bholenath bhajan lyrics

भोलेनाथ की सवारी निकली शान से

78 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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भole Nath Ki Sawari Nikli Shaan Se - महादेव की महिमा और दिव्य संकीर्तन

देवादिदेव महादेव भगवान शिव को समर्पित यह पावन भजन "भोलेनाथ की सवारी निकली शान से" भगवान शिव के कल्याणकारी, अघोरी, और वैराग्यपूर्ण स्वरूप का अत्यंत जीवंत और अद्भुत चित्रण करता है। सनातन संस्कृति में भगवान शिव को संहारक के साथ-साथ परम कल्याणकारी माना गया है, जिनका अर्थ ही समस्त जीवों का कल्याण करना है। इस भजन के प्रत्येक शब्द के माध्यम से साधक भगवान शिव की अनंत चेतना, महाकाल स्वरूप, भस्म आरती, डमरू की पावन ध्वनि और उनकी ध्यानमग्न मुद्रा का मानसिक स्मरण करता है। शिव भक्ति का मूल सिद्धांत यही है कि जगत की प्रत्येक नश्वर वस्तु का अंत और पुनः उत्पत्ति शिव में ही समाहित है। यह भजन भक्त को सांसारिक मोह-माया, राग-द्वेष और अहंकार से ऊपर उठकर आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानने की प्रेरणा देता है। शिव का नाम स्मरण करने मात्र से पंचमहाभूतों को नियंत्रित करने वाली परम शक्ति जाग्रत हो जाती है, जो साधक के जीवन के समस्त दुखों और संतापों का नाश कर देती है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ भोलेनाथ की सवारी निकली शान से ॥

भोलेनाथ की सवारी निकली शान से,
गूंजे डमरू की ध्वनि ब्रह्मांड में महान से।
नंदी पर सवार होकर चले शिव शम्भू,
देखकर रूप निराला झुके सुर और साधु॥

गले में नागराज विराजे, मुंडमाल सोहे,
त्रिपुंड ललाट पर ऐसा जो हर भक्त का मन मोहे।
जटाओं से बहे गंगा पावन, चन्द्रमा विराजे,
भस्म रमे तन पर ऐसी जो त्रैलोक्य में साजे॥

डम-डम डमरू बाजे, छम-छम घुंघरू बाजे,
भूत-प्रेत गण संग में नाचे और गाएं राज़े।
भोलेनाथ की सवारी निकली शान से,
गूंजे डमरू की ध्वनि ब्रह्मांड में महान से॥

कैलाशपति जब नगरी में आएं दर्शन देने,
भक्तों के सारे संकट पल में हरने लेने।
एक लोटा जल और बेलपत्र जो चढ़ावे,
महादेव उसकी हर इच्छा झोली में पावे॥

नंदी की सवारी और शिव का यह डेरा,
मिट जाता है जीवन का हर एक अंधेरा।
बोलो बम-बम भोले, हर-हर महादेव का नारा,
भक्तों को प्यारा लगे यह कैलाश का दुलारा॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस दिव्य भजन के माध्यम से रचयिता ने भगवान शिव के प्रस्थान और उनकी बारात अथवा सवारी के अनूठे दृश्य का वर्णन किया है। जब देवादिदेव महादेव अपनी जटाओं में गंगा और मस्तक पर चंद्रमा को धारण कर नंदी महाराज पर सवार होकर निकलते हैं, तो ब्रह्मांड के सभी देवी-देवता, गंधर्व और ऋषि-मुनि उनके दर्शन के लिए नतमस्तक हो जाते हैं। भजन की पंक्तियाँ बताती हैं कि शिव का श्रृंगार कोई सांसारिक आभूषणों से नहीं, बल्कि प्रकृति और वैराग्य के प्रतीकों से सुसज्जित है—जैसे गले में नागराज और शरीर पर श्मशान की भस्म। यह इस बात का प्रतीक है कि भगवान शिव मृत्यु और भय से परे हैं और जो साधक उनकी शरण में जाता है, वह सभी प्रकार के भौतिक और आध्यात्मिक भयों से मुक्त हो जाता है। डमरू की ध्वनि और भूत-प्रेतों का गण उनके साथ चलना यह दर्शाता है कि शिव इस सृष्टि के प्रत्येक जीव—चाहे वह साधारण हो या अलौकिक—को अपने प्रेम और करुणा के आंचल में स्थान देते हैं।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

