भक्ति काव्य व भजन बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

कृपा करो लक्ष्मी माता लक्ष्मी जी भजन भजन इन हिंदी लिरिक्स

कृपा करो लक्ष्मी माता भजन लिरिक्स, अर्थ एवं महिमा पढ़ें। संदर्भ एवं व्याख्या सहित यह पावन भजन जीवन में सुख-समृद्धि का संचार करता है। Bhaktilok पर विजिट करें।

सनातन धर्म में आदि शक्ति महालक्ष्मी को ऐश्वर्य, समृद्धि, सौभाग्य और चेतना की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। "कृपा करो लक्ष्मी माता लक्ष्मी जी भजन" एक अत्यंत पावन और हृदयस्पर्शी प्रार्थना है, जो साधक के अंतःकरण में श्रद्धा, समर्पण और संतोष का संचार करती है। यह भजन मुख्य रूप से 'विनय भाव' और 'करुणा रस' से ओतप्रोत है, जिसमें भक्त अपनी दीनता और अज्ञानता को स्वीकार करते हुए जगत जननी से अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखने की याचना करता है। इस भजन का गायन विशेष रूप से शुक्रवार की साप्ताहिक पूजा, दीपावली, शरद पूर्णिमा और धनतेरस जैसे महापर्वों पर किया जाता है। जब कोई साधक पूर्ण श्रद्धा के साथ इस भजन का संकीर्तन करता है, तो उसके जीवन से दरिद्रता, मानसिक क्लेश और अशांति का नाश होता है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। इस विस्तृत लेख में हम इस भजन के संपूर्ण लिरिक्स, भावार्थ, आध्यात्मिक महत्व और शास्त्रीय संदर्भों का गहन विश्लेषण करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ कृपा करो लक्ष्मी माता ॥

(कोरस / मुखड़ा)
कृपा करो लक्ष्मी माता, मैया कृपा करो माता।
तुम हो जग की भाग्य विधाता, मैया कृपा करो माता॥
कृपा करो लक्ष्मी माता, मैया कृपा करो माता...

(अंतरा - 1)
ऋद्धि सिद्धि के दाता तुम हो, सुख संपत्ति की दाता।
जो भी शरण तुम्हारी आए, मुंह मांगा फल पाता॥
कृपा करो लक्ष्मी माता, मैया कृपा करो माता...

(अंतरा - 2)
दीन दुखी और निर्धन जन पर, अपनी दया दिखाना।
भक्ति भाव का वर देकर मां, बिगड़ी बात बनाना॥
कृपा करो लक्ष्मी माता, मैया कृपा करो माता...

(अंतरा - 3)
महालक्ष्मी मां आदि भवानी, विष्णु प्रिया कल्याणी।
शंख चक्र और पद्म सुशोभित, महिमा जाए न जानी॥
कृपा करो लक्ष्मी माता, मैया कृपा करो माता...

(अंतरा - 4)
आरती उतारे शीश झुकाए, गाए तुम्हारी गाथा।
चरणों में हम शीश झुकाते, मैया कृपा करो माता॥
कृपा करो लक्ष्मी माता, मैया कृपा करो माता...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस पावन भजन का मूल स्वर पूर्ण आत्मसमर्पण और निष्काम भक्ति का है। भक्त माता महालक्ष्मी से प्रार्थना करता है कि हे माता! आप संपूर्ण चराचर जगत की नियंता और भाग्य का निर्माण करने वाली हैं। आपके बिना यह संसार श्रीहीन और अंधकारमय है। जब आप अपनी करुणामयी दृष्टि किसी जीव पर डालती हैं, तो उसका जीवन धन्य हो जाता है।

भजन के प्रथम भाग में माता को 'ऋद्धि-सिद्धि' और 'सुख-संपत्ति' का प्रदाता कहा गया है। यहाँ सुख का अर्थ केवल भौतिक धन से नहीं है, बल्कि मानसिक शांति, संतोष और आध्यात्मिक उन्नति से है। जो भी मनुष्य अहंकार को त्यागकर माता की शरण में आता है, उसकी सभी सात्विक मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। द्वितीय भाग में भक्त अपनी दीनता को स्वीकार करते हुए माता से प्रार्थना करता है कि वह उसके जीवन के समस्त विघ्नों को दूर करें और उसे भक्ति का वरदान दें। तृतीय और चतुर्थ भाग में माता के दिव्य स्वरूप का वर्णन है, जहाँ वे भगवान विष्णु की अर्धांगिनी के रूप में शंख, चक्र और पद्म धारण किए हुए सुशोभित हैं। भक्त उनके चरणों में शीश झुकाकर अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल एक संगीतमय रचना नहीं है, बल्कि यह साधक के मन को शुद्ध करने का एक सशक्त माध्यम है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • विनय और शरणागति: इस भजन में भक्त का अहंकार पूरी तरह विलीन हो जाता है। वह स्वयं को 'दीन-दुखी' मानकर माता की असीम सत्ता के आगे नतमस्तक होता है।
  • त्रिगुणात्मक शक्ति का आह्वान: यद्यपि यह भजन महालक्ष्मी को समर्पित है, किंतु इसमें उन्हें 'आदि भवानी' कहकर संबोधित किया गया है, जो यह दर्शाता है कि वे ही महाकाली और महासरस्वती का भी मूल स्वरूप हैं।
  • सकारात्मक ऊर्जा का संचार: इस भजन के नियमित श्रवण और कीर्तन से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और सकारात्मकता का संचार होता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

