पावन देवस्थान एवं तीर्थ दर्शन

श्री बिरजा देवी शक्तिपीठ, जाजपुर (ओडिशा)

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जाजपुर रोड, ओडिशा
प्रकाशित: 04 Nov 2026
दर्शन व इतिहास पढ़ें
मुख्य आराध्य देव
माँ बिरजा (दुर्गा)
दर्शन समय सारिणी
प्रातः 06:00 बजे से रात्रि 09:30 बजे तक (दोपहर 01:00 बजे से 03:00 बजे तक मंदिर पट विश्राम हेतु बंद रहते हैं)
नित्य आरती समय
मंगला आरती: 06:00 AM | बाल भोग: 08:30 AM | मध्याह्न भोग: 01:00 PM | संध्या आरती: 07:30 PM | शयन आरती: 09:15 PM
स्थान / नगर
जाजपुर रोड, ओडिशा
आराध्य देव
माँ बिरजा (दुर्गा)
दर्शन समय
प्रातः 06:00 बजे से रात्रि 09:30 बजे तक (दोपहर 01:00 बजे से 03:00 बजे तक मंदिर पट विश्राम हेतु बंद रहते हैं)
आरती समय
मंगला आरती: 06:00 AM | बाल भोग: 08:30 AM | मध्याह्न भोग: 01:00 PM | संध्या आरती: 07:30 PM | शयन आरती: 09:15 PM
स्थान / धाम
श्री बिरजा मंदिर, बिरजा क्षेत्र, जाजपुर, ओडिशा - 755001
अक्षर आकार:
पठन थीम:

श्री बिरजा देवी शक्तिपीठ: परिचय एवं महिमा

भारत के प्राचीनतम और अत्यंत प्रभावशाली शक्तिपीठों में ओडिशा के जाजपुर (याजापर) में स्थित श्री बिरजा देवी शक्तिपीठ का स्थान सर्वोपरि है। पावन वैतरणी नदी के तट पर स्थित यह दिव्य क्षेत्र आदिशक्ति माँ दुर्गा के 51 शक्तिपीठों में से एक है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यहाँ माता सती की 'नाभि' गिरी थी, जिसके कारण इस क्षेत्र को 'नाभि गया' के रूप में भी अपार ख्याति प्राप्त है। काशी और गया की तरह ही इस पावन भूमि पर पितरों का पिंडदान और तर्पण करने से पूर्वजों को वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। यह क्षेत्र सदियों से सनातन संस्कृति, शाक्त परंपरा और महायान बौद्ध धर्म का एक अद्भुत संगम रहा है।

पौराणिक संदर्भ एवं इतिहास

स्कंद पुराण, कालिका पुराण और ब्रह्म पुराण जैसे ग्रंथों में जाजपुर को 'बिरजा क्षेत्र' या 'विजा क्षेत्र' के नाम से वर्णित किया गया है। मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा ने यहाँ अश्वमेध यज्ञ किया था, जिसके उपलक्ष್ಯ में माँ बिरजा प्रकट हुईं। इस क्षेत्र की पवित्रता इतनी अधिक है कि इसे ओडिशा की काशी भी कहा जाता है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो इस मंदिर का निर्माण और जीर्णोद्धार विभिन्न राजवंशों - विशेषकर सोमवंशी राजाओं और बाद में गंगा राजवंश के शासनकाल में हुआ। यहाँ की अधिष्ठात्री देवी बिरजा न केवल ओडिशा की आराध्य हैं, बल्कि वे यहाँ की क्षेत्रीय अस्मिता और शक्ति का पर्याय भी हैं।

दिव्य विग्रह और वास्तुकला (Architectural Splendor)

