ओ कान्हा अब तो मुरली की मधुर सुना दो तान भजन श्री राधा-कृष्ण की विरह भक्ति, अनन्य प्रेम और पूर्ण आत्म-समर्पण की पराकाष्ठा को व्यक्त करने वाला अत्यंत लोकप्रिय एवं हृदयस्पर्शी भजन है। पुष्टिमार्ग एवं वैष्णव भक्ति परंपरा में मुरली की ध्वनि केवल एक वाद्य यंत्र का स्वर नहीं, बल्कि साक्षात ब्रह्म का अनाहत नाद है, जो जीवात्मा को भौतिक बंधनों से मुक्त कर परमात्मा की ओर आकर्षित करता है। इस भजन में एक अनन्य गोपी या साधक रूपी आत्मा अपने आराध्य भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना करती है कि वे अपनी वंशी की मोहिनी तान सुनाकर उसके व्याकुल प्राणों को शांत करें। विरह और समर्पण के इस अलौकिक भाव को संगीतमय छंद में पिरोया गया है, जिससे साधक के मन में सात्विक भक्ति का संचार होता है। एकादशी, जन्माष्टमी, सावन के झूले के दिनों या दैनिक संध्या आरती के समय इस भजन का गायन मन को परम शांति और भगवद्-प्रेम से भर देता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
ओ कान्हा अब तो मुरली की मधुर सुना दो तान।
मैं हूँ तेरी प्रेम दीवानी, मुझको तू पहचान॥
ओ कान्हा अब तो मुरली की मधुर सुना दो तान।
जब से तुम संग मैंने अपने नैना जोड़ लिए हैं।
क्या मैया क्या बाबुल, सबसे रिश्ते तोड़ लिए हैं॥
तेरे मिलन को व्याकुल हैं कब से मेरे प्राण।
ओ कान्हा अब तो मुरली की मधुर सुना दो तान॥
सागर से भी गहरे मेरे प्रेम की गहराई।
लोक-लाज कुल की मर्यादा, तज कर मैं तो आई॥
मेरी प्रीत से ओ निर्मोही, अब ना बनो अनजान।
ओ कान्हा अब तो मुरली की मधुर सुना दो तान॥
मैं हूँ तेरी प्रेम दीवानी, मुझको तू पहचान।
ओ कान्हा अब तो मुरली की मधुर सुना दो तान॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
यह भजन भगवद्-विमुख संसारी जीव के ईश्वर की ओर उन्मुख होने और अनन्य भक्ति में लीन होने की दिव्य यात्रा को चित्रित करता है। भजन की प्रथम पंक्ति में भक्त अपने प्रियतम नटनागर श्री कृष्ण से करुण पुकार करता है—"हे कान्हा! अब अपने अधरों पर वंशी धरकर उसकी मधुर तान छिड़ दो।" वंशी की ध्वनि जीवात्मा के लिए ईश्वर का बुलावा है। साधक स्वयं को प्रभु के प्रेम में दीवानी (लीन) बताते हुए प्रार्थना करता है कि प्रभु उसकी इस निष्काम भक्ति और तड़प को स्वीकार करें और उसे पहचानें।
भजन के प्रथम अंतरे में लौकिक आसक्तियों के त्याग का सुंदर वर्णन है। भक्त कहता है कि जब से उसकी दृष्टि जगदीश्वर श्री कृष्ण से मिली है, उसने संसार के समस्त सांसारिक बंधनों—माता, पिता, कुल-कुटुंब से अपना मोहात्मक नाता तोड़ लिया है। यह त्याग द्वेषवश नहीं, बल्कि परमात्मा के अनन्य प्रेम के समक्ष संसार की तुच्छता के बोध से उपजा है। जीवात्मा अपने प्राणों की आकुलता को प्रकट करते हुए कृष्ण मिलन की तीव्र अभिलाषा व्यक्त करती है।
