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भगवान शिव कृपा · भगवान शिव (महाकाल) Mantra

श्री महामृत्युंजय संजीवन मंत्र - ॐ हौं जूं सः माम् पालय पालय सः जूं हौं सम्पूर्ण आरोग्य विधान

श्री महामृत्युंजय संजीवन मंत्र (ॐ हौं जूं सः माम् पालय पालय) के संपूर्ण वैदिक विधान, जप विधि, अर्थ, न्यास और चमत्कारी लाभ जानें।

इष्ट देव भगवान शिव (महाकाल)
शास्त्र स्रोत वैदिक सनातन धर्मग्रंथ एवं संहिता
उत्तम जप समय ब्रह्म मुहूर्त अथवा प्रदोष काल
अनुशंसित माला रुद्राक्ष माला (पंचमुखी या एकमुखी)

मूल संस्कृत महामंत्र

शुद्ध शास्त्रीय पाठ एवं उच्चारण स्वरूप

॥ ॐ तत्सत् · सिद्ध वैदिक महामंत्र ॥
ॐ हौं जूं सः माम् पालय पालय सः जूं हौं सम्पूर्ण आरोग्य विधान
सरल हिंदी भावार्थ:

हे भगवान शिव! आप मेरी रक्षा करें, मेरी रक्षा करें। मुझमें प्राण ऊर्जा का संचार कर मुझे पूर्ण आरोग्य प्रदान करें।

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विस्तृत आध्यात्मिक व्याख्या एवं शास्त्रीय विवेचन

मंत्र का गूढ़ रहस्य एवं साधना विधि

मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता

सनातन वैदिक परंपरा में भगवान शिव के महामृत्युंजय मंत्रों का एक विशिष्ट और सर्वोच्च स्थान है। इन सभी में 'श्री महामृत्युंजय संजीवन मंत्र' (ॐ हौं जूं सः माम् पालय पालय सः जूं हौं) को तांत्रिक एवं वैदिक दोनों पद्धतियों में प्राण-प्रतिष्ठा, आयु रक्षा और संजीवन के लिए महाऔषधि माना गया है। जिस प्रकार महर्षि दधीचि या शुक्राचार्य के पास मृतसंजीवन विद्या थी, उसी प्रकार यह मंत्र साधक के शरीर में ऊर्जा का संचार कर बुढ़ापे, रोगों और अकाल मृत्यु के ग्रास से बाहर निकालता है।

इस मंत्र के ऋषि भगवान शिव स्वयं हैं, इसके बीज अक्षरों (हौं, जूं, सः) में त्रिमूर्ति और त्रिगुणात्मक शक्तियों का समाहार है। यह मंत्र केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय स्पंदन है जो साधक की नाड़ियों और चक्रों को जागृत करता है।

मूल शुद्ध मंत्र एवं लिप्यंतरण

संस्कृत भाषा देववाणी है और इसके प्रत्येक वर्ण में असीम ऊर्जा निहित है। अत: इसका उच्चारण पूर्ण शुद्धता के साथ किया जाना चाहिए:

ॐ हौं जूं सः माम् पालय पालय सः जूं हौं

पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ

  • ॐ : यह ब्रह्मांड का मूल नाद, प्रणव मंत्र और साक्षात परब्रह्म परमात्मा का प्रतीक है।
  • हौं : यह शिवजी का बीज मंत्र है, जो मोक्ष, साधना की सिद्धि और प्राण तत्त्व को जागृत करता है।
  • जूं : यह मृतसंजीवनी बीज है, जो प्राणों की रक्षा करता है और शरीर में आयु की वृद्धि करता है।
  • सः : यह विष्णु और शिव दोनों की ऊर्जा का द्योतक है जो साधक को जगत में स्थापित और सुरक्षित रखता है।
  • माम् : इसका अर्थ है 'मेरी' अर्थात् साधक स्वयं के लिए भगवान की शरण की याचना करता है।
  • पालय पालय : रक्षा करें, रक्षा करें (द्वित्व प्रयोग तीव्रता और सघन प्रार्थना को दर्शाता है)।
  • सः जूं हौं: मंत्र के समापन चरण में बीज मंत्रों का उल्टा क्रम ऊर्जा को साधक के भीतर सील करता है ताकि ऊर्जा का ह्रास न हो।

विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक

किसी भी उच्च कोटि के मंत्र के अनुष्ठान से पूर्व उसका विनियोग और न्यास करना अनिवार्य होता है ताकि मंत्र की ऊर्जा का सही दिशा में संचरण हो सके।

