प्रस्तुतिकरण: भक्तलोक (Bhaktilok.in) | अद्यतन: सावन विशेष
"गउरा कहाँ बा चिलम हमार" एक अत्यंत लोकप्रिय, ऊर्जावान और लोक-आस्था से ओत-प्रोत भोजपुरी बोलबम गीत है, जो देवों के देव महादेव और माता पार्वती के अलौकिक, सहज और प्रेमपूर्ण दांपत्य जीवन को समर्पित है। सावन के पावन और पवित्र महीने में जब सम्पूर्ण उत्तर भारत 'बोल बम' और 'हर हर महादेव' के जयकारों से गूंज उठता है, तब ऐसे पारंपरिक एवं आधुनिक लोक-भजन वातावरण को पूरी तरह शिवमय बना देते हैं। इस भजन में केवल मनोरंजन या लोक-संगीत का पुट नहीं है, अपितु इसमें भगवान शिव के उस अक्कड़, सरल, और भक्त-वत्सल स्वरूप का सजीव चित्रण मिलता है, जो सांसारिक मोह-माया से परे अपनी अर्द्धांगिनी माता गौरा के साथ अत्यंत प्रेमपूर्ण नोकझोंक करते हैं। पवन बाबू, मोना सिंह और सोनम राज जैसे प्रसिद्ध कलाकारों द्वारा स्वरबद्ध यह गीत कांवड़ियों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय है, जो सावन की यात्रा में एक अनोखा उत्साह भर देता है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम इस लोकप्रिय भजन के संपूर्ण बोल, इसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ, शिव-पार्वती के संबंध की दार्शनिक पृष्ठभूमि और बोलबम परंपरा पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
शीघ्र जानकारी (Quick Information)
| गीत का नाम | गउरा कहाँ बा चिलम हमार (Gaura Kaha Ba Chilam Hamar) |
|---|---|
| समर्पित देवता | भगवान शिव (महादेव) एवं माता पार्वती (गौरा) |
| गायक / कलाकार | पवन बाबू, मोना सिंह, सोनम राज |
| संगीत शैली | भोजपुरी बोलबम गीत / लोक भजन |
| भाषा | भोजपुरी / हिंदी |
| मुख्य भाव | शिव-पार्वती दांपत्य प्रेम, भोलेनाथ की सरलता, बोलबम उत्सव |
| उपयुक्त अवसर | सावन मास, कांवड़ यात्रा, शिवरात्रि, रुद्राभिषेक, शिव सत्संग |
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
स्थाई (Refrain):
गउरा कहाँ बा चिलम हमार, कहाँ बा चिलम हमार
गउरा कहाँ बा चिलम हमार, कहाँ बा चिलम हमार
भांग घोटत-घोटत भइली भोर, गउरा कहाँ बा चिलम हमार
भांग घोटत-घोटत भइली भोर, गउरा कहाँ बा चिलम हमार..
अंतरा 1:
सबेरे-सबेरे उठ के तू त, श्रृंगार करे लु
हमके भुला के तू त, सोलह सिंगार करे लु
कहाँ रखलू तू चिलम हमार, कहाँ बा चिलम हमार
गउरा कहाँ बा चिलम हमार, कहाँ बा चिलम हमार..
अंतरा 2:
पवन बाबू, मोना सिंह, सोनम राज गावेले
भक्तन के मनवा में, शिवजी समावेले
गूंजे जिकिर चारों ओर, गउरा कहाँ बा चिलम हमार
भांग घोटत-घोटत भइली भोर, गउरा कहाँ बा चिलम हमार..
अंतरा 3:
काशी के बाशिंदा हम, केहू ना सुनी बात
डमरू बजावे लागी, आई जब-जब रात
मिलता ना एको गो घूंट, गउरा कहाँ बा चिलम हमार
भांग घोटत-घोटत भइली भोर, गउरा कहाँ बा चिलम हमार..
समापन (Outro):
बोल बम, बोल बम, बम बम भोले,
गउरा संग भोलेनाथ झूम के डोले!
गउरा कहाँ बा चिलम हमार, कहाँ बा चिलम हमार...
गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth
यह भोजपुरी बोलबम गीत केवल एक साधारण लोकगीत नहीं है, बल्कि इसमें भगवान शिव के गृहस्थ जीवन और उनकी स्वाभाविक सरलता का अत्यंत सुंदर व मनोरंजक वर्णन किया गया है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव को तपस्वी, अघोरी और संन्यासी माना गया है, जिन्हें सांसारिक विलासिता से कोई मोह नहीं है। उनका प्रिय भोग धतूरा, भांग और चिलम है।
गीत के मुखड़े में भगवान शिव अपनी अर्द्धांगिनी माता पार्वती (गौरा) से अपनी चिलम के बारे में पूछ रहे हैं। वे कह रहे हैं कि भांग घोटते-घोटते भोर (सुबह) हो गई है, लेकिन अभी तक मेरी चिलम नहीं मिल रही है। यह प्रसंग शिव और गौरा के बीच के उस निर्मल और सहज प्रेम को दर्शाता है जहाँ कोई औपचारिकता नहीं है, केवल आत्मीयता है।
पहले अंतरे में भोलेनाथ अपनी पत्नी माता पार्वती से शिकायत करते हैं कि तुम सुबह उठकर केवल अपना सोलह श्रृंगार करने में व्यस्त हो जाती हो और मुझे बिल्कुल भुला देती हो। तुमने मेरी प्रिय चिलम कहाँ छुपाकर रख दी है? यह संवाद पति-पत्नी के बीच के उस प्रेमिल तकरार (Sweet Quarrel) को उजागर करता है जिसे भक्तजन अत्यंत आनंद के साथ सुनते हैं। आगे कलाकार कांवड़ियों की भक्ति का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि जब गायक इस भजन को गाते हैं, तो कांवड़ियों के मन में भगवान शिव के प्रति अटूट प्रेम और श्रद्धा जागृत हो जाती है।
गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message
इस भजन का मुख्य भाव 'भक्ति और माधुर्य' का अद्भुत मिश्रण है। जहाँ एक ओर भगवान शिव को ब्रह्मांड का संहारक और परम योगी माना गया है, वहीं दूसरी ओर लोक-संस्कृति में उन्हें एक पारिवारिक मुखिया और सरल स्वभाव वाले देवता के रूप में चित्रित किया गया है।
- पारिवारिक सरलता: शिव और पार्वती का संबंध इस बात का प्रतीक है कि दिव्य शक्तियाँ भी पारिवारिक जीवन के प्रेम और सहजता में आनंदित होती हैं।
- सावन और कांवड़ यात्रा का उल्लास: यह गीत कांवड़ियों को लंबी यात्रा के दौरान थकान भुलाकर नाचने और झूमने की ऊर्जा प्रदान करता है।
- भक्त और भगवान की आत्मीयता: इस भजन के माध्यम से भक्तगण भगवान के साथ एक निकटता का अनुभव करते हैं, जिससे डर या दूरी की भावना समाप्त होकर प्रेम की स्थापना होती है।
कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | संदर्भ / प्रसंग |
|---|---|---|
| गउरा | माता पार्वती / गौरी | भगवान शिव की अर्द्धांगिनी |
| चिलम | तंबाकू या भांग पीने का पारंपरिक मिट्टी का उपकरण | शिवजी की साधना और सेवन की वस्तु |
| भांग घोटत-घोटत | भांग को पीसने और मिलाने की प्रक्रिया | प्रातःकाल की शिव पूजा की तैयारी |
| भोर | सुबह / प्रातःकाल | रात बीतने का समय |
| सोलह सिंगार | स्त्रियों द्वारा किए जाने वाले पारंपरिक आभूषण और श्रृंगार | माता गौरा का प्रातःकालीन श्रृंगार |
गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance
भोजपुरी लोक संस्कृति में भगवान शिव को दामाद और परिवार के सदस्य के रूप में देखने की एक लंबी और समृद्ध परंपरा रही है। मिथिला और उत्तर प्रदेश-बिहार के लोकगीतों में शिव-पार्वती के विवाह और उनके घरेलू जीवन को बहुत ही सजीवता से गाया जाता है।
सावन मास में जब शिवभक्त कांवर लेकर सुल्तानगंज से देवघर या अन्य ज्योतिर्लिंगों की कठिन यात्रा पर निकलते हैं, तो उनके मार्ग की थकान मिटाने के लिए ऐसे लोकगीत संजीवनी का काम करते हैं। यह गीत हमें सिखाता है कि भगवान बहुत जटिल नहीं हैं; जो व्यक्ति उन्हें सच्चे भाव से याद करता है, भगवान उसके उतने ही निकट हो जाते हैं। यह लोक-साहित्य और उच्च आध्यात्मिक दर्शन का एक सुंदर संगम है।
गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing
इस प्रकार के बोलबम गीतों को मुख्य रूप से निम्नलिखित अवसरों पर सुना और गाया जाता है:
- सावन का प्रत्येक सोमवार: देवाधिदेव महादेव के प्रिय माह सावन में विशेष पूजा के दौरान।
- कांवड़ यात्रा मार्ग पर: डीजे और संगीत प्रणालियों के माध्यम से कांवड़ियों के शिविरों में।
- शिवरात्रि एवं महाशिवरात्रि उत्सव: मंदिरों और जागरण कार्यक्रमों में।
- पारिवारिक और सांस्कृतिक अनुष्ठान: बोलबम की झाँकियो और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह आलेख 'भक्तलोक' (Bhaktilok.in) के संपादकीय मानकों के अनुसार तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य शिव भक्तों और लोक-संगीत प्रेमियों को प्रामाणिक एवं सुंदर सामग्री उपलब्ध कराना है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।
स्रोत एवं संदर्भ:
भोजपुरी लोक-साहित्य परंपरा, बोलबम एल्बम संग्रह तथा पारंपरिक शिव स्तुति संदर्भों पर आधारित।
पाठकों के विचार (0)
भक्ति रस चर्चा में भाग लें