दूसरे अंतरे में भक्ति की गहराई और लोक-लाज के परित्याग की घोषणा है। जिस प्रकार सागर अनंत और गहरा होता है, उसी प्रकार भक्त का अनुराग अत्यंत गंभीर और निष्काम है। समाज द्वारा थोपी गई लोक-लाज और कुल की मर्यादा का त्याग कर भक्त प्रभु के चरणों में आ गया है। भक्त अपने प्रियतम कृष्ण को 'निर्मोही' कहकर उलाहना भी देता है कि इतना समर्पण देखने के बाद भी प्रभु अनजान क्यों बने हुए हैं? यह भाव माधुर्य भक्ति की वह अवस्था है जहाँ भक्त और भगवान का संबंध अत्यंत निकट और अधिकारपूर्ण हो जाता है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
वैष्णव काव्य परंपरा में इस भजन का विशेष स्थान है। यह भजन केवल संगीतमय रचना नहीं है, बल्कि श्रीमद्भागवत महापुराण के रासपंचाध्यायी में वर्णित गोपियों के महाभाव का आधुनिक सुगम रूप है।
- अनन्य भक्ति का प्रकटीकरण: यह भजन जीव के पूर्ण समर्पण (शरणागति) का प्रतीक है, जहाँ ईश्वर के अतिरिक्त अन्य किसी सांसारिक आश्रय की लालसा नहीं रह जाती।
- वेणु नाद का आध्यात्मिक अर्थ: वेणु या मुरली की तान का अर्थ है अंतरात्मा में उठने वाली अनहद ध्वनि जो साधक को ध्यानस्थ करती है।
- विरह और मिलन का सुंदर संतुलन: भजन में कृष्ण के दर्शन न मिलने का विरह-ताप भी है और उनके सान्निध्य की अगाध आशा भी है।
- माधुर्य भाव का समावेश: इसमें दास्य, सख्य और माधुर्य भाव का अद्भूत सम्मिश्रण है जो गायक और श्रोता दोनों के हृदय को भावविभोर कर देता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
यद्यपि प्रभु भक्ति के लिए प्रत्येक क्षण पवित्र है, परंतु वैष्णव मान्यताओं के अनुसार इस भजन के गायन एवं श्रवण का सर्वोत्तम समय इस प्रकार है:
| समय / अवसर | गायन की विधि | साधनात्मक लाभ |
|---|---|---|
| सांध्य उपासना एवं आरती | संध्या समय दीप प्रज्वलित कर शांत भाव से गायन करें। | दिनभर के तनाव से मुक्ति और मानसिक शांति की प्राप्ति। |
| जन्माष्टमी एवं राधाष्टमी | कीर्तन समूह के साथ ढोलक, मंजीरे और बाँसुरी की धुन पर गाएं। | भक्तिमय वातावरण का निर्माण और समूह साधना का पुण्य। |
| एकादशी व व्रत दिवस | एकांत स्थान पर बैठकर शांत मन से भावपूर्ण श्रवण करें। | चित्त की शुद्धि और अनन्य शरणागति का भाव जागृत होना। |
| सावन एवं झूलनोत्सव | राधा-कृष्ण के हिंडोला उत्सव के अवसर पर सामूहिक कीर्तन करें। | भगवद्-लीला का प्रत्यक्ष आनंद और भक्ति रस का अनुभव। |
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्री कृष्ण और उनकी आहादिनी शक्ति श्री राधा रानी के युगल स्वरूप को समर्पित है। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, वंशी की ध्वनि सुनकर ब्रज की गोपियां अपने घर-गृहस्थी के कार्य छोड़कर वृंदावन के कुंजों की ओर दौड़ पड़ती थीं। यह भजन उसी पौराणिक प्रसंग का भावात्मक निरूपण है। संत मीराबाई, सूरदास और रसखान की काव्य परंपरा में भी इसी प्रकार के विरह और अनन्य प्रेम के पद प्रचुरता से मिलते हैं। संत मीराबाई ने भी गाया था—'मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई', और इस भजन की मूल चेतना भी मीराबाई के इसी महाभाव से अनुप्राणित है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