माँ बिरजा का मुख्य विग्रह अत्यंत दुर्लभ और अनूठा है। माता यहाँ महिषासुरमर्दिनी के रूप में द्विभुजा (दो हाथों वाली) मुद्रा में विराजमान हैं। वे अपने एक हाथ से महिषासुर का वध कर रही हैं और दूसरे हाथ से उसका त्रिशूल से भेदन कर रही हैं। यह रूप अन्य सामान्य शक्तिपीठों से भिन्न है जहाँ माता अष्टभुजा या दशभुजा रूप में दिखती हैं।
मंदिर की वास्तुकला कलिंग वास्तुकला (Kalinga Architecture) की उत्कृष्ट शैली का परिचायक है। मुख्य मंदिर का शिखर पिरामिडनुमा है जो उन्नत शिल्पकला का प्रमाण देता है। मंदिर परिसर के भीतर अनेक छोटे-मोटे देवालय हैं जहाँ भगवान शिव, गणेश, कार्तिकेय और विभिन्न रूपों की देवियां स्थापित हैं। गर्भ गृह में माता की काले पत्थरों से निर्मित मूर्ति अत्यंत जीवंत और तेजोमय प्रतीत होती है।

दैनिक दर्शन एवं आरती समय सारणी

अनुष्ठान / सेवासमय (प्रातः / सायं)विवरण
मंगला दर्शन एवं आरती06:00 AM - 06:30 AMप्रातःकाल माता का शृंगार और प्रथम दर्शन
बाल भोग व आरती08:30 AMमिष्ठान एवं फलाहार का नैवेद्य
मध्याह्न महाभोग01:00 PMअन्नभोग अर्पण (इसके पश्चात पट बंद होते हैं)
पुनः द्वार खुलना03:00 PMअपराह्न दर्शन आरंभ
संध्या आरती व शृंगार07:30 PMदीपक और कपूर से भव्य आरती
शयन आरती09:15 PMरात्रि विश्राम से पूर्व अंतिम आरती व पट बंद

प्रमुख उत्सव और पर्व

श्री बिरजा क्षेत्र में वर्षभर धार्मिक उल्लास बना रहता है:

  • शरद नवरात्र (दुर्गा पूजा): यहाँ नवरात्र का पर्व अत्यंत भव्यता से मनाया जाता है। सोलह दिनों तक चलने वाली 'षोडशोपचार पूजा' यहाँ का मुख्य आकर्षण है। सप्तमी, अष्टमी और नवमी के दिन लाखों श्रद्धालु देश-विदेश से दर्शन हेतु आते हैं।
  • रथ यात्रा (बिरजा रथ): महाप्रभु जगन्नाथ की तर्ज पर यहाँ भी देवी बिरजा की रथ यात्रा निकाली जाती है जिसमें माता नगर भ्रमण करती हैं।
  • मकर संक्रांति और महाशिवरात्रि: इन पर्वों पर वैतरणी नदी में स्नान और पितृ तर्पण का विशेष विधान है।

संपूर्ण यात्रा गाइड (कैसे पहुंचें?)

  • वायु मार्ग (By Air): निकटतम हवाई अड्डा भुवनेश्वर का बीजू पटनायक अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा (BBI) है, जो जाजपुर से लगभग 110 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ से टैक्सी या बस द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है।
  • रेल मार्ग (By Rail): निकटतम प्रमुख रेलवे स्टेशन 'जाजपुर केन्दुझर रोड' (JJKR) है, जो हावड़ा-चेन्नई मुख्य मार्ग पर स्थित है। यहाँ से मंदिर की दूरी लगभग 30 किलोमीटर है, जिसके लिए ऑटो, कैब और लोकल बसें प्रचुर मात्रा में मिलती हैं।
  • सड़क मार्ग (By Road): राष्ट्रीय राजमार्ग 16 (NH-16) के माध्यम से जाजपुर सड़क मार्ग से बेहतरीन तरीके से जुड़ा हुआ है। ओडिशा राज्य सड़क परिवहन निगम (OSRTC) की बसें भुवनेश्वर, कटक और बालेश्वर से नियमित रूप से चलती हैं।

आवास और तीर्थयात्री सुविधाएं

जाजपुर में श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए मंदिर ट्रस्ट द्वारा संचालित विश्राम गृह (Dharamshala) और आधुनिक होटल उपलब्ध हैं। इसके अलावा:

  • भोजन प्रसादम: मंदिर परिसर के निकट स्थानीय पुजारियों और ट्रस्ट द्वारा भक्तों के लिए स्वच्छ महाप्रसाद की उत्तम व्यवस्था की जाती है।
  • पिंडदान सुविधाएं: नाभि गया घाट पर वैतरणी नदी के किनारे पितृ कर्म और पिंडदान कराने के लिए अनुभवी पंडे और कर्मकांडी ब्राह्मण उपलब्ध रहते हैं।
  • लॉकर और सुरक्षा: मंदिर के बाहर जूते-चप्पल और इलेक्ट्रॉनिक सामान रखने के लिए सुरक्षित काउंटर बने हुए हैं।

महत्वपूर्ण नियम व दिशा-निर्देश

मंदिर प्रवेश से पूर्व पारंपरिक भारतीय परिधान पहनना अनिवार्य माना जाता है। गर्भगृह के अंदर फोटोग्राफी पूर्णतः प्रतिबंधित है। दर्शन के समय अपनी और सामान की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखें। एकादशी और नवरात्र के दिनों में यहाँ भारी भीड़ होती है, अतः कतार व्यवस्था का पालन करें।

माँ बिरजा देवी शक्तिपीठ का पौराणिक इतिहास और नाभि गया का आध्यात्मिक रहस्य

ओडिशा के जाजपुर जिले में वैतरणी नदी के तट पर स्थित श्री बिरजा देवी शक्तिपीठ भारतीय सनातन संस्कृति और शाक्त परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और जाग्रत केंद्र है। पुराणों के अनुसार, जब भगवान शिव सती के मृत शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे, तब ब्रह्मांड को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के अंगों को विभाजित किया था। इसी क्रम में माता सती की नाभि इस पवित्र भूमि पर गिरी थी, जिसके कारण इस क्षेत्र को 'नाभि गया' के नाम से भी जाना जाता है। स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण और अन्य प्रमुख ग्रंथों में इस पावन क्षेत्र का वर्णन 'बिरजा क्षेत्र' या 'विजा क्षेत्र' के रूप में मिलता है, जो काशी और कुरुक्षेत्र के समान ही मोक्षदायिनी और पवित्र माना गया है।

यहाँ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह शक्तिपीठ होने के साथ-साथ पितृ कर्म और पिंडदान के लिए गयाजी के समान ही सर्वोच्च स्थान माना गया है। वैतरणी नदी के तट पर स्थित होने के कारण यहाँ स्नान और पिंडदान करने से पूर्वजों को सीधा वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है और कुल की सात पीढ़ियों तक के पितृ तृप्त हो जाते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, स्वयं भगवान ब्रह्मा ने यहाँ अश्वमेध यज्ञ किया था, जिसके उपलक्ष्य में उन्होंने माँ बिरजा को प्रकट किया था। इस क्षेत्र की पवित्रता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ साक्षात देवी विरजा 'गिरिजा' रूप में विराजमान हैं, जो भक्तों के सभी दुखों और बंधनों को क्षण भर में दूर कर देती हैं।

माता बिरजा का यह रूप अत्यंत दुर्लभ और अद्वितीय है। गर्भगृह में माँ बिरजा की जो मूर्ति स्थापित है, वह महिषासुर मर्दिनी के रूप में है, लेकिन उनकी मुद्रा अन्य सामान्य रूपों से भिन्न है। देवी अपने एक हाथ से महिषासुर के मुंह को चीर रही हैं और दूसरे हाथों से अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए हैं। उनके पैरों के पास उनका वाहन सिंह और उनके भक्त महिषासुर का चित्रण मिलता है। इस मूर्ति की एक और विशेषता यह है कि माता के मुकुट में गणेश, शिवलिंग और crescent moon (चंद्रमा) उत्कीर्ण हैं, जो त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) की एकता और शक्ति के सर्वोच्च प्रतीक को दर्शाते हैं। दर्शन मात्र से साधक को कुंडलिनी जागरण और आत्मिक शांति का अनुभव होता है।

नाभि गया क्षेत्र में पिंडदान और तर्पण करने से पितरों को अगाध शांति मिलती है। वैतरणी नदी का यह तट गंगा के समान ही पावन और पाप-विनाशक माना गया है, जहाँ साक्षात माँ बिरजा अपने भक्तों के समस्त कष्टों का निवारण करती हैं।

