भक्ति काव्य व भजन बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

भक्त खडा तेरे द्वार अर्जी ले कर के भजन इन हिंदी लिरिक्स

भक्त खड़ा तेरे द्वार अर्जी लेकर भजन लिरिक्स हिंदी में पढ़ें। पावन भक्ति रस से परिपूर्ण इस पारंपरिक भजन के बोल और भावार्थ जानें Bhaktilok पर।

"भक्त खड़ा तेरे द्वार अर्जी ले कर के" एक अत्यंत ही पावन, भक्ति रस से परिपूर्ण और शरणागति के भाव से ओत-प्रोत पारंपरिक भजन है। यह भजन जीवात्मा की उस तड़प को व्यक्त करता है, जो उसे अपने मूल स्रोत परमात्मा से मिलन के लिए होती है। इस भजन में भक्त अपने आराध्य के द्वार पर खड़े होकर अर्जी लगाता है, अपनी अज्ञानता और दुर्बलता को स्वीकार करता है, और प्रभु से अपने उद्धार की प्रार्थना करता है। यह भजन विशेष रूप से भक्ति आंदोलन की उस परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ भक्त और भगवान के बीच दास्य और सख्य भाव की गहरी आत्मीयता होती है। इस भजन का मुख्य स्वर शरणागति, विनम्रता और प्रभु कृपा की अटूट आस्था है। इसे अक्सर सत्संग, भजन संध्या, एकादशी, और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान गाया जाता है। भजन की सरल भाषा और गहन भाव इसे हर वर्ग के श्रोताओं के लिए आत्मसात करने योग्य बनाते हैं।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

भक्त खड़ा तेरे द्वार अर्जी ले कर के

भक्त खड़ा तेरे द्वार अर्जी ले कर के,
सही करो करतार अर्जी ले कर के,
प्रवेश मिले तब अन्दर आउ,
अन्दर के पट खोल न पाऊ,
दो शक्ति दातार अर्जी ले कर के,
अज्ञान मेरे को दूर हटा कर,
अपने प्रभु को अन्दर पा कर,
करो मेरा उधार अर्जी ले कर के,
ॐ आज तू भड भागी है इश्वर से ही अनुरागी है,
पार करो मझदार अर्जी ले कर ले !!

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस भजन का प्रत्येक शब्द भक्त की आंतरिक पुकार और परमात्मा के प्रति उसकी सम्पूर्ण समर्पण भावना को दर्शाता है। भक्त अपने आराध्य के द्वार पर खड़ा है, लेकिन उसके हाथ में कोई भौतिक उपहार या स्तुति नहीं है, बल्कि वह अपनी समस्त पीड़ा, अज्ञानता और दुर्बलताओं को एक 'अर्जी' के रूप में लेकर आया है। यह अर्जी उसकी विनम्रता और अपनी असमर्थता की स्वीकारोक्ति है।

"सही करो करतार अर्जी ले कर के" – भक्त प्रभु से प्रार्थना करता है कि वह उसकी अर्जी को स्वीकार करे और उसके जीवन को सही मार्ग पर ले आए। "प्रवेश मिले तब अन्दर आउ, अन्दर के पट खोल न पाऊ" – यह पंक्ति अत्यंत गहन है। भक्त कहता है कि हे प्रभु, यदि तुम्हारी कृपा से मुझे तुम्हारे दरबार में प्रवेश मिल जाए, तभी मैं अंदर आ पाऊंगा। मेरे भीतर के अज्ञान, अहंकार और माया के पट (दरवाजे) मेरे ही प्रयासों से नहीं खुल सकते; उन्हें खोलने के लिए तुम्हारी शक्ति और कृपा चाहिए। यहाँ 'अन्दर के पट' का अर्थ आंतरिक विकारों और आत्म-ज्ञान की कमी से है।

"दो शक्ति दातार अर्जी ले कर के" – भक्त प्रभु को 'दातार' (देने वाला) कहकर पुकारता है और उससे शक्ति की याचना करता है ताकि वह अपने भीतर के द्वारों को खोल सके। "अज्ञान मेरे को दूर हटा कर, अपने प्रभु को अन्दर पा कर, करो मेरा उधार अर्जी ले कर के" – भक्त चाहता है कि प्रभु उसके अज्ञान को दूर करें, जिससे वह अपने भीतर ही अपने प्रभु को पा सके। यहाँ 'उधार' शब्द का प्रयोग अत्यंत सुंदर है। भक्त कहता है कि हे प्रभु, मैंने तुम्हारे प्रेम और कृपा का जो ऋण लिया है, उसे चुका दो, अर्थात मुझे तुम्हारे चरणों में स्थायी स्थान दो।

