परिचय
"आसरा इस जहाँ का मिले ना मिले, मुझको तेरा सहारा सदा चाहिए" यह अत्यंत ही पावन, भावपूर्ण और भगवान के प्रति अनन्य प्रेम व पूर्ण शरणागति (Surrender) को समर्पित एक लोकप्रिय हिंदी भजन है। सनातन धर्म और भक्ति परंपरा में संकीर्तन, भजन और प्रभु नाम का स्मरण जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का सबसे सरल और प्रभावी माध्यम माना गया है। कलयुग के इस भागदौड़ भरे और मायावी संसार में मनुष्य पग-प पग पर कठिनाइयों, भ्रम, और अनिश्चितताओं का सामना करता है। ऐसे में यह भजन साधक के भीतर एक अद्वितीय आध्यात्मिक ऊर्जा, धैर्य और भगवान के प्रति अटूट विश्वास जगाता है। इस भजन की हर एक पंक्ति में सांसारिक मोह-माया से विरक्ति और केवल और केवल आराध्य देव (श्री कृष्ण या भगवान विष्णु) के चरणों में आश्रय पाने की तीव्र लालसा दिखाई देती है। इसे प्रातःकाल की प्रार्थना, संध्या वंदन, सत्संग, एकादशी जागरण, मंदिर के कार्यक्रमों और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में बड़े ही भाव के साथ गाया जाता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
आसरा इस जहाँ का मिले ना मिले भजन इन हिंदी लिरिक्स
आसरा इस जहाँ का मिले ना मिले,
मुझको तेरा सहारा सदा चाहिए,
चाँद तारे फलक पर दिखे ना दिखे,
मुझको तेरा नज़ारा सदा चाहिए।
यहाँ खुशियां हैं कम और ज़्यादा हैं ग़म,
जहाँ देखो वहीँ पर भरम ही भरम,
मेरी महफ़िल में शम्मा जले ना जले,
मेरे दिल में उजाला तेरा चाहिए।
मेरी धीमी है चाल और पथ है विशाल,
हर कदम पर मुसीबत है अब तो संभाल,
मेरी चाहत की दुनिया बसे ना बसे,
मेरे दिल में बसेरा तेरा चाहिए।
कभी वैराग है कभी अनुराग है,
यहाँ बदलते हैं माली वही बाग़ है,
पैर मेरे थके ये चले ना चले,
मुझको तेरा इशारा सदा चाहिए।
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
यह भजन केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि एक भक्त की अपनी आराध्य के प्रति पुकार है। भजन के प्रथम चरण में भक्त कहता है कि उसे इस संसार का कोई भी भौतिक सुख, मान-सम्मान या अन्य लोगों का साथ मिले या न मिले, उसे इस बात की कोई परवाह नहीं है। उसे केवल और केवल अपने प्रभु के असीम सहारे की आवश्यकता है। जैसे आकाश में चाँद और तारे दिखें या न दिखें, परंतु भक्त को तो अपने प्रभु के दिव्य स्वरूप का दर्शन और उनकी कृपा का प्रकाश निरंतर चाहिए।
द्वितीय चरण में संसार की वास्तविकता का वर्णन करते हुए भक्त कहता है कि इस दुनिया में खुशियाँ बहुत कम हैं और दुखों व चिंताओं का अंबार लगा हुआ है। हर तरफ मोह-माया और भ्रम का जाल फैला हुआ है। भौतिक दुनिया की महफिल में दीप जले या न जले, इससे भक्त को कोई अंतर नहीं पड़ता, उसके अंतस (हृदय) में तो केवल प्रभु की भक्ति का उजाला होना चाहिए।
तृतीय और चतुर्थ चरण में भक्त अपनी असमर्थता और जीवन पथ की कठिनाइयों को स्वीकार करता है। वह कहता है कि उसकी जीवन रूपी यात्रा की चाल बहुत धीमी है और मार्ग बहुत विशाल व अनिश्चित है। हर कदम पर विपत्तियाँ और बाधाएँ हैं, इसलिए हे प्रभु! अब आप ही संभालिए। जीवन में चाहे कोई भौतिक संसार या रिश्ते-नाते बसें या उजड़ जाएँ, भक्त की एकमात्र कामना यह है कि उसका दिल हमेशा प्रभु का निवास स्थान बना रहे। अंत में, वह संसार के बदलते स्वरूप (कभी वैराग्य, कभी अनुराग, बदलते माली और बाग) का उल्लेख करते हुए कहता है कि चाहे उसके पैर थक जाएँ और आगे न चल सकें, फिर भी उसे जीवन के हर मोड़ पर केवल प्रभु के मार्गदर्शन और इशारे की आवश्यकता है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