शिव भजन का संकीर्तन सनातन धर्म में अत्यंत पुण्यदायी और मानसिक शांति प्रदान करने वाला माना गया है। भगवान शिव को 'आशुतोष' कहा जाता है, जिसका अर्थ है जो अत्यंत शीघ्र प्रसन्न हो जाएं। पुराणों के अनुसार, शिवजी को प्रसन्न करने के लिए किसी बड़े अनुष्ठान या कठिन तपस्या की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि सच्चे भाव से अर्पित किया गया एक लोटा जल और एक बेलपत्र ही पर्याप्त है। इस भजन का निरंतर पाठ या श्रवण करने से साधक की कुंडली के चंद्र दोष, राहु-केतु के प्रभाव तथा कालसर्प योग जैसे कष्ट शांत होते हैं। यह भजन व्यक्ति में साहस, संतोष और वैराग्य की भावना का संचार करता है। विशेष अवसरों जैसे महाशिवरात्रि, सावन मास और प्रदोष व्रत के दौरान इस भजन का गान करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है और नकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस पावन शिव भजन को प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में या संध्या बेला में भगवान शिव के ध्यान के समय गाना या सुनना सबसे उत्तम माना गया है। सावन के पवित्र महीने में और प्रत्येक सोमवार को शिव मंदिर में दीप प्रज्वलित करके इस भजन का सामूहिक संकीर्तन करने से विशेष कृपा प्राप्त होती है। भजन गाने से पूर्व साधक को स्नान करके पवित्र वस्त्र धारण करने चाहिए और शिव प्रतिमा या शिवलिंग के समक्ष धूप-दीप जलाकर आसन पर बैठना चाहिए। ताली बजाकर और प्रेम भाव के साथ इस भजन को गाने से मन की एकाग्रता बढ़ती है और हृदय में भक्ति रस का संचार होता है.

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन के केंद्र बिंदु देवादिदेव महादेव, माता पार्वती और उनके वाहन नंदी महाराज हैं। शिव परंपरा (शैव मत) में महादेव को आदि गुरु और योगेश्वर माना गया है। आदि शंकराचार्य से लेकर संत तुलसीदास और विभिन्न नाथ योगियों ने शिव महिमा का गान किया है। भगवान शिव की यह सवारी साधक को जीव और शिव के मिलन का मार्ग दिखाती है। भगवान शिव के साथ उनके गणों का स्मरण यह सिखाता है कि भक्ति में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह भजन पारंपरिक लोक कथाओं, शिव पुराण की कथाओं और लोक संस्कृति की सुदृढ़ परंपरा पर आधारित है। लोक गायकों और संतों ने शिव विवाह, शिव बारात और शिव सवारी के प्रसंगों को अपने पदों के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाया है। यह भजन उसी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का एक हिस्सा है, जो ग्रामीण अंचलों से लेकर बड़े धार्मिक उत्सवों तक बड़े उत्साह के साथ गाया जाता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

भजन की भाषा अत्यंत सरल, मधुर और सहज हिंदी (खड़ी बोली एवं ब्रज-अवधि के प्रभावयुक्त) है, जिसे आम जनमानस आसानी से समझ और गुनगुना सकता है। इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकारों का सुंदर प्रयोग हुआ है जैसे "डमरू की ध्वनि" और "भस्म रमे तन पर"। काव्यात्मक शैली में तुकबंदी का ऐसा संयोजन किया गया है कि सुनते ही श्रोता झूम उठता है और उसके भीतर भक्ति का भाव जागृत हो जाता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें यह सिखाता है कि जीवन में दिखावे की चमक-दमक से अधिक महत्वपूर्ण आंतरिक पवित्रता और वैराग्य है। भगवान शिव जो स्वयं संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी हैं, भस्म रमाते हैं और साधारण नंदी पर सवार होते हैं, यह उनके अत्यधिक सरल और अहंकारहीन स्वभाव को दर्शाता है। इससे हमें यह सीख मिलती है कि मनुष्य को कितना भी उच्च पद या धन क्यों न प्राप्त हो जाए, उसे हमेशा विनम्र और धरातल से जुड़ा रहना चाहिए। साथ ही, यह भजन मृत्यु के भय से मुक्ति पाने का आध्यात्मिक मार्ग प्रशस्त करता है.

