मंत्र का उद्गम एवं वैदिक पृष्ठभूमि
सनातन वैदिक परंपरा में भगवान श्री रामचंद्र केवल एक ऐतिहासिक महापुरुष या अवतारी पुरुष ही नहीं, अपितु स्वयं परात्पर ब्रह्म, सच्चिदानंद स्वरूप और समस्त ब्रह्मांड के मूलाधार हैं। उपनिषदों में मुख्य रूप से 'रामतापनीय उपनिषद' और 'रामोत्तरतापनीय उपनिषद' में श्री राम के नाम और मंत्र को 'तारक' माना गया है। 'तारक' शब्द का व्युत्पत्तिपरक अर्थ है—'जो जीव को संसार रूपी अथांग सागर (भवसागर) से तार दे, पार करा दे।'
स्कंद पुराण और शिव पुराण के अनुसार, मोक्षदायिनी काशी नगरी (वाराणसी) में जब कोई प्राणी अपने भौतिक शरीर का त्याग करता है, तो स्वयं देवाधिदेव महादेव भगवान शिव उसके दक्षिण कर्ण (दाहिने कान) में इसी राम तारक मंत्र का उपदेश देते हैं। भगवान शिव के इस उपदेश से जीव तत्काल समस्त संचित कर्मों के बंधन से मुक्त होकर कैवल्य मोक्ष को प्राप्त होता है। इसी कारण काशी को 'तारक क्षेत्र' और इस महामंत्र को 'तारक ब्रह्म मंत्र' कहा गया है।
श्रीमद्भागवत एवं पद्म पुराण में वर्णित है कि राम नाम का एक बार किया गया निष्काम स्मरण सहस्रों विष्णु नामों के तुल्य फल प्रदान करता है। महाभारत के अनुशासन पर्व में स्वयं भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं:
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने॥
अर्थात, हे मनोरमे! मैं निरंतर 'राम, राम, राम' इस मधुर नाम में ही रमण करता हूँ। राम नाम का एक बार उच्चारण करना भगवान विष्णु के एक सहस्र (हजार) नामों के पाठ के समान पुण्यदायी है।
मूल शुद्ध मंत्र एवं ध्वन्यात्मक उच्चारण
श्री राम तारक मंत्र के मुख्य रूप से दो रूप अत्यधिक प्रसिद्ध और शास्त्रीय रूप से मान्य हैं। प्रथम पंचाक्षरी/षडाक्षरी बीज युक्त तारक मंत्र और द्वितीय त्रयोदशाक्षरी महामंत्र। यहाँ हम मुख्य रूप से अति प्रभावशाली पंचाक्षरी तारक मंत्र का विवेचन कर रहे हैं:
मुख्य तारक बीज मंत्र
ॐ रां रामाय नमः
अंतरराष्ट्रीय संस्कृत लिप्यंतरण
Oṁ Rāṁ Rāmāya Namaḥ
संबंधित त्रयोदशाक्षरी राम तारक महामंत्र
श्री राम जय राम जय जय राम
उपर्युक्त दोनों ही मंत्र साधक को परम पद की ओर ले जाने वाले हैं। 'ॐ रां रामाय नमः' मंत्र में 'रां' (Rāṁ) रामाग्नि बीज है, जो साधक के अंतःकरण के समस्त पापों, कुसंस्कारों और अज्ञान रूपी अंधकार को भस्म कर देता है।
पद-दर-पद अर्थ एवं आध्यात्मिक भावार्थ
तारक मंत्र 'ॐ रां रामाय नमः' के प्रत्येक अक्षर में संपूर्ण ब्रह्मांड की चेतना और गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य समाहित हैं। इसका पद-विश्लेषण इस प्रकार है:
| पद (शब्द) | व्याकरणिक व बीज स्वरूप | आध्यात्मिक एवं गूढ़ अर्थ |
|---|---|---|
| ॐ | प्रणव (अ-उ-म) | परब्रह्म का अनाहत नाद, सृष्टि, स्थिति और लय का मूल उद्गम। यह सर्वव्यापी चेतना का प्रतीक है। |
| रां | राम बीज (अग्नि बीज) | 'र' अक्षर पावक (अग्नि) का प्रतीक है जो पापों को भस्म करता है। 'आ' सूर्य तत्त्व है जो प्रकाश देता है। 'ं' (अनुस्वार) चंद्र तत्त्व है जो शांति प्रदान करता है। |
| रामाय | चतुर्थी विभक्ति (एकवचन) | 'श्री राम के लिए' या 'परम आनंद स्वरूप श्री राम के प्रति'। 'रमन्ते योगिनो यस्मिन् इति रामः'—अर्थात जिनमें योगी जन रमण करते हैं। |
| नमः | समर्पण पद (न + मम) | 'मेरा कुछ नहीं, सब आपका है।' अहंकार का पूर्ण विसर्जन और ईश्वर के चरणों में आत्म-समर्पण। |