इस भजन का मुख्य स्वर 'शरणागति भक्ति' (Surrender to God) है। सनातन संस्कृति में शरणागति को भक्ति का सर्वोच्च चरण माना गया है। जब मनुष्य सभी ओर से निराश हो जाता है और केवल ईश्वर को अपना सर्वस्व मान लेता है, तब भगवान उसकी रक्षा के लिए स्वयं आगे आते हैं। यह भजन साधक को मानसिक शांति प्रदान करता है और उसे जीवन के उतार-चढ़ाव में धैर्य रखना सिखाता है। इस भजन को नियमित रूप से स्मरण करने से अहंकार का नाश होता है और मन में निर्मल भक्ति भाव जागृत होता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस पावन भजन को किसी भी समय गाया या सुना जा सकता है, किंतु इसके गायन का विशेष महत्व निम्नलिखित अवसरों पर होता है:
- प्रातःकालीन वंदना: दिन की शुरुआत सकारात्मक ऊर्जा और भगवान के स्मरण के साथ करने के लिए।
- संध्या आरती के पश्चात: दिनभर की भागदौड़ के बाद मानसिक शांति और आत्मिक सुकून पाने के लिए।
- सत्संग और भजन संध्या: मंदिर या घरों में होने वाले धार्मिक आयोजनों और संकीर्तन में।
- एकादशी और व्रत के दिन: विशेष पूजा-अर्चना और भगवान विष्णु या श्री कृष्ण के स्मरण के समय।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन मूल रूप से भगवान श्री कृष्ण, श्री विष्णु या किसी भी आराध्य देव के प्रति गाए जाने वाले अनन्य प्रेम का प्रतीक है। भारतीय संत परंपरा में सूरदास, मीराबाई, तुलसीदास और आधुनिक संतों ने भी भगवान को ही अपना एकमात्र सहारा माना है। इस भजन के माध्यम से साधक अपने इष्ट देव को ही अपनी दुनिया, अपना मार्गदर्शक और अपना सर्वस्व स्वीकार करता है.
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
समकालीन भक्ति साहित्य और लोक संगीत परंपरा में इस प्रकार के भजन लोक-कल्याण और भक्तों की आंतरिक भावनाओं को व्यक्त करने के लिए रचे गए हैं। हालांकि किसी एक विशिष्ट प्राचीन ग्रंथ में इसका उल्लेख नहीं मिलता, परंतु संकीर्तन मंडलियों और आधुनिक भजन गायकों द्वारा इसे अत्यंत लोकप्रिय बनाया गया है। यह रचना सीधे हृदय को स्पर्श करती है क्योंकि इसमें सामान्य मनुष्य के जीवन के संघर्ष और उसकी ईश्वर के प्रति अटूट आस्था का सुंदर सामंजस्य है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा सरल, सहज और प्रवाहमान हिंदी (खड़ी बोली मिश्रित ब्रिज-अवधी प्रभाव) है। इसके बोल इतने मधुर और लयबद्ध हैं कि एक सामान्य व्यक्ति भी इसे आसानी से याद कर सकता है। इसमें रूपक अलंकार और उपमा का सुंदर प्रयोग किया गया है, जैसे- जीवन को एक 'पथ' और 'यात्रा' के रूप में देखना, तथा संसार को 'भ्रम का जाल' बताना।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
इस भजन से हमें कई महत्वपूर्ण जीवन सीख मिलती हैं:
- नश्वर संसार से मोह का त्याग: भौतिक संसार की चीजें और लोगों का साथ अनिश्चित है, इसलिए अपनी सच्ची आस केवल ईश्वर से रखें।
- कठिनाइयों में धैर्य: जीवन के विशाल पथ पर आने वाली बाधाओं से घबराने के बजाय भगवान के इशारे और मार्गदर्शन की प्रतीक्षा करें।
- पूर्ण शरणागति: अपने जीवन की डोर पूरी तरह से ईश्वर के हाथों में सौंप देना ही वास्तविक भक्ति है।
- आंतरिक प्रकाश: बाहरी दिखावे की महफिल से ज्यादा महत्वपूर्ण हृदय के भीतर भक्ति का उजाला होना है।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| आसरा | सहारा या शरण | ईश्वर की कृपा और संरक्षण की चाह |
| फलक | आकाश / आसमान | प्रकृति और ब्रह्मांड |
| शम्मा | दीपक / मोमबत्ती | सांसारिक सुख और बाहरी प्रकाश |
| पथ | मार्ग / रास्ता | जीवन की यात्रा |
| अनुराग | प्रेम / प्रीति | ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम |
| वैराग्य | मोह का त्याग | संसार की असारता का बोध |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"आसरा इस जहाँ का मिले ना मिले, मुझको तेरा सहारा सदा चाहिए..."
इस पंक्ति का अर्थ है कि भक्त को इस नश्वर संसार के लोगों से प्रशंसा, सहयोग या सांत्वना की कोई अपेक्षा नहीं है। उसे केवल और केवल सर्वशक्तिमान परमेश्वर का शाश्वत सहारा चाहिए।
"यहाँ खुशियां हैं कम और ज़्यादा हैं ग़म, जहाँ देखो वहीँ पर भरम ही भरम..."
