पावन देवस्थान एवं तीर्थ दर्शन

श्रीनाथजी मंदिर, नाथद्वारा (राजस्थान)

22 दर्शनार्थी
नाथद्वारा, राजस्थान
प्रकाशित: 26 Oct 2026
दर्शन व इतिहास पढ़ें
मुख्य आराध्य देव
Shri Nathji (Lord Krishna)
दर्शन समय सारिणी
सुबह 05:15 बजे से रात्रि 08:30 बजे तक (अष्टयाम दर्शन)
नित्य आरती समय
मंगला: 05:15 AM | श्रृंगार: 07:15 AM | ग्वाल: 09:15 AM | राजभोग: 11:15 AM | उत्थापन: 03:30 PM | भोग: 04:45 PM | संध्या: 05:15 PM | शयन: 08:15 PM
स्थान / नगर
नाथद्वारा, राजस्थान
आराध्य देव
Shri Nathji (Lord Krishna)
दर्शन समय
सुबह 05:15 बजे से रात्रि 08:30 बजे तक (अष्टयाम दर्शन)
आरती समय
मंगला: 05:15 AM | श्रृंगार: 07:15 AM | ग्वाल: 09:15 AM | राजभोग: 11:15 AM | उत्थापन: 03:30 PM | भोग: 04:45 PM | संध्या: 05:15 PM | शयन: 08:15 PM
स्थान / धाम
श्रीनाथजी मंदिर, मंदिर मार्ग, नाथद्वारा, जिला राजसमंद, राजस्थान - 313301
अक्षर आकार:
पठन थीम:

श्रीनाथजी मंदिर: पुष्टिमार्ग का दिव्य धाम

राजस्थान के राजसमंद जिले में बनास नदी के तट पर स्थित नाथद्वारा का श्रीनाथजी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि पुष्टिमार्ग (भक्ति का मार्ग) का हृदय है। यहाँ भगवान श्री कृष्ण अपने सात वर्ष के बाल स्वरूप में विराजमान हैं, जिन्हें 'श्रीनाथजी' कहा जाता है। यह विग्रह वही है जिसे द्वापर युग में भगवान ने गोवर्धन पर्वत को अपनी बायीं भुजा पर उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की थी।

ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि

श्रीनाथजी का विग्रह मूल रूप से गोवर्धन पर्वत (मथुरा) पर स्थित था। 17वीं शताब्दी में औरंगजेब के शासनकाल के दौरान, जब मंदिरों को खतरा था, तब श्रीनाथजी के भक्त विग्रह को सुरक्षित स्थान पर ले जाने के लिए निकल पड़े। किंवदंती है कि जब रथ नाथद्वारा के पास पहुँचा, तो रथ का पहिया कीचड़ में धंस गया और आगे नहीं बढ़ा। इसे प्रभु की इच्छा मानकर वहीं मंदिर की स्थापना की गई। 'नाथद्वारा' का अर्थ ही है 'नाथ (प्रभु) का द्वार'।

स्थापत्य कला और गर्भगृह

यह मंदिर किसी सामान्य मंदिर की तरह नहीं, बल्कि एक 'हवेली' की तरह निर्मित है। इसे 'श्रीनाथजी की हवेली' कहा जाता है। इसकी वास्तुकला राजस्थानी और मुगल शैली का अद्भुत मिश्रण है। गर्भगृह को अत्यंत सादगी और पवित्रता के साथ रखा गया है। यहाँ कोई भव्य स्वर्ण शिखर नहीं है, क्योंकि पुष्टिमार्ग में प्रभु को एक बालक के रूप में माना जाता है, न कि किसी राजा के रूप में।

अष्टयाम दर्शन की महिमा

श्रीनाथजी के दर्शन दिन में आठ बार होते हैं, जिन्हें 'अष्टयाम' कहा जाता है। प्रत्येक दर्शन का अपना महत्व है:

  • मंगला: प्रभु के जागने का समय।
  • श्रृंगार: प्रभु का दिव्य श्रृंगार।
  • ग्वाल: गायों को चराने जाने का समय।
  • राजभोग: प्रभु का मुख्य भोजन।
  • उत्थापन: प्रभु का दोपहर की नींद से जागना।
  • भोग: अल्पाहार।
  • संध्या: गोधूलि बेला।
  • शयन: प्रभु के विश्राम का समय।

प्रमुख उत्सव

यहाँ हर दिन उत्सव है, लेकिन 'अन्नकूट' महोत्सव यहाँ का सबसे भव्य आयोजन है। इसके अलावा जन्माष्टमी, होली, दीपावली और शरद पूर्णिमा पर मंदिर की छटा देखते ही बनती है। हवेली संगीत (कीर्तन) यहाँ की विशिष्ट पहचान है, जो प्रभु को रिझाने के लिए गाया जाता है।

यात्रा और ठहरने की व्यवस्था

नाथद्वारा उदयपुर से लगभग 48 किमी दूर है। निकटतम हवाई अड्डा उदयपुर (डबोक) है। निकटतम रेलवे स्टेशन मावली जंक्शन या उदयपुर सिटी है। सड़क मार्ग से यह राष्ट्रीय राजमार्ग 8 (NH-8) के माध्यम से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। मंदिर ट्रस्ट द्वारा संचालित कई धर्मशालाएं और गेस्ट हाउस उपलब्ध हैं।

दर्शनार्थियों के लिए नियम

मंदिर में प्रवेश के लिए सात्विक वेशभूषा अनिवार्य है। मोबाइल, कैमरा और चमड़े की वस्तुओं का प्रवेश वर्जित है। दर्शन के समय शांति बनाए रखना और 'श्री कृष्ण शरणं मम' का जाप करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।

तीर्थ यात्रा विधि

मंदिर दर्शन व पूजा के 4 सरल चरण

प्रभु के अलौकिक दर्शन का पूर्ण फल प्राप्त करने हेतु आवश्यक नियम

१. शुद्ध भाव व स्नान

दर्शन से पूर्व पवित्र भाव से स्नान कर सात्विक वस्त्र धारण करें।

२. आरती समय ज्ञान

मंगला, भोग अथवा शयन आरती के समय उपस्थित होकर दर्शन करें।

३. नैवेद्य व अर्पण

तुलसी, पुष्प, धूप, दीप व नैवेद्य श्रद्धापूर्वक प्रभु चरणों में अर्पित करें।

४. परिक्रमा व ध्यान

गर्भगृह की विधिवत परिक्रमा कर शांत भाव से प्रभु का ध्यान करें।

संदर्भ-आधारित एवं संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

भक्तिलोक पर उपलब्ध सभी मंदिर दर्शन समय, आरती सारिणी व इतिहास की जानकारी संबंधित देवस्थानम ट्रस्ट, प्रमाणिक धार्मिक पुस्तकों एवं तीर्थ यात्रियों के अनुभवों के आधार पर निरंतर अद्यतन की जाती है।

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