भजन का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए इसे एक निश्चित विधि और समय पर गाना चाहिए:

  • सर्वोत्तम समय: इस भजन का गायन प्रातःकाल सूर्योदय के समय अथवा संध्याकाल में गोधूलि बेला के दौरान करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
  • विशेष अवसर: शुक्रवार का दिन माता लक्ष्मी को समर्पित है। इसके अतिरिक्त, दीपावली पूजा विधि के समय इस भजन का सामूहिक संकीर्तन करना अत्यंत शुभ होता है।
  • गायन विधि: पूजा स्थान पर शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। माता लक्ष्मी की प्रतिमा के समक्ष लाल पुष्प अर्पित करें और शांत मन से, तालियों की थाप या मंजीरे के साथ सस्वर इस भजन का गायन करें।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन साक्षात विष्णुप्रिया माता महालक्ष्मी को समर्पित है। शास्त्रों के अनुसार, महालक्ष्मी केवल धन की देवी नहीं हैं, बल्कि वे 'अष्टलक्ष्मी' के रूप में जीवन के आठ महत्वपूर्ण आयामों (आदि लक्ष्मी, धन लक्ष्मी, धान्य लक्ष्मी, गज लक्ष्मी, संतान लक्ष्मी, वीर लक्ष्मी, विजय लक्ष्मी और विद्या लक्ष्मी) को नियंत्रित करती हैं। इस भजन की रचना पारंपरिक भक्ति काल के संतों की शैली से प्रेरित है, जिन्होंने ईश्वर को माता के रूप में मानकर वात्सल्य और करुणा की याचना की थी।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की पृष्ठभूमि भारतीय लोक-चेतना और पौराणिक आख्यानों में रची-बसी है। जब समुद्र मंथन के समय माता लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था, तब समस्त देवताओं ने उनकी स्तुति की थी। यह भजन उसी प्राचीन स्तुति परंपरा का आधुनिक और सरल हिंदी रूपांतरण है। इसकी रचना इस प्रकार की गई है कि एक साधारण अबोध बालक भी इसे आसानी से समझ सके और अपनी माता के प्रति प्रेम व्यक्त कर सके।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

भजन की भाषा अत्यंत सरल, सुबोध और प्रवाहमयी खड़ी बोली हिंदी है। इसमें तत्सम और तद्भव शब्दों का बहुत ही सुंदर समन्वय किया गया है। काव्य शैली की दृष्टि से यह एक 'गेय पद' है, जिसे किसी भी शास्त्रीय या सुगम संगीत के राग (जैसे राग यमन या राग भूपाली) में ढाला जा सकता है। इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकार का सहज प्रयोग देखने को मिलता है, जो इसके सौंदर्य को और अधिक बढ़ाता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें जीवन के कई महत्वपूर्ण संदेश देता है:

  • संतोष धन का महत्व: भजन हमें सिखाता है कि वास्तविक धन केवल स्वर्ण या मुद्रा नहीं है, बल्कि माता की कृपा से प्राप्त होने वाला संतोष और सद्बुद्धि ही असली संपदा है।
  • कर्म और प्रार्थना का संतुलन: प्रार्थना हमें मानसिक शक्ति देती है, जिससे हम अपने कर्मक्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन कर पाते हैं। माता को 'भाग्य विधाता' मानकर कर्म करना हमें फल की चिंता से मुक्त करता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
भाग्य विधाता किस्मत बनाने वाली संसार के सभी जीवों के कर्मफल और प्रारब्ध को संवारने वाली शक्ति।
ऋद्धि-सिद्धि समृद्धि और आध्यात्मिक शक्तियां भगवान गणेश की पत्नियां, जो बुद्धि और विवेक का प्रतीक हैं।
आदि भवानी सृष्टि की आदि शक्ति वह परम शक्ति जो सृष्टि के निर्माण से पूर्व भी विद्यमान थी।
विष्णु प्रिया भगवान विष्णु की अर्धांगिनी जगत के पालनहार श्री हरि विष्णु की शक्ति और संगिनी।
पद्म सुशोभित हाथ में कमल धारण करने वाली कमल पवित्रता, अनासक्ति और सौंदर्य का प्रतीक है।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

