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माँ भगवती शक्ति कृपा · माँ तारा Mantra

श्री तारा महाविद्या मंत्र - ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट् तीव्र साधना, मोक्ष प्राप्ति व वाक् सिद्धि महामंत्र

श्री तारा महाविद्या मंत्र और तीव्र साधना विधि, मोक्ष प्राप्ति व वाक् सिद्धि का महामंत्र। संदर्भ एवं व्याख्या सहित पढ़ें।

इष्ट देव माँ तारा
शास्त्र स्रोत वैदिक सनातन धर्मग्रंथ एवं संहिता
उत्तम जप समय रात्रि काल या ब्रह्म मुहूर्त
अनुशंसित माला रुद्राक्ष या रुद्राक्ष-स्फटिक मिश्रित माला

मूल संस्कृत महामंत्र

शुद्ध शास्त्रीय पाठ एवं उच्चारण स्वरूप

॥ ॐ तत्सत् · सिद्ध वैदिक महामंत्र ॥
ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट्
सरल हिंदी भावार्थ:

हे माँ तारा! माया, आकर्षण, प्राण शक्ति और भेदन करने वाली अपनी ऊर्जा से मुझे वाक् सिद्धि और मोक्ष प्रदान करें।

विस्तृत आध्यात्मिक व्याख्या एवं शास्त्रीय विवेचन

मंत्र का गूढ़ रहस्य एवं साधना विधि

मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता

सनातन संस्कृति और शाक्त परंपरा में दस महाविद्याओं का अत्यंत विशिष्ट स्थान है। इन दसों महाविद्याओं में माँ काली के पश्चात माँ तारा को द्वितीय महाविद्या के रूप में पूजा जाता है। 'तारा' शब्द का मूल अर्थ है 'तारने वाली' यानी इस भवसागर से पार लगाने वाली। पुराणों और तंत्र शास्त्रों के अनुसार, महर्षि वशिष्ठ ने मरु देश में माँ तारा की उग्र और तीव्र साधना करके ही सिद्धि प्राप्त की थी। तारा महाविद्या का यह महामंत्र न केवल भौतिक बाधाओं और शत्रुओं का नाश करता है, बल्कि साधक के भीतर प्रसुप्त चेतना को जाग्रत कर सर्वोच्च मोक्ष की ओर अग्रसर करता है। इस महामंत्र के ऋषि अक्षोभ्य ऋषि हैं, छंद बृहती है, और अधिष्ठात्री देवी स्वयं नीलसरस्वती या भगवती तारा हैं।

मूल शुद्ध मंत्र एवं लिप्यंतरण

भगवती तारा का यह चतुर्क्षर महामंत्र अत्यंत तीव्र और प्रभावशाली माना जाता है। इसे पूरी शुद्धता के साथ जपना चाहिए।

देवनागरी मूल मंत्र: ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट्

अंग्रेजी लिप्यंतरण : Om Hreem Streem Hum Phat

पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ

इस महाविद्या मंत्र के प्रत्येक बीज अक्षर का अपना अलौकिक और ब्रह्मांडीय महत्व है। आइए इसके पद-दर-पद अर्थ को समझें:

  • ॐ : यह ब्रह्मांड का मूल नाद और प्राण ऊर्जा का प्रतीक है, जो परम ब्रह्म से जोड़ता है।
  • ह्रीं : यह भुवनेश्वरी बीज है, जो माया, आकर्षण, और सृजन-पालन की शक्ति प्रदान करता है।
  • स्त्रीं : यह तारा और आकर्षण का विशेष बीज है, जो भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति में सहायक है।
  • हुं : यह शक्ति और शिव का बीज है, जो आंतरिक शत्रुओं, अज्ञान और बाधाओं का भेदन करता है।
  • फट् : यह अस्त्र बीज है, जो तीव्र गति से मंत्र के प्रभाव को सिद्ध करने और अवरोधों को तुरंत समाप्त करने के लिए प्रयुक्त होता है।

विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक

किसी भी तांत्रिक या वैदिक महाविद्या मंत्र के जप से पूर्व विनियोग और न्यास करना अनिवार्य माना जाता है ताकि साधना की ऊर्जा सुरक्षित और केंद्रित रहे।

विनियोग: अस्य मन्त्रस्य अक्षोभ्य ऋषिः, बृहत्युच्छन्दः, श्रीमहातार देवता, ह्रीं बीजं, हुं शक्तिः, फट् कीलकं, मम सर्वापच्छान्तये महातारामार्गसिद्धये जपे विनियोगः।

ध्यान श्लोक:

प्रत्युत्प्रफुल्लवदना दंष्ट्राकरालिका। घोररूपा च तारा च मुण्डमालाभूषिता।।
खड्गं च कर्त्रिकां चैव वरमुण्डाभयप्रदा। चतुर्भुजा च सा देवी वामपाणिभृतायुधा।।

जप विधि, माला एवं सर्वोत्तम समय

श्री तारा महाविद्या की साधना गुप्त और अत्यंत नियमबद्ध होती है। इसकी विधि इस प्रकार है:

  • सर्वोत्तम समय: इस मंत्र की साधना के लिए मध्य रात्रि (निशीथ काल) या ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 3 से 5 बजे) का समय सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
  • दिशा: साधक को उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए।
  • आसन: ऊनी या कुशा का आसन प्रयोग करें।
  • माला: रुद्राक्ष या स्फटिक की माला का उपयोग करना चाहिए।
  • जप संख्या: प्रतिदिन कम से कम 5 माला (540 बार) या 11 माला का नियम लेना चाहिए।

विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति

माँ तारा के इस महामंत्र के नियमित और अनुशासनबद्ध जप से साधक को निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • वाक् सिद्धि: साधक जो भी बोलता है, वह सत्य होने लगता है (वाक् सिद्धि की प्राप्ति)।
  • तीव्र बुद्धि व ज्ञान: स्मरण शक्ति में असीम वृद्धि और गूढ़ शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त होता है।
  • संकट निवारण: बड़े से बड़े कानूनी संकट, ऋण और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।
  • मोक्ष प्राप्ति: सांसारिक मोह-माया से मुक्ति पाकर साधक अंततः मोक्ष का अधिकारी बनता है।

सावधानियां एवं नियम

उग्र महाविद्या होने के कारण तारा साधना में विशेष सावधानियों का पालन करना अति आवश्यक है:

  • दीक्षित गुरु के मार्गदर्शन के बिना इस तीव्र मंत्र की पूर्ण तांत्रिक साधना नहीं करनी चाहिए।
  • साधना काल में पूर्ण ब्रह्मचर्य, सात्विक आहार और मानसिक पवित्रता बनाए रखें।
  • क्रोध, अहंकार और ईर्ष्या से दूर रहें, अन्यथा मंत्र का विपरीत प्रभाव हो सकता है।
  • जप के समय दीपक और अगरबत्ती निरंतर प्रज्वलित रहनी चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्नउत्तर
क्या गृहस्थ लोग तारा महाविद्या का जप कर सकते हैं?हाँ, गृहस्थ लोग सात्विक भाव से और बिना उग्र तांत्रिक प्रयोगों के इस मंत्र का जप कर सकते हैं।
क्या इस मंत्र के लिए गुरु दीक्षा आवश्यक है?साधारण नाम जप के लिए विशेष दीक्षा की अनिवार्यता नहीं है, किंतु तीव्र सिद्धि और अनुष्ठान हेतु गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक है।
इस मंत्र के जप का सबसे अच्छा दिन कौन सा है?रवि पुष्य नक्षत्र, अष्टमी तिथि, अमावस्या और मंगलवार का दिन इस साधना के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।
वाक् सिद्धि कितने दिनों में प्राप्त होती है?यह साधक की निष्ठा, शुद्धि और कुल जप संख्या पर निर्भर करता है, जिसमें नियमित अनुष्ठान की आवश्यकता होती है।

जाप के सिद्ध फल व सावधानियां

पुण्य लाभ एवं साधना के महत्वपूर्ण नियम

प्राप्त होने वाले पुण्य लाभ
वाक् सिद्धि, तीव्र बुद्धि, संकट निवारण और मोक्ष प्राप्ति
साधना में ध्यान रखने योग्य नियम
दीक्षा के बिना उग्र साधना न करें, पूर्ण ब्रह्मचर्य व पवित्रता बनाए रखें।

मंत्र से जुड़े मुख्य प्रश्न व समाधान (FAQs)

श्रद्धालुओं द्वारा पूछे जाने वाले सामान्य प्रश्न

इस पावन मंत्र का जप रात्रि काल या ब्रह्म मुहूर्त में रुद्राक्ष या रुद्राक्ष-स्फटिक मिश्रित माला से १०८ बार करना सबसे शुभ व फलदायी माना गया है।
हाँ, मानसिक जप (मानस जप) को शास्त्रों में वाचिक जप से भी अधिक प्रभावशाली और फलदायी माना गया है। इसे आप शांत चित्त होकर कभी भी कर सकते हैं।
नियमित जप से अकाल मृत्यु व नकारात्मकता का भय समाप्त होता है, मानसिक शांति व सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और इष्टदेव की असीम कृपा प्राप्त होती है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख वेदों, उपनिषदों एवं सनातन धर्मग्रंथों के उपलब्ध संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा श्रद्धालुओं के मार्गदर्शन हेतु तैयार किया गया है।

मंत्र जप के ५ स्वर्णिम नियम
शुद्धता: स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण कर पवित्र आसन पर बैठें।
दिशा: पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके जप करना सर्वोत्तम है।
माला का नियम: जप करते समय माला पर तर्जनी उंगली का स्पर्श न होने दें।
एकाग्रता: मंत्र के शब्दों के भावार्थ का हृदय में निरंतर ध्यान करें।
नियमितता: प्रतिदिन निश्चित समय और संख्या में जप करने से सिद्धि मिलती है।
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