"मत पकड़ो कलाई यशोदा के लला मचा दूंगी हला रे" सनातन धर्म की समृद्ध संकीर्तन परंपरा का एक अत्यंत लोकप्रिय और मधुर भजन है। यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्री कृष्ण और ब्रज की गोपियों के बीच के दिव्य संवाद, जिसे 'दानलीला' या 'माखनचोरी लीला' के रूप में जाना जाता है, पर आधारित है। इस भजन में 'माधुर्य भाव' और 'सख्य भाव' की पराकाष्ठा देखने को मिलती है, जहां जीवात्मा (गोपी) और परमात्मा (श्री कृष्ण) के बीच का प्रेम किसी सांसारिक बंधन से परे, पूर्णतः आध्यात्मिक और अलौकिक है। ब्रज मंडल के मंदिरों, विशेषकर मथुरा, वृंदावन और बरसाना में होली, जन्माष्टमी और शरद पूर्णिमा जैसे पावन अवसरों पर इस भजन को अत्यंत भक्ति भाव और हर्षोल्लास के साथ गाया जाता है। इस भजन का श्रवण और कीर्तन साधक के हृदय में छिपे सुप्त कृष्ण-प्रेम को जाग्रत करता है और मन को सांसारिक चिंताओं से मुक्त कर दिव्य आनंद की अनुभूति कराता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
॥ मत पकड़ो कलाई यशोदा के लला ॥
स्थायी:
मत पकड़ो कलाई यशोदा के लला,
मचा दूंगी हला रे, मचा दूंगी हला।
मत पकड़ो कलाई यशोदा के लला...॥
अंतरा १:
दही की मटुकिया मोरे शीश धरी है,
मारग रोकत ठाड़े कन्हाई।
जाने दे मोहे बरसाने की गली,
मचा दूंगी हला रे, मचा दूंगी हला।
मत पकड़ो कलाई यशोदा के लला...॥
अंतरा २:
सास ननद मोरी बड़ी ही हठीली,
घर जाके मोहे देगी वो गारी।
लाज की मारी मैं तो मर जाऊंगी,
मचा दूंगी हला रे, मचा दूंगी हला।
मत पकड़ो कलाई यशोदा के लला...॥
अंतरा ३:
तुम तो हो नटखट गोकुल के राजा,
हम हैं भोली-भाली गुजरिया।
छोड़ो डगरिया मोरी श्याम सुंदर,
मचा दूंगी हला रे, मचा दूंगी हला।
मत पकड़ो कलाई यशोदा के लला...॥
अंतरा ४:
चन्द्रसखी भज बालकृष्ण छवि,
चरण कमल पर बलि-बलि जाऊं।
दीजो मोहे अपनी भक्ति का दान,
मचा दूंगी हला रे, मचा दूंगी हला।
मत पकड़ो कलाई यशोदा के लला...॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
यह पावन भजन ब्रज रस की उस अनूठी विधा को दर्शाता है जहां भक्त और भगवान के बीच कोई दूरी नहीं रह जाती। यहाँ गोपी भगवान श्री कृष्ण से अपनी कलाई छोड़ने की मनुहार कर रही है। वह कहती है कि "हे यशोदा के लाडले! मेरी कलाई मत पकड़ो, अन्यथा मैं यहाँ शोर मचा दूंगी (हला मचाना अर्थात कोलाहल करना)।"
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, यहाँ 'कलाई पकड़ना' परमात्मा द्वारा जीवात्मा को अपने वश में करने या अपनी ओर खींचने का प्रतीक है। गोपी का यह कहना कि 'मचा दूंगी हला' वास्तव में कोई विरोध नहीं, बल्कि प्रेम की वह मीठी तकरार है जो केवल अनन्य भक्तों और भगवान के बीच ही संभव है। गोपी लोक-लाज और सामाजिक बंधनों (सास-ननद का भय) की दुहाई देती है, जो इस बात का प्रतीक है कि जब तक जीवात्मा संसार में रहती है, उसे सामाजिक मर्यादाओं का पालन करना पड़ता है। परंतु अंततः, वह श्री कृष्ण के चरणों में ही समर्पित होना चाहती है।
इस भजन का मुख्य संदेश यही है कि संसार के समस्त कार्यों को करते हुए भी यदि मनुष्य का मन निरंतर ईश्वर के चरणों में लीन रहे, तो वह संसार सागर से सहज ही पार उतर जाता है। यह भजन साधक के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
- माधुर्य भाव की अभिव्यक्ति: यह भजन ब्रज भक्ति धारा के माधुर्य भाव का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ भगवान को ऐश्वर्य रूप में नहीं, बल्कि अत्यंत आत्मीय और प्रेमी रूप में भजा जाता है।
- लोक-संस्कृति का समावेश: इसमें ब्रज की लोक-भाषा, रहन-सहन, दही बेचने जाना और सामाजिक ताने-बाने का सुंदर चित्रण है।
- समर्पण की भावना: यद्यपि ऊपरी तौर पर गोपी कन्हाई को रोकती है, परंतु आंतरिक रूप से वह उनके चरण कमलों में सर्वस्व न्योछावर करने को आतुर है।
