मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता
सनातन धर्म में वैदिक मंत्रों और पुराणोक्त महामंत्रों का अत्यंत विशिष्ट स्थान है। जब हम भगवान श्री विष्णु की आराधना की बात करते हैं, तो द्वादशाक्षर महामंत्र 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' को तारक मंत्र और मुक्तिदायक मंत्र के रूप में जाना जाता है। इस मंत्र में बारह (१२) अक्षर होने के कारण इसे 'द्वादशाक्षर मंत्र' कहा जाता है। श्रीमद्भागवत महापुराण में इस मंत्र की महिमा का वर्णन करते हुए बताया गया है कि यह मंत्र साधਕ को भवसागर से पार लगाने में पूरी तरह समर्थ है।
इस द्वादशाक्षर महामंत्र के ऋषि भगवान प्रजापति ब्रह्मा हैं, इसका छंद 'गायत्री' या 'अनुष्टुप' माना जाता है, और इसके अधिष्ठाता देवता सर्वांतर्यामी भगवान विष्णु, नारायण तथा वासुदेव श्रीकृष्ण हैं। यह मंत्र अनादि काल से मुनियों, ऋषियों और संतों द्वारा जपा जाता रहा है। इसके स्मरण मात्र से साधक के जन्म-जन्म के संचित कर्म क्षीण होने लगते हैं और हृदय में परम भक्ति का उदय होता है।
मूल शुद्ध मंत्र एवं लिप्यंतरण
भक्तिलोक.इन के इस पवित्र मार्गदर्शिका में हम आपको इस मंत्र का बिल्कुल शुद्ध और व्याकरण सम्मत स्वरूप प्रदान कर रहे हैं। मंत्र का उच्चारण करते समय इसकी शुद्धता का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
मूल संस्कृत मंत्र: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
शुद्ध प्रोनंसिएशन : Om Namo Bhagavate Vasudevaya
इस मंत्र का प्रत्येक अक्षर एक बीज शक्ति को समेटे हुए है। इसमें 'ॐ' प्रणव मंत्र है, जो ब्रह्मांड की मूल ध्वनि है। 'नमः' समर्पण का प्रतीक है, 'भगवते' ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य से युक्त भगवान को संबोधित करता है, और 'वासुदेवाय' वसुदेव के पुत्र भगवान श्रीकृष्ण या सर्वव्यापक परमब्रह्म का बोध कराता है।
पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ
इस द्वादशाक्षर महामंत्र का प्रत्येक पद वेदों और उपनिषदों के सार को अपने भीतर समाहित किए हुए है। आइए इसका पद-दर-पद अर्थ समझते हैं:
- ॐ : यह प्रणव मंत्र है। यह सच्चिदानंद परमात्मा का निज नाम है, जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड का आधार है।
- नमः : इसका अर्थ है झुकना, प्रणाम करना, समर्पण करना या अहंकार का त्याग करना।
- भगवते : इसका अर्थ 'भगवान' यानी भग (ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान, वैराग्य - इन छह ऐश्वर्यों) से युक्त पूर्ण पुरुषोत्तम को नमस्कार है।
- वासुदेवाय : इसका अर्थ 'वसुदेव के पुत्र' अथवा 'वह परमात्मा जो समस्त चराचर जगत में निवास करता है और जिसमें सम्पूर्ण जगत निवास करता है' (सर्वव्यापक)।
सम्पूर्ण भावार्थ: "मैं उन सर्वव्यापक, षडैश्वर्य संपन्न, भगवान वासुदेव (श्रीकृष्ण/विष्णु) के चरणों में अपना सर्वस्व समर्पित करता हूँ और उन्हें बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे प्रभु! मेरे अहंकार का नाश हो और आपकी चरणों में मेरी अनन्य भक्ति हो।"
विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक
किसी भी वैदिक या तांत्रिक मंत्र के पूर्ण फल की प्राप्ति के लिए विनियोग और ध्यान अति आवश्यक हैं। इसके बिना मंत्र का पूर्ण प्रभाव प्राप्त नहीं होता।
विनियोग
