भक्ति रस काव्य व भजन

ऐसो को उदार जग माहीं - तुलसीदास जी का भजन लिरिक्स और अर्थ

13 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
आकार:
कंट्रास्ट:

भजन का परिचय, भाव एवं भक्ति संदर्भ

सनातन संस्कृति और हिंदी साहित्य के आकाश में महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी का नाम एक ऐसे अनन्य भक्त, मर्मज्ञ संत और महाकवि के रूप में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है, जिनकी वाणी ने जन-जन को भगवान श्री राम के चरणों से जोड़ने का अद्भुत कार्य किया है। तुलसीदास जी केवल एक उत्कृष्ट रचयिता ही नहीं थे, अपितु वे शरणागत वत्सलता और अनन्य भक्ति की जीवंत प्रतिमूर्ति थे। उनके द्वारा रचित ग्रंथ 'विनय पत्रिका' और अन्य स्तोत्र-पदों में उनकी आर्त पुकार और प्रभु श्री राम के प्रति अगाध प्रेम स्पष्ट रूप से झलकता है। प्रस्तुत भजन ऐसो को उदार जग माहीं तुलसीदास जी की उसी शरणागति भावना और भगवान श्री राम की अकारण करुणा का सबसे जीवंत दस्तावेज है। इस पद में कवि ने संसार के समस्त दीन-दुखियों, पतितों और शरणार्थियों के लिए भगवान राम के असीम उदारता और सहज सुलभ स्वभाव का बहुत ही मार्मिक और शास्त्रीय ढंग से वर्णन किया है।

इस भजन का मुख्य केंद्रीय भाव भगवान श्रीराम की शरणागत-वत्सलता और दीनदयालुता पर आधारित है। गोस्वामी जी इस पद के माध्यम से यह संदेश देना चाहते हैं कि इस संपूर्ण चराचर जगत में भगवान श्री राम के समान उदार, दयालु और परोपकारी दूसरा कोई नहीं है। संसार के अन्य देवी-देवता या भौतिक साधन मनुष्यों से कठोर साधना, यज्ञ, योग, तपस्या और जप-तप की मांग करते हैं, तब जाकर कहीं आत्मिक शांति या मुक्ति की प्राप्ति होती है। परंतु मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की कृपा इतनी सहज और अहैतुकी है कि वे बिना किसी कठिन सेवा या अनुष्ठान के ही केवल दीन भाव और शरणागति मात्र से अपने भक्तों पर द्रवीभूत हो जाते हैं। यह भजन उन तमाम साधकों और भक्तों के लिए एक महान संबल है जो अपनी कमजोरियों, पापों और सांसारिक बंधनों से त्रस्त होकर भगवान के चरणों में आश्रय पाना चाहते हैं। तुलसीदास जी ने इस पद के माध्यम से यह प्रमाणित कर दिया है कि कलियुग में प्रभु का नाम स्मरण और उनकी शरण ही एकमात्र भवसागर से पार लगाने वाली नौका है।

भक्ति साहित्य के इतिहास में इस प्रकार के पदों का विशेष स्थान रहा है। जब-जब मानव मन संशय, निराशा और मोह-माया के अंधकार से घिरता है, तब-तब तुलसीदास जी के ऐसे पद प्रकाश पुंज बनकर मार्ग दिखाते हैं। इस भजन को गाते समय साधक के मन में अहंकार का शमन होता है और प्रभु के प्रति अनन्य समर्पण का भाव स्वतः जागृत होता है। शास्त्रीय दृष्टि से यदि देखें तो यह पद शांत रस और भक्ति रस का अद्भुत संगम है, जहाँ कवि अपनी दीनता का स्वीकार करते हुए प्रभु की महानता का गुणगान कर रहा है। आज भी देश-विदेश के राम भक्तों, संतों और संगीत प्रेमियों द्वारा इस भजन को अत्यंत श्रद्धा और भाव के साथ गाया व सुना जाता है। यह भजन केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, अपितु एक आर्त हृदय की वह पुकार है जो सीधे परमात्मा के सिंहासन को स्पंदित करती है।

सम्पूर्ण मूल भजन लिरिक्स (हिंदी पाठ)

ऐसो को उदार जग माहीं।
बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर, राम सरिस कोउ नाहीं॥

जो गति जोग बिराग जततन करि, नहिं पावत मुनि ग्यानी।
सो गति देत गीत गध्रवहिं, अपने अंक समांनी॥

सब कौ साजि सुता सबही की, सुनि गति सुधि बिसराई।
ऐसौ कुटिल कपूत कपट बस, ताकी ओर न ताकी॥

कह तुलसी प्रभु नाथ कृपा करि, अपनी भगति बड़ाई।
अब मोहि छोड़ि और की आसन, परिहरि प्रीति बढ़ाई॥

