पावन देवस्थान एवं तीर्थ दर्शन

श्री द्वारकाधीश मंदिर (जगत मंदिर), द्वारका (गुजरात)

129 दर्शनार्थी
द्वारका, गुजरात
प्रकाशित: 30 Sep 2026
दर्शन व इतिहास पढ़ें
मुख्य आराध्य देव
भगवान श्री कृष्ण (द्वारकाधीश)
दर्शन समय सारिणी
सुबह 06:30 बजे से दोपहर 01:00 बजे तक और शाम 05:00 बजे से रात 09:30 बजे तक
नित्य आरती समय
मंगला आरती: 07:00 AM | अभिषेक पूजा: 08:00 AM | श्रृंगार आरती: 10:30 AM | संध्या आरती: 07:30 PM | शयन आरती: 08:30 PM
स्थान / नगर
द्वारका, गुजरात
आराध्य देव
भगवान श्री कृष्ण (द्वारकाधीश)
दर्शन समय
सुबह 06:30 बजे से दोपहर 01:00 बजे तक और शाम 05:00 बजे से रात 09:30 बजे तक
आरती समय
मंगला आरती: 07:00 AM | अभिषेक पूजा: 08:00 AM | श्रृंगार आरती: 10:30 AM | संध्या आरती: 07:30 PM | शयन आरती: 08:30 PM
स्थान / धाम
द्वारकाधीश मंदिर, द्वारका, गुजरात 361335
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पठन थीम:

श्री द्वारकाधीश मंदिर: एक परिचय

द्वारकाधीश मंदिर, जिसे 'जगत मंदिर' के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म के चार धामों में से एक है। यह पवित्र स्थान भगवान श्री कृष्ण की कर्मभूमि और उनकी राजधानी रही है। गोमती नदी के तट पर स्थित यह मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि भारतीय वास्तुकला और भक्ति का एक अद्भुत संगम है।

पौराणिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

स्कंद पुराण के अनुसार, द्वारका का निर्माण स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने समुद्र से भूमि प्राप्त करके किया था। इसे 'द्वारवती' या 'द्वारका' कहा गया क्योंकि यहाँ मोक्ष के द्वार हैं। वर्तमान मंदिर का निर्माण 16वीं शताब्दी में माना जाता है, लेकिन इसके मूल आधार को वज्रनाभ (भगवान कृष्ण के प्रपौत्र) द्वारा निर्मित बताया जाता है। यह मंदिर सदियों से विदेशी आक्रमणों और प्राकृतिक आपदाओं का साक्षी रहा है, फिर भी अपनी भव्यता के साथ आज भी अडिग है।

वास्तुकला की भव्यता

जगत मंदिर की वास्तुकला 'चालुक्य' शैली का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह मंदिर पांच मंजिला है और 72 स्तंभों पर टिका हुआ है। मंदिर का मुख्य शिखर 78 मीटर ऊंचा है, जिस पर विशाल ध्वज (ध्वजा) फहराया जाता है। यह ध्वज दिन में पांच बार बदला जाता है, जो सूर्य और चंद्रमा के प्रतीक के रूप में माना जाता है। गर्भगृह में भगवान द्वारकाधीश की चतुर्भुज प्रतिमा विराजमान है, जो काले पत्थर से निर्मित है और अत्यंत मनोहारी है।

प्रमुख उत्सव और पर्व

द्वारकाधीश मंदिर में जन्माष्टमी का पर्व सबसे भव्य तरीके से मनाया जाता है। इसके अलावा, होली, दीपावली, और शरद पूर्णिमा के अवसर पर मंदिर को विशेष रूप से सजाया जाता है। 'अन्नकूट' उत्सव के दौरान भगवान को 56 भोग अर्पित किए जाते हैं, जिसे देखने के लिए लाखों श्रद्धालु उमड़ते हैं।

तीर्थयात्रियों के लिए महत्वपूर्ण निर्देश

  • मंदिर परिसर में मोबाइल फोन, कैमरा और चमड़े के सामान ले जाना वर्जित है।
  • श्रद्धालुओं को शालीन वस्त्र धारण करने की सलाह दी जाती है।
  • गर्भगृह में प्रवेश के लिए कतार का पालन करना अनिवार्य है।
  • विशेष पूजा के लिए मंदिर ट्रस्ट की वेबसाइट पर पूर्व पंजीकरण किया जा सकता है।
तीर्थ यात्रा विधि

मंदिर दर्शन व पूजा के 4 सरल चरण

प्रभु के अलौकिक दर्शन का पूर्ण फल प्राप्त करने हेतु आवश्यक नियम

१. शुद्ध भाव व स्नान

दर्शन से पूर्व पवित्र भाव से स्नान कर सात्विक वस्त्र धारण करें।

२. आरती समय ज्ञान

मंगला, भोग अथवा शयन आरती के समय उपस्थित होकर दर्शन करें।

३. नैवेद्य व अर्पण

तुलसी, पुष्प, धूप, दीप व नैवेद्य श्रद्धापूर्वक प्रभु चरणों में अर्पित करें।

४. परिक्रमा व ध्यान

गर्भगृह की विधिवत परिक्रमा कर शांत भाव से प्रभु का ध्यान करें।

संदर्भ-आधारित एवं संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

भक्तिलोक पर उपलब्ध सभी मंदिर दर्शन समय, आरती सारिणी व इतिहास की जानकारी संबंधित देवस्थानम ट्रस्ट, प्रमाणिक धार्मिक पुस्तकों एवं तीर्थ यात्रियों के अनुभवों के आधार पर निरंतर अद्यतन की जाती है।

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