प्रस्तावना एवं भूमिका
सनातन संस्कृति और वैदिक सनातन धर्म में नाम जप का अद्वितीय और सर्वोपरि स्थान है। कलयुग में भगवान के नाम स्मरण मात्र से ही भवसागर से तर जाने की अद्भुत सामर्थ्य छिपी है। समस्त वेदों, उपनिषदों, पुराणों और ऐतिहासिक महाकाव्यों में भगवान श्री राम का नाम और उनका तारक मंत्र मोक्ष का सीधा मार्ग बताया गया है। महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण और तुलसीदास कृत रामचरितमानस में राम नाम की महिमा का अनंत गान किया गया है। 'श्री राम तारक मंत्र' अर्थात् 'ॐ रां रामाय नमः' एक ऐसा दिव्य मंत्र है, जो न केवल भौतिक दुखों, व्याधियों और संतापों का नाश करता है, बल्कि साधक को आध्यात्मानुभूति कराते हुए परम ब्रह्म की प्राप्ति कराता है। Bhaktilok.in के इस विस्तृत और पावन लेख में हम श्री राम तारक मंत्र के हर एक पहलू, इसके सूक्ष्म रहस्यों, व्याकरणिक अर्थ, विनियोग, न्यास, ध्यान और जप विधि का संपूर्ण विवेचन प्रस्तुत कर रहे हैं।
मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता
प्रत्येक वैदिक और तांत्रिक मंत्र की अपनी एक आध्यात्मिक वंशावली होती है, जिसे उसका विनियोग कहा जाता है। श्री राम तारक मंत्र के उद्गम का संबंध सीधे तौर पर तारक ब्रह्म उपनिषद और रामरहस्य उपनिषद से जुड़ा हुआ है। इस दिव्य मंत्र के दृष्टा ऋषि स्वयं भगवान शिव हैं, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि काशी के मणिकर्णिका घाट पर स्वयं महादेव मृत व्यक्ति के कान में इसी तारक मंत्र का उपदेश देते हैं, जिससे जीव को मुक्ति मिलती है।
- ऋषि: इस मंत्र के ऋषि भगवान शिव (महेश्वर) हैं।
- छंद: इस मंत्र का छंद 'गायत्री' अथवा 'अनुष्टुप' कोटि का माना जाता है, जो वाणी और प्राण को नियंत्रित करता है।
- देवता: इसके अधिष्ठाता देवता सच्चिदानंद विग्रह, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम हैं।
- बीज मंत्र: इस मंत्र का मूल बीज 'रां' (र + आ + चंद्रबिंदु) है, जो अग्नि तत्व और तेज का प्रतीक है।
- शक्ति: माता सीता इस मंत्र की शक्ति स्वरूपा हैं।
- कीलकम: हनुमान जी इस मंत्र के कीलक को खोलने वाले अर्थात प्राणतत्व हैं।
मंत्र के उच्चारण में शुद्धता का अत्यधिक महत्व होता है। किसी भी मंत्र का प्रभाव उसकी ध्वनि तरंगों पर निर्भर करता है। श्री राम तारक मंत्र का मूल रूप निम्नलिखित है:
देवनागरी में मूल शुद्ध मंत्र:
ॐ रां रामाय नमः
अंग्रेजी लिप्यंतरण :
Om Ram Ramaya Namah
यह मंत्र अपने आप में एक पूर्ण महामंत्र है। इसमें प्रणव (ॐ) से लेकर बीज अक्षर (रां), संप्रदान कारक (रामाय) और नमस्कारात्मक पद (नमः) का अद्भुत समन्वय है जो साधक के सूक्ष्म शरीर और चक्रों को जाग्रत करता है।
श्री राम तारक मंत्र के प्रत्येक शब्द का गहरा दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थ है। आइए इसे पद-दर-पद समझें:
| पद | व्याकरणिक रूप | शाब्दिक एवं आध्यात्मिक अर्थ |
|---|---|---|
| ॐ | प्रणव अक्षर | यह संपूर्ण ब्रह्मांड का मूल नाद है, जो त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) और त्रिगुण (सत्व, रज, तम) से परे निर्गुण ब्रह्म का प्रतीक है। |