पदवार सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक संदेश

गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित इस पवित्र भजन की एक-एक पंक्ति में अत्यंत गहरा आध्यात्मिक रहस्य और दार्शनिक सार छिपा हुआ है। आइए इस भजन के प्रत्येक पद के सरल हिंदी भावार्थ को समझें और इसके मर्म तक पहुँचने का प्रयास करें। भजन की पहली पंक्ति है - 'ऐसो को उदार जग माहीं। बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर, राम सरिस कोउ नाहीं॥' इसका अर्थ है कि इस पूरे संसार में ऐसा उदार और दयालु कौन है? जो बिना किसी बड़ी सेवा या अनुष्ठान के ही केवल दीन-दुखियों पर द्रवित हो जाए, भगवान श्री राम के समान ऐसा परोपकारी और करुणावान दूसरा कोई नहीं है। संसार के लोग या अन्य प्रणालियाँ कुछ पाने के बाद ही उपकार करती हैं, किंतु प्रभु राम तो अहैतुकी कृपा के सागर हैं।

इसके अगले चरण में तुलसीदास जी ज्ञान, योग और तपस्या की सीमाओं का उल्लेख करते हुए कहते हैं - 'जो गति जोग बिराग जततन करि, नहिं पावत मुनि ग्यानी। सो गति देत गीत गध्रवहिं, अपने अंक समांनी॥' यहाँ तुलसी जी कहते हैं कि बड़े-बड़े मुनि, ज्ञानी और संत जन जीवनभर कठिन योग, वैराग्य, संयम और अनेक प्रकार के यत्न करते हैं, तब जाकर उन्हें जो परम गति या मोक्ष प्राप्त होता है, वही दुर्लभ गति भगवान श्री राम ने जटायु जैसे गिद्ध और शबरी जैसे साधारण जीवों को अपनी गोद में बिठाकर सहज ही प्रदान कर दी। इसका तात्पर्य यह है कि भगवान को कठिन तपस्या से अधिक भक्त का निर्मल प्रेम और समर्पण प्रिय है।

भजन के अंतिम चरणों में तुलसीदास जी अपनी और संपूर्ण संसार की स्थिति का वर्णन करते हुए अत्यंत विनम्र भाव से कहते हैं - 'कह तुलसी प्रभु नाथ कृपा करि, अपनी भगति बड़ाई। अब मोहि छोड़ि और की आसन, परिहरि प्रीति बढ़ाई॥' तुलसीदास जी अपने आराध्य से प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु! आपने अपनी शरणागत-वत्सलता और भक्ति की महानता को बनाए रखते हुए मुझ जैसे पतित और कुटिल प्राणी को भी अपनी शरण में लिया है। अब हे नाथ! मेरी यह विनती है कि मुझे छोड़कर किसी अन्य की आशा या प्रलोभन में न फँसाऊँ, बल्कि केवल आपके चरणों में ही मेरी सच्ची प्रीति और निष्ठा निरंतर बढ़ती रहे। यह संदेश हर साधक को यह सिखाता है कि जीवन में अन्य सभी आश्रय छोड़कर केवल एक भगवान के चरणों में ही चित्त लगाना चाहिए।

गायन समय, लाभ एवं श्रवण महात्म्य

भजनों और संकीर्तन का हमारे मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। गोस्वामी तुलसीदास जी के पदों का गायन और श्रवण करने से न केवल चित्त को शांति मिलती है, बल्कि नकारात्मक ऊर्जा का भी शमन होता है। इस पवित्र भजन को गाने या सुनने के लिए ब्रह्म मुहूर्त (प्रातःकाल का समय) या संध्या बेला को सबसे उत्तम माना गया है। जब कोई साधक एकाग्रचित्त होकर प्रातःकाल उठकर इस भजन का गान करता है, तो उसके पूरे दिन की शुरुआत सकारात्मक ऊर्जा, भक्ति और भगवान राम के स्मरण के साथ होती है।

इस भजन के श्रवण और गायन से मिलने वाले आध्यात्मिक लाभों की कोई सीमा नहीं है। सबसे पहला और बड़ा लाभ यह है कि इसके निरंतर अभ्यास से मनुष्य के भीतर से अहंकार और हीनभावना दोनों समाप्त हो जाते हैं। जब व्यक्ति यह महसूस करता है कि भगवान राम बिना किसी भेदभाव के सभी दीनों पर कृपा करने वाले हैं, तो उसका आत्मविश्वास और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास मजबूत होता है। आधुनिक जीवन की तनावपूर्ण भागदौड़ में जब मानसिक अशांति बढ़ जाती है, तब ऐसे पारंपरिक संकीर्तन और भजन मानसिक चिकित्सा का कार्य करते हैं। नियमित रूप से तुलसीदास जी के पदों का पाठ करने से बुद्धि निर्मल होती है, वाणी में मिठास आती है और परिवार में आध्यात्मिक वातावरण का सृजन होता है।

साधक के लिए विशेष मार्गदर्शन: इस भजन को गाते समय शब्दों के उच्चारण के साथ-साथ उनके आंतरिक भाव पर विशेष ध्यान देना चाहिए। जब आप 'बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर' पंक्ति का उच्चारण करें, तो अपने हृदय में समाज के दीन-दुखियों के प्रति करुणा का भाव अवश्य जागृत करें। यही सच्ची रामभक्ति है जिसे तुलसीदास जी ने अपने संपूर्ण साहित्य में स्थापित किया है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 28 Sep 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!