यहाँ जीवन की कड़वी सच्चाई का वर्णन है कि सांसारिक सुख क्षणिक हैं और दुख अधिक हैं। चारों तरफ माया और भ्रम का साम्राज्य है, जिसमें मनुष्य भटक जाता है।
"मेरी धीमी है चाल और पथ है विशाल, हर कदम पर मुसीबत है अब तो संभाल..."
मानव जीवन की लघुता और उसकी कमजोरियों को दर्शाते हुए भक्त कहता है कि जीवन का सफर बहुत लंबा है और क्षमताएँ सीमित हैं, हे प्रभु! आप ही हर कदम पर मेरी रक्षा करें।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन की भावना से जुड़े हुए कुछ प्रमुख पावन श्लोक निम्नलिखित हैं, जिन्हें स्मरण करना कल्याणकारी माना गया है:
"कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणातः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः॥"
तथा भगवद्गीता का प्रसिद्ध श्लोक:
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥"
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| श्रेणी | विवरण |
|---|---|
| भजन का नाम | आसरा इस जहाँ का मिले ना मिले भजन (Aasara Is Janha Ka Mile Na Mile) |
| मुख्य आराध्य | भगवान श्री कृष्ण / विष्णु / समस्त इष्ट देव |
| भाषा | सरल हिंदी (भक्ति रस प्रधान) |
| मुख्य भाव | शरणागति, अनन्य प्रेम, विरक्ति और विनय |
| गाने का अवसर | प्रातः वंदना, सत्संग, एकादशी, भजन संध्या |
| आध्यात्मिक लाभ | मानसिक शांति, धैर्य और ईश्वर में अटूट विश्वास |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
"आसरा इस जहाँ का मिले ना मिले" भजन का मुख्य संदेश क्या है?
इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि मनुष्य को संसार की नश्वरता और भ्रम से दूर रहकर केवल और केवल भगवान के चरणों में अपनी पूर्ण शरणागति रखनी चाहिए। ईश्वर का सहारा ही जीवन का एकमात्र सच्चा संबल है।
इस भजन को किस समय गाना सबसे अच्छा माना जाता है?
इस भजन को प्रातःकाल उठकर, संध्या वंदन के समय, अथवा किसी भी धार्मिक सत्संग और एकादशी के पावन अवसर पर गाना अत्यंत फलदायी और शांतिदायक माना गया है।
क्या यह भजन शुरुआती संगीत सीखने वालों के लिए उपयुक्त है?
हाँ, इसकी लय बहुत सरल और सुमधुर है, इसलिए जो लोग संगीत या हारमोनियम सीख रहे हैं, वे इस भजन को बहुत आसानी से गा सकते हैं।
भजन में "वैराग्य" और "अनुराग" शब्दों का क्या अर्थ है?
वैराग्य का अर्थ संसार के मोह-माया से विरक्ति या डिटैचमेंट है, और अनुराग का अर्थ ईश्वर के प्रति गाढ़ा प्रेम या अटूट प्रीति है।
क्या इस भजन को घर पर अकेले गाया जा सकता है?
निश्चित रूप से! एकांत में बैठकर या पूजा के समय इस भजन का मनन करने से मानसिक तनाव दूर होता है और एकाग्रता बढ़ती है।
इस भजन से हमें जीवन की कौन सी सीख मिलती है?
यह भजन सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी घबराना नहीं चाहिए, क्योंकि ईश्वर का साथ और उनका इशारा ही हमारे जीवन को सही दिशा देता है।
क्या इस भजन से जुड़े अन्य लोकप्रिय भजन भी हैं?
हाँ, शरणागति और भक्ति भाव से जुड़े अन्य भजन जैसे श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी और अच्युतम केशवम कृष्ण दामोदरम भी इसी भाव को दर्शाते हैं।
शरणागति भक्ति का सनातन धर्म में क्या महत्व है?
सनातन धर्म और विशेषकर भक्ति मार्ग में शरणागति को मोक्ष और मानसिक शांति का सबसे सरल और श्रेष्ठ मार्ग माना गया है, जिसमें भक्त अपनी संपूर्ण जिम्मेदारी ईश्वर को सौंप देता है।
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह आलेख पाठकों की आध्यात्मिक जिज्ञासा और भक्ति भावना को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। इसमें भजन के सटीक बोल, उसका सरल हिंदी अर्थ, दार्शनिक महत्व और जीवनोपयोगी सीख को बहुत ही प्रामाणिक तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- पारंपरिक संकीर्तन एवं भजन साहित्य परंपरा
- श्रीमद्भगवद्गीता (शरणागति योग प्रसंग)
- सनातन भक्ति साहित्य एवं संत वाणी संग्रह
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