| रां | बीज मंत्र (अग्नि बीज) | यह श्री राम का अग्नि बीज है। 'र' वर्ण तेज, अग्नि और दहन शक्ति का प्रतीक है जो पापकर्मों और अज्ञान को जलाकर भस्म कर देता है। |
| रामाय | चतुर्थी विभक्ति (संप्रदान) | 'राम के लिए'। इसका अर्थ है कि मैं अपनी ऊर्जा, अपना समर्पण और अपने कर्म भगवान राम को समर्पित करता हूँ। जो रमण करे वही राम है, जो हर कण में व्याप्त है। |
| नमः | अव्यय (नमस्कार) | अहंकार का विसर्जन और पूर्ण समर्पण। 'न मम' (यह मेरा नहीं है सब कुछ भगवान का है) का भाव रखते हुए शरणागति स्वीकार करना। |
समग्र भावार्थ: 'ॐ रां रामाय नमः' का संपूर्ण भाव यह है कि हम उस अनंत चैतन्य, सच्चिदानंद स्वरूप भगवान श्री राम को बारंबार प्रणाम करते हैं, जिनके भीतर संपूर्ण ब्रह्मांड रमण करता है और जो साधक को इस संसार रूपी भवसागर से पार उतारने में पूर्ण समर्थ हैं।
जपानुष्ठान को पूर्ण फलदायी बनाने के लिए विनियोग, न्यास और ध्यान करना अत्यंत आवश्यक माना जाता है। इससे शरीर और मन में दैवीय ऊर्जा का संचार होता है।
विनियोग
दाएं हाथ में जल लेकर निम्नलिखित मंत्र बोलते हुए जमीन पर छोड़ दें:
विनियोगः अस्य श्री राम तारक महामंत्रस्य ब्रह्म ऋषिः, अनुष्टुप छन्दः, श्रीरामाचन्द्रो देवता, रां बीजं, सीता शक्तिः, हनुमान कीलकं, श्रीरामप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।
ऋष्यादि न्यास
- सिर पर हाथ रखकर कहें: ब्रह्म ऋषये नमः शिरसि।
- मुख या कंठ पर हाथ रखकर कहें: अनुष्टुप छन्दसे नमः मुखे।
- हृदय पर हाथ रखकर कहें: श्रीरामाचन्द्र देवतायै नमः हृदि।
- नाभि पर हाथ रखकर कहें: रां बीजाय नमः गुह्ये।
- दाएं पैर पर हाथ रखकर कहें: सीता शक्तये नमः पादयोः।
- बाएं पैर पर हाथ रखकर कहें: हनुमते कीलकाय नमः सर्वांगे।
ध्यान श्लोक
जप शुरू करने से पहले भगवान श्री राम के इस सुंदर स्वरूप का मानसिक ध्यान करना चाहिए:
नीलाम्बुज श्यामल कोलांग सीता समारोपित बामभागम् ।
पाणौ महासायक चाप धार्तं वमी त्वां राम रघुवंश नाथम् ॥
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं,
पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्।
वामाङ्कारूदसीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदलाभं,
नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम्॥
नियमबद्ध जप करने से साधक को अल्प समय में ही महानिर्वाण और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।
- सर्वोत्तम समय: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4:00 से 6:00 बजे) या सायं संध्या वेला। इसके अतिरिक्त दिन या रात में किसी भी समय मानसिक जप किया जा सकता है।
- दिशा: उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए।
- आसन: कुश या ऊनी (कंबल) का आसन सर्वथा श्रेष्ठ है।
- माला का चयन: तुलसी की माला इस मंत्र के जप के लिए सर्वोत्तम मानी गई है। इसके अलावा स्फटिक या रुद्राक्ष की माला का उपयोग भी किया जा सकता है।
- जप संख्या: प्रतिदिन कम से कम 1 माला (108 बार) या सामर्थ्यनुसार 3, 5, 11 माला का जप करें।
