मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता
सनातन संस्कृति और वैदिक वांग्मय में महामंत्रों का एक विशिष्ट और सर्वोच्च स्थान है। कलियुग के समस्त कल्मषों, पापों, संतापों और मानसिक विकारों को दूर करने के लिए पुराणों में जिस एकमात्र महामंत्र की महिमा का अनंत बार गुणगान किया गया है, वह है षोडश-नाम महामंत्र यानी 'हरे कृष्ण महामंत्र'। कलिसंतरण उपनिषद के अनुसार, ब्रह्माजी ने नारद मुनि को कलियुग में भवसागर पार करने के लिए इस सोलह नामों के दिव्य महामंत्र का उपदेश दिया था।
इस महामंत्र के ऋषि स्वयंभू ब्रह्माजी हैं, इसके देवता स्वयं परात्पर ब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण और भगवती ह्लादिनी शक्ति श्री राधा रानी (हरे) हैं। वेदों और उपनिषदों में इस बात की स्पष्ट घोषणा की गई है कि कलियुग में न तो कठिन यज्ञ संभव हैं, न ही कठोर तपस्या और न ही बड़े-बड़े अनुष्ठान। ऐसे में केवल और केवल भगवत नाम का संकीर्तन ही मनुष्य को भौतिकता के दलदल से निकालकर पार लगा सकता है।
मूल शुद्ध मंत्र एवं लिपि
हरे कृष्ण महामंत्र को देवनागरी लिपि में पूर्ण शुद्धता के साथ इस प्रकार लिखा और उच्चारित किया जाता है:
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥
इस महामंत्र में कुल सोलह शब्द हैं जो दो-दो के जोड़े में विभाजित हैं। इसमें 'हरि' शब्द का संबोधन 'हरे' के रूप में प्रयुक्त हुआ है, जो भगवान की अंतरंग शक्ति श्रीमती राधारानी या भगवान द्वारा भक्तों के पापों को हरने की क्षमता का प्रतीक है। 'कृष्ण' का अर्थ है जो सभी को अपनी ओर आकर्षित करते हैं और 'राम' का अर्थ है जो समस्त ब्रह्मांड में रमण करते हैं तथा सबके हृदय में आनंद का संचार करते हैं।
पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ
इस महामंत्र के प्रत्येक शब्द का दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थ अत्यंत गहरा है। आइए इसका पद-दर-पद विश्लेषण करें:
- हरे : हे भगवती हरिया (राधारानी)! या हे समस्त दुखों और पापों को हरने वाले भगवान!
- कृष्ण : हे सर्वआकर्षक सच्चिदानंद स्वरूप भगवान श्रीकृष्ण!
- हरे : हे मेरी आंतरिक चेतना को आनंदित करने वाली शक्ति!
- कृष्ण : हे भक्तों के प्राणधन श्रीकृष्ण!
- कृष्ण : हे अष्टसखाओं के प्रिय और गोकुलनंदन कृष्ण!
- कृष्ण : हे मेरे आराध्य सर्वेश्वर कृष्ण!
- हरे : हे भक्तों के संताप हरने वाले!
- हरे : हे योगेश्वर और परम पुरुष!
- हरे : हे रमण करने वाले, सबके हृदय में निवास करने वाले भगवान राम!
- हरे : हे दशरथनंदन मर्यादा पुरुषोत्तम राम!
- राम : हे योगियों के ध्यान के केंद्र राम!
- राम : हे आनंद के भंडार राम!
- हरे : हे संपूर्ण जगत के आश्रय!
- हरे : हे अंतर्यामी प्रभु!
