Parvati Stotram

चाहे बेटी कितनी प्यारी हो || Devendra Pathak ji Nirgun Bhajan || New Bhakti Song || Ambey Bhakti - BhaktiLok

96 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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प्रसिद्ध भजन गायक आदरणीय देवेंद्र पाठक जी महाराज की सुमधुर आवाज में गाया गया निर्गुण भजन "चाहे बेटी कितनी प्यारी हो, एक दिन तो विदा होना ही पड़ेगा" सनातन धर्म के गूढ़ दार्शनिक सत्यों को अत्यंत सरल और मर्मस्पर्शी रूप में प्रस्तुत करता है। यह भजन केवल एक लौकिक कन्या की विदाई का गीत नहीं है, बल्कि यह जीवात्मा (आत्मा) की इस नश्वर संसार (मायके) से विदाई और परमात्मा (ससुराल) के मिलन की शाश्वत यात्रा का जीवंत चित्रण है। निर्गुण भक्ति परंपरा में कबीरदास जी के पदों की भांति, इस भजन में भी रूपकों के माध्यम से जीवन की क्षणभंगुरता, मृत्यु की अपरिहार्यता और ईश्वर भक्ति की महत्ता को दर्शाया गया है। जब साधक इस भजन का श्रवण करता है, तो उसके भीतर वैराग्य भाव का उदय होता है और वह संसार की असारता को समझकर प्रभु चरणों में लीन होने के लिए प्रेरित होता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ चाहे बेटी कितनी प्यारी हो ॥

कोरस (मुखड़ा):
चाहे बेटी कितनी प्यारी हो, एक दिन तो विदा होना ही पड़ेगा।
चाहे काया कितनी प्यारी हो, एक दिन तो जुदा होना ही पड़ेगा॥

अंतरा १:
मात-पिता और भाई-भतीजे, सब रोते रह जाएंगे।
जब यम के दूत आएंगे, कोई बचा न पाएंगे।
चाहे दौलत कितनी सारी हो, सब यहीं छोड़ जाना ही पड़ेगा॥

अंतरा २:
यह काया माटी की ढेरी, माटी में मिल जाएगी।
सुंदरता और जवानी तेरी, पल भर में ढल जाएगी।
चाहे कोठी महल अटारी हो, एक दिन तो विदा होना ही पड़ेगा॥

अंतरा ३:
राम नाम का सुमिरन कर ले, यही साथ में जाएगा।
खाली हाथ तू आया जग में, खाली हाथ ही जाएगा।
चाहे कितनी बड़ी होशियारी हो, अंत में पछताना ही पड़ेगा॥

अंतरा ४:
सच्चा साजन वो अविनाशी, जिसके घर हमें जाना है।
इस झूठे जग के बंधन से, नाता हमें छुड़ाना है।
चाहे दुनिया कितनी प्यारी हो, इसे छोड़ के जाना ही पड़ेगा॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस पावन निर्गुण भजन का भावार्थ अत्यंत गहरा और वैराग्य से परिपूर्ण है। यहाँ 'बेटी' को जीवात्मा का प्रतीक माना गया है। जिस प्रकार एक पिता अपनी पुत्री को अत्यंत लाड-प्यार से पालता है, परंतु एक दिन सामाजिक मर्यादा और सृष्टि के नियम के अनुसार उसे अश्रुपूरित नेत्रों से विदा करना ही पड़ता है, ठीक उसी प्रकार यह मनुष्य शरीर (काया) हमें चाहे कितनी भी प्रिय क्यों न हो, एक दिन मृत्यु आने पर इस जीवात्मा को इस शरीर को छोड़कर जाना ही पड़ता है।

भजनकार कहते हैं कि जब जीवन का अंतिम क्षण आता है, तब परिवार के सभी सदस्य—माता, पिता, भाई, बंधु—केवल देखते रह जाते हैं और कोई भी काल (यमराज) के दूतों से रक्षा नहीं कर पाता। मनुष्य जीवन भर जिस धन-दौलत, कोठी, महल और अटारी को संचित करने में लगा रहता है, वह सब यहीं धरी की धरी रह जाती है। अंत समय में केवल भगवान का नाम (राम नाम) ही जीव के साथ जाता है। इसलिए, इस नश्वर संसार के मोह-माया के बंधनों से ऊपर उठकर उस अविनाशी परमात्मा की शरण में जाना ही जीवन का परम लक्ष्य होना चाहिए।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

देवेंद्र पाठक जी द्वारा गाए गए इस भजन की कई ऐसी विशेषताएं हैं जो इसे सामान्य भजनों से अलग और विशिष्ट बनाती हैं:

  • वैराग्य रस की प्रधानता: यह भजन श्रोता के मन में संसार के प्रति आसक्ति को कम कर वैराग्य और भक्ति का संचार करता है।
  • सरल और मर्मस्पर्शी रूपक: बेटी की विदाई के माध्यम से मृत्यु जैसे कठिन और कड़वे सत्य को अत्यंत सहजता से समझाया गया है।
  • चेतावनी और जागृति: यह भजन सोई हुई आत्मा को जगाने का कार्य करता है, जिससे मनुष्य सत्कर्मों की ओर प्रवृत्त हो सके।
  • संगीत की मधुरता: देवेंद्र पाठक जी की शास्त्रीय और लोक शैली का अनूठा मिश्रण इस भजन को सीधे हृदय तक पहुंचाता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

निर्गुण भजनों के गायन और श्रवण के लिए कोई विशेष बंधन नहीं होता, परंतु कुछ विशेष अवसरों पर इसका प्रभाव और भी अधिक बढ़ जाता है:

  • अमृतवेला या संध्या काल: सुबह के समय शांत वातावरण में या संध्या आरती के बाद इस भजन को सुनने से मन शांत होता है और आत्मचिंतन की प्रेरणा मिलती है।
  • सत्संग और प्रवचन: धार्मिक सभाओं, सत्संगों और कथाओं के विश्राम के समय इस भजन का गायन श्रोताओं को गहरे ध्यान में ले जाता है।
  • श्रवण विधि: इस भजन को शांत चित्त होकर, आंखें बंद करके सुनना चाहिए ताकि इसके शब्दों के पीछे छिपे दार्शनिक अर्थ को आत्मसात किया जा सके।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन किसी सगुण साकार देवता (जैसे राम या कृष्ण के भौतिक रूप) की स्तुति न करके निर्गुण निराकार ब्रह्म की ओर संकेत करता है। यह संत कबीरदास, संत रैदास और गुरु नानक देव जी की निर्गुण विचारधारा से प्रेरित है। इसमें 'राम' शब्द का प्रयोग दशरथ पुत्र राम के लिए नहीं, बल्कि कण-कण में रमे हुए उस अविनाशी तत्व के लिए किया गया है जो सृष्टि का नियंता है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

भारतीय लोक संगीत और संत साहित्य में विदाई गीतों की एक लंबी परंपरा रही है। कबीरदास जी ने अपने कई पदों में आत्मा को 'दुल्हन' और परमात्मा को 'वर' या 'दूल्हा' कहा है। देवेंद्र पाठक जी ने इसी पारंपरिक लोक दर्शन को आधुनिक संगीत और सरल भाषा के साथ प्रस्तुत किया है ताकि आज की युवा पीढ़ी भी इस शाश्वत सत्य से परिचित हो सके।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें अवधी और भोजपुरी लोक बोलियों का पुट है। इसकी काव्य शैली अत्यंत सरल और गेय (गाने योग्य) है। इसमें रूपक अलंकार (बेटी = आत्मा, मायका = संसार, ससुराल = परलोक) का उत्कृष्ट प्रयोग किया गया है। शांत और करुण रस का यह अनूठा संगम श्रोता को भाव-विभोर कर देता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण जीवन सीख देता है:

  1. जीवन की अनित्यता: संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है, इसलिए अत्यधिक मोह-माया से बचना चाहिए।
  2. सत्कर्मों का संचय: मृत्यु के बाद केवल हमारे द्वारा किए गए अच्छे कर्म और ईश्वर का नाम ही हमारे साथ जाता है।
  3. अहंकार का त्याग: सुंदरता, यौवन और धन-दौलत का अहंकार व्यर्थ है क्योंकि ये सब क्षणभंगुर हैं।
  4. शरणगति भाव: उस अविनाशी परमात्मा को ही अपना वास्तविक संबंधी मानना चाहिए।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

कठिन शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
बेटी / कन्या पुत्री जीवात्मा (आत्मा) जो इस संसार में कुछ समय के लिए आई है।
विदा होना प्रस्थान करना / विदाई मृत्यु के समय शरीर का त्याग कर परलोक की यात्रा पर जाना।
काया शरीर / देह पंच तत्वों से बनी नश्वर देह जो अंततः नष्ट हो जाती है।
माटी की ढेरी मिट्टी का ढेर शरीर की नश्वरता, जो अंत में मिट्टी में मिल जाती है।
सुमिरन स्मरण / जप परमात्मा के नाम का निरंतर ध्यान और नाम-जप।
अविनाशी जिसका कभी नाश न हो परमेश्वर / ब्रह्म जो अजन्मा और अमर है।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"चाहे बेटी कितनी प्यारी हो, एक दिन तो विदा होना ही पड़ेगा..."
जिस प्रकार माता-पिता अपनी पुत्री से अगाध प्रेम करते हैं, फिर भी उसे एक दिन विदा करना ही पड़ता है, उसी प्रकार हमें यह शरीर चाहे कितना भी प्रिय हो, एक दिन इसे छोड़ना ही होगा।

"मात-पिता और भाई-भतीजे, सब रोते रह जाएंगे..."
मृत्यु के समय सांसारिक संबंधी केवल विलाप कर सकते हैं, वे यमदूतों के पाश से जीव को मुक्त कराने में सर्वथा असमर्थ होते हैं।

