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भगवान श्री हरि कृपा · भगवान श्री नरसिंह (श्री हरि विष्णु के चतुर्थ अवतार) Mantra

श्री नरसिंह मंत्र - ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् अमोघ रक्षा कवच

भगवान नरसिंह के अमोघ उग्रं वीरं महाविष्णुं अनुष्टुप मंत्र का शुद्ध उच्चारण, पद-दर-पद अर्थ, विनियोग, न्यास एवं संपूर्ण पूजन विधि पढ़ें।

इष्ट देव भगवान श्री नरसिंह (श्री हरि विष्णु के चतुर्थ अवतार)
शास्त्र स्रोत वैदिक सनातन धर्मग्रंथ एवं संहिता
उत्तम जप समय ब्रह्म मुहूर्त, संध्या काल (प्रदोष काल) या नृसिंह जयंती
अनुशंसित माला तुलसी की माला या लाल चन्दन / रुद्राक्ष की माला

मूल संस्कृत महामंत्र

शुद्ध शास्त्रीय पाठ एवं उच्चारण स्वरूप

॥ ॐ तत्सत् · सिद्ध वैदिक महामंत्र ॥
ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥
सरल हिंदी भावार्थ:

मैं उन परम पराक्रमी, महाविष्णु स्वरूप, प्रदीप्त अग्नि के समान देदीप्यमान, सर्वव्यापी, अत्यंत भयानक एवं साथ ही भक्तों के लिए कल्याणकारी, तथा मृत्यु की भी मृत्यु स्वरूप भगवान नृसिंह को भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ।

विस्तृत आध्यात्मिक व्याख्या एवं शास्त्रीय विवेचन

मंत्र का गूढ़ रहस्य एवं साधना विधि

मंत्र का उद्गम एवं वैदिक पृष्ठभूमि

वैदिक एवं पौराणिक परंपरा में भगवान श्री नरसिंह, देवाधिदेव श्रीहरि विष्णु के चतुर्थ अवतार माने गए हैं। हिरण्यकशिपु जैसे महाबलशाली असुर राज के अत्याचारों से धर्म और भक्त प्रह्लाद की रक्षा करने के लिए भगवान विष्णु ने आधा नर (मनुष्य) और आधा सिंह (केसरी) का विलक्षण एवं अत्यंत उग्र स्वरूप धारण किया था। तंत्र शास्त्र, ऋग्वेद की खील ऋचाओं, तथा विशेष रूप से नृसिंह तापनीय उपनिषद् में इस महामंत्र का विस्तृत एवं अत्यंत गूढ़ वर्णन प्राप्त होता है।

यह मंत्र केवल एक प्रार्थना नहीं है, अपितु यह नृसिंह अनुष्टुप् महामंत्र के नाम से जाना जाता है। इसमें ३२ (32) अक्षर (बीजाक्षर एवं वर्ण) विद्यमान हैं। वैदिक छंद शास्त्र के अनुसार अनुष्टुप् छंद में ३२ अक्षर होते हैं। नृसिंह तापनीय उपनिषद् में ब्रह्मा जी ने देवताओं को उपदेश देते हुए कहा है कि यह मंत्र समस्त मंत्रों का राजा (मंत्रराज) है। जो साधक इस ३२ अक्षरीय महामंत्र का आश्रय लेता है, वह संसार के समस्त भयों, बंधनों, पापों, रोगों और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।

तद्द्वा एतन्नारसिंह मानुष्टुभं महामन्त्रं भवति। येन देवा अभवन् येनासुरा पराभवन्॥
— (नृसिंह पूर्वतापनीय उपनिषद्)

अर्थात् इस नृसिंह अनुष्टुप् महामंत्र के प्रभाव से ही देवताओं ने अमरत्व और विजय प्राप्त की तथा असुर पराभूत हुए। यह मंत्र एक अमोघ रक्षा कवच के रूप में कार्य करता है, जो साधक के चारों ओर दिव्य प्रकाश का एक अभेद्य सुरक्षा चक्र निर्मित कर देता है।

मूल शुद्ध मंत्र एवं आंग्ल उच्चारण

मंत्र की पूर्ण ऊर्जा और उसका फल तभी प्राप्त होता है जब उसका उच्चारण पूर्णतः शुद्ध, स्पष्ट और प्रामाणिक हो। नीचे मूल संस्कृत देवनागरी पाठ तथा आंग्ल लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

देवनागरी मूल पाठ

ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥

अंग्रेजी लिप्यंतरण

पद-दर-पद अर्थ एवं आध्यात्मिक भावार्थ

नृसिंह अनुष्टुप् मंत्र का प्रत्येक पद अपने आप में अगाध दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थ समेटे हुए है। इसमें भगवान नरसिंह के परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाले लेकिन वास्तव में परिपूर्ण गुणों का अद्भुत संतुलन देखने को मिलता है—एक ओर उनका रूप शत्रुओं के लिए उग्र और भीषण है, तो दूसरी ओर अपने अनन्य भक्तों के लिए वे भद्र (अत्यंत दयालु) हैं।