यह लोकप्रिय भजन उत्तर भारत की लोक-भक्ति परंपरा और सुगम शास्त्रीय संगीत का एक सुंदर मेल है। यद्यपि इसके मूल रचयिता के संबंध में भिन्न-भिन्न जनश्रुतियां हैं, परंतु यह पारंपरिक ब्रज और खड़ी बोली हिंदी के लोकगीतों से विकसित होकर जन-जन के कंठ काहार बना है। आधुनिक काल में अनेक मूर्धन्य गायकों ने इस भजन को स्वरबद्ध कर संपूर्ण भारत में प्रसारित किया। मंदिर प्रांगणों, रासलीलाओं और प्रभात फेरियों में इस भजन का निरंतर गायन इसकी सर्वप्रियता को सिद्ध करता है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
भजन की भाषा अत्यंत सरल, सुबोध और भावानुकूल खड़ी बोली हिंदी है जिसमें ब्रजभाषा का मधुर पुट शामिल है।
- छंद एवं ताल: यह पद रूपक या कहरवा ताल में अत्यंत सहजता से गाया जाता है, जो श्रोताओं को सहज ही झूमने पर विवश कर देता है।
- अलंकार योजना: 'सागर से भी गहरे' में उपमा एवं अतिशयोक्ति अलंकार का सधे हुए रूप में प्रयोग किया गया है जो प्रेम की अगाधता को दर्शाता है।
- रस एवं भाव: मुख्य रूप से इसमें वियोग श्रृंगार रस और शांत/भक्ति रस की अविरल धारा प्रवाहित होती है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन केवल भक्ति भावना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन के लिए गूढ़ आध्यात्मिक संदेश भी देता है:
- सांसारिक मोहासक्ति का परित्याग: जब तक जीव नश्वर सांसारिक संबंधों में अटका रहता है, तब तक उसे शाश्वत आनंद (परमात्मा) की प्राप्ति नहीं हो सकती।
- अहंकार का विसर्जन: लोक-लाज और कुल की मर्यादा का त्याग वस्तुतः साधक के सूक्ष्म अहंकार के विसर्जन का ही प्रतीक है।
- ईश्वर के प्रति निष्काम अनुराग: प्रभु से कुछ मांगने के बजाय केवल उनके दर्शन और सान्निध्य की अभिलाषा ही सच्ची भक्ति है।
- समर्पण में ही परम शांति: जब साधक स्वयं को पूर्ण रूप से ईश्वर के हाथों में सौंप देता है, तो उसके जीवन के समस्त भय और संताप समाप्त हो जाते हैं।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / पद | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक / संदर्भगत अर्थ |
|---|---|---|
| तान | संगीत की मधुर धुन या स्वर | दिव्य अनाहत नाद, परमात्मा की पुकार |
| नैना जोड़ना | दृष्टि मिलाना, प्रेम होना | ईश्वर से ध्यान व सुरति का जुड़ना |
| बाबुल | पिता | सांसारिक जन्य संबंध व भौतिक आश्रय |
| व्याकुल | अधीर, तड़पता हुआ | ईश्वर दर्शन के लिए जीवात्मा की तीव्र आकुलता |
| लोक-लाज | सामाजिक भय या लोक मर्यादा | अहंकार और सामाजिक अवधारणाओं का बंधन |
| निर्मोही | मोह न करने वाला, तटस्थ | प्रभु का निरंजन एवं अनसक्त स्वरूप |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
ओ कान्हा अब तो मुरली की मधुर सुना दो तान...
हे कान्हा! मेरे जीवन का कोलाहल बहुत बढ़ गया है। अब आप अपनी मुरली की वह दिव्य और मधुर तान सुनाइए जो मेरे मन को शांत कर दे और मुझे आपके चरणों में खींच ले।
मैं हूँ तेरी प्रेम दीवानी, मुझको तू पहचान...
