देना हो तो दीजिए जनम जनम का साथ भजन परिचय एवं आध्यात्मिक महत्व
"देना हो तो दीजिए जनम जनम का साथ" यह अत्यंत ही पावन, भावपूर्ण और भगवान श्री कृष्ण एवं बांके बिहारी के चरणों में समर्पित एक ऐसा अद्भुत भजन है, जिसे सुनते ही हृदय में भक्ति की मंदाकिनी प्रवाहित होने लगती है। यह भजन अनन्य प्रेम, पूर्ण शरणागति (Surrender), और अपने आराध्य के प्रति अगाध निष्ठा का एक जीवंत प्रतीक है। जब एक भक्त संसार के सभी प्रलोभनों और भौतिक सुख-सुविधाओं को छोड़कर केवल प्रभु के चरणों की सेवा और उनके सान्निध्य की कामना करता है, तब इस प्रकार के भजन उसके आंतरिक भावों को वाणी प्रदान करते हैं। यह भजन न केवल मानसिक शांति प्रदान करता है, बल्कि साधक को यह भी स्मरण कराता है कि इस नश्वर संसार में यदि कुछ प्राप्त करने योग्य है, तो वह केवल भगवान का नित्य सान्निध्य और उनकी कृपा है। इसे सुबह की बेला में, संध्या कालीन संकीर्तन के समय या किसी भी विशेष धार्मिक आयोजन में अत्यंत श्रद्धा के साथ गाया और सुना जाता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें:
देना हो तो दीजिए, जनम जनम का साथ
अब तो कृपा कर दीजिए, जनम जनम का साथ
मेरे सर पर रख बनवारी, अपने दोनों यह हाथ .......2
देने वाले श्याम प्रभु से, धन और दौलत क्या मांगे
श्याम प्रभु से मांगे तो फिर, नाम और इज्ज़त क्या मांगे
मेरे जीवन में अब कर दे, तू कृपा की बरसात .......2
श्याम तेरे चरणों की धूलि, धन दौलत से महंगी है
एक नज़र कृपा की बाबा, नाम इज्ज़त से महंगी है
मेरे दिल की तम्मना यही है, करूँ सेवा तेरी दिन रात .......2
झुलस रहें है गम की धुप में, प्यार की छईया कर दे तू
बिन माझी के नाव चले ना, अब पतवार पकड़ ले तू
मेरा रास्ता रौशन कर दे, छायी अन्धिआरी रात .......2
सुना है हमने शरणागत को, अपने गले लगाते हो
ऐसा हमने क्या माँगा जो, देने से घबराते हो
चाहे जैसे रख बनवारी, बस होती रहे मुलाक़ात .......2
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस सुंदर भजन की हर एक पंक्ति में भक्त की अपने आराध्य श्यामसुंदर के प्रति अनन्य भावना छिपी हुई है। भक्त भगवान से प्रार्थना करता है कि हे प्रभु! यदि आप मुझे कुछ देना ही चाहते हैं, तो मुझे केवल एक जन्म के लिए नहीं, बल्कि जन्म-जन्मांतर के लिए अपना साथ प्रदान कीजिए। संसार के रिश्ते-नाते और वैभव क्षणिक हैं, किंतु आपका सान्निध्य शाश्वत है। भक्त कहता है कि हे 'बनवारी'! आप मेरे सिर पर अपने दोनों हाथ रखकर मुझे हमेशा के लिए अपना आशीर्वाद दे दीजिए, ताकि जीवन के किसी भी मोड़ पर मैं अकेलापन या भय महसूस न करूँ।
भजन की अगली पंक्तियों में भक्त संसार की भौतिक वस्तुओं जैसे धन, दौलत, यश और कीर्ति की तुच्छता को दर्शाता है। वह कहता है कि जब देने वाले स्वयं समस्त ब्रह्मांड के स्वामी श्री श्याम प्रभु हैं, तो उनसे माया-मोह रूपी धन या संसार की नश्वर इज्जत क्या मांगनी? प्रभु के चरणों की धूलि संसार के सारे ऐश्वर्य से कहीं अधिक मूल्यवान है। भक्त की एकमात्र यही अभिलाषा है कि वह दिन-रात निरंतर अपने आराध्य की सेवा करता रहे। जीवन के दुखों की धूप में जब भक्त झुलसने लगता है, तब वह प्रभु से करुणा की छाया और अपने जीवन रूपी नौका की पतवार थामने की विनती करता है.