इस प्रकार, इस महामंत्र का समग्र भावार्थ यह है कि जीव अपनी समस्त अहंता और ममंता को त्यागकर भगवान की शरण में जाता है और उनसे प्रार्थना करता है कि वे उसकी चित्तवृत्ति को अपनी पावन भक्ति में लीन कर लें। यह एक प्रकार से जीवात्मा की परमात्मा के प्रति शाश्वत पुकार है।
विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक
भगवान श्रीकृष्ण के इस महामंत्र के जप से पूर्व साधक को मानसिक पवित्रता और आंतरिक शुद्धि के लिए विनियोग और ध्यान करना चाहिए। यद्यपि महामंत्र के संकीर्तन के लिए किसी कठोर विधि-विधान की अनिवार्यता नहीं है, तथापि शास्त्रीय परंपरा का पालन करने से चित्त एकाग्र होता है:
- विनियोग: अस्य श्रीकलिसंतरणमहामंत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप छंदः, श्रीराधाकृष्णो देवता, बीजम्, शक्तिः, कीलकम्, कलियुगपापध्वंसार्थे जपे विनियोगः।
- ध्यान श्लोक:
ध्यायेत्चतुर्भुजं कृष्णं शंखचक्रगदाधरम्।
पीताम्बरधरं देवं श्रीवत्सांकलशोभितम्॥
कान्त्या गोरोचनालाभं मुक्तामालाभूषितम्।
सर्वसुन्दरमीशानं भक्तनां अभयप्रदम्॥
जप विधि, नियम एवं माला चयन
हरे कृष्ण महामंत्र का जप या संकीर्तन किसी भी समय, किसी भी स्थान और किसी भी स्थिति में किया जा सकता है। फिर भी, इसकी सर्वोच्च प्रभावशीलता के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना श्रेष्ठकर माना गया है:
- समय: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) या संध्या बेला जप के लिए अत्यंत उत्तम मानी जाती है। हालांकि, चौबीसों घंटे में कभी भी इसका कीर्तन किया जा सकता है।
- माला: इस मंत्र के जप के लिए केवल और केवल पवित्र तुलसी की माला का ही उपयोग किया जाना चाहिए। तुलसी माला के मनकों की संख्या 108 होती है।
- दिशा: जप करते समय साधक का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।
- संख्या: साधक को अपनी क्षमतानुसार प्रतिदिन कम से कम 1 से 16 माला (108 बार प्रति माला) का जप अवश्य करना चाहिए।
विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति
कलिसंतरण उपनिषद में स्पष्ट उल्लेख है कि इन सोलह नामों का जप करने से कलियुग के प्रभाव और कुप्रभावों का नाश हो जाता है। इसके नियमित जप से निम्नलिखित आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- मानसिक शांति और तनाव मुक्ति: मन की चंचलता समाप्त होती है और गहन आंतरिक शांति का अनुभव होता है।
- पापों का क्षय: जन्म-जन्मांतर के संचित कर्म और पाप नष्ट होने लगते हैं।
- भगवद् प्राप्ति: अंतःकरण शुद्ध होने से भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में अनन्य भक्ति और प्रेम की प्राप्ति होती है।
- आत्म-साक्षात्कार: साधक को यह बोध होता है कि वह भौतिक शरीर नहीं, बल्कि सच्चिदानंद आत्मा है।
सावधानियां एवं नियम
महामंत्र की पवित्रता बनाए रखने के लिए कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है:
- साधक को सात्विक आहार (प्याज, लहसुन और तामसिक भोजन से रहित) का सेवन करना चाहिए।
- जप करते समय मन को भटकने न दें और भगवान के रूप का स्मरण करते रहें।
- अशुद्ध अवस्था में मानसिक रूप से स्मरण किया जा सकता है, किंतु माला पर जप शुद्ध होकर ही करें।
- किसी भी प्रकार के नशे, मांस-मदिरा और दुराचरण से पूर्णतः दूर रहें।
| प्रश्न | उत्तर |
|---|---|
| क्या महिलाएं हरे कृष्ण महामंत्र का जप कर सकती हैं? | हाँ, यह महामंत्र स्त्री, पुरुष, बच्चे और वृद्ध सभी के लिए समान रूप से खुला है। इसके जप पर किसी भी प्रकार का कोई लिंगगत प्रतिबंध नहीं है। |
| क्या इस मंत्र के जप के लिए दीक्षा लेना अनिवार्य है? | नहीं, हरे कृष्ण महामंत्र महा-उदार मंत्र है। इसके संकीर्तन या जप के लिए गुरु से दीक्षा लेना अनिवार्य नहीं है, कोई भी श्रद्धावान व्यक्ति इसका जप कर सकता है। |
| तुलसी माला के बिना क्या मंत्र जप सकते हैं? | हाँ, आप उंगलियों पर (कर-माला) या बिना माला के भी कीर्तन कर सकते हैं, किंतु तुलसी माला का प्रयोग आध्यात्मिक ऊर्जा को संचित करने में विशेष सहायक होता है। |
| इस मंत्र को 'महामंत्र' क्यों कहा जाता है? | क्योंकि इसमें सभी वेदों, उपनिषदों और भगवतनामों का सार समाहित है तथा यह कलियुग में मोक्ष प्रदान करने वाला सर्वोच्च मंत्र है। |