संस्कृत पद शाब्दिक अर्थ आध्यात्मिक एवं गूढ़ भावार्थ
ॐ परमब्रह्म का वाचक प्रणवसमस्त ब्रह्मांड की मूल ध्वनि, जो त्रिदेवों एवं अनादि परब्रह्म का प्रतीक है।
उग्रम् अत्यंत उग्र व प्रचंडजो अधर्म, पाप और अज्ञान के विनाश के लिए प्रचंड रूप धारण करते हैं।
वीरम् परम पराक्रमी व शूरवीरजिनके शौर्य की कोई सीमा नहीं है, जो समस्त शक्तियों के परम स्रोत हैं।
महाविष्णुम् सर्वव्यापी परमेश्वर श्रीहरिजो संपूर्ण जगत में व्याप्त हैं और समस्त ब्रह्मांड के पालनकर्ता हैं।
ज्वलन्तम् अग्नि समान देदीप्यमानजिनकी दिव्य कांति अनंत सूर्यों और अग्नि की ज्वालाओं के समान प्रदीप्त है।
सर्वतोमुखम् चारों ओर मुख/नेत्र वालेजो सर्वद्रष्टा हैं, जिनकी दृष्टि दसों दिशाओं और भूत-भविष्य-वर्तमान पर है।
नृसिंहम् नर-सिंह स्वरूपजो न पूर्ण मनुष्य हैं और न पूर्ण पशु, बल्कि धर्म-रक्षा हेतु दिव्य अवतारी रूप हैं।
भीषणम् अत्यंत भयानक व भयप्रददुष्टों, असुरों, और नकारात्मक शक्तियों के लिए जो साक्षात काल के समान भयानक हैं।
भद्रम् कल्याणकारी व कृपासिन्धुजो अपने निर्दोष भक्तों (जैसे प्रह्लाद) के लिए अत्यंत सौम्य, कृपालु व रक्षक हैं।
मृत्युमृत्युम् मृत्यु की भी मृत्यु करने वालेजो साक्षात काल और मृत्यु को भी नियंत्रित करते हैं, तथा अमरत्व प्रदान करते हैं।
नमाम्यहम् नमामि + अहम् (मैं प्रणाम करता हूँ)मैं अपने अहंकार को त्यागकर पूर्ण समर्पण भाव से नतमस्तक होकर नमन करता हूँ।

विस्तृत आध्यात्मिक व्याख्या

यह मंत्र साधक को सिखाता है कि ईश्वर की शक्ति दोधारी है। जब संसार में अधर्म और अहंकार का अत्याचार बढ़ता है (जैसा हिरण्यकशिपु के काल में हुआ), तब परमात्मा 'उग्रम्', 'वीरम्', 'ज्वलन्तम्' और 'भीषणम्' बनकर अधर्म को भस्म कर देते हैं। परंतु, वही परमात्मा अपने भक्त के लिए 'भद्रम्' अर्थात् मंगलकारी हैं। वे 'मृत्युमृत्युम्' हैं, जिसका तात्पर्य यह है कि जो साधक उनकी शरण में जाता है, उसे न तो किसी भौतिक शत्रु का भय रहता है और न ही अकाल मृत्यु या काल का भय रहता है।

विनियोग, न्यास एवं ध्यान विधि

किसी भी वैदिक या तांत्रिक अनुष्ठान को सिद्ध करने के लिए विनियोग, करन्यास, अंगन्यास और ध्यान श्लोक का विधान अत्यंत आवश्यक माना गया है। यह साधना की आंतरिक ऊर्जा को जाग्रत करने का शास्त्रीय मार्ग है।

१. विनियोग

दाहिने हाथ में जल लेकर निम्नलिखित संकल्प मंत्र का पाठ करें और जल को भूमि पर छोड़ दें:

अस्य श्री नृसिंह अनुष्टुप् महामंत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्री नृसिंहो देवता, क्ष्रौं बीजम्, स्वाहा शक्तिः, फट् कीलकम्, श्री नृसिंह प्रसाद सिद्ध्यर्थे सर्व-बाधा निवारणार्थे जपे विनियोगः॥

२. करन्यास

अपनी अंगुलियों में मंत्र की दिव्य शक्तियों को स्थापित करने के लिए करन्यास करें:

  • ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं अंगुष्ठाभ्यां नमः। (दोनों अंगूठों का स्पर्श करें)
  • ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् तर्जनीभ्यां नमः। (तर्जनी अंगुली का स्पर्श करें)
  • नृसिंहं भीषणं भद्रं मध्यमाभ्यां नमः। (मध्यमा अंगुली का स्पर्श करें)
  • मृत्युमृत्युं अनामिकाभ्यां नमः। (अनामिका अंगुली का स्पर्श करें)
  • नमाम्यहम् कनिष्ठिकाभ्यां नमः। (कनिष्ठिका अंगुली का स्पर्श करें)
  • ॐ उग्रं वीरं... करतल करपृष्ठाभ्यां नमः। (दोनों हथेलियों के आगे और पीछे के भाग का स्पर्श करें)

३. अंगन्यास

  • ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं हृदयाय नमः। (हृदय को स्पर्श करें)
  • ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् शिरसे स्वाहा। (सिर को स्पर्श करें)
  • नृसिंहं भीषणं भद्रं शिखायै वषट्। (शिखा का स्पर्श करें)
  • मृत्युमृत्युं कवचाय हुम्। (दोनों हाथों से कंधों/शरीर का कवच रूप में स्पर्श करें)
  • नमाम्यहम् नेत्रत्रयाय वौषट्। (दोनों नेत्रों एवं आज्ञा चक्र/तीसरे नेत्र का स्पर्श करें)
  • ॐ उग्रं वीरं... करतल अस्त्राय फट्। (दाहिने हाथ की तर्जनी व मध्यमा से बाएं हाथ की हथेली पर ताली बजाएं)

४. ध्यान श्लोक

न्यास के पश्चात् अपने हृदय कमल में भगवान नरसिंह के भव्य एवं तेजोमय स्वरूप का ध्यान करें:

ध्यायेन्नृसिंहं तरुणार्कभासं विद्याद्वसंतं शरदिंदुगौरम्।
किरीटहारैः कटकैः उपेतं चक्राब्जशंखान् दधतं कराग्रैः॥

ध्यान का भावार्थ: मैं उन भगवान श्री नरसिंह का ध्यान करता हूँ, जिनकी कांति मध्याह्न के प्रदीप्त सूर्य के समान तेजोमय है, जो अत्यंत कांतिमान हैं। उन्होंने अपने मस्तक पर दिव्य किरीट (मुकुट), गले में सुंदर हार तथा हाथों में कंकन धारण किए हुए हैं। वे अपने चार कर-कमलों में चक्र, कमल, शंख और गदा/अभय मुद्रा धारण किए हुए हैं। ऐसे करुणामय व महाशक्तिशाली प्रभु मेरे हृदय में विराजमान हों।

जप विधि, माला, दिशा एवं शुभ मुहूर्त

शास्त्रों में नृसिंह मंत्र की साधना के लिए विशेष नियम और समय निर्धारित किए गए हैं, जिनका पालन करने से साधक को त्वरित फल की प्राप्ति होती है:

  1. दिशा : जप के समय साधक का मुख पूर्व दिशा या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।
  2. आसन : लाल रंग का सूती या ऊनी आसन सर्वोत्तम है। कुशा का आसन भी अत्यंत पवित्र माना गया है।
  3. माला : जप के लिए तुलसी की माला या लाल चंदन की माला अथवा रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करें।
  4. उत्तम समय :
    • संध्या काल (प्रदोष काल): भगवान नरसिंह का प्राकट्य सूर्यास्त के समय हुआ था, अतः सायंकाल का समय सर्वश्रेष्ठ है।
    • ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः 4:00 बजे से 6:00 बजे का समय साधना के लिए अत्यंत अनुकूल है।
    • विशेष तिथियां: नृसिंह जयंती, स्वाति नक्षत्र, शनिवार, मंगलवार, और एकादशी।
  5. जप संख्या : नित्य साधना में कम से कम १ माला (१०८ बार) जप अवश्य करें। विशेष रक्षा अनुष्ठान के लिए ११ माला या ३२ माला प्रतिदिन करने का विधान है। ३२ हजार या १,२५,००० जप करने से मंत्र का पुरश्चरण सिद्ध होता है।

विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति

शास्त्रों के अनुसार जो साधक नित्य प्रति श्रद्धा और नियमपूर्वक श्री नृसिंह अनुष्टुप् मंत्र का पाठ करता है, उसे निम्नलिखित अलौकिक एवं भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • समस्त भयों का समूल नाश: यह मंत्र मानसिक भय, अकारण चिंता, दुःस्वप्न, और मृत्यु के भय को तुरंत समाप्त कर साधक को निर्भय बनाता है।
  • तंत्र-मंत्र एवं बुरी नजर से रक्षा: यदि किसी व्यक्ति पर अभिचार कर्म, भूत-प्रेत बाधा, या नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव हो, तो इस मंत्र के जप से वह तुरंत प्रभावहीन हो जाता है। यह एक सर्वशक्तिमान अमोघ रक्षा कवच की तरह कार्य करता है।
  • शत्रु बाधा एवं न्यायालयीन विजय: गुप्त शत्रुओं, प्रतिस्पर्धियों और अदालती मुकदमों में साधक को विजय प्राप्त होती है। शत्रु स्वयं परास्त या मित्रवत हो जाते हैं।
  • अकाल मृत्यु व असाध्य रोगों से सुरक्षा: 'मृत्युमृत्युं' पद के प्रभाव से साधक की अकाल मृत्यु (दुर्घटनाओं) से रक्षा होती है तथा गंभीर और असाध्य शारीरिक व्याधियों में राहत मिलती है।
  • आत्मिक एवं मानसिक बल: यह मंत्र साधक के भीतर प्रचंड ओज, तेज, आत्मविश्वास और निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि करता है।
  • आध्यात्मिक उन्नति: अंततः यह मंत्र साधक के पापकर्मों को नष्ट कर उसे विष्णु लोक की प्राप्ति और मोक्ष का मार्ग दिखाता है।

महत्वपूर्ण सावधानियां एवं नियम

चूंकि भगवान नरसिंह श्रीहरि का उग्र अवतार हैं, इसलिए इनकी साधना में सात्विकता और अनुशासन का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है:

  • पूर्ण सात्विकता: साधना काल के दौरान मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन और तामसिक पदार्थों का पूर्णतः त्याग करें।
  • आचार-विचार की शुद्धता: काम, क्रोध, लोभ, मोह और दूसरों के प्रति द्वेष भावना से दूर रहें। अपनी वाणी पर संयम रखें।
  • शुद्ध उच्चारण: संस्कृत वर्णों और मात्राओं का उच्चारण एकदम शुद्ध होना चाहिए। यदि आप उच्चारण में असमर्थ हैं, तो पहले किसी योग्य विद्वान से मंत्र सुनना और सीखना चाहिए।
  • भक्ति एवं विश्वास: यह मंत्र केवल कौतूहल या किसी को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से न जपें। भगवान नरसिंह भाव के भूखे हैं; प्रह्लाद जैसी निश्चल भक्ति ही उन्हें सर्वाधिक प्रिय है।
  • महिला साधकों हेतु नियम: महिलाएं भी इस मंत्र का जप कर सकती हैं, परंतु कठिन दिनों (मासिक धर्म) के दौरान जप पूरी तरह वर्जित रखें।

जाप के सिद्ध फल व सावधानियां

पुण्य लाभ एवं साधना के महत्वपूर्ण नियम

प्राप्त होने वाले पुण्य लाभ
समस्त भय, तंत्र-बाधा, शत्रु-दोष, भयानक रोगों एवं अकाल मृत्यु से पूर्ण संरक्षण व आत्मिक बल
साधना में ध्यान रखने योग्य नियम
पूर्ण सात्विकता, आचार-विचार की शुद्धता, स्पष्ट उच्चारण तथा क्रोध एवं तामसिक भोजन का पूर्ण त्याग अनिवार्य है।

मंत्र से जुड़े मुख्य प्रश्न व समाधान (FAQs)

श्रद्धालुओं द्वारा पूछे जाने वाले सामान्य प्रश्न

इस पावन मंत्र का जप ब्रह्म मुहूर्त, संध्या काल (प्रदोष काल) या नृसिंह जयंती में तुलसी की माला या लाल चन्दन / रुद्राक्ष की माला से १०८ बार करना सबसे शुभ व फलदायी माना गया है।
हाँ, मानसिक जप (मानस जप) को शास्त्रों में वाचिक जप से भी अधिक प्रभावशाली और फलदायी माना गया है। इसे आप शांत चित्त होकर कभी भी कर सकते हैं।
नियमित जप से अकाल मृत्यु व नकारात्मकता का भय समाप्त होता है, मानसिक शांति व सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और इष्टदेव की असीम कृपा प्राप्त होती है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख वेदों, उपनिषदों एवं सनातन धर्मग्रंथों के उपलब्ध संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा श्रद्धालुओं के मार्गदर्शन हेतु तैयार किया गया है।

मंत्र जप के ५ स्वर्णिम नियम
शुद्धता: स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण कर पवित्र आसन पर बैठें।
दिशा: पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके जप करना सर्वोत्तम है।
माला का नियम: जप करते समय माला पर तर्जनी उंगली का स्पर्श न होने दें।
एकाग्रता: मंत्र के शब्दों के भावार्थ का हृदय में निरंतर ध्यान करें।
नियमितता: प्रतिदिन निश्चित समय और संख्या में जप करने से सिद्धि मिलती है।
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