विनियोग

असस्य श्री महामृत्युंजय संजीवन मंत्रस्य ऋषिः ब्रह्मा, छन्दो गायत्री, देवता महामृत्युंजय रुद्रो भगवान्, हौं बीजं, सः शक्तिः, जूं कीलकं, मम सर्वारोग्य-आयुर्वृद्धये जपे विनियोगः।

ध्यान श्लोक

धायेत्सदा सवितृमण्डलमध्यस्थं चन्द्रायुतरत्नकिरीटिनं कुण्डलिनम्। हारैः कनककैर्दीप्तं दिव्यहारोपशोभितम्॥ कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्। सदा बसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानी सहितं नमामि॥

जप विधि व नियम

इस संजीवन मंत्र का अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए:

  • समय: प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त (3:00 बजे से 6:00 बजे के बीच) अथवा प्रदोष काल में जप करना अत्यंत फलदायी होता है।
  • दिशा: साधक का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।
  • आसन: कुशा या ऊनी आसन का प्रयोग करें। जमीन पर सीधे न बैठें।
  • माला: रुद्राक्ष की 108 मनकों वाली पवित्र माला का उपयोग करें।
  • संख्या: प्रतिदिन कम से कम 5 माला (505 बार) या 11 माला का जप करें। किसी गंभीर रोगी के लिए अनुष्ठान के दौरान संकल्प लेकर एक लाख जप भी कराए जाते हैं।

विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति

इस महामृत्युंजय संजीवन मंत्र के नियमित और अनुशासित जप से निम्नलिखित अद्भुत लाभ प्राप्त होते हैं:

  • अकाल मृत्यु का भय हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।
  • दीर्घायु और उत्तम आरोग्य की प्राप्ति होती है।
  • शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और असाध्य रोग धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं।
  • मानसिक तनाव, अवसाद , और भय से मुक्ति मिलती है।
  • कुंडली में उपस्थित गंभीर दुर्घटना योग, सर्प योनि भय या अकाल मृत्यु के योग नष्ट होते हैं।

सावधानियां एवं नियम

साधना काल में कुछ विशेष नियमों का पालन करना आवश्यक है ताकि मंत्र की पूर्ण सिद्धि मिल सके:

  • मंत्र जप के दौरान पूर्ण सात्विकता (शाकाहारी भोजन, लहसुन-प्याज का त्याग) बनाए रखें।
  • ब्रह्मचर्य का कठोरता से पालन करें।
  • क्रोध, ईर्ष्या और नकारात्मक विचारों से दूर रहें।
  • जप करते समय माला को गोमुखी के अंदर रखें या किसी वस्त्र से ढक कर रखें, माला को जमीन पर न गिरने दें।
  • शुद्धता और उच्चारण की स्पष्टता पर विशेष ध्यान दें।
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जाप के सिद्ध फल व सावधानियां

पुण्य लाभ एवं साधना के महत्वपूर्ण नियम

प्राप्त होने वाले पुण्य लाभ
असाध्य रोगों से मुक्ति, अकाल मृत्यु टलना, जीवन रक्षा और आध्यात्मिक उन्नति
साधना में ध्यान रखने योग्य नियम
सात्विकता, ब्रह्मचर्य का पालन और शुद्ध उच्चारण अनिवार्य है।

मंत्र से जुड़े मुख्य प्रश्न व समाधान (FAQs)

श्रद्धालुओं द्वारा पूछे जाने वाले सामान्य प्रश्न

इस पावन मंत्र का जप ब्रह्म मुहूर्त अथवा प्रदोष काल में रुद्राक्ष माला (पंचमुखी या एकमुखी) से १०८ बार करना सबसे शुभ व फलदायी माना गया है।
हाँ, मानसिक जप (मानस जप) को शास्त्रों में वाचिक जप से भी अधिक प्रभावशाली और फलदायी माना गया है। इसे आप शांत चित्त होकर कभी भी कर सकते हैं।
नियमित जप से अकाल मृत्यु व नकारात्मकता का भय समाप्त होता है, मानसिक शांति व सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और इष्टदेव की असीम कृपा प्राप्त होती है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख वेदों, उपनिषदों एवं सनातन धर्मग्रंथों के उपलब्ध संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा श्रद्धालुओं के मार्गदर्शन हेतु तैयार किया गया है।

मंत्र जप के ५ स्वर्णिम नियम
शुद्धता: स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण कर पवित्र आसन पर बैठें।
दिशा: पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके जप करना सर्वोत्तम है।
माला का नियम: जप करते समय माला पर तर्जनी उंगली का स्पर्श न होने दें।
एकाग्रता: मंत्र के शब्दों के भावार्थ का हृदय में निरंतर ध्यान करें।
नियमितता: प्रतिदिन निश्चित समय और संख्या में जप करने से सिद्धि मिलती है।
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