"यह काया माटी की ढेरी, माटी में मिल जाएगी..."
यह सुंदर दिखने वाला शरीर अंततः पंचतत्वों में विलीन हो जाएगा। भौतिक सौंदर्य और युवावस्था का अंत निश्चित है।

"राम नाम का सुमिरन कर ले, यही साथ में जाएगा..."
संसार की कोई भी भौतिक वस्तु परलोक में सहायक नहीं होती। केवल भगवान का नाम ही जीव का सच्चा संबल बनता है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के दार्शनिक संदेश की पुष्टि श्रीमद्भगवद्गीता के इस सुप्रसिद्ध श्लोक से होती है:

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥

अर्थ: जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार जीवात्मा पुराने और जीर्ण शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम चाहे बेटी कितनी प्यारी हो (निर्गुण भजन)
गायक देवेंद्र पाठक जी महाराज
संगीत श्रेणी निर्गुण भक्ति / लोक भजन
मुख्य रस शांत रस एवं करुण रस
मुख्य विषय जीवन की नश्वरता, मृत्यु का सत्य और भगवद-भक्ति
प्रस्तुतकर्ता अम्बे भक्ति (Ambey Bhakti)
संबंधित श्रेणियां Krishna Stotram, Parvati Stotram, Om Jai Jagdish Aarti

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

"चाहे बेटी कितनी प्यारी हो" भजन का मुख्य संदेश क्या है?

इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि मानव जीवन और यह भौतिक शरीर नश्वर है। जिस प्रकार बेटी को एक दिन मायका छोड़कर जाना पड़ता है, उसी प्रकार जीवात्मा को भी यह शरीर छोड़कर परमात्मा के पास जाना है। इसलिए हमें सांसारिक मोह में न पड़कर ईश्वर भक्ति करनी चाहिए।

निर्गुण भजन किसे कहते हैं?

निर्गुण भजन वे होते हैं जो ईश्वर के निराकार, अजन्मा और सर्वव्यापी रूप की आराधना करते हैं। इनमें जीवन के सत्य, वैराग्य, मृत्यु और आत्मा-परमात्मा के संबंध पर विशेष बल दिया जाता है।

इस भजन के गायक देवेंद्र पाठक जी की गायन शैली की क्या विशेषता है?

देवेंद्र पाठक जी महाराज अपनी शास्त्रीय और पारंपरिक लोक शैली के लिए जाने जाते हैं। उनकी आवाज में एक विशेष प्रकार का ठहराव और भावुकता होती है, जो निर्गुण भजनों के लिए अत्यंत उपयुक्त है।

भजन में 'राम नाम' का क्या महत्व बताया गया है?

भजन के अनुसार, मृत्यु के बाद धन, संपत्ति या परिवार का कोई सदस्य हमारे साथ नहीं जाता। केवल 'राम नाम' का सुमिरन और हमारे सत्कर्म ही परलोक की यात्रा में हमारे साथ जाते हैं।

क्या यह भजन केवल शोक के समय सुना जाता है?

नहीं, यह भजन किसी भी समय सुना जा सकता है। यह हमें जीवन के वास्तविक उद्देश्य की याद दिलाता है और हमें अहंकार मुक्त होकर धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

इस भजन में 'काया' को 'माटी की ढेरी' क्यों कहा गया है?

क्योंकि हमारा शरीर मिट्टी (पंचतत्वों) से बना है और मृत्यु के पश्चात इसे पुनः मिट्टी में ही मिल जाना है। इसकी क्षणभंगुरता को दर्शाने के लिए इसे 'माटी की ढेरी' कहा गया है।

इस भजन का संगीत किस प्रकार का है?

यह भजन अत्यंत ही सुमधुर, धीमा और हृदय को छूने वाले पारंपरिक वाद्यों (जैसे हारमोनियम, तबला और ढोलक) के साथ गाया गया है, जो मन को शांत करता है।

क्या यह भजन कबीरदास जी के दर्शन से प्रभावित है?

हाँ, यह भजन पूरी तरह से संत कबीरदास जी के 'चदरिया झीनी रे झीनी' और 'दुल्हन गावहू मंगलाचार' जैसे पदों के दर्शन से प्रेरित है, जहाँ आत्मा को दुल्हन के रूप में चित्रित किया गया है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख Bhaktilok.in के विद्वान संपादकों द्वारा तैयार किया गया है। इस सामग्री का उद्देश्य पाठकों को सनातन धर्म के निर्गुण दर्शन और लोक भजनों के गहरे आध्यात्मिक अर्थों से परिचित कराना है। यह एक संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जो पारंपरिक स्रोतों और प्रामाणिक संत साहित्यों के गहन अध्ययन पर आधारित है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भगवद्गीता - द्वितीय अध्याय (सांख्य योग)
  • संत कबीर ग्रंथावली - निर्गुण पद संग्रह
  • पारंपरिक भारतीय लोक संगीत एवं भजन संग्रह

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 27 Sep 2026

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