Parvati Stotram

Baadi Sher Par Sawar [Full Song] Baadi Sher Par Sawar - BhaktiLok

76 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
आकार:
कंट्रास्ट:

सनातन धर्म में आदिशक्ति माँ दुर्गा की आराधना का अत्यंत विशेष महत्त्व है। "बाड़ी शेर पर सवार" (Baadi Sher Par Sawar) एक ऐसा ही परम पावन और श्रद्धा से परिपूर्ण भजन है, जो देवी भक्तों के हृदय में माँ भगवती के प्रति अनन्य भक्ति और समर्पण का संचार करता है। यह भजन विशेष रूप से नवरात्रि, जगराता, और माता की चौकी जैसे पावन अवसरों पर अत्यंत उत्साह और भाव के साथ गाया जाता है। इस भजन में माँ दुर्गा के दिव्य स्वरूप, उनकी सिंह-सवारी, और उनके ममतामयी रूप का अत्यंत सुंदर और सजीव चित्रण किया गया है। जब कोई साधक पूर्ण श्रद्धा के साथ इस भजन का श्रवण या गायन करता है, तो उसके अंतःकरण में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है और मानसिक क्लेशों से मुक्ति मिलती है। यह भजन केवल एक गीत नहीं, बल्कि माँ के चरणों में शरणागति का एक माध्यम है, जो जीवात्मा को परमात्मा की असीम शक्ति से जोड़ता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ बाड़ी शेर पर सवार ॥

बाड़ी शेर पर सवार, मैया ओढ़ के चुनरिया।
मैया ओढ़ के चुनरिया, मैया ओढ़ के चुनरिया॥
बाड़ी शेर पर सवार, मैया ओढ़ के चुनरिया...

माथे पे मैया के बिंदिया सोहे,
मांग में सिंदूर अपार, मैया ओढ़ के चुनरिया।
बाड़ी शेर पर सवार, मैया ओढ़ के चुनरिया...

गले में मैया के हरवा सोहे,
हाथों में कंगना हजार, मैया ओढ़ के चुनरिया।
बाड़ी शेर पर सवार, मैया ओढ़ के चुनरिया...

कानों में मैया के कुंडल सोहे,
नाक में नथुनी बहार, मैया ओढ़ के चुनरिया।
बाड़ी शेर पर सवार, मैया ओढ़ के चुनरिया...

पैरों में मैया के पायल बाजे,
बिछुआ की छम-छम पुकार, मैया ओढ़ के चुनरिया।
बाड़ी शेर पर सवार, मैया ओढ़ के चुनरिया...

हाथ में मैया के त्रिशूल सोहे,
दुष्टों का करती संहार, मैया ओढ़ के चुनरिया।
बाड़ी शेर पर सवार, मैया ओढ़ के चुनरिया...

भक्तों की मैया लाज बचावे,
करती है बेड़ा पार, मैया ओढ़ के चुनरिया।
बाड़ी शेर पर सवार, मैया ओढ़ के चुनरिया...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस पावन भजन "बाड़ी शेर पर सवार" का भावार्थ अत्यंत गहरा और हृदयस्पर्शी है। यहाँ 'बाड़ी' शब्द का अर्थ 'विराजमान होना' या 'सजी-धजी' होना है। भजन की प्रथम पंक्तियों में भक्त माँ दुर्गा के उस भव्य रूप की वंदना करता है, जिसमें वे सिंह पर सवार होकर और लाल रंग की दिव्य चुनरी ओढ़कर अपने भक्तों के कल्याण के लिए प्रकट हुई हैं। लाल चुनरी शक्ति, सौभाग्य और मंगल का प्रतीक है, जबकि सिंह पर सवारी करना इस बात को दर्शाता है कि माँ संपूर्ण ब्रह्मांड की अनियंत्रित ऊर्जा और भय पर पूर्ण नियंत्रण रखती हैं।