दाएं हाथ में जल लेकर मंत्र के विनियोग का उच्चारण किया जाता है और जल को जमीन पर छोड़ दिया जाता है:
अस्य श्रीद्वादशाक्षर-महामंत्रस्य प्रजापतिऋषिः, अनुष्टुप छन्दः, भगवान् वासुदेवो देवता, ॐ बीजं, नमः शक्तिः, भगवते कीलकम्, मम समस्त-पाप-क्षयार्थम्, श्रीविष्णु-प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।
करन्यास एवं हृदयादि अंगन्यास
- ॐ अंगुष्ठेभ्यो नमः, ॐ तर्जनीभ्यो स्वाहा।
- ॐ मध्यमाभ्यो वषट्, ॐ अनामिकाभ्यो हूँ।
- ॐ कनिष्ठिकाभ्यो वौषट्, ॐ करतल-कर-पृष्ठाभ्यां फट्।
- इसी प्रकार हृदय नमः, शिरसे स्वाहा, शिखायै वषट्, कवचाय हूँ, नेत्रत्रयाय वौषट्, अस्त्राय फट् का न्यास करना चाहिए।
ध्यान श्लोक
जप से पूर्व भगवान विष्णु के इस रूप का मानसिक ध्यान करना चाहिए:
ध्यायेत् सत्यं परं ब्रह्म शङ्ख-चक्र-गदा-धरम्। पीताम्बरधरं देवं शरण्यं करुणाकरम्॥
कान्त्या कोटकलानिभं सुरवरं वन्दे मुकुन्दं प्रभुम्।
जप विधि, नियम एवं माला चयन
इस महामंत्र की साधना अत्यंत सरल किंतु अत्यंत प्रभावशाली है। इसके लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए:
- सर्वोत्तम समय: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4:00 बजे से 6:00 बजे तक) या संध्याकाल इस मंत्र के जाप के लिए सर्वोत्तम है।
- दिशा: साधक को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए।
- माला: तुलसी की लकड़ी की माला (तुलसी माला) इस मंत्र के जाप के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। रुद्राक्ष की माला से भी इसका जाप किया जा सकता है।
- संख्या: नित्य कम से कम 1 माला (108 बार) या सामर्थ्यनुसार 3, 5, 11 माला का जाप करना चाहिए।
- आसन: कुशा या ऊनी आसन का प्रयोग करना चाहिए।
विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति
श्री विष्णु द्वादशाक्षर मंत्र का नियमित जाप करने से साधक को भौतिक और आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर असीम लाभ प्राप्त होते हैं:
- मोक्ष प्राप्ति: पुराणों के अनुसार, अंत समय में जो मनुष्य इस द्वादशाक्षर मंत्र का स्मरण करता है, वह वैकुण्ठ धाम को प्राप्त होता है और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो जाता है।
- पाप नाश: इस मंत्र के निरंतर स्मरण से जाने-अनजाने में किए गए सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं।
- मानसिक शांति: तनाव, चिंता, भय और अवसाद से मुक्ति मिलती है और मन में असीम शांति का अनुभव होता है।
- आरोग्य एवं दीर्घायु: भगवान विष्णु की कृपा से शरीर के रोग दूर होते हैं और आरोग्य की प्राप्ति होती है।
- कुण्डलिनी जागरण व आध्यात्मिक उन्नति: यह मंत्र चक्रों को संतुलित करता है और आध्यात्मिक चेतना को जागृत करता है।
सावधानियां एवं नियम
साधना मार्ग में पवित्रता और अनुशासन का बहुत महत्व है। इस मंत्र का जाप करते समय निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखें:
- मंत्र जाप के दौरान पूर्ण सात्विक आहार (प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा का त्याग) का पालन करें।
- जाप के समय आसन और वस्त्र शुद्ध होने चाहिए।
- अशुद्धि की स्थिति में (सूतक या अशौच काल में) मानसिक जाप किया जा सकता है, मौखिक जाप वर्जित है।
- जाप में निरंतरता (नियमितता) बनाए रखें। रोज़ाना एक ही समय और एक ही स्थान पर जाप करना सबसे उत्तम होता है।