भक्ति काव्य व भजन बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

वर दे वीणावादिनि वर दे भजन लिरिक्स हिंदी में(Var De Veena Vadini Bhajan Lyrics in Hindi)

महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' रचित सरस्वती वंदना 'वर दे वीणावादिनि वर दे' के हिंदी लिरिक्स, अर्थ और महत्व पढ़ें। माँ शारदा की पावन प्रार्थना।

भजन एवं प्रार्थना

वर दे वीणावादिनि वर दे भजन लिरिक्स हिंदी में (Var De Veena Vadini Bhajan Lyrics in Hindi)

प्रकाशित तिथि: 2026 | श्रेणी: भक्तिगीत एवं प्रार्थना | स्रोत: महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' रचनावली

"वर दे, वीणावादिनि वर दे!" आधुनिक हिंदी साहित्य के सूर्य, छायावाद के प्रमुख स्तंभ और महान ओजस्वी कवि महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित एक अत्यंत प्रेरणादायी, चेतना जगाने वाली और अमर प्रार्थना है। यह भजन या सरस्वती वंदना केवल शब्दों का साधारण समूह नहीं, बल्कि ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी माँ शारदा के चरणों में एक साधक, एक छात्र और एक राष्ट्र-प्रेमी की सस्वर एवं अंतरंग पुकार है। इस कालजयी रचना में माँ सरस्वती से यह प्रार्थना की जाती है कि वे मनुष्य के अज्ञान रूपी अंधकार को पूर्णतः मिटाकर उसके अंतःकरण में नव-चेतना, स्वतंत्रता, सृजन और ज्ञान का अनंत प्रकाश भर दें। वसंत पंचमी के पावन पर्व, सरस्वती पूजा, विद्यालयों की प्रार्थना सभाओं और विभिन्न सांस्कृतिक आयोजनों में इस वंदना को अत्यंत श्रद्धा, गरिमा और तल्लीनता के साथ गाया जाता है। इसमें निहित 'स्वतंत्र-रव' और 'अमृत-मंत्र' जैसे शक्तिशाली शब्द भारत के स्वाधीनता संग्राम, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और वैचारिक स्वतंत्रता की भावना को भी सजीव रूप से प्रतिध्वनित करते हैं। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम इस पावन भजन के सम्पूर्ण लिरिक्स, सरल हिंदी अर्थ, भावार्थ, साहित्यिक विशेषता और इसके आध्यात्मिक महत्व का गहन अध्ययन करेंगे।

मुख्य बिंदु

यह भजन विद्या, बुद्धि, कला और संगीत की देवी माँ सरस्वती को समर्पित है। इसका मुख्य भाव जड़ता को मिटाकर चेतना का संचार करना, अज्ञान का नाश करना और जीवन में नए स्वर व नई गति प्राप्त करना है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

वर दे, वीणावादिनि वर दे!

प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नवभारत में भर दे।

काट अंध-उर के बंधन-स्तर, बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर,

कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर, जगमग जग कर दे।

वर दे, वीणावादिनि वर दे!

नव गति, नव लय, ताल-छंद नव,

नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव,

नव नभ के नव विहग-वृंद को, नव पर, नव स्वर दे।

वर दे, वीणावादिनि वर दे!

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

महाकवि निराला द्वारा रचित इस अद्भुत वंदना का प्रत्येक शब्द गहरे आध्यात्मिक और राष्ट्रीय भाव से ओत-प्रोत है। आइए इसके विस्तृत अर्थ और भावार्थ को समझें:

प्रथम पद का भाव: कवि माँ सरस्वती से निवेदन करते हुए कहते हैं कि हे वीणा को धारण करने वाली माँ! हमें ऐसा वरदान दीजिए कि हमारे इस नवीन राष्ट्र (नवभारत) में प्रिय, स्वतंत्र और ओजस्वी रव (ध्वनि) तथा अमृत रूपी मंत्र का संचार हो जाए। मानव हृदय के भीतर जो अज्ञानता, रूढ़िवादिता और कुंठाओं के अंधकार की परतें (अंध-उर के बंधन-स्तर) जमी हुई हैं, उन्हें काटकर समाप्त कर दीजिए। हे जननी! हमारे भीतर ज्ञान और चेतना का ज्योतिर्मय झरना बहा दीजिए, जिससे मन के सारे कलुष (विकार), भेदभाव और अंधकार (तम) दूर हो जाएं और यह पूरा संसार ज्ञान के प्रकाश से जगमगा उठे।