1. "कृपा करो लक्ष्मी माता, मैया कृपा करो माता। तुम हो जग की भाग्य विधाता..."
हे जगत जननी महालक्ष्मी! हम अज्ञानी बालकों पर अपनी असीम कृपा बरसाइए। आप ही इस संपूर्ण ब्रह्मांड की नियंता हैं और प्रत्येक जीव के भाग्य का निर्धारण करने वाली हैं। आपके आशीर्वाद के बिना जीवन में शुभता का आगमन असंभव है।

2. "ऋद्धि सिद्धि के दाता तुम हो, सुख संपत्ति की दाता..."
आप ही समस्त सिद्धियों, बुद्धि, ऐश्वर्य और भौतिक व आध्यात्मिक सुखों को प्रदान करने वाली हैं। जो भी मनुष्य निष्कपट भाव से आपकी शरण में आता है, आप उसकी सभी सात्विक इच्छाओं को पूर्ण करती हैं।

3. "दीन दुखी और निर्धन जन पर, अपनी दया दिखाना..."
हे करुणामयी मां! जो लोग इस संसार में असहाय, निर्धन और दुखी हैं, उन पर आपकी विशेष दया दृष्टि होनी चाहिए। हमारे भीतर भक्ति का संचार करके हमारे जीवन की सभी बिगड़ी हुई परिस्थितियों को अनुकूल बना दीजिए।

4. "महालक्ष्मी मां आदि भवानी, विष्णु प्रिया कल्याणी..."
आप ही आदि शक्ति भवानी हैं और भगवान विष्णु की प्रिय कल्याणी हैं। आपके दिव्य हाथों में शंख, चक्र और कमल का पुष्प सुशोभित है। आपकी इस अनंत महिमा को समझ पाना मानव बुद्धि की सीमा से परे है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के गायन के पूर्व या पश्चात निम्नलिखित महालक्ष्मी मंत्र का जाप करना अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है:

॥ महालक्ष्मी मूल मंत्र ॥

"ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं त्रिभुवन महालक्ष्म्यै अस्माकम् दारिद्र्य नाशय नाशय प्रचुर धन देहि देहि क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ"

इसके अतिरिक्त, प्रसिद्ध कनकधारा स्तोत्र का पाठ भी माता लक्ष्मी को अत्यंत प्रिय है, जो दरिद्रता का समूल नाश करता है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण जानकारी
भजन का नाम कृपा करो लक्ष्मी माता
मुख्य देवी/देवता माता महालक्ष्मी (विष्णु प्रिया)
भक्ति का स्वरूप विनय, शरणागति, करुणा भाव
भाषा सरल हिंदी (खड़ी बोली)
उपयुक्त अवसर शुक्रवार पूजा, दीपावली, धनतेरस, नवरात्रि
मुख्य लाभ सुख-समृद्धि, मानसिक शांति, दरिद्रता का नाश

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन का मुख्य उद्देश्य माता लक्ष्मी के प्रति पूर्ण समर्पण व्यक्त करना और उनसे जीवन में सुख, समृद्धि, शांति और भक्ति का वरदान मांगना है।

वैसे तो इस भजन का पाठ प्रतिदिन किया जा सकता है, लेकिन शुक्रवार का दिन माता लक्ष्मी को समर्पित होने के कारण इस दिन इसका गायन विशेष फलदायी होता है।

हाँ, भजन के पश्चात "ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः" मंत्र का जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

'ऋद्धि' का अर्थ है अलौकिक समृद्धि और 'सिद्धि' का अर्थ है आध्यात्मिक पूर्णता या सफलता। ये दोनों ही जीवन को संतुलित और सुखी बनाने के लिए आवश्यक हैं।

अनिवार्य तो नहीं, परंतु दीपावली महालक्ष्मी पूजन का सबसे बड़ा उत्सव है, इसलिए इस दिन इस भजन का गायन करने से घर में सुख-समृद्धि का स्थायी वास होता है।

पूजा करते समय और भजन गाते समय साधक का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए, जो सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।

यह भजन अत्यंत सरल और मधुर हिंदी भाषा में रचित है, जिससे आम जनमानस इसे आसानी से समझ और गा सके।

हाँ, बच्चों द्वारा इस भजन का गायन करने से उनके भीतर अच्छे संस्कार, एकाग्रता और देवी मां के प्रति श्रद्धा का विकास होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ और अर्थ को विभिन्न प्रामाणिक स्रोतों, पारंपरिक पूजा पद्धतियों और वैदिक विद्वानों के परामर्श के आधार पर संकलित किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध और त्रुटिहीन भक्ति सामग्री पहुंचाना है ताकि वे अपनी साधना को सही दिशा दे सकें।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • विष्णु पुराण: महालक्ष्मी के प्राकट्य और उनकी स्तुति का वर्णन।
  • श्रीमद्देवीभागवत पुराण: आदि शक्ति के महालक्ष्मी स्वरूप की महिमा।
  • सनातन धर्म की पारंपरिक भजन संग्रह पुस्तिकाएं।

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यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 10 Oct 2026

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