भजन के विभिन्न अंतराओं में माँ के दिव्य श्रृंगार का वर्णन है। माथे की बिंदिया, मांग का सिंदूर, गले का हार, हाथों के कंगन, कानों के कुंडल और पैरों की पायल—ये सभी केवल आभूषण नहीं हैं, बल्कि ये प्रकृति की सुंदरता और ब्रह्मांडीय शक्तियों के प्रतीक हैं। माँ का यह सौम्य और ममतामयी रूप भक्तों को अभय प्रदान करता है। वहीं दूसरी ओर, जब माँ के हाथों में त्रिशूल और अन्य अस्त्र-शस्त्र दिखाई देते हैं, तो वह दुष्टों के संहार और अधर्म के नाश का प्रतीक बन जाता है। इस प्रकार, यह भजन माँ के दो रूपों—ममतामयी 'करुणामयी माँ' और दुष्टनाशिनी 'महिषासुरमर्दिनी'—का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन सनातन संस्कृति में देवी उपासना का एक अत्यंत लोकप्रिय माध्यम है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • सिंह सवारी का प्रतीक: सिंह उग्रता, क्रोध और अहंकार का प्रतीक है। माँ का सिंह पर सवार होना यह संदेश देता है कि साधक को अपनी इंद्रियों और क्रोध पर विजय प्राप्त करनी चाहिए।
  • लाल चुनरी का महत्त्व: लाल रंग ऊर्जा, उत्साह और संकल्प का प्रतीक है। माँ की लाल चुनरी भक्तों के जीवन में सकारात्मकता और नव-ऊर्जा का संचार करती है।
  • भक्ति और समर्पण: यह भजन साधक के मन में पूर्ण शरणागति का भाव जागृत करता है। जब भक्त गाता है कि "मैया करती है बेड़ा पार", तो उसका अहंकार समाप्त हो जाता है और वह स्वयं को माँ के चरणों में समर्पित कर देता है।
  • सामूहिक संकीर्तन: इस भजन की लय और धुन इतनी सरल और कर्णप्रिय है कि सामूहिक रूप से गाने पर यह पूरे वातावरण को भक्तिमय और स्पंदित कर देती है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि ईश्वर की आराधना किसी भी समय की जा सकती है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष नियम और समय अत्यंत फलदायी माने गए हैं:

  • सर्वोत्तम समय: सुबह और शाम की आरती के समय इस भजन का गायन अत्यंत शुभ माना जाता है। विशेषकर संध्या काल में माता की चौकी या जगराते के दौरान इसका गायन वातावरण को शुद्ध करता है।
  • विशेष अवसर: चैत्र और आश्विन मास के नवरात्रि के नौ दिनों में इस भजन का नित्य पाठ और गायन करने से माँ दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
  • गायन विधि: भजन गाते समय मन में पूर्ण पवित्रता और श्रद्धा होनी चाहिए। यदि संभव हो, तो माँ दुर्गा की प्रतिमा के समक्ष घी का दीपक जलाकर, उन्हें लाल पुष्प और चुनरी अर्पित करने के बाद ढोलक, मंजीरे या ताली की थाप पर सामूहिक रूप से इसका संकीर्तन करना चाहिए।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से आदिशक्ति माँ दुर्गा को समर्पित है। माँ दुर्गा, जिन्हें पार्वती, सती, और जगदम्बा के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में सर्वोच्च शक्ति की प्रतीक हैं। वे भगवान शिव की अर्धांगिनी हैं और समस्त सृष्टि की जननी हैं। इस भजन में माँ के सौम्य और उग्र दोनों रूपों की स्तुति की गई है।

