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श्री सूक्तम: ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम् (16 ऋचाएं एवं अर्थ)

श्री सूक्तम की संपूर्ण 16 ऋचाओं का शुद्ध पाठ, पद-दर-पद अर्थ, विनियोग, न्यास और महालक्ष्मी कृपा प्राप्ति की सरल विधि जानें। Bhaktilok.in

इष्ट देव माता महालक्ष्मी
शास्त्र स्रोत वैदिक सनातन धर्मग्रंथ एवं संहिता
उत्तम जप समय ब्रह्म मुहूर्त / प्रातः काल या शुक्रवार की संध्या
अनुशंसित माला स्फटिक या कमल गट्टा माला

मूल संस्कृत महामंत्र

शुद्ध शास्त्रीय पाठ एवं उच्चारण स्वरूप

॥ ॐ तत्सत् · सिद्ध वैदिक महामंत्र ॥
ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्। चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥
सरल हिंदी भावार्थ:

हे जातवेद अग्नि देव! सोने के समान कांति वाली, हरिणी (मन को आकर्षित करने वाली), स्वर्ण और रजत की मालाओं से सुसज्जित, चंद्रमा के समान प्रकाशमान, स्वर्णमयी महालक्ष्मी को मेरे लिए आहूत करें (बुलाएं)।

विस्तृत आध्यात्मिक व्याख्या एवं शास्त्रीय विवेचन

मंत्र का गूढ़ रहस्य एवं साधना विधि

मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता

सनातन वैदिक परंपरा में 'श्री सूक्तम' को साक्षात भगवती महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने का सर्वोच्च और अचूक साधन माना गया है। यह दिव्य स्तोत्र ऋग्वेद के परिशिष्ट (खिलान) से लिया गया है। ऋग्वेद के श्रीसूक्त में कुल सोलह ऋचाएं हैं, जो जगत जननी महालक्ष्मी के विभिन्न स्वरूपों, उनके सौंदर्य, उनकी महिमा और साधक पर उनकी कृपा के विधान का वर्णन करती हैं। इस सूक्त के द्रष्टा ऋषि 'आनंद कर्दम चिक्लीत कर्दमाश्च' मंत्रों के अनुसार आनंद, कर्दम, और चिक्लीत आदि ऋषि हैं, जो स्वयं माता लक्ष्मी के मानस पुत्र या सहयोगी ऊर्जाओं के प्रतीक हैं। इस सूक्त के देवता स्वयं श्री (महालक्ष्मी) हैं और इसके छंद त्रिष्टुप, जगती एवं अनुष्टुप आदि हैं।

वैदिक विद्वानों और तांत्रिक आचार्यों का मत है कि श्री सूक्तम केवल धन प्राप्ति का साधन नहीं है, बल्कि यह भौतिक समृद्धि के साथ-साथ आध्यात्मिक चेतना को भी उन्नत करने की एक पूर्ण साधना पद्धति है। 'श्री' शब्द का अर्थ केवल सोना-चांदी या सिक्के नहीं है, बल्कि यह परम चेतना, तेज, यश, सौंदर्य, आरोग्य और ब्रह्मविद्या का प्रतीक है। जब साधक पूरी श्रद्धा के साथ श्री सूक्तम की एक-एक ऋचा का उच्चारण करता है, तो उसके आसपास एक शक्तिशाली सकारात्मक और चुंबकीय औरा का निर्माण होता है, जो नकारात्मक ऊर्जा और गरीबी दरिद्रता को दूर भगाता है।

मूल शुद्ध मंत्र

श्री सूक्तम की प्रथम और अत्यंत महत्वपूर्ण ऋचा निम्नलिखित है, जिसका सस्वर पाठ वेदों में सर्वोपरि माना गया है:

ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्। चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥

इसके अतिरिक्त श्री सूक्तम की संपूर्ण 16 ऋचाएं इस प्रकार हैं:

  1. ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्। चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥
  2. तां म आवह जातवेदो लक्ष्म्यमनपगािनीम्। यस्यां हिरण्यं विन्देयं गां अश्वं पुरुषानहम्॥
  3. अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रमोदिनीम्। श्रियं देवीमुपयेह्ये श्रीर्मा जुषताम्॥
  4. कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्। पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोपयेह्ये श्रियम्॥
  5. चन्द्रां प्रभां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्। तामपद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे॥
  6. आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पति वृक्षोऽथ बिल्वः। तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मयान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः॥
  7. उपैतु मां देवसकीर्तिर्मणिना सह। प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे॥
  8. क्षुपिपासामलां ज्येष्ठामलक्षीं नाशयाम्यहम्। अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात्॥
  9. गन्धद्वारां दुराधर्षान्नित्यपुष्टां करीषिणीम्। ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपयेह्ये श्रियम्॥
  10. मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि। पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्र्यतां यशः॥
  11. कर्दमेन प्रजा भूता ममयि संभव कर्दम। श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्॥
  12. आपः सृजन्तु स्थ स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे। निच देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले॥
  13. आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्। सोसूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥
  14. आर्द्रां यः यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्। सोसूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥
  15. तां म आवह जातवेदो लक्ष्म्यनपगामिनीम्। यस्यां हिरण्यं प्रभूतो गां दास्योऽश्वान्रिन्देंयं पुरुषानहम्॥
  16. यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्। सूक्तं पंचदशर्चं च श्रीकः सततं जपेत्॥

पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ

श्री सूक्तम के प्रथम और प्रधान मंत्र का पद-दर-पद विश्लेषण निम्नलिखित है:

संस्कृत पदव्याकरण एवं शाब्दिक अर्थ
हिरण्यवर्णांसोने के समान चमकने वाली, स्वर्ण आभा वाली
हरिणींमन को हरने वाली या पीले वर्ण वाली
सुवर्णरजतस्रजाम्स्वर्ण (सोने) और रजत (चांदी) की मालाओं को धारण करने वाली
चन्द्रांचंद्रमा के समान शीतल और आह्लादकारी कांति वाली
हिरण्मयींपूर्णतः स्वर्णमयी, दिव्य तेज से युक्त
लक्ष्मींसौभाग्य, श्री और समृद्धि की देवी महालक्ष्मी को
जातवेदोहे जातवेद! (अग्नि देव का एक नाम, जो सब कुछ जानते हैं)
म आवहमेरे लिए आहूत करें, मेरे पास लाएं

भावार्थ: इस मंत्र में साधक अग्नि देव (जातवेद) के माध्यम से भगवती महालक्ष्मी का आह्वान करता है। अग्नि समस्त यज्ञों और आहूतियों के वाहक हैं, इसलिए अग्नि के माध्यम से माँ लक्ष्मी तक प्रार्थना पहुंचाई जाती है कि हे अग्नि देव! जिनका वर्ण स्वर्ण के समान दैदीप्यमान है, जो स्वर्ण और रजत की मालाओं से विभूषित हैं, जो चंद्रतुल्य शीतल प्रकाश से युक्त हैं, ऐसी स्वर्णमयी महालक्ष्मी को आप मेरे घर और जीवन में स्थापित करें।

विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक

किसी भी वैदिक मंत्र या सूक्त के अनुष्ठान से पूर्व उसका विनियोग और ध्यान करना अनिवार्य माना जाता है ताकि मंत्र की ऊर्जा सही दिशा में प्रवाहित हो सके।

विनियोग:
ॐ अस्य श्रीश्रीमहामंत्रस्य आनंद-कर्दम-चिक्लीत-अलक्ष्मी नाशना ऋषिः, त्रिष्टुप् जगती अनुष्टुप छंदांसि, महालक्ष्मीर्देवता, श्रीं बीजं, ह्रीं शक्तिः, क्लीं कीलकं, महालक्ष्मीप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।

ध्यान श्लोक:
पद्मास्यां पद्मपद्मां विमलदलदृशां विश्ववन्द्यां वरेण्यां,
विष्णोर्वक्षःस्थलभ्यां शतदलनिलयां विष्णुपत्नीं नमामि।
रक्ताम्भासोजनस्थां मणिमुकुटजुषां स्वर्णवर्णां सुराणां,
वन्दे लक्ष्मीं परमां सर्वकामार्थदात्रीम्॥

साधना विधि, जप नियम एवं उत्तम मुहूर्त

श्री सूक्तम का पाठ नियमित रूप से अथवा विशेष अनुष्ठान के रूप में किया जा सकता है। इसके लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है:

  • सर्वोत्तम समय: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4:00 बजे से 6:00 बजे के बीच) या प्रदोष काल (संध्या के समय) श्री सूक्तम के पाठ के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।
  • विशेष दिन: प्रत्येक शुक्रवार, पूर्णिमा तिथि, दीपावली की रात्रि और धनतेरस का दिन इस साधना के लिए अत्यंत फलदायी होता है।
  • आसन एवं दिशा: साधक को लाल रंग के ऊनी या कुशा के आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए।
  • दीपक एवं सुगंध: गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें और धूप-अग्रबत्ती जलाएं। माता को कमल का फूल या लाल गुलाब अत्यंत प्रिय है।
  • माला का चयन: स्फटिक माला, कमल गट्टे की माला या रुद्राक्ष की माला से इस सूक्त का जप किया जा सकता है।

विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति

श्री सूक्तम का नियमित और विधि-विधान पूर्वक पाठ करने से साधक को निम्नलिखित अलौकिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति: व्यापार में आ रही बाधाएं दूर होती हैं और स्थिर लक्ष्मी का वास होता है।
  • कर्ज मुक्ति: पुराने से पुराना कर्ज और आर्थिक संकट समाप्त होने लगते हैं।
  • मानसिक शांति और आकर्षण: चेहरे पर तेज, आकर्षण और मन में परम शांति की अनुभूति होती है।
  • अलक्ष्मी का नाश: दरिद्रता, आलस्य, कलह और दुर्भाग्य का नाश होता है।

