पावन देवस्थान एवं तीर्थ दर्शन

श्री द्वारकाधीश मंदिर (जगत मंदिर), द्वारका: इतिहास, दर्शन समय, आरती एवं संपूर्ण यात्रा गाइड

215 दर्शनार्थी
द्वारका, गुजरात
प्रकाशित: 28 Sep 2026
दर्शन व इतिहास पढ़ें
मुख्य आराध्य देव
भगवान श्रीकृष्ण (श्री द्वारकाधीश)
दर्शन समय सारिणी
प्रातः ०६:३० AM से अपराह्न ०१:०० PM एवं संध्या ०५:०० PM से रात्रि ०९:३० PM
नित्य आरती समय
मंगला आरती: ०६:३० AM | श्रृंगार: ०८:०० AM | राजभोग: १२:०० PM | संध्या आरती: ०७:३० PM | शयन आरती: ०८:३० PM
स्थान / नगर
द्वारका, गुजरात
आराध्य देव
भगवान श्रीकृष्ण (श्री द्वारकाधीश)
दर्शन समय
प्रातः ०६:३० AM से अपराह्न ०१:०० PM एवं संध्या ०५:०० PM से रात्रि ०९:३० PM
आरती समय
मंगला आरती: ०६:३० AM | श्रृंगार: ०८:०० AM | राजभोग: १२:०० PM | संध्या आरती: ०७:३० PM | शयन आरती: ०८:३० PM
स्थान / धाम
श्री द्वारकाधीश मंदिर, गोमती घाट के पास, द्वारका, जिला देवभूमि द्वारका, गुजरात - 361335
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पठन थीम:

१. श्री द्वारकाधीश मंदिर (जगत मंदिर): तीर्थ परिचय एवं आध्यात्मिक महत्व

भारतवर्ष के पश्चिमी समुद्र तट पर गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र (देवभूमि द्वारका जिला) में पावन गोमती नदी और अरब सागर के दिव्य संगम पर स्थित श्री द्वारकाधीश मंदिर (Shri Dwarkadhish Temple, Dwarka), जिसे संपूर्ण विश्व में श्रद्धापूर्वक 'जगत मंदिर' (The World Temple) और 'त्रिलोक सुंदर मंदिर' कहा जाता है, सनातन धर्म के चार परम पावन महाधामों (बद्रीनाथ, द्वारका, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम) तथा मोक्षदायिनी सप्त पुरियों (अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, कांची, अवंतिका, द्वारकापुरी) में अत्यंत महिमामयी तीर्थ है।

स्कन्द पुराण के प्रभास खंड के अंतर्गत द्वारका महात्म्य में महर्षि वेदव्यास जी द्वारकापुरी के आध्यात्मिक महात्म्य का उद्घोष करते हुए कहते हैं:

॥ द्वारका महात्म्य श्लोक ॥

"द्वारकायां वसेद् यस्तु स्नायाद् वा गोमतीजले।
न तस्य पुनरावृत्तिर्जन्मकोटिशतैरपि॥"

भावार्थ: जो मनुष्य पावन द्वारकापुरी में निवास करता है अथवा पवित्र गोमती नदी के जल में श्रद्धापूर्वक स्नान कर भगवान द्वारकाधीश के दर्शन करता है, उसका सैकड़ों करोड़ जन्मों तक इस नश्वर संसार में पुनर्जन्म नहीं होता; वह परम पद (मोक्ष) को प्राप्त होता है।

भगवान श्री कृष्ण मथुरा और गोकुल का त्याग कर जब सौराष्ट्र पधारे, तो उन्होंने समुद्र के मध्य अपनी स्वर्णिम राजधानी द्वारका का निर्माण कराया और यहाँ प्रजावत्सल 'द्वारकाधीश' (द्वारका के अधिपति राजा) के रूप में शासन किया। जगतगुरु आदि शंकराचार्य जी ने सनातन धर्म की रक्षा और वेदों के पुनरुद्धार हेतु भारत के पश्चिमी छोर पर इसी पावन तीर्थ में 'शारदा पीठ' (पश्चिम आम्नाय पीठ) की स्थापना की, जो सामवेद से संबद्ध है। यह तीर्थ भक्ति, ज्ञान और मुक्ति का साक्षात् सागर है।