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन भगवान कृष्ण और उनके भक्तों के बीच के मधुर संबंध को गहराई से उजागर करता है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- पूर्ण शरणागति: भजन साधक को सिखाता है कि किस प्रकार अपनी संपूर्ण इच्छाओं को भगवान के चरणों में समर्पित कर देना चाहिए।
- भौतिकता से ऊपर उठना: धन-दौलत और नाम-यश की कामना त्यागकर केवल भगवत्कृपा को सर्वोपरि मानना इस भजन का मुख्य संदेश है।
- भक्ति रस से ओत-प्रोत: यह भजन चित्त को शांत करता है और मन में भगवत्प्रेम की अद्भुत जागृति पैदा करता है।
- सार्वभौमिक अपील: इसे किसी भी आयु वर्ग के लोग और किसी भी संप्रदाय के कृष्ण भक्त आसानी से गा सकते हैं।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
भक्ति संगीत का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए उचित समय और विधि का होना अत्यंत आवश्यक है:
- उचित समय: प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में या संध्या के समय जब पूजा-आरती का समय हो, तब इस भजन का गायन और श्रवण अत्यंत फलदायी होता है।
- स्थान: मंदिर के प्रांगण में, घर के पूजा स्थल पर या किसी भी पवित्र सत्संग में इसे पूरे उत्साह के साथ गाया जा सकता है।
- विधि: स्नान आदि से निवृत्त होकर, आसन पर बैठकर, दीप प्रज्वलित कर मन को शांत चित्त करके इस भजन का स्मरण करना चाहिए।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन मुख्य रूप से लीलाधर भगवान श्री कृष्ण, बांके बिहारी, और खाटू श्याम जी को समर्पित है। सनातन धर्म में कृष्ण भक्ति की धारा मीराबाई, सूरदास, रसखान और चैतन्य महाप्रभु जैसे महान संतों द्वारा प्रवाहित की गई है। इस भजन में भी उसी माधुर्य भाव और सख्य भाव की झलक मिलती है, जहाँ भक्त अपने भगवान को केवल पूज्य ही नहीं, बल्कि अपना सर्वस्व और सबसे निकट का बंधु मानता है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
समकालीन भक्ति साहित्य और लोक संगीत की परंपरा में ऐसे भजनों का विशेष स्थान रहा है। संकीर्तन मंडलों और युवा भजन गायकों द्वारा इसे अत्यंत लोकप्रिय बनाया गया है। इस भजन की पृष्ठभूमि विशुद्ध रूप से एक विरही और प्रेमी भक्त की मनोदशा पर आधारित है, जो भगवान से किसी प्रकार की सांसारिक वस्तु की मांग न करके केवल उनकी कृपा और निरंतर सान्निध्य की भीख मांगता है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
यह भजन अत्यंत सरल, सहज और प्रवाहमयी हिंदी (ब्रज और खड़ी बोली के सुंदर समन्वय) में रचा गया है। इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकारों का सहज प्रयोग हुआ है जैसे "गम की धूप में, प्यार की छईया" और "बिन माझी के नाव चले ना"। भाषा की सरलता ही इस भजन की सबसे बड़ी शक्ति है, जो बच्चे से लेकर वृद्ध तक के हृदय को तुरंत स्पर्श कर लेती है और आसानी से याद हो जाती है.
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
इस भजन से हमें जीवन के कई गहरे आध्यात्मिक संदेश मिलते हैं:
- संसार के संबंध अस्थायी हैं, केवल ईश्वर का नाम और उनका साथ ही शाश्वत सत्य है।
- अहंकार का त्याग करके भगवान के सम्मुख शरणागत होना ही सच्चे भक्त का लक्षण है।
- जीवन रूपी नौका को पार लगाने के लिए सद्गुरु या भगवान रूपी माझी का हाथ थामना अनिवार्य है।
- कठिन परिस्थितियों और दुखों से घबराने के बजाय भगवान की कृपा दृष्टि पर भरोसा रखना चाहिए।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल अर्थ | संदर्भ / प्रसंग |
|---|---|---|
| बनवारी | भगवान श्री कृष्ण (वन के मालिक) | भक्त द्वारा आराध्य को संबोधित करने का प्रेमपूर्ण नाम | शरणागत | जो शरण में आया हो | भगवान के चरणों में पूर्ण रूप से समर्पित भक्त | पतवार | नाव चलाने का साधन / नियंत्रण | जीवन की नैया को सही दिशा देने वाला ईश्वर का हाथ |
| अंधियारी रात | अंधेरी रात / अज्ञानता का अंधकार | जीवन में आने वाले संकट और कठिनाइयाँ |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"देना हो तो दीजिए जनम जनम का साथ..."
इस पंक्ति का अर्थ है कि भौतिक वस्तुएं आज हैं और कल नष्ट हो जाएंगी, इसलिए यदि प्रभु कुछ देना ही चाहते हैं, तो अपना शाश्वत साथ प्रदान करें।
"श्याम तेरे चरणों की धूलि धन दौलत से महंगी है..."