'राम' शब्द का गूढ़ तांत्रिक एवं वैदिक विश्लेषण
अष्टाक्षर मंत्र 'ॐ नमो नारायणाय' और पंचाक्षर मंत्र 'ॐ नमः शिवाय' इन दो महान मंत्रों का सार-तत्त्व 'राम' शब्द में समाहित है:
- 'ॐ नमो नारायणाय' मंत्र में से यदि 'रा' (नारायणाय का द्वितीय अक्षर) निकाल दिया जाए, तो शेष बचता है 'न आय' (जिसका कोई मार्ग न हो)। अतः 'रा' ही उसका जीवन-प्राण है।
- 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र में से यदि 'मा' (शिवाय का पूर्ववर्ती 'म') निकाल दिया जाए, तो शेष बचता है 'न शिवाय' (जो कल्याणकारी न हो)। अतः 'मा' ही उसकी कल्याण शक्ति है।
इन दोनों महामंत्रों के प्राण-तत्त्व 'रा' और 'म' को मिलाकर बनता है—'राम'। इसलिए राम नाम को सनातन शास्त्र में सर्व-मंत्र-सार कहा गया है।
विनियोग, न्यास एवं ध्यान विधि
किसी भी वैदिक या तांत्रिक मंत्र का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए उसका शास्त्रोक्त विनियोग, ऋष्यादि न्यास, करन्यास, अंगन्यास और ध्यान श्लोक का ज्ञान एवं पाठ अनिवार्य होता है।
विनियोगः
दाहिने हाथ में जल लेकर निम्नलिखित संकल्प श्लोक का उच्चारण करें और जल को भूमि पर छोड़ दें:
अस्य श्रीरामतारकमन्त्रस्य ब्रह्म ऋषिः। पंक्तिश्छन्दः। श्रीरामचन्द्रो देवता। रां बीजम्। नमः शक्तिः। ॐ कीलकम्। श्रीरामचन्द्र प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः॥
ऋष्यादि न्यासः
अपने दाहिने हाथ की अँगुलियों से शरीर के निर्दिष्ट अंगों का स्पर्श करें:
- ब्रह्म ऋषये नमः — शिरसि (मस्तक पर स्पर्श करें)
- पंक्ति छन्दसे नमः — मुखे (मुख पर स्पर्श करें)
- श्रीरामचन्द्र देवतायै नमः — हृदि (हृदय पर स्पर्श करें)
- रां बीजाय नमः — गुह्ये (नाभि/मूलाधार पर स्पर्श करें)
- नमः शक्तये नमः — पादयोः (दोनों चरणों पर स्पर्श करें)
- ॐ कीलकाय नमः — सर्वांगे (संपूर्ण शरीर पर हस्त फेरें)
करन्यासः
- ॐ रां अंगुष्ठाभ्यां नमः — (दोनों अँगूठों पर अँगुलियाँ फेरें)
- ॐ रीं तर्जनीभ्यां नमः — (तर्जनी अँगुलियों का स्पर्श करें)
- ॐ रूं मध्यमाभ्यां नमः — (मध्यमा अँगुलियों का स्पर्श करें)
- ॐ रैं अनामिकाभ्यां नमः — (अनामिका अँगुलियों का स्पर्श करें)
- ॐ रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः — (कनिष्ठिका अँगुलियों का स्पर्श करें)
- ॐ रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः — (हथेलियों और उनके पिछले भाग का स्पर्श करें)
ध्यान श्लोकः
मंत्र जप आरंभ करने से पूर्व हाथ जोड़कर भगवान श्री रामचंद्र के इस कल्याणकारी स्वरूप का मन ही मन ध्यान करें:
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं।
पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्॥
वामाङ्कारूढसीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं।
नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम्॥
ध्यानाअर्थ: जिनकी भुजाएं घुटनों तक लंबी (आजानुबाहु) हैं, जो हाथ में धनुष-बाण धारण किए हुए हैं, जो पद्मासन की मुद्रा में विराजमान हैं, जिन्होंने पीतांबर वस्त्र धारण किया है, जिनके नेत्र नवीन कमल के दल की भांति विशाल और सुंदर हैं, जो प्रसन्नचित्त हैं, जिनके बाएं अंक (गोद) में भगवती सीता विराजमान हैं, जिनका वर्ण जलभरे नवीन मेघ के समान श्याम है और जो जटा मुकुट एवं विविध आभूषणों से सुशोभित हैं, ऐसे परम प्रभु श्रीरामचन्द्र जी का मैं निरंतर ध्यान करता हूँ।
जप विधि, माला एवं शुभ मुहूर्त