मंदिर की वास्तुकला, दैनिक दर्शन समय और प्रमुख उत्सव

श्री बिरजा देवी मंदिर की वास्तुकला कलिंग स्थापत्य कला का एक उत्कृष्ट और प्राचीन नमूना है। मंदिर का मुख्य शिखर नागर शैली में निर्मित है, जिसके चारों ओर कई छोटे-छोटे उप-मंदिर और प्राचीन देवी-देवताओं के विग्रह स्थापित हैं। मंदिर परिसर के भीतर ही भगवान शिव के कई प्राचीन मंदिर जैसे कोटितीर्थश्वर, विरंचेस्वर और स्वर्णजलेश्वर महादेव विराजमान हैं, जिनकी परिक्रमा किए बिना बिरजा देवी की यात्रा अधूरी मानी जाती है। मंदिर की दीवारों पर की गई नक्काशी और प्राचीन मूर्तियां ओडिशा की समृद्ध सांस्कृतिक और शिल्प कला की कहानी बयां करती हैं, जो सदियों के आक्रमणों और समय के थपेड़ों को झेलते हुए आज भी अपनी मूल भव्यता के साथ खड़ी हैं।

मंदिर में दर्शन और पूजन का समय सुबह से लेकर देर रात तक निर्धारित किया गया है, ताकि दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो। प्रातःकाल मंगला आरती के साथ मंदिर के पट भक्तों के लिए खोल दिए जाते हैं, जिसके बाद महास्नान, षोडशोपचार पूजा और श्रृंगार होता है। दोपहर में भोग अर्पित करने के बाद मंदिर कुछ समय के लिए बंद होता है और फिर संध्या आरती के साथ दोबारा खुलता है। विशेष अवसरों पर मंदिर का प्रशासन और पंडा समाज भक्तों की भारी भीड़ को नियंत्रित करने के लिए विशेष प्रबंध करता है, ताकि प्रत्येक श्रद्धालु माता के सुगमता से दर्शन कर सके।

पूजा / सेवा का नाम समय / अवधि विशेष विवरण
मंगला आरती व कपाट खुलना प्रातः 06:00 बजे दिन की पहली आरती, जिसमें माता का दिव्य श्रृंगार होता है।
मध्याह्न भोग एवं दर्शन दोपहर 12:30 बजे से 03:00 बजे तक माता को पारंपरिक ओडिया व्यंजनों का भोग लगाया जाता है।
संध्या आरती सायंकाल 07:00 बजे दीपों की रोशनी और मंत्रोच्चार के साथ भव्य आरती।
रात्रि शयन आरती रात्रि 09:30 बजे दिनभर के दर्शन के पश्चात मंदिर के कपाट बंद करने की प्रक्रिया।

श्री बिरजा देवी मंदिर में वर्ष भर कई भव्य उत्सव मनाए जाते हैं, जिनमें 'बिरजा क्षेत्र महोत्सव' और 'दुर्गा पूजा' का विशेष महत्व है। शारदीय नवरात्रि के दौरान यहाँ कातात्यायनी और महिषासुर मर्दिनी रूप में माँ की 16 दिनों तक पूजा होती है, जिसे 'षोडश दिवसीय पूजा' कहा जाता है। इस दौरान यहाँ ओडिशा के अलावा बंगाल, झारखंड और आंध्र प्रदेश से भी लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इसके अलावा रथ यात्रा और मकर संक्रांति के अवसरों पर भी विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं, जिनमें भाग लेने से जीवन के समस्त पापों का नाश होता है और साधक को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

संपूर्ण यात्रा गाइड: कैसे पहुँचें, ठहरने की व्यवस्था और मार्ग की जानकारी

जाजपुर-केन्दुझर रोड (Jajpur Keonjhar Road) रेलवे स्टेशन इस शक्तिपीठ का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन है, जो हावड़ा-चेन्नई मुख्य रेल मार्ग पर स्थित है। भारत के प्रमुख महानगरों जैसे कोलकाता, दिल्ली, चेन्नई, बेंगलुरु और भुवनेश्वर से यहाँ के लिए नियमित ट्रेनें उपलब्ध हैं। रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी लगभग 30 किलोमीटर है, जहाँ पहुँचने के लिए ऑटो-रिक्शा, टैक्सी और ओडिशा राज्य सड़क परिवहन निगम (OSRTC) की बसें आसानी से मिल जाती हैं। यदि आप हवाई मार्ग से आना चाहते हैं, तो निकटतम हवाई अड्डा भुवनेश्वर का बीजू पटनायक अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा (BBI) है, जो जाजपुर से लगभग 125 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

