पावन देवस्थान एवं तीर्थ दर्शन

श्री बिरजा देवी शक्तिपीठ (जाजपुर, ओडिशा)

18 दर्शनार्थी
जाजपुर, ओडिशा
प्रकाशित: 26 Oct 2026
दर्शन व इतिहास पढ़ें
मुख्य आराध्य देव
माँ बिरजा (दुर्गा)
दर्शन समय सारिणी
प्रातः 06:00 बजे से रात्रि 09:00 बजे तक (दोपहर में विश्राम हेतु पट बंद रहते हैं)
नित्य आरती समय
प्रातः मंगला आरती: 06:00 AM | मध्याह्न भोग: 12:30 PM | संध्या आरती: 07:30 PM | शयन आरती: 09:00 PM
स्थान / नगर
जाजपुर, ओडिशा
आराध्य देव
माँ बिरजा (दुर्गा)
दर्शन समय
प्रातः 06:00 बजे से रात्रि 09:00 बजे तक (दोपहर में विश्राम हेतु पट बंद रहते हैं)
आरती समय
प्रातः मंगला आरती: 06:00 AM | मध्याह्न भोग: 12:30 PM | संध्या आरती: 07:30 PM | शयन आरती: 09:00 PM
स्थान / धाम
श्री बिरजा देवी मंदिर, बिरजा क्षेत्र, जाजपुर, ओडिशा - 755001
अक्षर आकार:
पठन थीम:

श्री बिरजा देवी शक्तिपीठ: जाजपुर, ओडिशा का दिव्य परिचय

सनातन धर्म और शाक्त परंपरा में ओडिशा के जाजपुर (जिसे प्राचीन काल में 'बिरजा क्षेत्र' या 'गजक्षेत्र' कहा जाता था) में स्थित श्री बिरजा देवी शक्तिपीठ का अत्यंत विशिष्ट एवं पूजनीय स्थान है। यह पावन तीर्थ वैतरणी नदी के तट पर स्थित है और इसे 51 शक्तिपीठों में से एक होने का गौरव प्राप्त है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यहां माता सती की 'नाभि' गिरी थी, जिसके कारण इस क्षेत्र को 'नाभि गया' के नाम से भी जाना जाता है। मोक्षदायिनी वैतरणी के तट पर स्थित होने के कारण यहां पितरों के पिंडदान और तर्पण का अनंत आध्यात्मिक महत्व है।

पौराणिक कथा एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, दक्ष प्रजापति के यज्ञ कुंड में माता सती के आत्मदाह के उपरांत, भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर तांडव करते हुए ब्रह्मांड में भ्रमण कर रहे थे। संसार को प्रलय से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के अंगों को विभाजित किया। जहां-जहां माता के अंग गिरे, वे स्थान 'शक्तिपीठ' कहलाए। जाजपुर में माता की नाभि गिरी थी। स्कंद पुराण, कालिका पुराण और ब्रम्हांड पुराण में इस क्षेत्र की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है।

ऐतिहासिक रूप से, जाजपुर प्राचीन कलिंग साम्राज्य की राजधानी रह चुका है। सोमवंशी राजाओं और केसरी वंश के शासकों ने इस मंदिर के जीर्णोद्धार और निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहां के प्राचीन अवशेषों और मूर्तियों से ज्ञात होता है कि यह स्थान सदियों से तांत्रिक साधना और देवी उपासना का महान केंद्र रहा है।

वास्तुकला और गर्भगृह का स्वरूप

श्री बिरजा देवी मंदिर की वास्तुकला कलिंग शैली (Kalinga Architecture) की उत्कृष्ट मिसाल है। मंदिर का मुख्य विमान (शिखर) नागर शैली और कलिंग वास्तुकला के समन्वय से निर्मित है। मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही एक असीम शांति और दिव्य ऊर्जा का अनुभव होता है।

गर्भगृह (Sanctum Sanctorum): मां बिरजा की मुख्य विग्रह प्रतिमा अत्यंत अद्वितीय है। माता यहां महिषासुर मर्दिनी के रूप में विराजमान हैं, जिनके दो हाथ हैं। वे अपने त्रिशूल से महिषासुर का वध कर रही हैं। उनका एक पैर महिषासुर की छाती पर और दूसरा पैर शेर पर है। मां बिरजा की यह द्विभुजा प्रतिमा देश के अन्य शक्तिपीठों में दुर्लभ मानी जाती है। गर्भगृह के भीतर माता का यह सौम्य एवं रौद्र दोनों रूपों का संगम दर्शन भक्तों को मंत्रमुग्ध कर देता है। मंदिर के चारों तरफ छोटे-छोटे कई उप-मंदिर हैं जिनमें भगवान शिव, गणेश, कार्तिकेय और विभिन्न देवियों की मूर्तियां स्थापित हैं।

वैतरणी नदी और नाभि गया का महत्व

मंदिर के ठीक समीप वैतरणी नदी प्रवाहित होती है। जिस प्रकार गया में फल्गु नदी के तट पर पिंडदान किया जाता है, उसी प्रकार जाजपुर में 'नाभि गया' वेदी पर पिंडदान करने से पूर्वजों को सीधा वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। मकर संक्रांति, महालया और अमावस्या के अवसरों पर यहां देश भर से श्रद्धालु अपने पितरों की शांति के लिए पिंडदान करने आते हैं।