२. पौराणिक कथा एवं स्थल पुराण (Sthala Purana)

श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध तथा महाभारत के मौसल पर्व में द्वारका निर्माण और जगत मंदिर की स्थापना का अत्यंत पावन आख्यान वर्णित है:

॥ देवशिल्पी विश्वकर्मा द्वारा स्वर्ण द्वारका का निर्माण एवं वज्रनाभ की भक्ति ॥

द्वापर युग में जब मगध नरेश जरासंध ने मथुरा पर निरंतर सत्रह बार आक्रमण किया, तब प्रजा को बार-बार होने वाले युद्ध के विनाश और संताप से बचाने हेतु योगेश्वर श्री कृष्ण ने एक नई सुरक्षित राजधानी स्थापित करने का निर्णय लिया। भगवान श्री कृष्ण ने समुद्र देव से बारह योजन (लगभग ९६ वर्ग मील) भूमि की याचना की। समुद्र देव ने विनम्रतापूर्वक भगवान के चरणों में भूमि समर्पित कर दी।

भगवान की आज्ञा पाकर देवशिल्पी विश्वकर्मा जी ने मात्र एक रात में समुद्र के भीतर सुवर्ण, पद्मराग मणियों, हीरों और वैदूर्य मणियों से जगमगाती अलौकिक 'द्वारका नगरी' का निर्माण किया। इसमें विशाल राजप्रासाद, गगनचुंबी अट्टालिकाएं, सुंदर सरोवर और ५२ सुदृढ़ नगर-द्वार बनाए गए। भगवान श्री कृष्ण ने अपने संपूर्ण यदुवंश और मथुरा की प्रजा को यहाँ सुरक्षित बसाया।

आगे चलकर जब भगवान श्री कृष्ण अपनी लीला का संवरण कर परमधाम पधारे, तो स्वर्णिम द्वारका नगरी समुद्र में समा गई। केवल भगवान श्री कृष्ण का निजी निवास कक्ष 'हरि गृह' समुद्र के जल से अछूता रहा। भगवान श्री कृष्ण के प्रपौत्र (अनिरुद्ध के पुत्र) महाराज वज्रनाभ ने अपने परदादा की पावन स्मृति में उसी 'हरि गृह' की पवित्र भूमि पर काले पाषाण से चतुर्भुज भगवान द्वारकाधीश की दिव्य प्रतिमा प्रतिष्ठित कराई और वर्तमान जगत मंदिर की नींव रखी।

॥ परम सखा सुदामा जी का मिलन एवं गोमती संगम ॥

द्वारका ही वह परम पावन तीर्थ है जहाँ बालसखा सुदामा जी अपने फटे वस्त्रों और चार मुट्ठी तंदुल (चावल) की पोटली लेकर भगवान श्री कृष्ण से मिलने पहुंचे थे। भगवान द्वारकाधीश ने अपने सिंहासन से उठकर नंगे पैर दौड़ते हुए सुदामा जी को गले लगाया और अपने अश्रुओं से उनके चरण धोकर उन्हें दो लोकों की संपत्ति प्रदान कर दी थी। द्वारका के निकट स्थित 'गोमती-सागर संगम' में स्नान करने से दरिद्रता का नाश और अक्षय लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

३. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं मंदिर निर्माण कालक्रम

श्री द्वारकाधीश जगत मंदिर का ऐतिहासिक सफर सदियों के उत्थान, आक्रमणों और पुनरुद्धार की अद्वितीय गाथा है:

कालखंड / वर्ष ऐतिहासिक घटनाक्रम शासक / योगदानकर्ता
द्वापर युग (लगभग २५०० ई.पू.) 'हरि गृह' पर प्रारंभिक मंदिर एवं विग्रह स्थापना। भगवान श्री कृष्ण के प्रपौत्र महाराज वज्रनाभ द्वारा।
८वीं शताब्दी ईस्वी पश्चिम आम्नाय शारदा पीठ की स्थापना। जगतगुरु आदि शंकराचार्य जी द्वारा सनातन धर्म जागरण।
१३वीं शताब्दी (ईस्वी १२४१) सुलतान मोहम्मद शाह द्वारा आक्रमण। मंदिर के बाहरी हिस्सों को क्षति पहुंची, जिसे स्थानीय भक्तों ने पुनः बनाया।
१५वीं-१६वीं शताब्दी वर्तमान भव्य चालुक्य पाषाण मंदिर का विस्तार। गुजरात के चालुक्य और सोलंकी वास्तुकारों द्वारा ७२ स्तंभों वाला भव्य रूप।
ईस्वी सन् १४७२ महमूद बेगड़ा द्वारा आक्रमण। मंदिर को पुनः नुकसान पहुंचाया गया, परंतु राजपूत राजाओं और गायकवाड़ राजघराने ने इसे और अधिक भव्यता से पुनर्निर्मित किया।
आधुनिक काल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) एवं मंदिर ट्रस्ट। समुद्री लवणीय वायु से मंदिर पत्थरों का वैज्ञानिक संरक्षण एवं सुदर्शन सेतु कॉरिडोर।

भारतीय नौसेना और प्रख्यात पुरातत्वविद डॉ. एस. आर. राव के समुद्री उत्खनन (Marine Archaeology) में द्वारका के समुद्र में जलमग्न प्राचीन पाषाण दीवारें, स्तंभ और लंगर प्राप्त हुए हैं, जिसने महाभारत कालीन द्वारका नगरी की ऐतिहासिक सत्यता को संपूर्ण विश्व के समक्ष अकाट्य रूप से सिद्ध कर दिया है।

४. जगत मंदिर की वास्तुकला एवं ५२ गज की धर्मध्वजा का अलौकिक रहस्य

श्री द्वारकाधीश मंदिर चालुक्य (सोलंकी) स्थापत्य शैली का सात मंजिला पाषाण महाकाव्य है:

  • १. बहत्तर नक्काशीदार स्तंभ (72 Carved Pillars): मंदिर का मुख्य सभा मंडप बलुआ पत्थर से निर्मित ७२ भव्य और नक्काशीदार स्तंभों पर टिका हुआ है। यह मंडप बिना किसी आधुनिक धातु के सहारे सदियों से अडिग खड़ा है। मंदिर का मुख्य शिखर ७८ मीटर (२५६ फीट) ऊंचा है जो दूर समुद्र से ही नाविकों को दिशा दिखाता है।
  • २. दो पावन प्रवेश द्वार (स्वर्ग द्वार एवं मोक्ष द्वार): मंदिर में प्रवेश हेतु दो मुख्य दिशा-द्वार हैं:
    • स्वर्ग द्वार (Swarga Dwar): गोमती नदी के तट पर स्थित ५६ सीढ़ियों वाला भव्य द्वार जहाँ से श्रद्धालु नदी में स्नान कर मंदिर में प्रवेश करते हैं।
    • मोक्ष द्वार (Moksha Dwar): दर्शनोपरांत बाहर निकलने का मुख्य द्वार, जो जीवात्मा के भवबंधन से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्ति का प्रतीक है।
  • ३. चतुर्भुज श्याम विग्रह (Trivikrama Svarupa): गर्भगृह के मध्य में चमकदार काले कसौटी पत्थर से निर्मित भगवान द्वारकाधीश की दिव्य चतुर्भुज प्रतिमा विराजमान है। भगवान के चारों हाथों में क्रमशः शंख, चक्र, गदा और पद्म (कमल) शोभायमान हैं। भगवान का नित्य बहुमूल्य हीरों, मोतियों और पीले पीतांबर से अलौकिक श्रृंगार किया जाता है।
  • ४. विस्मयकारी ५२ गज की धर्मध्वजा (The Sacred 52-Yard Flag): जगत मंदिर के शिखर पर लहराती विशाल ध्वजा संपूर्ण विश्व में अद्वितीय है:
    • ५२ गज का माप: यह ध्वजा पूरे ५२ गज (लगभग १५६ फीट) लंबे शुद्ध रेशमी वस्त्र से निर्मित होती है। ५२ अंक प्राचीन द्वारका के ५२ मुख्य द्वारों, ५२ यादव वीरों, और मानव शरीर के ५२ विकारों पर विजय का प्रतीक है।
    • सूर्य और चंद्रमा का अंकन: ध्वजा पर सूर्य और चंद्र के पवित्र चिह्न बने होते हैं, जो यह उद्घोष करते हैं कि जब तक आकाश में सूर्य और चंद्रमा रहेंगे, तब तक भगवान श्री कृष्ण का नाम और धर्म की विजय पताका लहराती रहेगी।
    • दिन में पांच बार ध्वजारोहण: प्रतिदिन प्रातःकाल से सायं तक कुल पांच बार नई ध्वजा चढ़ाई जाती है। अबोटी ब्राह्मण जाति के प्रशिक्षित युवा बिना किसी सुरक्षा उपकरण के ७८ मीटर ऊंचे शिखर पर चढ़कर यह ध्वजारोहण करते हैं। इस ध्वजा को चढ़ाने हेतु श्रद्धालुओं को वर्षों पूर्व अग्रिम बुकिंग करानी पड़ती है।