द्वितीय पद का भाव: दूसरे भाग में कवि जीवन और सृजन के नए स्वरूप की कामना करते हैं। वे माँ से प्रार्थना करते हैं कि हे देवी! हमें जीवन जीने के लिए नई गति, नई लय, नया ताल और नया छंद प्रदान कीजिए। हमारी वाणी को नया और मधुर कंठ दें, और हमारे स्वर में आकाश में उमड़ने वाले गंभीर बादलों जैसी गूंज (जलद-मन्द्ररव) भर दें। इस नए आकाश में उड़ान भरने वाले पक्षियों के समूह (विहग-वृंद) को नए पंख (पर) और नए स्वर प्रदान करें, ताकि सम्पूर्ण सृष्टि नए उत्साह और नव-सृजन के साथ आगे बढ़ सके।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह प्रार्थना केवल शैक्षणिक संस्थानों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका आध्यात्मिक और दार्शनिक दायरा बहुत व्यापक है।

  • ज्ञान और चेतना का प्रतीक: यह भजन साधक के भीतर छिपी सुसुप्त शक्तियों को जागृत करने का माध्यम है।
  • स्वतंत्रता और राष्ट्रप्रेम: 'नवभारत' और 'स्वतंत्र-रव' शब्दों के प्रयोग से इसमें राष्ट्रभक्ति की अलौकिक धारा बहती है।
  • सकारात्मकता का संचार: यह भजन निराशा और अज्ञान को दूर कर जीवन में नई ऊर्जा, नई गति और नई उमंग भरता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन को प्रातःकाल के समय, अध्ययन आरंभ करने से पूर्व, अथवा संध्या बेला में सस्वर गाना अत्यंत शुभ माना जाता है। वसंत पंचमी के दिन माँ सरस्वती के पूजन के समय इसका पाठ विशेष फलदायी होता है। इसे शुद्ध उच्चारण, सस्वर लय और एकाग्र मन के साथ गाना चाहिए। शिक्षण संस्थानों में प्रार्थना सभाओं की शुरुआत के लिए यह सर्वोच्च रचना मानी जाती है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस रचना की अधिष्ठात्री देवी माता सरस्वती (शारदा, ब्राह्मी, वीणावादिनि) हैं, जो विद्या, बुद्धि, कला, संगीत और ज्ञान की देवी हैं। इसके रचयिता हिंदी साहित्य के महान छायावादी कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' हैं, जिन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से भारतीय संस्कृति, ओज और जन-चेतना को नया आयाम दिया। आप इसी प्रकार के अन्य पावन पदों के लिए माँ सरस्वती वंदना लिरिक्स और श्री हनुमान चालीसा के पावन पाठ का भी अध्ययन कर सकते हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

महाकवि 'निराला' ने इस कविता की रचना ऐसे समय में की थी जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था और देशवासियों के मन में स्वतंत्रता की तीव्र लालसा थी। उन्होंने माँ सरस्वती की वंदना के माध्यम से न केवल वैचारिक और शैक्षणिक स्वतंत्रता की बात की, बल्कि देश की स्वतंत्रता के लिए वैचारिक क्रांति का आह्वान किया। यह रचना उनके प्रसिद्ध काव्य संग्रह 'वर दे वीणावादिनि वर दे' एवं अन्य आरंभिक संकलनों में समाहित है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा शुद्ध, परिष्कृत और ओजगुण से युक्त खड़ी बोली हिंदी है। इसमें संस्कृतनिष्ठ शब्दावली (तत्सम शब्दों) का सुंदर प्रयोग किया गया है जैसे— वीणावादिनि, ज्योतिर्मय, कलुष, विहग-वृंद, जलद-मन्द्ररव आदि। इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकारों की छटा देखने को मिलती है, जो इसकी काव्य सौंदर्यता को और अधिक प्रगाढ़ बनाती है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