सड़क मार्ग द्वारा यात्रा करने वालों के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग 16 (NH-16) इस क्षेत्र को भुवनेश्वर, कटक और कोलकाता से जोड़ता है। जाजपुर शहर के भीतर और मंदिर के आसपास श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए उत्तम व्यवस्था उपलब्ध है। यहाँ कई सरकारी विश्राम गृह, बजट होटल, आधुनिक यात्री निवास और पारंपरिक धर्मशालाएँ उचित दरों पर मिल जाती हैं। पिंडदान और तर्पण के लिए यहाँ स्थानीय पुरोहितों (पांडा समाज) की सहायता ली जा सकती है, जो वेदों और शास्त्रों के अनुसार पूर्ण विधि-विधान से पितृ कर्म संपन्न कराते हैं।

  1. सर्वश्रेष्ठ यात्रा का समय: अक्टूबर से मार्च के बीच का समय (शारदीय नवरात्रि और सर्दियों के दिन) मौसम के लिहाज से सबसे उत्तम माना जाता है।
  2. पिंडदान के लिए आवश्यक सामग्री: काले तिल, जौ, कुश, सफेद वस्त्र और पारंपरिक पूजन सामग्री स्थानीय बाजारों या पंडाजी से आसानी से मिल जाती है।
  3. खानपान: मंदिर के आसपास सात्विक भोजन और पारंपरिक महाप्रसाद की बेहतरीन व्यवस्था उपलब्ध है।
  4. स्वास्थ्य और सुरक्षा: गर्मियों के दिनों में यहाँ तापमान अधिक हो सकता है, अतः हल्के सूती वस्त्र और पर्याप्त मात्रा में जल साथ रखें।

यह शक्तिपीठ केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह ऊर्जा और चेतना का वह पुंज है जहाँ मनुष्य अपने पूर्वजों के ऋण से मुक्त होकर आत्मिक शांति प्राप्त करता है। वैतरणी नदी के पावन तट पर स्थित नाभि गया और माँ बिरजा के चरणों में हाजिरी लगाना प्रत्येक सनातनधर्मी के जीवन का एक अत्यंत सौभाग्यपूर्ण क्षण होता है। यदि आप मोक्ष, शांति और माँ की असीम कृपा की कामना रखते हैं, तो जाजपुर का यह ऐतिहासिक शक्तिपीठ आपकी यात्रा की सूची में अवश्य होना चाहिए।

तीर्थ यात्रा विधि

मंदिर दर्शन व पूजा के 4 सरल चरण

प्रभु के अलौकिक दर्शन का पूर्ण फल प्राप्त करने हेतु आवश्यक नियम

१. शुद्ध भाव व स्नान

दर्शन से पूर्व पवित्र भाव से स्नान कर सात्विक वस्त्र धारण करें।

२. आरती समय ज्ञान

मंगला, भोग अथवा शयन आरती के समय उपस्थित होकर दर्शन करें।

३. नैवेद्य व अर्पण

तुलसी, पुष्प, धूप, दीप व नैवेद्य श्रद्धापूर्वक प्रभु चरणों में अर्पित करें।

४. परिक्रमा व ध्यान

गर्भगृह की विधिवत परिक्रमा कर शांत भाव से प्रभु का ध्यान करें।

संदर्भ-आधारित एवं संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

भक्तिलोक पर उपलब्ध सभी मंदिर दर्शन समय, आरती सारिणी व इतिहास की जानकारी संबंधित देवस्थानम ट्रस्ट, प्रमाणिक धार्मिक पुस्तकों एवं तीर्थ यात्रियों के अनुभवों के आधार पर निरंतर अद्यतन की जाती है।

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