५. दर्शन समय, दैनिक भोग एवं पंच आरती क्रम

श्री द्वारकाधीश मंदिर में प्रातः ०६:३० बजे से रात्रि ०९:३० बजे तक राजाधिराज की सेवा चलती है:

प्रातः मंगला आरती

०६:३० AM - ०७:०० AM

कपाट उद्घाटन, मंगल शंखनाद एवं मंगला दर्शन।

मध्याह्न राजभोग आरती

१२:०० PM - १२:३० PM

छप्पन प्रकार के व्यंजनों का राजभोग अर्पण एवं विश्राम पट।

संध्या आरती व शयन

०७:३० PM - ०९:३० PM

दीपदान संध्या आरती, शयन भोग एवं अंतिम शयन आरती।

दैनिक दर्शन चक्र: मंगला दर्शन (०६:३० AM), श्रृंगार दर्शन (०८:०० AM), ग्वाल भोग (०९:४५ AM), राजभोग (१२:०० PM), उत्थापन दर्शन (०५:०० PM), संध्या भोग (०७:३० PM), और शयन आरती (०८:३० PM)। दोपहर ०१:०० PM से ०५:०० PM तक मंदिर के पट भगवान के विश्राम हेतु बंद रहते हैं।

६. प्रमुख उत्सव, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी एवं यात्रा मुहूर्त

द्वारका में राजाधिराज श्री कृष्ण के उत्सव अत्यंत राजसी वैभव से मनाए जाते हैं:

१. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महापर्व (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी)

द्वारका का सबसे बड़ा वार्षिक उत्सव। मध्यरात्रि १२:०० बजे भगवान का पंचामृत से महाभिषेक होता है। संपूर्ण मंदिर लाखों दीपों और फूलों से जगमगाता है और लाखों भक्त 'नंद घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की' का जयघोष करते हैं।

२. अन्नकूट एवं गोवर्धन पूजा (कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा)

दिवाली के अगले दिन भगवान द्वारकाधीश को सहस्रों प्रकार के मिष्ठान और व्यंजनों का विशाल 'अन्नकूट' अर्पित किया जाता है।

३. होली एवं डांडिया रास उत्सव (फाल्गुन पूर्णिमा)

फाल्गुन में द्वारका में प्राकृतिक गुलाल और केवड़े के जल से भव्य रंगोत्सव मनाया जाता है। मंदिर प्रांगण में श्रद्धालु पारंपरिक डांडिया रास करते हैं।

४. यात्रा हेतु सर्वोत्तम मौसम

द्वारका यात्रा हेतु सर्वोत्तम मौसम अक्टूबर से मार्च तक रहता है जब मौसम सुहावना और शीतल रहता है। ग्रीष्म ऋतु में यहाँ तेज धूप रहती है।

७. यात्रा मार्गदर्शिका: कैसे पहुँचें द्वारकाधीश मंदिर?

द्वारका देश के सभी प्रमुख नगरों से वायु, रेल और सड़क मार्ग द्वारा सुगमता से जुड़ा हुआ है:

  • हवाई मार्ग (By Air): निकटतम हवाई अड्डा जामनगर हवाई अड्डा (JGA - लगभग १३५ किमी) और पोरबंदर हवाई अड्डा (लगभग ११० किमी) है। राजकोट अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (Hirasar - लगभग २३० किमी) दूर है जहाँ से देश भर की सीधी उड़ानें मिलती हैं। हवाई अड्डों से द्वारका हेतु नियमित बसें और टैक्सियां उपलब्ध हैं।
  • रेल मार्ग (By Train): निकटतम रेलवे स्टेशन द्वारका (DWK - मंदिर से मात्र २ किमी) है। द्वारका स्टेशन ब्रॉडगेज लाइन पर स्थित है और मुंबई, दिल्ली, अहमदाबाद, वाराणसी, कोलकाता, जयपुर और चेन्नई से सीधी एक्सप्रेस ट्रेनों से जुड़ा है।
  • सड़क मार्ग (By Road): द्वारका अहमदाबाद (४५० किमी), राजकोट (२२५ किमी), जामनगर (१३५ किमी), और सोमनाथ (२३५ किमी) से उत्तम फोर-लेन राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-51) द्वारा जुड़ा है। गुजरात राज्य परिवहन (GSRTC) की वातानुकूलित वोल्वो और स्लीपर बसें निरंतर उपलब्ध हैं।

८. तीर्थयात्रियों के लिए आवास, नियम एवं आवश्यक सावधानियां

द्वारका यात्रा के दौरान तीर्थयात्रियों को निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए:

  • १. इलेक्ट्रॉनिक उपकरण निषेध: सुरक्षा कारणों से मंदिर के भीतर मोबाइल फोन, कैमरा, स्मार्ट वॉच, चमड़े के बेल्ट और पर्स ले जाना पूर्णतः प्रतिबंधित है। मंदिर के प्रवेश द्वार (स्वर्ग द्वार व मोक्ष द्वार) पर निःशुल्क लॉकर सुविधा उपलब्ध है।
  • २. वेशभूषा मर्यादा (Dress Code): मंदिर में शालीन पारंपरिक वस्त्र (पुरुषों हेतु कुर्ता-पायजामा या धोती, महिलाओं हेतु साड़ी या सलवार सूट) अनिवार्य हैं। बरमूडा, शॉर्ट्स और कटी-फटी जींस पहनकर प्रवेश की अनुमति नहीं है।
  • ३. गोमती स्नान एवं आवास: मंदिर के ठीक नीचे गोमती नदी के घाट हैं जहाँ चक्रतीर्थ में स्नान करने का विशेष महत्व है। आवास हेतु द्वारका में गुजराती धर्मशालाएं, बिड़ला धर्मशाला, माहेश्वरी भवन और सैकड़ों आधुनिक होटल उपलब्ध हैं।

९. द्वारका के प्रमुख दर्शनीय एवं तीर्थ स्थल (Nearby Attractions)

द्वारका यात्रा के साथ निम्नलिखित प्रमुख तीर्थों के दर्शन अवश्य करने चाहिए:

  1. बेट द्वारका एवं सुदर्शन सेतु (Beyt Dwarka): समुद्र के भीतर स्थित वह पावन द्वीप जहाँ भगवान श्री कृष्ण का राजमहल था। अब यह भारत के सबसे लंबे केबल ब्रिज 'सुदर्शन सेतु' (Sudarshan Setu - २.३२ किमी) द्वारा सीधे सड़क मार्ग से जुड़ चुका है।
  2. श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग: द्वारका से १६ किमी दूर स्थित भगवान शिव का द्वादश ज्योतिर्लिंग।
  3. गोपी तालाब (Gopi Talav): द्वारका से २१ किमी दूर वह पावन सरोवर जहाँ गोपियों ने कृष्ण विरह में देहत्याग किया था और यहाँ की माटी 'गोपीचंदन' कहलाई।
  4. रुक्मिणी देवी मंदिर (Rukmini Temple): द्वारका शहर से २ किमी दूर स्थित माता रुक्मिणी का प्राचीन मंदिर जहाँ दुर्वासा ऋषि के शाप की कथा जुड़ी है।
  5. भड़केश्वर महादेव मंदिर: अरब सागर के भीतर चट्टान पर स्थित शिव मंदिर जहाँ सूर्यास्त का विहंगम दृश्य दिखाई देता है।
  6. गोमती संगम घाट एवं सुदामा सेतु: गोमती नदी और समुद्र के संगम पर बना सुंदर झूला पुल (सुदामा सेतु)।

१०. प्रामाणिक प्रश्नोत्तरी (FAQ)