शब्द / वाक्यांश सरल अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
देवादिदेव देवताओं के भी देव समस्त ब्रह्मांड के सर्वोच्च नियंत्रक भगवान शिव
त्रिपुंड मस्तक पर तीन रेखाएं ज्ञान, पवित्रता और तपस्या का प्रतीक
भस्म विभूति या राख नश्वरता का बोध और मोह का त्याग
नंदी बैल धर्म, शक्ति और अटूट निष्ठा के प्रतीक
आशुतोष शीघ्र प्रसन्न होने वाले भगवान शिव का भक्त-वत्सल स्वरूप

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"भोलेनाथ की सवारी निकली शान से..." - इस पहली पंक्ति में महादेव के भव्य प्रस्थान और उनकी सवारी की महिमा का गुणगान किया गया है। "गूंजे डमरू की ध्वनि ब्रह्मांड में महान से..." - शिव के डमरू की हर थाप से पूरा ब्रह्मांड गंजायमान हो उठता है, जो सृष्टि की उत्पत्ति और नादब्रह्म का प्रतीक है। "नंदी पर सवार होकर चले शिव शम्भू..." - भगवान शिव अपने प्रिय वाहन नंदी पर विराजमान होकर अपनी प्रजा और भक्तों को आशीर्वाद देने निकल पड़े हैं। "गले में नागराज विराजे, मुंडमाल सोहे..." - उनके रूप का वर्णन करते हुए बताया गया है कि भयानक दिखने वाले नाग और मुंडमाल भी शिव के सानिध्य में पावन हो जाते हैं।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

शिव साधना को पूर्ण करने के लिए निम्नलिखित महामृत्युंजय मंत्र और पंचाक्षर मंत्र का स्मरण अत्यंत फलदायी माना गया है:

« ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥ »

« ॐ नमः शिवाय ॥ »

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम भोलेनाथ की सवारी निकली शान से (Bholenath Ki Sawari Nikli Shaan Se)
समर्पित देवता भगवान शिव (महादेव, भोलेनाथ)
भाषा सरल हिंदी / लोक भाषा
मुख्य थीम शिव महिमा, सवारी, वैराग्य और भक्ति
प्रमुख भाव भक्ति, उल्लास, श्रद्धा और समर्पण
उपयुक्त अवसर महाशिवरात्रि, सावन सोमवार, प्रदोष व्रत और सत्संग
संबंधित पावन लेख शिव तांडव स्तोत्र, महामृत्युंजय मंत्र

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

भोलेनाथ की सवारी क्या है?

भगवान शिव की सवारी नंदी (बैल) है, जिन्हें धर्म और शक्ति का प्रतीक माना जाता है।

इस भजन का पाठ कब करना चाहिए?

इस भजन का पाठ सावन मास, महाशिवरात्रि, सोमवार के दिन या किसी भी धार्मिक सत्संग के समय करना अत्यंत शुभ होता है.

भगवान शिव को प्रसन्न करने का सबसे आसान तरीका क्या है?

शिवलिंग पर सच्चे मन से जल, दूध और बेलपत्र अर्पित करना तथा पंचाक्षर मंत्र का जाप करना शिवजी को अतिशीघ्र प्रसन्न करता है।

शिवजी के गले में सर्प क्यों रहता है?

सर्प भगवान शिव के नियंत्रण और इस बात का प्रतीक है कि मृत्यु और विषैली प्रवृत्तियां भी उनके अधीन हैं।

त्रिपुंड का क्या महत्व है?

लगाया जाने वाला त्रिपुंड शरीर की शुद्धि, ज्ञान प्राप्ति और भगवान शिव के प्रति समर्पण का प्रतीक है।

क्या इस भजन को घर पर गाया जा सकता है?

हाँ, इस भजन को घर पर परिवार के साथ संध्या आरती या पूजा के दौरान पूरी श्रद्धा से गाया जा सकता है।

भगवान शिव को आशुतोष क्यों कहा जाता है?

क्योंकि वे बहुत भोले हैं और अपने भक्तों की छोटी-सी पूजा से भी शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं।

इस भजन से क्या आध्यात्मिक लाभ मिलता है?

इसके गायन से मन को शांति मिलती है, मानसिक भय दूर होता है और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह सामग्री सनातन धर्म के ग्रंथों, शिव पुराण, लोक कथाओं और पारंपरिक संकीर्तन परंपराओं के अध्ययन के आधार पर तैयार की गई है। Bhaktilok.in की टीम पाठकों को प्रामाणिक, शुद्ध और उच्च कोटि की devotional सामग्री प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है। यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत पूरी शुद्धता के साथ प्रस्तुत किया गया है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • शिव महापुराण (रुद्र संहिता एवं कोटि रुद्र संहिता)
  • पारंपरिक भारतीय लोक भजन एवं संकीर्तन संग्रह
  • सनातन धर्म की लोक कथाएं एवं शिव स्तुति ग्रंथ

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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