यद्यपि यह एक पारंपरिक लोक-भजन है जिसकी रचना किसी विशिष्ट संत के नाम से नहीं जुड़ी है, परंतु यह भारत के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में सदियों से मौखिक परंपरा और लोक-संस्कृति के माध्यम से जीवित रहा है। उत्तर भारत के अनेक संतों और लोक-गायकों ने इस भजन को अपनी सुरीली आवाज देकर जन-जन तक पहुँचाया है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की पृष्ठभूमि भारतीय लोक-साहित्य और देवी-गीतों (देवी पचरा या जस) से प्रेरित है। भारत के ग्रामीण अंचलों में शक्ति पूजा की एक समृद्ध परंपरा रही है। जब भी फसल की कटाई होती है या कोई शुभ कार्य होता है, तो कुलदेवी की पूजा की जाती है। ऐसे ही अवसरों पर महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले गीतों से इस भजन का उद्भव हुआ है। समय के साथ, इस पारंपरिक लोक-गीत को आधुनिक संगीत वाद्ययंत्रों के साथ संयोजित कर एक सुप्रसिद्ध भजन का रूप दिया गया, जिसे आज देश-विदेश में बसे सभी सनातनी बड़े चाव से सुनते हैं।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और लोक-भाषा (खड़ी बोली और अवधी का मिश्रण) है। इसकी काव्य शैली अत्यंत प्रवाहमयी और गेय (गाने योग्य) है। इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकारों का सहज प्रयोग देखने को मिलता है।

भजन में प्रयुक्त शब्द जैसे 'हरवा', 'बिंदिया', 'नथुनी', 'पायल', और 'बिछुआ' भारतीय पारंपरिक आभूषणों को दर्शाते हैं, जो लोक-जीवन की सादगी और सौंदर्य को उजागर करते हैं। इसकी लयबद्धता इतनी तीव्र है कि यह सुनने वाले को स्वतः ही झूमने और ताली बजाने पर विवश कर देती है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन केवल मनोरंजन या सामान्य गायन के लिए नहीं है, बल्कि इसके भीतर गहरे आध्यात्मिक संदेश छिपे हैं:

  1. अहंकार का त्याग: सिंह जैसे हिंसक पशु को अपना वाहन बनाकर माँ यह सिखाती हैं कि हमें अपने भीतर के क्रोध, मद और लोभ रूपी हिंसक पशुओं को वश में करना चाहिए।
  2. नारी शक्ति का सम्मान: माँ दुर्गा का यह रूप शक्ति और सौंदर्य का अद्भुत प्रतीक है। यह समाज को संदेश देता है कि नारी केवल कोमल ही नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर दुष्टों का संहार करने वाली सबला भी है।
  3. विपदा में धैर्य: "भक्तों की मैया लाज बचावे, करती है बेड़ा पार"—यह पंक्ति हमें सिखाती है कि जीवन में चाहे कितनी भी बड़ी विपत्ति क्यों न आए, यदि हमारा विश्वास अटूट है, तो ईश्वर किसी न किसी रूप में हमारी सहायता अवश्य करते हैं।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
बाड़ी विराजमान होना / सजी हुई माँ का दिव्य और भव्य रूप में प्रकट होना।
शेर पर सवार सिंह की सवारी करने वाली क्रोध और अहंकार पर पूर्ण नियंत्रण का प्रतीक।
चुनरिया लाल रंग का वस्त्र / ओढ़नी सौभाग्य, शक्ति और मंगलमय ऊर्जा का प्रतीक।
हरवा गले का हार / माला भक्तों के प्रेम और श्रद्धा की माला।
त्रिशूल तीन शूलों वाला अस्त्र आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक तापों का नाश करने वाला।
बेड़ा पार संसार सागर से मुक्ति मोक्ष और जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

पंक्ति: "बाड़ी शेर पर सवार, मैया ओढ़ के चुनरिया..."
भावार्थ: माँ दुर्गा सिंह पर सवार होकर और अत्यंत सुंदर लाल चुनरी ओढ़कर अपने दिव्य रूप में विराजमान हैं। वे अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए आतुर हैं।

पंक्ति: "माथे पे मैया के बिंदिया सोहे, मांग में सिंदूर अपार..."
भावार्थ: माँ के मस्तक पर लगी बिंदिया और मांग का सिंदूर उनके अखंड सुहाग और ब्रह्मांड की सृजनात्मक शक्ति को प्रदर्शित करता है।