द्वारकाधीश मंदिर को 'जगत मंदिर' (Universal Temple) इसलिए कहा जाता है क्योंकि भगवान श्री कृष्ण संपूर्ण जगत के स्वामी और जगतगुरु हैं ('कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्')। यह मंदिर किसी एक संप्रदाय का नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव जाति को मोक्ष और प्रेम का संदेश देने वाला विश्व मंदिर है। इसकी स्थापत्य भव्यता और आध्यात्मिक आभा तीनों लोकों में अद्वितीय मानी जाती है।

५२ गज की ध्वजा का गहरा दार्शनिक और ऐतिहासिक रहस्य है। प्राचीन द्वारका नगरी में कुल ५२ विशाल नगर-प्रवेश द्वार थे। इसके अतिरिक्त यदुवंश के ५२ प्रमुख वीर सेनापति थे। आध्यात्मिक दृष्टि से ५२ अंक मानव शरीर के ५२ विकारों (काम, क्रोध, मद, लोभ आदि) पर विजय का प्रतीक है। इस ध्वजा पर सूर्य और चंद्र अंकित होते हैं जो भगवान के शाश्वत धर्म और सार्वभौम सत्ता का प्रतीक हैं।

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार महर्षि दुर्वासा को भोजन हेतु भगवान श्री कृष्ण और माता रुक्मिणी अपने रथ में बैठाकर ला रहे थे। मार्ग में माता रुक्मिणी को तीव्र प्यास लगी। भगवान कृष्ण ने अपने पैर के अंगूठे से गंगाजल प्रकट किया और रुक्मिणी जी ने जल पी लिया, परंतु उन्होंने दुर्वासा ऋषि से जल पीने की अनुमति नहीं ली। इससे क्रुद्ध होकर दुर्वासा ऋषि ने शाप दिया कि तुम दोनों बारह वर्ष तक अलग रहोगे। इसी कारण रुक्मिणी जी का मंदिर मुख्य मंदिर से अलग स्थित है।

हाँ, पहले बेट द्वारका जाने हेतु ओखा बंदरगाह से नौका (बोट) द्वारा जाना पड़ता था। अब भारत सरकार द्वारा निर्मित भारत के सबसे लंबे केबल ब्रिज 'सुदर्शन सेतु' (Sudarshan Setu) का उद्घाटन हो चुका है। अब श्रद्धालु अपनी कार, बस या ऑटो द्वारा मात्र १० मिनट में सीधे बेट द्वारका द्वीप पर पहुँच सकते हैं।

अधिकांश श्रद्धालु द्वारका और प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ की यात्रा एक साथ करते हैं। दोनों तीर्थों के बीच सड़क मार्ग की दूरी मात्र २३५ किमी (लगभग ४.५ से ५ घंटे) है। मार्ग में पोरबंदर (महात्मा गांधी की जन्मस्थली एवं सुदामा मंदिर) पड़ता है। ३ दिन के प्रवास में द्वारकाधीश, बेट द्वारका, नागेश्वर ज्योतिर्लिंग, पोरबंदर और सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के अत्यंत सुखद दर्शन संपन्न हो जाते हैं।
तीर्थ यात्रा विधि

मंदिर दर्शन व पूजा के 4 सरल चरण

प्रभु के अलौकिक दर्शन का पूर्ण फल प्राप्त करने हेतु आवश्यक नियम

१. शुद्ध भाव व स्नान

दर्शन से पूर्व पवित्र भाव से स्नान कर सात्विक वस्त्र धारण करें।

२. आरती समय ज्ञान

मंगला, भोग अथवा शयन आरती के समय उपस्थित होकर दर्शन करें।

३. नैवेद्य व अर्पण

तुलसी, पुष्प, धूप, दीप व नैवेद्य श्रद्धापूर्वक प्रभु चरणों में अर्पित करें।

४. परिक्रमा व ध्यान

गर्भगृह की विधिवत परिक्रमा कर शांत भाव से प्रभु का ध्यान करें।

संदर्भ-आधारित एवं संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

भक्तिलोक पर उपलब्ध सभी मंदिर दर्शन समय, आरती सारिणी व इतिहास की जानकारी संबंधित देवस्थानम ट्रस्ट, प्रमाणिक धार्मिक पुस्तकों एवं तीर्थ यात्रियों के अनुभवों के आधार पर निरंतर अद्यतन की जाती है।

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