मुख्य पृष्ठ / मंत्र संग्रह / Mantra / श्री कृष्ण महामंत्र - हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे सम्पूर्ण भावार्थ व कीर्तन
भगवान श्री हरि कृपा · भगवान श्री कृष्ण Mantra

श्री कृष्ण महामंत्र - हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे सम्पूर्ण भावार्थ व कीर्तन

जानें हरे कृष्ण हरे कृष्ण महामंत्र का सम्पूर्ण भावार्थ, वैदिक इतिहास, जप विधि, माला, नियम और इसके आध्यात्मिक लाभ। Bhaktilok.in पर पढ़ें विस्तृत मार्गदर्शिका।

इष्ट देव भगवान श्री कृष्ण
शास्त्र स्रोत वैदिक सनातन धर्मग्रंथ एवं संहिता
उत्तम जप समय ब्रह्म मुहूर्त / संध्या बेला / सर्वदा संकीर्तन
अनुशंसित माला तुलसी माला

मूल संस्कृत महामंत्र

शुद्ध शास्त्रीय पाठ एवं उच्चारण स्वरूप

॥ ॐ तत्सत् · सिद्ध वैदिक महामंत्र ॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे । हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥
सरल हिंदी भावार्थ:

हे हरण करने वाले (दुखों को दूर करने वाले) भगवान कृष्ण! और हे रमण करने वाले भगवान राम! कृपया मुझे अपनी अनन्य भक्ति प्रदान करें।

विस्तृत आध्यात्मिक व्याख्या एवं शास्त्रीय विवेचन

मंत्र का गूढ़ रहस्य एवं साधना विधि

मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता

सनातन वैदिक सनातन धर्म में भगवान श्री कृष्ण के अनेक नाम, स्तोत्र और मंत्र प्रचलित हैं, परन्तु कलियुग के समस्त दोषों और प्रपंचों का नाश करने वाला, जीव को भवसागर से तरने वाला एकमात्र महामंत्र 'हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे' को माना गया है। वैदिक साहित्यों और पुराणों में इस मंत्र का अत्यंत गौरवशाली स्थान है। कलियुग में मोक्ष और भगवत्प्राप्ति का कोई अन्य सुलभ मार्ग न होने के कारण वेदों और उपनिषदों ने इसी महामंत्र को जप और संकीर्तन का आधार बनाया है।

इस महामंत्र का प्रथम स्पष्ट उल्लेख कलि-संतरण उपनिषद (जो कि कृष्ण-यजुर्वेद से संबद्ध है) में मिलता है। नारद मुनि ने जब ब्रह्मा जी से कलियुग में जीव के उद्धार का मार्ग पूछा, तब ब्रह्मा जी ने इस षोडशाक्षर (सोलह अक्षरों वाले) महामंत्र का उपदेश दिया। इस महामंत्र के ऋषि स्वयंभू ब्रह्मा जी हैं, इसका छंद 'गायत्री' या विशिष्ट वैदिक छंदों की श्रेणी में आता है, और इसके अधिष्ठाता देवता स्वयंप्रकाश भगवान श्री कृष्ण और माता हर (श्री राधा या भगवती योगमाया) हैं।

Complete Sanskrit Mantra & Phonetic Transliteration (मूल शुद्ध मंत्र)

इस महामंत्र के शुद्ध उच्चारण और लिपि का विशेष महत्व है। देवनागरी लिपि में इसका मूल रूप इस प्रकार है:

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥

इस मंत्र का अंतरराष्ट्रीय रोमनाइजेशन इस प्रकार है:

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि 'कृष्ण' शब्द का उच्चारण 'कृष्-ण' और 'राम' का उच्चारण 'राम्' होना चाहिए। इस महामंत्र में कुल सोलह शब्द और बत्तीस अक्षर हैं, जो हमारे शरीर की बत्तीस नाड़ियों और सोलह कलाओं को जाग्रत करने की सामर्थ्य रखते हैं।

Word-by-Word Meaning & Spiritual Bhavarth (पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ)

इस महामंत्र में मुख्य रूप से तीन दिव्य शब्दों का बार-बार प्रयोग हुआ है - 'हरि' (या हरे), 'कृष्ण', और 'राम'। आइए इन शब्दों का पद-दर-पद विश्लेषण और इसका गूढ़ भावार्थ समझें:

  • हरे : यह 'हरि' शब्द का संबोधन रूप है। 'हरि' का अर्थ है - जो भक्तों के सभी दुखों, संतापों, कर्म बंधनों और अज्ञान का हरण (नाश) कर लेते हैं। इसका दूसरा अर्थ शक्ति स्वरूपा आह्लादिनी शक्ति श्रीमती राधा रानी भी है, जो कृष्ण के प्राणों की आल्हादिनी शक्ति हैं।
  • कृष्ण : 'कृष्' धातु का अर्थ है - अस्तित्व की सत्ता, और 'ण' का अर्थ है - परम आनंद। जो सच्चिदानंद स्वरूप हैं, जिनके आकर्षण से सारा ब्रह्मांड आकृष्ट होता है, जो समस्त आकर्षणों के केंद्र हैं, वे भगवान श्री कृष्ण हैं।
  • राम : 'रम्' धातु का अर्थ है - जिसमें सभी योगी और भक्त रमण करते हैं, जो सर्वव्यापक और रमणीय हैं, वे श्री राम हैं। महामंत्र में 'राम' शब्द भगवान बलराम, परशुराम और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के साथ-साथ अंतर्यामी परमात्मा का भी प्रतीक है, जो हर हृदय में रमण करते हैं।

सम्पूर्ण भावार्थ: इस महामंत्र का सीधा अर्थ है— "हे आल्हादिनी शक्ति श्री राधिके! हे सर्वआकर्षक भगवान कृष्ण! हे समस्त योगियों के केंद्र भगवान राम! कृपया मुझ दीनहीन जीव को अपनी सेवा में संलग्न करें और मेरे मन को इस संसार के मायाजाल से मुक्त कर अपने चरणों में प्रीति प्रदान करें।" यह कोई साधारण नाम नहीं है, बल्कि आत्मा का परमात्मा से मिलन कराने वाला अमोघ तारक मंत्र है।

Viniyoga, Nyasa & Dhyana Vidhi (विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक)

वैदिक और गौड़ीय परंपरा के अनुसार किसी भी मंत्र के अनुष्ठान से पूर्व उसका विनियोग और ध्यान करना अत्यंत आवश्यक होता है ताकि मंत्र की शक्ति जाग्रत हो सके:

  • विनियोग: अस्य श्रीहरिकृष्णमहामंत्रस्य ब्रह्म ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीकृष्णापरब्रह्मा देवता, हरीति बीजं, राममिति शक्तिः, कृष्णमिति कीलकं, श्रीकृष्णाप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।
  • ध्यान श्लोक:
    ध्यायेत्सदा परिपूर्णमयं प्रपन्नं,
    गोलोकधामधिपतिं तरुणार्कवर्णम् ।
    वंशोद्धृतं करसुधेन समन्वितं तं,
    राधासुखप्रदमनन्तगुणं नमामि ॥

इस ध्यान श्लोक का तात्पर्य है कि हम उन भगवान कृष्ण का ध्यान करते हैं जो गोलोक धाम के अधिपति हैं, तरुणार्क (निकलते हुए सूर्य) के समान जिनकी कांति है, हाथ में वंशी धारण किए हुए हैं और जो श्री राधा को परम सुख प्रदान करने वाले हैं।

Sacred Chanting Rules, Rosary & Best Auspicious Timing (जप विधि व नियम)

हरे कृष्ण महामंत्र का जप किसी भी समय, किसी भी अवस्था में किया जा सकता है, क्योंकि यह नाम-संकीर्तन कलि-पावन है। फिर भी, इसकी कुछ विशिष्ट पद्धतियाँ हैं:

  • माला का चयन: इस महामंत्र के जप के लिए पवित्रातिपवित्र तुलसी माला (कंठामणि या जप माला) का ही उपयोग सर्वोत्तम माना जाता है। तुलसी की लकड़ी भगवान कृष्ण को अत्यंत प्रिय है।
  • जप संख्या: सामान्यतः साधक 108 मनकों वाली तुलसी माला से 1 माला से लेकर 16 माला (प्रत्येक माला में 108 बार मंत्र जप) प्रतिदिन नियमपूर्वक करते हैं। इस्कॉन और गौड़ीय वैष्णव परंपरा में प्रतिदिन न्यूनतम 16 माला का नियम अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।
  • श्रेष्ठ समय: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4:00 बजे से 6:00 बजे के बीच) इस जप के लिए सर्वोत्तम है। इसके अतिरिक्त संध्या वेला में या दिनभर चलते-फिरते, उठते-बैठते मानसिक रूप से भी इस महामंत्र का संकीर्तन किया जा सकता है।
  • दिशा: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठकर जप करना श्रेष्ठ फलदायी होता है।