- जप के प्रकार: वैचलिक जप (उच्च स्वर में), उपांसु जप (फुसफुसा कर) और मानसिक जप (मन ही मन)। इनमें मानसिक जप की महिमा सबसे अधिक बताई गई है।
भगवान श्री राम के तारक मंत्र का नियमित और निष््टापूर्वक जप करने से साधक को अनगिनत आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- भवसागर से मुक्ति (तारक प्रभाव): जैसा कि नाम से स्पष्ट है, यह तारक मंत्र मनुष्य को जन्म-मृत्यु के चक्र और सांसारिक बंधनों से मुक्त करता है।
- मानसिक शांति व एकाग्रता: मन की चंचलता, तनाव, अवसाद और भय दूर होते हैं। मस्तिष्क में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है।
- रोग मुक्ति और आरोग्यता: राम नाम और 'रां' बीज मंत्र के प्रभाव से शारीरिक कोशिकाएं ऊर्जावान होती हैं, जिससे दीर्घायु और आरोग्य की प्राप्ति होती है।
- नकारात्मक ऊर्जा का नाश: घर और शरीर की नकारात्मक ऊर्जा, बुरी दृष्टियां, भूत-प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।
- आत्मबल और नेतृत्व क्षमता का विकास: मर्यादा पुरुषोत्तम राम के गुणों (धैर्य, पराक्रम, सत्यनिष्ठा, करुणा) का विकास साधक के भीतर स्वतः होने लगता है।
मंत्र साधना एक विज्ञान है, अतः कुछ सावधानियों का पालन करना अनिवार्य है:
- सात्विकता: जप काल के दौरान और संभव हो तो पूरे अनुष्ठान के दौरान तामसिक भोजन (मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन) का त्याग करें।
- पवित्रता: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करने के पश्चात ही जप आरंभ करें। अशुद्ध अवस्था में मानसिक जप ही किया जा सकता है।
- नियमितता: जप संख्या और समय को निश्चित रखें। बीच में नियम न बदलें।
- अहंकार का त्याग: मंत्र जप के दौरान अपनी साधना का अहंकार न करें। विनम्रता और भक्ति भाव ही सफलता की कुंजी है।
- गुप्तता: अपने जप की संख्या और अनुभवों को हर किसी के साथ साझा न करें, गुप्त रूप से किया गया जप फलदायी होता है।
श्री राम तारक मंत्र 'ॐ रां रामाय नमः' का जाप कौन कर सकता है?
इस मंत्र को करने के लिए किसी भी प्रकार के जाति, लिंग, उम्र या वर्ग का बंधन नहीं है। संसार का प्रत्येक मनुष्य, चाहे वह गृहस्थ हो या सन्यासी, इस मंत्र का जाप कर सकता है।
क्या इस मंत्र के जप के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?
सामान्य रूप से लोक कल्याण और मानसिक शांति के लिए राम नाम और इस तारक मंत्र का जप बिना गुरु दीक्षा के भी किया जा सकता है। किंतु यदि आप इसे अनुष्ठानिक सिद्धि के रूप में करना चाहते हैं, तो किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन में करना श्रेष्ठ रहता है।
तुलसी माला के अलावा क्या रुद्राक्ष पर भी यह जप किया जा सकता है?
हाँ, तुलसी की माला इस मंत्र के लिए सबसे उत्तम मानी गई है क्योंकि तुलसी भगवान राम को अतिप्रिय है, परंतु यदि तुलसी उपलब्ध न हो तो रुद्राक्ष या स्फटिक की माला का उपयोग भी किया जा सकता है।
इस मंत्र का जप कितनी बार करना चाहिए?
नित्य नियम के रूप में कम से कम 108 बार (एक माला) का जप अवश्य करना चाहिए। विशेष मनोकामना पूर्ति के लिए इसे 3, 5 या 11 माला प्रतिदिन भी बढ़ाया जा सकता है।