दैनिक दर्शन एवं अनुष्ठान समय

अनुष्ठान / सेवासमय (Timing)
प्रातः मंगला दर्शन एवं द्वार खुलना06:00 AM
माता का श्रृंगार और बाल भोग07:30 AM
राजोपचार पूजा एवं दोपहर भोग आरती12:30 PM to 01:30 PM
मंदिर विश्राम हेतु बंद02:00 PM to 04:00 PM
सायंकालीन दर्शन एवं संध्या आरती07:30 PM
शयन आरती एवं पट बंद होना09:00 PM

प्रमुख उत्सव एवं पर्व

श्री बिरजा देवी मंदिर में वर्ष भर विभिन्न धार्मिक उत्सव धूमधाम से मनाए जाते हैं:

  • शारदीय नवरात्र (दुर्गा पूजा): आश्विन मास के नवरात्र यहां अत्यंत भव्यता से मनाए जाते हैं। बिरजा क्षेत्र में होने वाली दुर्गा पूजा का ओडिशा में विशेष सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व है। सोलह दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में 'षोडशोपचार पूजा' होती है।
  • रथ यात्रा (बिरजा रथ): महालया के अवसर पर यहां माता की रथ यात्रा निकाली जाती है, जिसमें हजारों की संख्या में भक्त सम्मिलित होते हैं।
  • महाशिवरात्रि और मकर संक्रांति: इन पर्वों पर विशेष अभिषेक, हवन और वैतरणी स्नान का विधान है।

कैसे पहुंचें (Travel Guide)

वायु मार्ग (By Air): निकटतम हवाई अड्डा भुवनेश्वर का बीजू पटनायक अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा (BBI) है, जो जाजपुर से लगभग 125 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हवाई अड्डे से टैक्सी या बस द्वारा आसानी से जाजपुर पहुंचा जा सकता है।

रेल मार्ग (By Rail): निकटतम रेलवे स्टेशन 'जाजपुर केओंझर रोड' (Jajpur Keonjhar Road - JJKR) है, जो हावड़ा-चेन्नई मुख्य रेल मार्ग पर स्थित है। यह स्टेशन मंदिर से लगभग 30 किलोमीटर दूर है। स्टेशन से ऑटो, टैक्सी और बसें नियमित रूप से उपलब्ध हैं।

सड़क मार्ग (By Road): जाजपुर ओडिशा के प्रमुख शहरों जैसे भुवनेश्वर, कटक, बालासोर और कोलकाता से राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-16) के माध्यम से सड़क मार्ग द्वारा बेहतरीन ढंग से जुड़ा हुआ है। ओडिशा राज्य सड़क परिवहन निगम (OSRTC) और निजी बसें लगातार चलती हैं।

आवास और तीर्थयात्री सुविधाएं

मंदिर ट्रस्ट और जाजपुर जिला प्रशासन द्वारा श्रद्धालुओं के लिए बेहतरीन व्यवस्थाएं की गई हैं:

  • धर्मशाला और गेस्ट हाउस: मंदिर परिसर के पास ट्रस्ट द्वारा संचालित विश्राम गृह और बजट अनुकूल धर्मशालाएं उपलब्ध हैं।
  • भोजन प्रसादम: मंदिर न्यास द्वारा पर्व-त्योहारों पर और सामान्य दिनों में भक्तों के लिए महाप्रसाद की व्यवस्था रहती है। शहर में अनेक शुद्ध शाकाहारी भोजनालय भी उपलब्ध हैं।
  • लॉकर और अन्य सुविधाएं: जूता घर, पेयजल और सुरक्षा के लिए पुलिस सहायता केंद्र मंदिर के पास सुलभ हैं।

दर्शनार्थियों के लिए महत्वपूर्ण नियम

मंदिर में प्रवेश करते समय शालीन पारंपरिक वस्त्र पहनें। पुरुषों के लिए धोती-कुर्ता या कुर्ता-पैजामा तथा महिलाओं के लिए साड़ी या सलवार सूट उत्तम माना जाता है। गर्भगृह के भीतर मोबाइल फोन, कैमरे और चमड़े की वस्तुएं ले जाना सख्त वर्जित है। पूजा-सामग्री मंदिर के बाहर से आसानी से मिल जाती है।

तीर्थ यात्रा विधि

मंदिर दर्शन व पूजा के 4 सरल चरण

प्रभु के अलौकिक दर्शन का पूर्ण फल प्राप्त करने हेतु आवश्यक नियम

१. शुद्ध भाव व स्नान

दर्शन से पूर्व पवित्र भाव से स्नान कर सात्विक वस्त्र धारण करें।

२. आरती समय ज्ञान

मंगला, भोग अथवा शयन आरती के समय उपस्थित होकर दर्शन करें।

३. नैवेद्य व अर्पण

तुलसी, पुष्प, धूप, दीप व नैवेद्य श्रद्धापूर्वक प्रभु चरणों में अर्पित करें।

४. परिक्रमा व ध्यान

गर्भगृह की विधिवत परिक्रमा कर शांत भाव से प्रभु का ध्यान करें।

संदर्भ-आधारित एवं संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

भक्तिलोक पर उपलब्ध सभी मंदिर दर्शन समय, आरती सारिणी व इतिहास की जानकारी संबंधित देवस्थानम ट्रस्ट, प्रमाणिक धार्मिक पुस्तकों एवं तीर्थ यात्रियों के अनुभवों के आधार पर निरंतर अद्यतन की जाती है।

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