सावधानियां एवं नियम

वैदिक मंत्रों के जाप में पवित्रता और अनुशासन का विशेष ध्यान रखा जाता है:

  • शरीर और मन की शुद्धावस्था का पूरा ध्यान रखें। स्नान करके स्वच्छ वस्त्र (विशेषकर लाल या पीले वस्त्र) धारण करें।
  • मांस, मदिरा, तामसिक भोजन और व्यसनों से पूर्णतः दूर रहें।
  • उच्चारण की शुद्धता का विशेष ध्यान रखें। यदि संस्कृत उच्चारण में कठिनाई हो, तो धीरे-धीरे शुद्ध अभ्यास करें।
  • अनुष्ठान काल में मन में ईर्ष्या, द्वेष या लोभ की भावना न रखें, केवल भक्ति भाव प्रधान होना चाहिए।

प्रश्न 1: क्या स्त्रियां श्री सूक्तम का पाठ कर सकती हैं?
उत्तर: हां, स्त्रियां और पुरुष दोनों ही श्री सूक्तम का पाठ कर सकते हैं। महालक्ष्मी स्त्री रूप ही हैं, अतः उनकी कृपा प्राप्ति के लिए महिलाओं द्वारा इसका पाठ अत्यंत फलदायी माना गया है।

प्रश्न 2: श्री सूक्तम का पाठ दिन में कितनी बार करना चाहिए?
उत्तर: सामान्य दिनों में प्रतिदिन 1, 3 या 11 पाठ करना श्रेष्ठ माना जाता है। विशेष अनुष्ठान में प्रतिदिन 16 पाठ या 108 आहुतियों का विधान है।

प्रश्न 3: क्या श्री सूक्तम के पाठ के साथ हवन भी करना अनिवार्य है?
उत्तर: नियमित पाठ के लिए हवन अनिवार्य नहीं है, किंतु यदि आप विशेष मनोकामना पूर्ति के लिए अनुष्ठान कर रहे हैं, तो गाय के घी और कमल गट्टे से दशांश हवन करने से पूर्ण फल मिलता है।

प्रश्न 4: श्री सूक्तम के पाठ से कर्ज से मुक्ति कैसे मिलती है?
उत्तर: श्री सूक्तम की ऋचाएं दरिद्रता और अलक्ष्मी का नाश करती हैं। इसके निरंतर पाठ से आय के नए स्रोत खुलते हैं और बुद्धि में ऐसा विवेक आता है जिससे कर्ज चुकाने के मार्ग प्रशस्त होते हैं।

जाप के सिद्ध फल व सावधानियां

पुण्य लाभ एवं साधना के महत्वपूर्ण नियम

प्राप्त होने वाले पुण्य लाभ
धन, धान्य, ऐश्वर्य, ऋण मुक्ति, कर्ज से छुटकारा और स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति
साधना में ध्यान रखने योग्य नियम
पूर्ण सात्विकता, पवित्रता और ब्रह्मचर्य का पालन करें

मंत्र से जुड़े मुख्य प्रश्न व समाधान (FAQs)

श्रद्धालुओं द्वारा पूछे जाने वाले सामान्य प्रश्न

इस पावन मंत्र का जप ब्रह्म मुहूर्त / प्रातः काल या शुक्रवार की संध्या में स्फटिक या कमल गट्टा माला से १०८ बार करना सबसे शुभ व फलदायी माना गया है।
हाँ, मानसिक जप (मानस जप) को शास्त्रों में वाचिक जप से भी अधिक प्रभावशाली और फलदायी माना गया है। इसे आप शांत चित्त होकर कभी भी कर सकते हैं।
नियमित जप से अकाल मृत्यु व नकारात्मकता का भय समाप्त होता है, मानसिक शांति व सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और इष्टदेव की असीम कृपा प्राप्त होती है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख वेदों, उपनिषदों एवं सनातन धर्मग्रंथों के उपलब्ध संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा श्रद्धालुओं के मार्गदर्शन हेतु तैयार किया गया है।

मंत्र जप के ५ स्वर्णिम नियम
शुद्धता: स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण कर पवित्र आसन पर बैठें।
दिशा: पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके जप करना सर्वोत्तम है।
माला का नियम: जप करते समय माला पर तर्जनी उंगली का स्पर्श न होने दें।
एकाग्रता: मंत्र के शब्दों के भावार्थ का हृदय में निरंतर ध्यान करें।
नियमितता: प्रतिदिन निश्चित समय और संख्या में जप करने से सिद्धि मिलती है।
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