पंक्ति: "हाथ में मैया के त्रिशूल सोहे, दुष्टों का करती संहार..."
भावार्थ: माँ के हाथों में सुशोभित त्रिशूल इस बात का प्रतीक है कि वे अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहती हैं और समाज से बुराई व दुष्टता का समूल नाश करती हैं।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के साथ-साथ माँ दुर्गा के निम्नलिखित सिद्ध मंत्रों का जाप करने से पूजा का फल बहुगुणित हो जाता है:

॥ देवी स्तुति ॥

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

यह श्लोक माँ दुर्गा के कल्याणकारी रूप की वंदना करता है, जो सभी कार्यों को सिद्ध करने वाली और शरण में आए भक्तों की रक्षा करने वाली हैं। इसके अतिरिक्त, आप पार्वती स्तोत्र का पाठ भी कर सकते हैं।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम बाड़ी शेर पर सवार (Baadi Sher Par Sawar)
मुख्य देवी/देवता माँ दुर्गा (शेरावाली माता)
भाषा हिंदी (लोक-भाषा / अवधी मिश्रित)
मुख्य विषय देवी स्तुति, श्रृंगार और महिमा गान
भक्ति का भाव दास्य और माधुर्य भाव (समर्पण)
उपयुक्त अवसर नवरात्रि, माता की चौकी, जगराता, दुर्गा पूजा
संबंधित पाठ दुर्गा चालीसा, ॐ जय जगदीश हरे आरती

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन मुख्य रूप से आदिशक्ति माँ दुर्गा (शेरावाली माता) को समर्पित है, जो सिंह पर सवार होकर अपने भक्तों के कष्टों का निवारण करती हैं।

इस भजन को सुबह या शाम की आरती के समय, विशेषकर नवरात्रि के दिनों में या माता के जगराते के दौरान गाना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।

लोक-भाषा में 'बाड़ी' का अर्थ 'विराजमान होना' या 'सजी-धजी' अवस्था में प्रकट होना है। यहाँ इसका तात्पर्य माँ दुर्गा के भव्य रूप में सिंह पर विराजमान होने से है।

सिंह उग्रता और अनियंत्रित शक्ति का प्रतीक है। माँ का सिंह पर सवार होना यह दर्शाता है कि दिव्य शक्ति के माध्यम से हम अपने भीतर के क्रोध, अहंकार और पाशविक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण पा सकते हैं।

हाँ, माँ दुर्गा के भक्त अपने दैनिक पूजा-पाठ के दौरान इस भजन का नित्य गायन या श्रवण कर सकते हैं। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

इस भजन के साथ "ॐ दुं दुर्गायै नमः" या "सर्वमंगल मांगल्ये..." श्लोक का जाप करना अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है।

लाल रंग शक्ति, तेज, सुहाग और ऊर्जा का प्रतीक है। माँ को लाल चुनरी अर्पित करने से जीवन में सुख-समृद्धि और सौभाग्य का आगमन होता है।

हाँ, इस भजन की मधुर ध्वनि और लयबद्धता मस्तिष्क को शांत करती है, तनाव को दूर करती है और मन में सुरक्षा व भक्ति का भाव जगाती है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "बाड़ी शेर पर सवार" भजन के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक पहलुओं का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस सामग्री का संकलन पारंपरिक लोक-साहित्य, देवी भागवत पुराण के संदर्भों और सनातन धर्म की मान्यताओं के आधार पर किया गया है। यह संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसका उद्देश्य पाठकों को शुद्ध और प्रामाणिक जानकारी प्रदान करना है ताकि वे भक्ति मार्ग पर अग्रसर हो सकें।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्देवीभागवत महापुराण - शक्ति महिमा प्रसंग
  • पारंपरिक लोक-साहित्य एवं देवी पचरा संग्रह
  • सनातन धर्म की आरती एवं भजन परंपरा - कल्याण (गीताप्रेस, गोरखपुर)

संबंधित भजन एवं लेख

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 27 Sep 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!