- मानसिक शांति: इस भजन के मधुर गायन से मन की चंचलता समाप्त होती है और साधक को असीम शांति की अनुभूति होती है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस भजन को गाने और सुनने के लिए किसी विशेष कठिन नियम की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि भगवान भाव के भूखे हैं। फिर भी, निम्नलिखित अवसरों पर इसका विशेष महत्व माना गया है:
- संध्या आरती व सत्संग: शाम के समय घर के मंदिर या सामूहिक सत्संग में ढोलक, मंजीरे और हारमोनियम के साथ इसे गाने से वातावरण अत्यंत भक्तिमय हो जाता है।
- विशेष त्योहार: श्री कृष्ण जन्माष्टमी, राधाष्टमी, होली और शरद पूर्णिमा के पावन पर्व पर इस भजन का गायन ब्रज मंडल की याद दिलाता है।
- गायन विधि: इसे गाते समय मन में श्री कृष्ण की बाल-लीलाओं और ब्रज की गोपियों के निश्छल प्रेम का ध्यान करना चाहिए। अश्रुपूर्ण नेत्रों और गद्गद कंठ से गाया गया भजन सीधे ठाकुर जी के चरणों तक पहुंचता है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन भगवान श्री कृष्ण (यशोदा नंदन) और उनकी आल्हादिनी शक्ति श्री राधा रानी के बरसाने की गोपियों को समर्पित है। इस भजन की रचना प्रसिद्ध संत कवयित्री चन्द्रसखी द्वारा की गई मानी जाती है। चन्द्रसखी ब्रज मंडल की एक महान कृष्ण भक्त थीं, जिन्होंने अपनी रचनाओं में भगवान श्री कृष्ण की बाल-लीलाओं और श्रृंगार रस का अत्यंत सजीव वर्णन किया है। उनकी रचनाओं में 'चन्द्रसखी भज बालकृष्ण छवि' की छाप मिलती है, जो उनके अनन्य समर्पण को दर्शाती है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
मध्यकालीन भारत में जब भक्ति आंदोलन अपने चरम पर था, तब अष्टछाप के कवियों और अन्य संत-कवियों ने ब्रजभाषा में अनगिनत पदों की रचना की। यह भजन उसी कालखंड की देन है। बरसाना और नंदगांव के बीच की संकरी गलियों (जिन्हें सांकरी खोर कहा जाता है) में भगवान श्री कृष्ण अपने सखाओं के साथ गोपियों से दही का दान (कर) मांगा करते थे। इसी ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि पर इस भजन का ताना-बाना बुना गया है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा शुद्ध और मधुर ब्रजभाषा है। ब्रजभाषा अपनी कोमलता और काव्यात्मकता के लिए जानी जाती है। इस भजन में 'मटुकिया', 'मारग', 'कन्हाई', 'गुजरिया' और 'डगरिया' जैसे देशज और तद्भव शब्दों का प्रयोग किया गया है, जो इसे जन-साधारण के अत्यंत निकट लाते हैं। काव्य शैली की दृष्टि से यह एक 'पद' है जिसे सुगम शास्त्रीय संगीत या लोक धुनों पर आसानी से गाया जा सकता है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
- लोक-लाज से ऊपर उठना: भगवान की प्राप्ति के लिए साधक को धीरे-धीरे सांसारिक लोक-लाज और अहंकार का त्याग करना पड़ता है।
- परमात्मा की सर्वव्यापकता: श्री कृष्ण हर मार्ग में, हर मोड़ पर साधक का हाथ पकड़ने को तैयार खड़े हैं, बस साधक में पुकारने का सच्चा भाव होना चाहिए।
- सरलता और निष्कपटता: गोपियों की तरह निष्कपट और सरल हृदय वाले भक्तों को ही भगवान अपनी लीलाओं का आनंद प्रदान करते हैं।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| लला | पुत्र / बालक (श्री कृष्ण) | वात्सल्य और सख्य भाव का सूचक |
| हला | शोर / कोलाहल / हंगामा | प्रेम जन्य व्याकुलता और पुकार |
| मटुकिया | मिट्टी का छोटा घड़ा (मटकी) | बुद्धि और अहंकार रूपी पात्र जिसमें भक्ति का रस भरा है |
| मारग | रास्ता / मार्ग | भवसागर से मुक्ति का आध्यात्मिक मार्ग |
| गुजरिया | ग्वालिन / गोपी | परमात्मा की शरण में आई जीवात्मा |
| बलि-बलि जाऊं | न्योछावर होना / समर्पित होना | पूर्ण शरणागति की अवस्था |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
१. "मत पकड़ो कलाई यशोदा के लला, मचा दूंगी हला रे..."