हे प्रभु! मैं किसी सांसारिक कामना से आपके पास नहीं आई हूँ। मैं तो केवल आपके अनन्य प्रेम की दीवानी हूँ। संसार भले ही मुझे न समझे, परंतु आप तो अंतर्यामी हैं, आप मुझे पहचान लीजिए।
जब से तुम संग मैंने अपने नैना जोड़ लिए हैं...
जब से मेरी आत्मा की दृष्टि आपके परम सौंदर्य और सत्य से जुड़ी है, तब से मुझे इस संसार का कोई अन्य रूप आकर्षित नहीं करता।
क्या मैया क्या बाबुल, सबसे रिश्ते तोड़ लिए हैं...
मैंने आपके अनन्य अनुराग के लिए माता, पिता और कुटुंब के मोहात्मक संबंधों की सीमाओं को लांघ दिया है, क्योंकि मेरा शाश्वत संबंध केवल आपसे ही है।
सागर से भी गहरे मेरे प्रेम की गहराई...
मेरा यह अनुरागी भाव क्षैणिक या स्वार्थी नहीं है। इसकी गहराई अगाध सागर से भी अधिक है, जिसे नापा नहीं जा सकता।
लोक-लाज कुल की मर्यादा, तज कर मैं तो आई...
संसार क्या कहेगा, समाज क्या सोचेगा—इस लोक-लाज और कुल की झूठी मर्यादाओं के भय को मैंने सदा के लिए त्याग दिया है और आपके शरण में आ गई हूँ।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के भाव को समझने के लिए श्रीमद्भागवतम् एवं वेणुगीत के निम्नलिखित श्लोक और मंत्र अत्यंत प्रासंगिक हैं:
मुरली मंत्र / वंशी ध्यान श्लोक:
बर्हापीड़ं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं
विभ्रद्वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्।
रन्ध्रान् वेणोरधरसुधयापूरयन्गोपवृन्दैः
बृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः॥
(श्रीमद्भागवत महापुराण - १०.२१.५)
भावार्थ: अपने मस्तक पर मोरपंख, कानों में कनेर के पुष्प, शरीर पर पीताम्बर और गले में वैजयंती माला धारण किए नटनागर श्रीकृष्ण अपने अधरामृत से वंशी के छिद्रों को भरते हुए ब्रजभूमि में प्रवेश करते हैं।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| विषय | विवरण |
|---|---|
| भजन का नाम | ओ कान्हा अब तो मुरली की मधुर सुना दो तान |
| मुख्य देवता | भगवान श्री कृष्ण (राधा-कृष्ण) |
| भक्ति मार्ग | पुष्टिमार्ग / वैष्णव माधुर्य भक्ति |
| प्रमुख भाव | विरह, समर्पण, माधुर्य एवं अनन्य अनुराग |
| काव्य भाषा | हिंदी (ब्रज-मिश्रित खड़ी बोली) |
| उपयुक्त अवसर | जन्माष्टमी, एकादशी, सांध्य आरती, रासलीला, सत्संग |
| संगीत ताल | कहरवा / रूपक ताल |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख भक्तिलोक के विद्वान संपादकों द्वारा प्रामाणिक वैष्णव ग्रंथों, श्रीमद्भागवत पुराण के प्रसंगों एवं पारंपरिक संकीर्तन परंपरा के आधार पर तैयार किया गया है। सामग्री की प्रामाणिकता और भाषा की शुद्धता का विशेष ध्यान रखा गया है। यह संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है जिसका उद्देश्य पाठकों को शुद्ध एवं अर्थपूर्ण भक्ति साहित्य उपलब्ध कराना है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्भागवत महापुराण (दशम स्कंध - वेणुगीत एवं रासपंचाध्यायी, गीता प्रेस गोरखपुर)
- वैष्णव पद साहित्य एवं ब्रज लोक-कीर्तन परंपरा
- पुष्टिमार्गीय कीर्तन संग्रह एवं भक्ति रसमंजरी
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