Specific Spiritual & Material Benefits (विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति)

पद्म पुराण, बहुरूप पुराण और कलि-संतरण उपनिषद के अनुसार हरे कृष्ण महामंत्र के जप से अनंत फल प्राप्त होते हैं:

  • मानसिक शांति और तनाव मुक्ति: इस महामंत्र के निरंतर जप और संकीर्तन से मन की चंचलता समाप्त होती है, अवसाद , चिंता और नकारात्मक विचार दूर होते हैं।
  • पापों का क्षय और कर्म शुद्धि: अग्नि जिस प्रकार स्वर्ण को शुद्ध कर देती है, उसी प्रकार यह महामंत्र जन्म-जन्मंतर के संचित पापों और बुरे संस्कारों का नाश कर देता है।
  • भगवत्प्रेम की प्राप्ति: भौतिक सुखों से ऊपर उठकर साधक को अहैतुकी भक्ति, दिव्य आनंद और अंततः भगवान के नित्य धाम (गोलोक) की प्राप्ति होती है।
  • पारिवारिक सुख व शांति: जिस घर में नियमित रूप से हरे कृष्ण महामंत्र का संकीर्तन होता है, वहाँ सकारात्मक ऊर्जा, सुख-समृद्धि और आरोग्य का वास होता है।

Important Precautions & Dos and Don'ts (सावधानियां एवं नियम)

महामंत्र की पवित्रता और उसकी सिद्धि के लिए कुछ विशेष सावधानियों का ध्यान रखना अनिवार्य है:

  • सात्विकता: मंत्र जप करने वाले साधक को तामसिक आहार (प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा आदि) का पूर्ण त्याग करना चाहिए और पूर्णतः सात्विक जीवनशैली अपनानी चाहिए।
  • नाम अपराधों से बचना: पद्म पुराण में वैष्णव अपराध और नाम अपराध (जैसे भक्तों की निंदा करना, भगवान के नामों को साधारण समझना, गुरु का अनादर करना) का निषेध किया गया है। इनसे बचना चाहिए।
  • अनंतरता और श्रद्धा: जप में निरंतरता होनी चाहिए। ऐसा नहीं कि एक दिन जप किया और चार दिन छोड़ दिया। श्रद्धा और विश्वास ही इस मंत्र की प्राण-ऊर्जा हैं।

जाप के सिद्ध फल व सावधानियां

पुण्य लाभ एवं साधना के महत्वपूर्ण नियम

प्राप्त होने वाले पुण्य लाभ
मानसिक शांति, भवसागर से मुक्ति, कृष्ण भक्ति की प्राप्ति, पापों का नाश
साधना में ध्यान रखने योग्य नियम
सात्विक आहार, शुद्धता, अनासक्त भाव और निरंतरता का पालन

मंत्र से जुड़े मुख्य प्रश्न व समाधान (FAQs)

श्रद्धालुओं द्वारा पूछे जाने वाले सामान्य प्रश्न

इस पावन मंत्र का जप ब्रह्म मुहूर्त / संध्या बेला / सर्वदा संकीर्तन में तुलसी माला से १०८ बार करना सबसे शुभ व फलदायी माना गया है।
हाँ, मानसिक जप (मानस जप) को शास्त्रों में वाचिक जप से भी अधिक प्रभावशाली और फलदायी माना गया है। इसे आप शांत चित्त होकर कभी भी कर सकते हैं।
नियमित जप से अकाल मृत्यु व नकारात्मकता का भय समाप्त होता है, मानसिक शांति व सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और इष्टदेव की असीम कृपा प्राप्त होती है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख वेदों, उपनिषदों एवं सनातन धर्मग्रंथों के उपलब्ध संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा श्रद्धालुओं के मार्गदर्शन हेतु तैयार किया गया है।

मंत्र जप के ५ स्वर्णिम नियम
शुद्धता: स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण कर पवित्र आसन पर बैठें।
दिशा: पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके जप करना सर्वोत्तम है।
माला का नियम: जप करते समय माला पर तर्जनी उंगली का स्पर्श न होने दें।
एकाग्रता: मंत्र के शब्दों के भावार्थ का हृदय में निरंतर ध्यान करें।
नियमितता: प्रतिदिन निश्चित समय और संख्या में जप करने से सिद्धि मिलती है।
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!