हे यशोदा के नंदन! आप मार्ग में इस प्रकार मेरी कलाई मत पकड़िए। यदि आप नहीं माने, तो मैं शोर मचाकर सभी ब्रजवासियों को यहाँ एकत्रित कर लूंगी। यहाँ गोपी का बाह्य क्रोध वास्तव में आंतरिक अनुराग को छिपाने का एक मधुर प्रयास है।
२. "दही की मटुकिया मोरे शीश धरी है, मारग रोकत ठाड़े कन्हाई..."
मेरे सिर पर दही से भरी मटकी रखी है और कन्हाई बीच रास्ते में खड़े होकर मेरा मार्ग रोक रहे हैं। वह मुझे बरसाने की गलियों में जाने नहीं दे रहे हैं। यह दर्शाता है कि जब जीवात्मा ज्ञान और भक्ति का रस लेकर आगे बढ़ती है, तो परमात्मा उसकी परीक्षा लेने के लिए मार्ग में लीला रचते हैं।
३. "सास ननद मोरी बड़ी ही हठीली, घर जाके मोहे देगी वो गारी..."
मेरी सास और ननद अत्यंत क्रोधी और हठी स्वभाव की हैं। यदि मुझे घर पहुंचने में देर हुई, तो वे मुझे अपशब्द कहेंगी और मुझ पर संदेह करेंगी। मैं इस लोक-लाज के भय से मरी जा रही हूँ। यह सांसारिक बंधनों और मर्यादाओं का सजीव चित्रण है।
४. "चन्द्रसखी भज बालकृष्ण छवि, चरण कमल पर बलि-बलि जाऊं..."
अंतिम पद में कवयित्री चन्द्रसखी कहती हैं कि मैं तो केवल अपने बालकृष्ण की सुंदर छवि का ही भजन करती हूँ और उनके चरण कमलों पर बार-बार न्योछावर होती हूँ। हे प्रभु! मुझे अपनी अनन्य भक्ति का वरदान दीजिए।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
भगवान श्री कृष्ण की इस मधुर लीला का स्मरण करते समय श्रीमद्भागवत महापुराण के इस सुप्रसिद्ध श्लोक का पाठ करना अत्यंत फलदायी माना जाता है:
"कस्तूरीतिलकं ललाटपटले वक्षःस्थले कौस्तुभं
नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले वेणुं करे कङ्कणम्।
सर्वाङ्गे हरिचन्दनं सुललितं कण्ठे च मुक्तावलि
गोपस्त्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपालचूडामणिः॥"
इसके साथ ही, भगवान श्री कृष्ण की कृपा प्राप्त करने के लिए श्री कृष्ण चालीसा का पाठ भी अत्यंत कल्याणकारी माना गया है।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| विवरण बिंदु | महत्वपूर्ण जानकारी |
|---|---|
| भजन का नाम | मत पकड़ो कलाई यशोदा के लला मचा दूंगी हला रे |
| आराध्य देव | भगवान श्री कृष्ण (बालकृष्ण / गोपाल) |
| रचयिता / कवि | संत कवयित्री चन्द्रसखी |
| काव्य भाषा | ब्रजभाषा (मधुर लोक शैली) |
| मुख्य भाव | माधुर्य भाव, सख्य भाव, लीला रस |
| गायन का उत्तम समय | प्रातःकाल, संध्या काल, संकीर्तन और उत्सव |
| संबंधित पर्व | जन्माष्टमी, होली, राधाष्टमी, शरद पूर्णिमा |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख सनातन धर्म के प्रामाणिक ग्रंथों, ब्रज साहित्य की समृद्ध परंपरा और पूज्य संतों के प्रवचनों के आधार पर तैयार किया गया है। इस भजन के माध्यम से प्रस्तुत की गई व्याख्या पूरी तरह से आध्यात्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण पर आधारित है। यह "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" पाठकों को शुद्ध और उच्च गुणवत्ता वाली भक्तिपरक जानकारी प्रदान करने के उद्देश्य से संकलित की गई है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्भागवत महापुराण (दशम स्कंध - रासपंचाध्यायी एवं गोपी गीत संदर्भ)
- ब्रज साहित्य अकादमी, मथुरा (संत कवयित्री चन्द्रसखी की रचनाएं)
- कल्याण (श्रीकृष्ण अंक), गीताप्रेस गोरखपुर
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