मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता
सनातन संस्कृति और वैदिक वांग्मय में 'श्री राम तारक मंत्र' को सर्वोपरि स्थान प्राप्त है। 'तारक' शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है जो पार लगा दे—अर्थात भवसागर के असीम दुखों, जन्म-मृत्यु के चक्र और सांसारिक बंधनों से जो जीव का उद्धार कर दे, वही तारक मंत्र है। भगवान श्री राम का यह बीज मंत्र अत्यंत शक्तिशाली और चमत्कारी है। वाल्मीकि रामायण, अध्यात्म रामायण, रामचरितमानस तथा विभिन्न उपनिषदों (जैसे रामतापनीय उपनिषद) में राम नाम की महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है।
शिव पुराण के अनुसार, स्वयं देवों के देव महादेव भगवान शिव निरंतर राम नाम का जप करते हैं। काशी में मणिकर्णिका घाट पर मरने वाले हर प्राणी के कान में भगवान शिव स्वयं तारक मंत्र का उपदेश देते हैं, जिससे जीव को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस मंत्र के ऋषि स्वयं ब्रह्मर्षि वाल्मीकि या हनुमान जी माने जाते हैं, इसका छंद 'अनुष्टुप' या विशिष्ट बीज छंद है, और इसके आधिदैविक देवता मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम हैं, जो कि साक्षात् परब्रह्म परमात्मा का ही स्वरूप हैं।
मूल शुद्ध मंत्र एवं लिपि रूपांतरण
वैदिक एवं तांत्रिक विधान में मंत्र का उच्चारण उसकी शुद्धता पर ही निर्भर करता है। श्री राम तारक मंत्र का मूल संस्कृत स्वरूप निम्नलिखित है:
देवनागरी लिपि: ॐ रां रामाय नमः
अंतर्राष्ट्रीय लिपि : Om Rāṁ Rāmāya Namaḥ
इस मंत्र में 'ॐ' प्रणव ध्वनि है जो ब्रह्मांड की आदिनाथ ध्वनि है। 'रां' बीज मंत्र है जो अग्नि और ऊर्जा का प्रतीक है, 'रामाय' चतुर्थी विभक्ति में राम के प्रति समर्पण को दर्शाता है, और 'नमः' का अर्थ अहंकार का विसर्जन और पूर्ण शरणागति है।
पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ
मंत्र के प्रत्येक अक्षर और शब्द का अपना विशिष्ट आध्यात्मिक कंपन और अर्थ होता है:
- ॐ : यह प्रणव मंत्र है जो सच्चिदानंद परमात्मा, ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों शक्तियों का समेकित रूप है।
- रां : यह श्री राम का बीज मंत्र है। 'र' वर्ण अग्नि तत्व का द्योतक है जो पापों और अज्ञान के अंधकार को जलाकर भस्म कर देता है। अनुस्वार (ं) बिंदु ब्रह्म का प्रतीक है।
- रामाय : इसका अर्थ है 'राम के लिए' अथवा 'राम को नमस्कार'। यह चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग है, जो यह दर्शाता है कि साधक अपना सर्वस्व भगवान राम को समर्पित कर रहा है।
- नमः : नमस्कार या प्रणाम। यह जीव के भीतर के अहंकार (अहम) को समाप्त कर परमपिता परमेश्वर के चरणों में झुकने की प्रक्रिया है।
समग्र भावार्थ: हे परम प्रभु श्री राम! आपके चरणों में मेरा कोटि-कोटि प्रणाम है। आप मेरे सभी प्रकार के भौतिक, दैहिक और आध्यात्मिक संतापों को दूर करें तथा मुझे इस भवसागर से पार लगाएं।
विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक
किसी भी वैदिक मंत्र के अनुष्ठान या नियमित जप से पूर्व विनियोग, न्यास और ध्यान करना अनिवार्य माना जाता है ताकि मंत्र की ऊर्जा सही दिशा में प्रवाहित हो सके।
विनियोग
दाहिने हाथ में जल लेकर निम्नलिखित मंत्र बोलते हुए जमीन पर छोड़ें:
अस्य श्री राम तारक मंत्रस्य ब्रह्म ऋषिः, अनुष्टुप छन्दः, श्रीरामाचंद्रो देवता, रां बीजं, नमः शक्तिः, रामाय कीलकम, श्री रामप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।
कर न्यास एवं अंग न्यास
अंगूठे से तर्जनी आदि उंगलियों को स्पर्श करते हुए न्यास करें:
- ॐ रां अंगुष्ठाभ्यां नमः
- ॐ रामाय तर्जनीभ्यां नमः
- ॐ नमः मध्यमाभ्यां नमः
- ॐ रां अनामिकाभ्यां नमः
- ॐ रामाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः
- ॐ नमः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः
ध्यान श्लोक
जप शुरू करने से पहले भगवान श्री राम के इस सुंदर स्वरूप का मानसिक ध्यान करें:
नीलकमल श्यामलम् कोमलाङ्गं, सीतासहितं हनुमान् सेव्यमानम्।
बाणधनुष्पाणिं कमलेक्षणं रामं, भजामि सततं तुलसीदलालंकारम्॥
अर्थात्: जो नीले कमल के समान श्यामल और कोमल अंगों वाले हैं, जिनके पास माता सीता और भक्त हनुमान विराजमान हैं, जो हाथों में धनुष-बाण धारण किए हुए हैं और जिनकी आँखें कमल के समान सुंदर हैं, उन भगवान श्री राम का मैं निरंतर भजन करता हूँ।
जप विधि, नियम एवं माला चयन
श्री राम तारक मंत्र का जप अत्यधिक सरल होते हुए भी अत्यंत शक्तिशाली है। इसके नियमों का पालन करने से अतिशीघ्र फल मिलता है:
- सर्वोत्तम समय: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4:00 बजे से 6:00 बजे तक) या प्रदोष काल (संध्या के समय) जप के लिए सर्वोत्तम है।
- दिशा: उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊन के आसन पर बैठना चाहिए।
- माला: तुलसी की माला इस मंत्र के जप के लिए सबसे उत्तम मानी जाती है। यदि तुलसी उपलब्ध न हो, तो रुद्राक्ष या स्फटिक की माला का भी प्रयोग किया जा सकता है।
- संख्या: प्रतिदिन कम से कम 1 माला (108 बार) या सामर्थ्यनुसार 3, 5 या 11 माला का जप करना चाहिए।
विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति
निरंतर और निष्ठापूर्वक श्री राम तारक मंत्र का जप करने से साधक को निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- मानसिक शांति और भय मुक्ति: अकारण भय, तनाव, अवसाद और चिंता समाप्त होती है तथा मन में अगाध शांति का संचार होता है।
- काल और मृत्यु का भय नाश: इसे तारक मंत्र कहा गया है, अतः इसके नियमित स्मरण से अकाल मृत्यु का भय और यमराज की यातनाओं से मुक्ति मिलती है।
- कर्म बंधनों से मुक्ति: पिछले जन्मों के संचित कर्मों और पापों का शमन होता है, जिससे आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
- परिवार में सुख-समृद्धि: घर-परिवार में सकारात्मक ऊर्जा, प्रेम, सौहार्द और सुख-समृद्धि का वास होता है।
सावधानियां एवं नियम
मंत्र साधना की पवित्रता बनाए रखने के लिए कुछ विशेष सावधानियों का ध्यान रखना अति आवश्यक है:
- जप के दौरान पूरी तरह से सात्विक आहार (प्याज, लहसुन, तामसिक भोजन का त्याग) का पालन करें।
- शारीरिक और मानसिक पवित्रता का विशेष ध्यान रखें। स्नान करके ही जप पर बैठें।
- जप की संख्या को गुप्त रखें और माला को हमेशा गोमुखी (थैली) के अंदर रखकर ही जपें, माला जमीन पर न गिरे।
- अस्थिर चित्त या नकारात्मक भावों के साथ जप न करें; मन में भगवान राम के प्रति पूर्ण प्रेम और समर्पण होना चाहिए।