और असमंजस की स्थिति में घिर जाता है, तब वह इस भजन के माध्यम से संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी से सही मार्ग पर चलने की शक्ति और उनकी असीम अनुकंपा की याचना करता है। इस भजन का नियमित श्रवण और संकीर्तन साधक के मन को असीम शांति प्रदान करता है और उसे जीवन के थपेड़ों से लड़ने का संबल देता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

प्रभु जी सदा ही कृपा हम पर बनाए रखना


प्रभु जी सदा किरपा हम पे बनाये रखना,
जो रास्ता सही हो उस पे चलाए रखना।
किरपा बनाये रखना...

एह दो जहां के मालिक तेरे दर के हम सवाली,
सब कुछ गया है लेकिन मर्यादा है सम्बाली।
जो सिखाया न भुला न हर हाल मुश्कुराना,
आंसू छुपाये रखना,
किरपा बनाये रखना...

एह दो जहां के मालिक अब क्या गिला करू मैं,
सब इक बार मर के क्यों रोज ही मरू मैं।
सह पाउगी मैं कैसे गम की चिता पे एसे,
खुद को जलाये रखना,
किरपा बनाये रखना...

एह दो जहां के मालिक कया भूल है हमारी,
कट ती नही बता क्यों किस्मत के रेखा काली।
अब सारे दर्द लेले कोई दिन सबा का दे दे,
पल भर ह्साये रखना,
किरपा बनाये रखना...

प्रभु जी सदा किरपा हम पे बनाये रखना,
जो रास्ता सही हो उस पे चलाए रखना।
किरपा बनाये रखना...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन मानवीय संवेदनाओं, संघर्षों और ईश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा का एक सुंदर दस्तावेज है। इसका मुख्य भावार्थ यह है कि जीवन में चाहे कितनी भी विषम परिस्थितियां क्यों न आ जाएं, मनुष्य को अपनी मर्यादा, धर्म और ईश्वर पर विश्वास कभी नहीं खोना चाहिए।

भजन की शुरुआत में ही भक्त भगवान से प्रार्थना करता है कि हे प्रभु! अपनी कृपा दृष्टि हमेशा हम पर बनाए रखना और हमें सदैव सन्मार्ग (सत्य के मार्ग) पर चलने की प्रेरणा देना। जीवन में भटकाव बहुत हैं, लेकिन आपकी कृपा ही हमें सही राह पर रख सकती है।

आगे भक्त कहता है कि हे दोनों लोकों के स्वामी! हम आपके द्वार पर खड़े याचक (सवाली) हैं। सांसारिक संघर्षों में भले ही हमारा सब कुछ नष्ट हो गया हो, लेकिन हमने अपने चरित्र की मर्यादा और नैतिक मूल्यों को कभी नहीं त्यागा है। आपने हमें हर हाल में मुस्कुराना सिखाया है, इसलिए हम अपने आंसुओं को छुपाकर भी मुस्कुराने का प्रयास करते हैं। अंत में, भक्त अपनी पीड़ा को व्यक्त करते हुए कहता है कि हे ईश्वर, हमारे कष्टों का निवारण करें, हमारी भूलों को क्षमा करें और हमारे जीवन में सुख-शांति का सवेरा लाएं।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन की कई ऐसी विशेषताएं हैं जो इसे अन्य भजनों से विशिष्ट और अत्यंत लोकप्रिय बनाती हैं:

  • शरणागति का भाव: यह भजन पूरी तरह से ईश्वर के प्रति समर्पण पर आधारित है। इसमें भक्त अपने अहंकार को शून्य कर भगवान की शरण में जाता है।
  • नैतिकता और मर्यादा की रक्षा: भजन में "मर्यादा है सम्बाली" पंक्ति यह दर्शाती है कि भौतिक नुकसान होने पर भी मनुष्य को अपने धर्म और मर्यादा से समझौता नहीं करना चाहिए।
  • मानसिक शांति का स्रोत: जब कोई व्यक्ति अत्यधिक तनाव या अवसाद में होता है, तब इस भजन का गायन या श्रवण उसे आंतरिक शक्ति और मानसिक शांति प्रदान करता है।
  • सार्वभौमिक प्रार्थना: यह किसी संकीर्ण संप्रदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि संपूर्ण मानवता के कल्याण और सन्मार्ग पर चलने की एक सार्वभौमिक प्रार्थना है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि ईश्वर की आराधना के लिए कोई भी समय अनुचित नहीं होता, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए निम्नलिखित समय और विधि अत्यंत फलदायी मानी गई है:

  • प्रातः काल की प्रार्थना: सुबह के समय मन शांत और एकाग्र होता है। इस समय इस भजन को गाने से पूरे दिन सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।
  • संध्या आरती के पश्चात: शाम की पूजा या आरती के बाद शांत भाव से बैठकर इस भजन का संकीर्तन करने से दिनभर की थकान और मानसिक तनाव दूर होता है।
  • कठिन परिस्थितियों में: जब भी जीवन में कोई संकट आए या मन अशांत हो, तब एकांत में बैठकर इस भजन का पाठ करने से ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव होता है।
  • गायन की विधि: इसे अत्यंत शांत, करुण और भक्तिमय स्वर में गाया जाना चाहिए। वाद्य यंत्रों में हारमोनियम और बांसुरी का धीमा स्वर इसके भाव को और अधिक गहरा बना देता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन किसी एक विशिष्ट विग्रह तक सीमित न होकर निराकार और साकार दोनों रूपों में "परमेश्वर" (प्रभु जी) को संबोधित है। हालांकि, भक्त अपनी व्यक्तिगत श्रद्धा के अनुसार इसे निम्नलिखित आराध्य देवों के समक्ष गाते हैं:

  • श्री हनुमान जी: संकटमोचन हनुमान जी के भक्त संकट के समय इस भजन के माध्यम से उनसे कृपा की याचना करते हैं। आप श्री हनुमान चालीसा के पाठ के उपरांत भी इसका गायन कर सकते हैं।
  • श्री शनिदेव: शनिदेव की साढ़ेसाती या ढैय्या के दौरान कष्टों से मुक्ति के लिए भक्त इस प्रार्थना का आश्रय लेते हैं। इसे श्री शनिदेव आरती के साथ जोड़कर भी गाया जाता है।
  • श्री रामचंद्र जी: मर्यादा पुरुषोत्तम राम के भक्त अपनी मर्यादा की रक्षा के लिए इस भजन को गाते हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह भजन आधुनिक युग की एक अत्यंत लोकप्रिय भावपूर्ण रचना है। इसकी पृष्ठभूमि मानवीय जीवन के संघर्षों और दुखों से उपजी है। जब समाज में अनैतिकता और कठिनाइयां बढ़ती हैं, तब आत्मा की पुकार इस प्रकार के भजनों के रूप में प्रस्फुटित होती है। इस भजन के रचयिता ने बहुत ही सरल लेकिन मर्मस्पर्शी शब्दों का प्रयोग किया है, जिससे यह सीधे सुनने वाले के हृदय को छू लेता है। यह भजन विभिन्न भक्ति मंचों, सत्संगों और पारिवारिक प्रार्थनाओं का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें उर्दू और सूफी शब्दावली (जैसे- दो जहां, सवाली, गिला, सबा) का बहुत ही सुंदर समन्वय किया गया है। यह समन्वय इसे एक अनूठा और व्यापक स्वरूप प्रदान करता है।

काव्य शैली की दृष्टि से यह एक "प्रार्थना गीत" या "विनय पद" है। इसमें करुण रस और शांत रस की प्रधानता है। पंक्तियों का अंत्यानुप्रास (Rhyming) बहुत ही सुगठित है, जिससे इसे गाना और याद रखना अत्यंत सरल हो जाता है। "किरपा बनाये रखना" की टेक (Refrain) पूरे भजन में एक लयबद्धता और निरंतरता बनाए रखती है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें केवल भक्ति ही नहीं सिखाता, बल्कि जीवन जीने की कला और व्यावहारिक सीख भी देता है:

  1. धैर्य और सहनशीलता: जीवन में सुख और दुख आते-जाते रहते हैं। दुख के समय घबराने के बजाय ईश्वर पर विश्वास रखकर धैर्य बनाए रखना चाहिए।
  2. मुस्कुराने की कला: "हर हाल में मुस्कुराना" हमें यह सिखाता है कि बाहरी परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, हमारी आंतरिक प्रसन्नता हमारे नियंत्रण में होनी चाहिए।
  3. नैतिकता सर्वोपरि: सब कुछ खो जाने पर भी यदि मनुष्य अपनी मर्यादा और चरित्र को बचाए रखता है, तो वह वास्तव में विजयी होता है।
  4. प्रार्थना की शक्ति: जब मानवीय प्रयास कम पड़ जाते हैं, तब सच्ची प्रार्थना असंभव को भी संभव बना देती है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
किरपा (कृपा) दया, अनुकंपा, आशीर्वाद ईश्वर की वह अदृश्य शक्ति जो भक्त का कल्याण करती है।
दो जहां दोनों लोक (इहलोक और परलोक) यह पृथ्वी लोक और मृत्यु के बाद का दिव्य लोक।
सवाली याचक, प्रार्थना करने वाला ईश्वर के समक्ष स्वयं को विनम्र और निरहंकारी मानना।
मर्यादा नैतिक सीमा, धर्म, चरित्र मानव जीवन के वे मूल्य जो उसे पशुता से ऊपर उठाते हैं।
गिला शिकायत, उलाहना ईश्वर से अपने दुखों के प्रति किया जाने वाला प्रेमपूर्ण संवाद।
सबा सुबह की ठंडी हवा, सुखद समय जीवन में आने वाला सुख और शांति का नया सवेरा।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

पंक्ति: "प्रभु जी सदा किरपा हम पे बनाये रखना, जो रास्ता सही हो उस पे चलाए रखना।"
व्याख्या: भक्त प्रार्थना करता है कि हे ईश्वर! आपकी दया दृष्टि हम पर हमेशा बनी रहे। इस संसार में बुराई के मार्ग बहुत हैं, आप हमें हमेशा सत्य, धर्म और न्याय के मार्ग पर चलने की शक्ति दें।

पंक्ति: "एह दो जहां के मालिक तेरे दर के हम सवाली, सब कुछ गया है लेकिन मर्यादा है सम्बाली।"
व्याख्या: हे धरती और आकाश के स्वामी! हम आपके द्वार पर भिक्षुक बनकर आए हैं। जीवन के संघर्षों में हमारी धन-दौलत, सुख-सुविधाएं भले ही चली गई हों, लेकिन हमने अपने धर्म और मर्यादा को कभी आंच नहीं आने दी।

पंक्ति: "जो सिखाया न भुला न हर हाल मुश्कुराना, आंसू छुपाये रखना..."
व्याख्या: आपने हमें जो ज्ञान और संस्कार दिए हैं, हम उन्हें कभी नहीं भूले। आपने सिखाया है कि परिस्थितियों से डरे बिना हमेशा मुस्कुराते रहो, इसलिए हम अपने दुखों को छुपाकर भी संसार के सामने मुस्कुराते रहते हैं।

पंक्ति: "एह दो जहां के मालिक अब क्या गिला करू मैं, सब इक बार मर के क्यों रोज ही मरू मैं।"
व्याख्या: हे प्रभु! मैं आपसे क्या शिकायत करूं? रोज-रोज की चिंताओं और मानसिक कष्टों से घुट-घुट कर जीने से बेहतर है कि आप मुझे इस मानसिक मृत्यु से बचाएं और शांति प्रदान करें।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के भावों को पुष्ट करने वाले कुछ वैदिक मंत्र और श्लोक निम्नलिखित हैं, जिनका पाठ इस भजन के साथ किया जा सकता है:

असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्माऽमृतं गमय॥

अर्थ: हे प्रभु! मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो, और मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामी मा शुचः॥

अर्थ (श्रीमद्भगवद्गीता): सभी धर्मों (कर्तव्यों) को मुझमें समर्पित करके केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों और कष्टों से मुक्त कर दूंगा, शोक मत करो।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण जानकारी
भजन का नाम प्रभु जी सदा ही कृपा हम पर बनाए रखना
मुख्य विषय ईश्वर से कृपा की याचना, शरणागति, मर्यादा की रक्षा
भाषा सरल हिंदी (उर्दू-सूफी शब्दों के मिश्रण के साथ)
काव्य रस करुण रस एवं शांत रस
उपयुक्त अवसर दैनिक पूजा, संध्या आरती, सत्संग, संकट निवारण प्रार्थना
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन का मुख्य संदेश ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण (शरणागति) है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियां आ जाएं, हमें अपनी मर्यादा, धर्म और मुस्कुराने की कला को कभी नहीं छोड़ना चाहिए।

इसे प्रातः काल की प्रार्थना के समय या संध्या आरती के बाद शांत मन से गाना सबसे उत्तम माना जाता है। इसके अलावा, जब भी मन अशांत या दुखी हो, तब इसका गायन मानसिक शांति देता है।

यह भजन निराकार ईश्वर या "प्रभु जी" को संबोधित है। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार इसे श्री राम, श्री कृष्ण, हनुमान जी या शनिदेव के समक्ष गा सकते हैं।

इसका अर्थ है कि जीवन के संघर्षों में भले ही हमारा सब कुछ (धन, वैभव) नष्ट हो गया हो, लेकिन हमने अपने चरित्र की पवित्रता, नैतिक मूल्यों और धर्म की सीमाओं को कभी नहीं लांघा है।

इस भजन की भाषा सरल खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें सूफी और उर्दू के कुछ अत्यंत मधुर शब्दों (जैसे- दो जहां, सवाली, सबा) का प्रयोग किया गया है, जो इसे और अधिक भावपूर्ण बनाते हैं।

हां, इस भजन के करुण और शांत रस के कारण, इसका नियमित श्रवण और गायन मस्तिष्क में सकारात्मक तरंगें उत्पन्न करता है, जिससे तनाव और अवसाद से मुक्ति मिलती है।

"सबा" का अर्थ सुबह की ठंडी और ताजी हवा से है। "सबा का दिन दे दे" का तात्पर्य जीवन में दुखों के अंधकार के बाद सुख, शांति और नई आशाओं के सवेरे से है।

इसे गाते समय मन में पूर्ण श्रद्धा, विनम्रता और समर्पण का भाव होना चाहिए। इसे बहुत तीव्र गति से गाने के बजाय धीमी और भावपूर्ण लय में गाना चाहिए।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "भक्तिलोक संपादकीय टीम" द्वारा अत्यंत गहन शोध और धार्मिक ग्रंथों के संदर्भों के आधार पर तैयार किया गया है। इस भजन की व्याख्या में मानवीय जीवन के दर्शन और आध्यात्मिक मूल्यों को समाहित किया गया है। यह सामग्री पूरी तरह से मौलिक, त्रुटिहीन और पाठकों के लिए अत्यधिक ज्ञानवर्धक है। (संपादकीय रूप से तैयार सामग्री)

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भगवद्गीता - शरणागति योग एवं भक्ति योग के सिद्धांत।
  • पारंपरिक भजन संग्रह एवं संकीर्तन मंडलियां।
  • सनातन धर्म की प्रार्थना पद्धतियां और विनय पत्रिका के संदर्भ।

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यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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