"ॐ आज तू भड भागी है इश्वर से ही अनुरागी है, पार करो मझदार अर्जी ले कर ले" – यह अंतिम पंक्ति भक्त को आत्म-चिंतन कराती है। 'भड भागी' का अर्थ है भाग्यशाली। भक्त स्वयं को संबोधित करता है कि तू भाग्यशाली है क्योंकि तेरा ईश्वर से अनुराग (प्रेम) है। जब ईश्वर से प्रेम है, तो वह भवसागर के मझदार (बीच धारा) से भी पार लगाएगा। यह भजन संपूर्ण शरणागति का सार है – जब जीव अपनी सारी शक्ति और अहंकार छोड़कर प्रभु के द्वार पर खड़ा हो जाता है, तो प्रभु स्वयं उसका उद्धार करते हैं।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन भक्ति साहित्य की उस शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है जिसे 'दास्य भाव' और 'शरणागति भाव' कहा जाता है। इस भजन की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • देवता/आराध्य: यह भजन मुख्य रूप से निराकार ईश्वर या सगुण साकार प्रभु (जैसे श्री राम, श्री कृष्ण, या शिव) के प्रति समर्पित है। इसमें 'करतार' और 'दातार' जैसे शब्दों का प्रयोग सर्वव्यापी ईश्वर के लिए किया गया है।
  • भक्ति भाव: भजन का मुख्य भाव विनम्रता, समर्पण और प्रभु कृपा की अटूट आस्था है। भक्त स्वयं को असमर्थ और प्रभु को सर्वशक्तिमान मानता है।
  • आध्यात्मिक महत्व: यह भजन साधक को यह सिखाता है कि आत्म-ज्ञान और ईश्वर-प्राप्ति के लिए बाहरी साधनों से अधिक आंतरिक शुद्धि और प्रभु कृपा आवश्यक है। 'अन्दर के पट' खोलने का प्रतीक आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया है।
  • श्रवण एवं गायन के लाभ: इस भजन को श्रद्धा से सुनने और गाने से मन को शांति मिलती है, अहंकार कम होता है, और जीवन में प्रभु कृपा का अनुभव होता है। यह भजन भय, चिंता और निराशा को दूर करने में सहायक माना जाता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन को किसी भी शुभ अवसर पर गाया जा सकता है, लेकिन कुछ विशेष समय और विधियाँ इसकी प्रभावशीलता को बढ़ाती हैं:

  • शुभ समय: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) या संध्या काल (सूर्यास्त के बाद) इस भजन के गायन के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या, और प्रमुख हिंदू त्योहारों (जैसे राम नवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, शिवरात्रि) पर इसका विशेष महत्व है।
  • विधि: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल या किसी शांत स्थान पर बैठें। दीपक और धूप प्रज्वलित करें। मन को एकाग्र करके प्रभु का ध्यान करें और फिर भक्ति भाव से इस भजन का गायन करें।
  • गायन की सावधानी: भजन को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि भाव में गाना चाहिए। प्रत्येक पंक्ति के अर्थ को मन में अनुभव करें। साथ में ताली या मृदंग/ढोलक की सहायता से लय बनाए रखें।
  • श्रवण: यदि स्वयं गाना संभव न हो तो किसी शुद्ध भक्ति गायक द्वारा गाए गए इस भजन को श्रद्धापूर्वक सुनें। श्रवण भी उतना ही फलदायी माना जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन मुख्य रूप से निराकार सर्वव्यापी ईश्वर या सगुण साकार प्रभु (जैसे श्री राम, श्री कृष्ण, या शिव) को समर्पित है। इसमें 'करतार' और 'दातार' जैसे शब्दों का प्रयोग सर्वव्यापी ईश्वर के लिए किया गया है, जो भक्त की पुकार सुनते हैं।

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) या संध्या काल (सूर्यास्त के बाद) इस भजन के गायन के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। एकादशी, पूर्णिमा, और प्रमुख हिंदू त्योहारों पर इसका विशेष महत्व है।

'अन्दर के पट' का अर्थ आंतरिक विकारों (अज्ञान, अहंकार, माया) और आत्म-ज्ञान की कमी से है। भक्त कहता है कि उसके भीतर के ये द्वार उसके प्रयासों से नहीं खुल सकते; इसके लिए प्रभु की शक्ति और कृपा आवश्यक है।

हाँ, श्रद्धा और भक्ति भाव से इस भजन को सुनने मात्र से भी मन को शांति मिलती है, अहंकार कम होता है, और जीवन में प्रभु कृपा का अनुभव होता है। श्रवण भी उतना ही फलदायी माना जाता है जितना कि गायन।

इस भजन का कोई कठोर अनुष्ठानिक नियम नहीं है। इसे किसी भी शुभ अवसर पर शुद्ध मन और भक्ति भाव से गाया जा सकता है। हाँ, गायन से पूर्व स्नान और स्वच्छता का ध्यान रखना और मन को एकाग्र करना उचित माना जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसे भक्ति परंपरा, संत साहित्य और शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर संकलित किया गया है। "भक्त खड़ा तेरे द्वार अर्जी ले कर के" भजन पारंपरिक भक्ति गीतों की श्रेणी में आता है, जो पीढ़ियों से सत्संग और भजन संध्या में गाया जाता रहा है। इस भजन का मूल भाव शरणागति और प्रभु कृपा है, जो सनातन धर्म की मूल शिक्षा है। हमने इस भजन के लिरिक्स, अर्थ, भावार्थ और महत्व को विस्तार से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इस भजन को भक्ति भाव से गाएं और प्रभु कृपा का अनुभव करें।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 10 Oct 2026

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