इस भजन से हमें यह गहरी सीख मिलती है कि मनुष्य को अपने जीवन से अज्ञान, जड़ता और रूढ़िवादिता के अंधकार को हटाकर ज्ञान का प्रकाश अपनाना चाहिए। जीवन में निरंतर आगे बढ़ने के लिए नई गति, नए विचार और सकारात्मकता आवश्यक है। सच्चे अर्थों में विद्या वही है जो मनुष्य के भीतर के विकारों और भेदभाव को समाप्त कर उसे संपूर्ण जगत के कल्याण के लिए प्रेरित करे।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल अर्थ संदर्भ / भाव
वीणावादिनि वीणा बजाने वाली (माता सरस्वती) विद्या और संगीत की अधिष्ठात्री देवी
स्वतंत्र-रव स्वतंत्रता की गूंज / ओजस्वी ध्वनि मुक्ति और स्वाधीनता का आह्वान
अंध-उर अंधकारमय हृदय अज्ञान और अविद्या से घिरा मन
ज्योतिर्मय निर्झर प्रकाश से भरा हुआ झरना ज्ञान और चेतना का निरंतर प्रवाह
कलुष पाप, गंदगी या मानसिक विकार मन के दुर्गुण और बुराइयां
जलद-मन्द्ररव मेघों जैसी गंभीर गूंज वाणी में गहराई और ओज
विहग-वृंद पक्षियों का समूह सृष्टि के जीव-जंतु और छात्र वर्ग

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

1. वर दे, वीणावादिनि वर दे!
हे माँ सरस्वती! आप हमें अपनी वीणा के स्वर से ऐसा वरदान दीजिए जो हमारे जीवन को आलोकित कर दे।

2. प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नवभारत में भर दे।
हमारे देश में स्वतंत्रता का मधुर नाद और अमरता का मंत्र गूंज उठे, जिससे राष्ट्र में नया जीवन आ जाए।

3. काट अंध-उर के बंधन-स्तर, बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर...
हे माता! हृदय के अंधकारमय बंधनों को काटकर ज्ञान का पावन झरना प्रवाहित कर दीजिए।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

माँ सरस्वती की आराधना के लिए यह प्रसिद्ध श्लोक भी अत्यंत लोकप्रिय है:

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता,

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।

या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभर्देवैः सदा पूजिता,

सा माम पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम वर दे वीणावादिनि वर दे (Var De Veena Vadini)
समर्पित देवता माता सरस्वती (शारदा / वीणावादिनि)
रचयिता / कवि महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
भाषा परिष्कृत हिंदी (खड़ी बोली)
मुख्य थीम ज्ञान, चेतना, स्वतंत्रता और नव-सृजन
मुख्य भाव विनय, प्रार्थना, राष्ट्रप्रेम एवं उत्थान
उपयुक्त अवसर वसंत पंचमी, सरस्वती पूजा, विद्यालय प्रार्थना सभा

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस प्रसिद्ध प्रार्थना एवं कविता के रचयिता आधुनिक हिंदी साहित्य के छायावादी युग के महान कवि महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' हैं।

यह भजन मुख्य रूप से वसंत पंचमी, सरस्वती पूजा, विद्यालयों की प्रार्थना सभाओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आरंभ में अत्यंत श्रद्धा के साथ गाया जाता है।

इस भजन में माँ सरस्वती से अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाने, मन के विकारों को दूर करने और राष्ट्र में नव-चेतना व स्वतंत्रता का संचार करने की प्रार्थना की गई है।

'वीणावादिनि' का अर्थ है - वीणा को धारण करने वाली या वीणा बजाने वाली, जो कि माता सरस्वती का एक प्रमुख नाम है।

हाँ, 'प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नवभारत में भर दे' पंक्ति के माध्यम से इसमें सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्र की स्वतंत्रता का ओजस्वी भाव भी स्पष्ट रूप से झलकता है।

यह विद्यार्थियों के भीतर एकाग्रता, विद्या प्राप्ति की ललक, अनुशासन और बौद्धिक विकास के लिए सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।

इस भजन की भाषा संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दों से युक्त परिष्कृत खड़ी बोली हिंदी है।

इसका गायन सस्वर, लयबद्धता और स्पष्ट उच्चारण के साथ शांत एवं पवित्र वातावरण में करना चाहिए।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की मूल रचनाओं और पारंपरिक साहित्यिक स्रोतों के आधार पर संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इसका उद्देश्य पाठकों को माँ सरस्वती की इस पावन वंदना के सटीक लिरिक्स, सरल अर्थ और इसके आध्यात्मिक-सांस्कृतिक महत्व से अवगत कराना है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' रचनावली, राजकमल प्रकाशन।
  • शास्त्रीय सरस्वती स्तोत्र एवं पौराणिक ग्रंथ।
  • भारतीय शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक प्रार्थना परंपरा।

संबंधित भजन एवं लेख

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 12 Oct 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!