यहाँ भक्त सांसारिक ऐश्वर्य की तुलना में भगवान के चरणों की धूलि को सर्वोपरि मानता है, क्योंकि भगवत्पाद-धूलि से ही मुक्ति और शांति मिलती है।
"बिन माझी के नाव चले ना, अब पतवार पकड़ ले तू..."
संसार रूपी भवसागर से पार पाने के लिए मानव असमर्थ है, इसलिए वह भगवान से आग्रह करता है कि वे स्वयं जीवन की नैया का नियंत्रण अपने हाथ में ले लें।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के भाव के साथ निम्नलिखित पावन मंत्र का स्मरण अत्यंत फलदायी माना गया है:
कृष्ाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणातः क्लेशनाशाय गोविंदाय నమో नमः॥
यह श्लोक भगवान कृष्ण के चरणों में अनंत शरणागति का भाव जगाता है और समस्त क्लेशों का नाश करता है। साथ ही आप श्री हनुमान चालीसा का पाठ करके भी मानसिक बल प्राप्त कर सकते हैं।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| भजन का नाम | देना हो तो दीजिए जनम जनम का साथ |
| आराध्य देवता | भगवान श्री कृष्ण / खाटू श्याम जी |
| प्रमुख भाव | शरणागति, प्रेम, विनय और समर्पण |
| भाषा | सरल हिंदी / ब्रज भाव |
| उपयुक्त अवसर | सत्संग, एकादशी, जन्माष्टमी, दैनिक पूजा |
| गायन शैली | मधुर संकीर्तन भजन |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
"देना हो to दीजिए जनम जनम का साथ" भजन किस देवता को समर्पित है?
यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्री कृष्ण और उनके बाल रूप अथवा खाटू श्याम जी को समर्पित है।
इस भजन को गाने का सबसे अच्छा समय कौन सा है?
इस भजन को प्रातःकाल पूजा के समय या संध्या वंदन के दौरान गाना सबसे उत्तम माना जाता है।
इस भजन का मुख्य आध्यात्मिक संदेश क्या है?
इस भजन का मुख्य संदेश संसार की नश्वर वस्तुओं की चाह न रखकर केवल भगवान का निरंतर साथ और उनकी भक्ति मांगना है।
क्या इस भजन को घर पर अकेले गाया जा सकता है?
हाँ, इस भजन को आप एकांत में ध्यान लगाते हुए या अपने परिवार के साथ सामूहिक संकीर्तन में भी गा सकते हैं।
भगवत्कृपा प्राप्ति के लिए शरणागति क्यों आवश्यक है?
जब तक मनुष्य अपने अहंकार का त्याग करके भगवान की शरण में नहीं जाता, तब तक उसे सच्चे आंतरिक सुख और शांति की प्राप्ति नहीं होती।
क्या इस भजन को किसी विशेष उत्सव पर गाया जाता है?
इसे जन्माष्टमी, गोवर्धन पूजा, एकादशी और किसी भी धार्मिक सत्संग या जागरण में विशेष रूप से गाया जाता है।
इस भजन के माध्यम से भक्त भगवान से क्या मांग रहा है?
भक्त धन-दौलत या यश न मांगकर केवल प्रभु के चरणों की सेवा और जन्म-जन्मांतर का साथ मांग रहा है।
मानसिक शांति के लिए ऐसे भजनों का क्या महत्व है?
भक्तिमय भजनों का श्रवण करने से मन का तनाव दूर होता है, सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और चित्त शांत होता है।
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह सामग्री Bhaktilok.in के उच्च संपादकीय मानकों के तहत पाठकों की आध्यात्मिक और धार्मिक जिज्ञासा को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई है। इस लेख में प्रस्तुत भजन के बोल, भावार्थ और व्याख्या पारंपरिक स्रोतों और संकीर्तन परंपराओं पर आधारित हैं। यह सामग्री पूरी तरह से संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसका उद्देश्य पाठकों को शुद्ध भक्ति रस प्रदान करना है। अधिक धार्मिक और आध्यात्मिक लेखों के लिए आप हमारे अन्य पृष्ठों जैसे शिव तांडव स्तोत्र और श्री दुर्गा चालीसा का भी अध्ययन कर सकते हैं।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- पारंपरिक लोक संकीर्तन एवं भजन संग्रह परंपरा
- श्रीमद्भागवत पुराण एवं कृष्ण भक्ति काव्य ग्रंथ
- संत वाणी एवं भक्ति रस मीमांसा
- सनातन धर्म के प्राचीन संकीर्तन ग्रंथ
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