भक्ति काव्य व भजन बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

पेन्ही के बबुआ के पापा पियरिया

पढ़ें पेन्ही के बबुआ के पापा पियरिया का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्तिलोक पर।

बिहार, उत्तर प्रदेश और संपूर्ण भारतवर्ष में आस्था के महापर्व छठ पूजा का एक विशेष और अद्वितीय सांस्कृतिक महत्व है। इस पावन अवसर पर गाए जाने वाले लोकगीत न केवल पर्व की शोभा बढ़ाते हैं, बल्कि भक्तों के हृदय में अगाध श्रद्धा और भक्ति का संचार भी करते हैं। ऐसा ही एक अत्यंत लोकप्रिय और कर्णप्रिय भोजपुरी छठ गीत है "पेन्ही के बबुआ के पापा पियरिया" (Penhi Ke Babua Ke Papa Piyariya)। इस गीत को सुप्रसिद्ध लोक गायक खेसारी लाल यादव (Khesari Lal Yadav) और सुरीली गायिका शिल्पी राज (Shilpi Raj) ने अपनी मधुर आवाजों से सजाया है। यह गीत दाम्पत्य जीवन के मधुर संबंधों, पारिवारिक सहयोग और सूर्य देव व छठी मैया के प्रति पूर्ण समर्पण को दर्शाता है। इस विस्तृत लेख में हम इस गीत के संपूर्ण बोल (Lyrics), उसका गहरा भावार्थ, सांस्कृतिक संदर्भ, कठिन शब्दों के अर्थ और इस महापर्व से जुड़ी आध्यात्मिक सीख का गहन विश्लेषण करेंगे।

सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics

पेन्ही के बबुआ के पापा पियरिया

(मुखड़ा)
पेन्ही के बबुआ के पापा पियरिया, दौरा माथे पर उठाईं ना!
चलीं ना घाट ए सइयां, अरघ के बेर भईल बा!
पेन्ही के बबुआ के पापा पियरिया, दौरा माथे पर उठाईं ना!
चलीं ना घाट ए सइयां, अरघ के बेर भईल बा!

(अंतरा - 1)
कांचे ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए!
बात जे पूछें बटोहिया, बहंगी केकरा के जाए?
तू तऽ चलीं ना ए सइयां धीरे-धीरे, डगरिया जोहत होईहें छठी माई!
पेन्ही के बबुआ के पापा पियरिया, दौरा माथे पर उठाईं ना!
चलीं ना घाट ए सइयां, अरघ के बेर भईल बा!

(अंतरा - 2)
गंगा जी के पावन तीरे, घाट सजल बा अपार!
दीपक जलत बाटे घीव के, करत सब जय-जयकार!
मनसा पूरण करीहें छठी मैया, गोदिया में खेलीहें बबुआ हमार!
पेन्ही के बबुआ के पापा पियरिया, दौरा माथे पर उठाईं ना!
चलीं ना घाट ए सइयां, अरघ के बेर भईल बा!

(अंतरा - 3)
सभ परिवार मिलि गावे, छठी माई के पावन गीत!
नेह अउर श्रद्धा से सजल, बाटे ई पावन प्रीत!
खेसारी गावेले महिमा अपार, शिल्पी के मन हरषाई बा!
पेन्ही के बबुआ के पापा पियरिया, दौरा माथे पर उठाईं ना!
चलीं ना घाट ए सइयां, अरघ के बेर भईल बा!

गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth

यह गीत छठ पूजा के पावन अवसर पर एक सुहागिन स्त्री (व्रती) और उसके पति के बीच के आत्मीय और भक्तिमय संवाद को दर्शाता है। छठ पूजा में पवित्रता, सादगी और पारिवारिक सहयोग का बहुत बड़ा महत्व होता है। इस गीत के माध्यम से पत्नी अपने पति से आग्रह करती है कि वे पूजा के लिए तैयार हो जाएं और पारंपरिक अनुष्ठानों में हाथ बटाएं।

पीले वस्त्र (पियरिया) और दौरा उठाने का आग्रह

गीत की शुरुआत में पत्नी अपने पति को 'बबुआ के पापा' कहकर संबोधित करती है, जो भोजपुरी समाज की एक अत्यंत मधुर और पारंपरिक शैली है। वह कहती है कि हे स्वामी! आप शुभ और पवित्र पीले रंग की धोती (पियरिया) धारण कर लीजिए और पूजा की सामग्रियों से भरा हुआ बांस का दौरा (दउरा) अपने सिर पर उठा लीजिए। संध्या अर्घ्य का समय हो चुका है, इसलिए हमें बिना किसी विलंब के पवित्र नदी या तालाब के घाट की ओर प्रस्थान करना चाहिए।

बहंगी और मार्ग की सुगमता

गीत के पहले अंतरे में पारंपरिक छठ गीत की पंक्तियों "कांचे ही बांस के बहंगिया" का सुंदर समावेश किया गया है। पत्नी कहती है कि कच्चे बांस से बनी यह बहंगी (जिसमें पूजा का प्रसाद और फल रखे हैं) बहुत भारी होने के कारण लचक रही है। रास्ते में चलने वाले राही (बटोहिया) पूछ रहे हैं कि यह सुंदर बहंगी किसके लिए जा रही है? पत्नी पति से कहती है कि आप धीरे-धीरे और सावधानी से कदम बढ़ाएं, क्योंकि छठी मैया घाट पर हमारी प्रतीक्षा कर रही हैं।

घाट की सुंदरता और संतान सुख की कामना

दूसरे अंतरे में गंगा घाट की अलौकिक सुंदरता का वर्णन है। गंगा नदी के किनारे सुंदर घाट सजे हुए हैं, जहां घी के अनगिनत दीपक प्रज्वलित हो रहे हैं और चारों ओर छठी मैया के जयकारे गूंज रहे हैं। पत्नी पूर्ण विश्वास के साथ कहती है कि छठी मैया हमारी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करेंगी और हमारी सूनी गोद को भरकर हमारे घर में खुशहाली लाएंगी।

गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message

इस गीत की मुख्य भावना समर्पण, दाम्पत्य प्रेम, और अटूट श्रद्धा है। छठ पूजा केवल एक व्यक्तिगत व्रत नहीं है, बल्कि यह पूरे परिवार को एक सूत्र में बांधने वाला पर्व है। इस गीत में निम्नलिखित महत्वपूर्ण संदेश छिपे हैं:

  • पारिवारिक सहभागिता: व्रत रखने वाली महिला (परवैतिन) अकेले इस कठिन व्रत को पूर्ण नहीं कर सकती। पति का दौरा उठाना और घाट तक साथ चलना दाम्पत्य जीवन में सहयोग और समानता का प्रतीक है।
  • पवित्रता और सादगी: पीले वस्त्र (पियरिया) और मिट्टी व बांस के बर्तनों का उपयोग प्रकृति के प्रति सम्मान और सादगी को दर्शाता है।
  • आस्था और विश्वास: छठी मैया के प्रति अटूट विश्वास ही मनुष्य को कठिन से कठिन साधना करने की शक्ति प्रदान करता है।

गीत की जानकारी | Song Information

विवरण क्षेत्र महत्वपूर्ण जानकारी
गीत का नाम (Song Name) पेन्ही के बबुआ के पापा पियरिया (Penhi Ke Babua Ke Papa Piyariya)
मुख्य गायक (Singers) खेसारी लाल यादव (Khesari Lal Yadav) एवं शिल्पी राज (Shilpi Raj)
गीत की भाषा (Language) भोजपुरी (Bhojpuri)
मुख्य विषय (Theme) छठ पूजा लोकगीत (Chhath Puja Devotional Folk Song)
संगीत शैली (Music Style) पारंपरिक एवं आधुनिक भोजपुरी लोक संगीत
मुख्य वाद्य यंत्र ढोलक, मंजीरा, बांसुरी, और सिंथेसाइज़र

गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators

इस गीत की सफलता के पीछे इसके कलाकारों का अद्भुत योगदान है। खेसारी लाल यादव भोजपुरी संगीत जगत के एक ऐसे स्तंभ हैं, जिनके छठ गीत हर साल करोड़ों लोगों के घरों में गूंजते हैं। उनकी आवाज में मिट्टी की सोंधी खुशबू और भक्ति का अनूठा संगम होता है। वहीं, शिल्पी राज ने अपनी तीखी और सुरीली आवाज से इस गीत में महिला व्रती के भावों को जीवंत कर दिया है। दोनों कलाकारों की जुगलबंदी ने इस पारंपरिक गीत को आधुनिक पीढ़ी के बीच भी बेहद लोकप्रिय बना दिया है।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings

कठिन शब्द सरल हिंदी अर्थ सांस्कृतिक संदर्भ व महत्व
पियरिया (Piyariya) पीले रंग का पारंपरिक वस्त्र (धोती या साड़ी) हिंदू धर्म में पीला रंग अत्यंत शुभ, पवित्र और सूर्य देव की ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।
बबुआ (Babua) छोटा बच्चा या पुत्र भोजपुरी लोक संस्कृति में पति को आदरपूर्वक संबोधित करने के लिए 'बबुआ के पापा' कहा जाता है।
दौरा / दउरा (Daura) बांस की तीलियों से बना बड़ा टोकरा इसमें छठ पूजा का मुख्य प्रसाद जैसे ठेकुआ, फल, नारियल और गन्ना रखकर घाट पर ले जाया जाता है।
अरघ (Arghya) अर्घ्य (सूर्य देव को जल अर्पित करना) छठ पूजा के दौरान अस्ताचलगामी (डूबते) और उदीयमान (उगते) सूर्य को दूध और जल अर्पित करने की क्रिया।
बहंगिया (Bahangiya) बांस की लचीली पट्टी जिससे दोनों ओर टोकरे लटकाए जाते हैं यह पारंपरिक रूप से पूजा सामग्री को कंधे पर रखकर ले जाने का साधन है।
बटोहिया (Batohiya) राही या मुसाफिर मार्ग पर चलने वाले लोग जो श्रद्धापूर्वक बहंगी ले जाने वाले से प्रश्न करते हैं।

गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance

छठ पूजा का त्योहार पूर्णतः प्रकृति, स्वच्छता और अनुशासन को समर्पित है। इस गीत में प्रयुक्त शब्द और बिम्ब जैसे "गंगा जी के पावन तीरे" और "दीपक जलत बाटे घीव के" सीधे तौर पर हमारी वैदिक परंपराओं से जुड़े हैं।

सनातन धर्म में सूर्य को प्रत्यक्ष देवता माना गया है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि वे ही सूर्य की तेजस्विता हैं। छठ पर्व के दौरान गाए जाने वाले इन गीतों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि ये शास्त्रीय अनुष्ठानों को लोक जीवन की सरलता से जोड़ते हैं। जब एक परिवार सामूहिक रूप से इन गीतों को गाता है, तो घर का वातावरण शुद्ध और सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है।

गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons

यह गीत केवल मनोरंजन या भक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमें कई महत्वपूर्ण जीवन मूल्य भी सिखाता है:

  1. सहयोग की भावना (Cooperation): कठिन से कठिन कार्य भी यदि परिवार के सदस्य मिलकर करें, तो वह सहज और आनंदमयी बन जाता है।
  2. प्रकृति से जुड़ाव (Connection with Nature): बांस की बहंगी, मिट्टी के दीये और नदी का किनारा हमें अपनी जड़ों और प्रकृति के करीब लाते हैं।
  3. धैर्य और अनुशासन (Patience & Discipline): "धीरे-धीरे चलीं ना ए सइयां" पंक्ति हमें जीवन की डगर पर धैर्यपूर्वक और संभलकर चलने की सीख देती है।

गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing

यद्यपि इस गीत को कार्तिक मास के आते ही पूरे उत्तर भारत में सुना जाने लगता है, परंतु इसके श्रवण और गायन के विशेष अवसर निम्नलिखित हैं:

  • खरना के दिन: जब व्रती प्रसाद ग्रहण करने के बाद निर्जला व्रत का संकल्प लेते हैं।
  • संध्या अर्घ्य के समय: जब पूरा परिवार दौरा उठाकर घाट की ओर प्रस्थान करता है।
  • उषा अर्घ्य के समय: सुबह के समय जब उगते सूर्य देव की प्रतीक्षा की जाती है।

एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance

मुख्य बिंदु संक्षिप्त विवरण
गीत का शीर्षक पेन्ही के बबुआ के पापा पियरिया
मुख्य गायक खेसारी लाल यादव, शिल्पी राज
त्योहार छठ पूजा (महापर्व)
मुख्य पात्र पति (बबुआ के पापा) और पत्नी (व्रती)
मुख्य संदेश पारिवारिक एकता, प्रकृति पूजा और अटूट श्रद्धा
उपयुक्त समय कार्तिक मास, छठ पूजा के चारों दिन

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस बेहद लोकप्रिय छठ गीत को भोजपुरी के प्रसिद्ध लोक गायक खेसारी लाल यादव और सुरीली गायिका शिल्पी राज ने गाया है।

'पियरिया' का अर्थ पीले रंग के पारंपरिक वस्त्र (धोती या साड़ी) से है, जिसे हिंदू धर्म में किसी भी शुभ और मांगलिक कार्य, विशेषकर पूजा-पाठ के समय पहनना अत्यंत पवित्र माना जाता है।

छठ पूजा में पति द्वारा दौरा उठाना परिवार के प्रति जिम्मेदारी, सहयोग और दाम्पत्य जीवन में आपसी सामंजस्य का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि धार्मिक अनुष्ठानों में दोनों की समान भागीदारी है।

यह पंक्ति पारंपरिक छठ गीतों से ली गई है, जिसका अर्थ है कि कच्चे बांस से बनी बहंगी अत्यंत पवित्र और नाजुक होती है, जिसे बहुत ही सावधानी और शुद्धता के साथ ले जाना होता है।

यह गीत विशेष रूप से कार्तिक मास में मनाए जाने वाले लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा के अवसर पर गाया और सुना जाता है।

छठ पूजा में प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य देव और उनकी शक्ति छठी मैया (उषा और प्रत्युषा) की पूजा-अर्चना की जाती है।

इस गीत का मुख्य संदेश पारिवारिक सहयोग, आपसी प्रेम, सादगी, पवित्रता और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना को सुदृढ़ करना है।

नहीं, यह गीत बिहार के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, झारखंड और देश-विदेश में जहां भी भोजपुरी भाषी और छठ पर्व मनाने वाले लोग रहते हैं, वहां अत्यंत चाव से सुना जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस गीत का विश्लेषण लोक परंपराओं, भोजपुरी संस्कृति के विशेषज्ञों और पारंपरिक छठ पूजा के शास्त्रीय महत्व को ध्यान में रखकर किया गया है। गीत के बोलों की शुद्धता और उसके सांस्कृतिक निहितार्थों को पूरी तरह से सत्यापित किया गया है ताकि पाठकों को एक प्रामाणिक और ज्ञानवर्धक अनुभव प्राप्त हो सके।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • बिहार एवं पूर्वांचल की लोक संस्कृति और पारंपरिक छठ गीत संग्रह।
  • श्रीमद्भगवद्गीता (सूर्य देव की उपासना और तेज का संदर्भ)।
  • भोजपुरी लोक साहित्य एवं संगीत समीक्षात्मक ग्रंथ।

संबंधित भजन एवं लेख

यदि आप छठ पूजा और अन्य पावन भजनों के बारे में अधिक जानना चाहते हैं, तो हमारे निम्नलिखित लेखों को अवश्य पढ़ें:

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 10 Oct 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!