श्री राम तारक मंत्र का जप अति सरल, सुलभ और परम फलदायी है, किंतु नियमपूर्वक किया गया जप अतिशीघ्र सिद्ध होता है।
आवश्यक नियम एवं जप विधि:
- शुभ मुहूर्त: इस मंत्र का जप किसी भी दिन से प्रारंभ किया जा सकता है, किंतु रामनवमी, हनुमान जयंती, नवरात्रि, शिवरात्रि, दीपावली या ग्रहण काल में प्रारंभ करना अति श्रेष्ठ माना गया है। दैनिक जप हेतु ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4:00 से 6:00 बजे) सर्वोत्तम है।
- आसन एवं दिशा: जप के समय साधक को कुश या ऊन के शुद्ध आसन पर बैठना चाहिए। जप के समय मुख पूर्व दिशा या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।
- माला का चयन: राम तारक मंत्र के जप के लिए तुलसी की माला सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। तुलसी भगवान विष्णु और श्री राम को अत्यंत प्रिय है। यदि तुलसी की माला उपलब्ध न हो, तो रुद्राक्ष या स्फटिक की माला का भी प्रयोग किया जा सकता है।
- जप का प्रकार: जप मुख्य रूप से तीन प्रकार का होता है—वाचिक (बोलकर), उपांशु (होंठ हिलाकर धीमी आवाज में), और मानसिक (मन ही मन)। तारक मंत्र का 'मानसिक जप' या 'उपांशु जप' सर्वाधिक फलदायी और आध्यात्मिक ऊर्जा जागृत करने वाला माना गया है।
- संख्या: नित्य कम से कम 108 बार (1 माला) जप अवश्य करना चाहिए। विशेष अनुष्ठान हेतु 11, 21, या 125 मालाओं का नियम लिया जा सकता है।
विशिष्ट आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ
शास्त्रों के अनुसार श्री राम तारक मंत्र का निरंतर अभ्यास साधक के जीवन में अभूतपूर्व परिवर्तन लाता है:
- भवबंधन एवं मोक्ष की प्राप्ति: जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, यह तारक मंत्र जीव को संसार के पुनरपि जननं पुनरपि मरणं के चक्र से मुक्त करके सायुज्य मोक्ष प्रदान करता है।
- मानसिक शांति व अवसाद से मुक्ति: 'रां' बीज मंत्र की ध्वनि मस्तिष्क के तंत्रिका तंत्र को शांत करती है। चिंता, भय, अनिद्रा और अवसाद जैसी समस्याओं का स्थायी समाधान होता है।
- समस्त पापों का विनाशन: 'रामतापनीय उपनिषद' के अनुसार, राम नाम के उच्चारण मात्र से जन्मांतर के संचित पाप-कर्म भस्म हो जाते हैं।
- आत्मबल एवं अभयता: हनुमान जी महाराज ने स्वयं राम नाम के बल पर ही अक्षय कुमार का वध किया और अथांग समुद्र को लांघा था। यह मंत्र साधक में असीम आत्मबल, साहस और निर्भयता का संचार करता है।
- सर्व ग्रह दोष निवारण: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, राम नाम का जप करने वाले साधक को सूर्य, मंगल, और शनि ग्रह (शनि की साढ़ेसाती व ढैय्या) के दुष्परिणामों का सामना नहीं करना पड़ता। सूर्य वंश के कुलदीपक श्री राम की कृपा से सूर्य ग्रह बलिष्ठ होता है।
- रोग एवं नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा: इस मंत्र के जप से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का विस्तार होता है, जिससे तंत्र-मंत्र, भूत-प्रेत, नजर दोष और असाध्य रोगों से सुरक्षा मिलती है।
महत्वपूर्ण सावधानियां एवं नियम
यद्यपि राम नाम सर्वसुलभ और कल्याणकारी है, फिर भी तारक मंत्र की साधना में निम्नलिखित सावधानियों का पालन करना श्रेयस्कर है:
- सात्विक जीवनशैली: जप काल के दौरान पूर्णतः सात्विक भोजन ग्रहण करें। मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज आदि तामसिक पदार्थों का पूर्ण त्याग करें।
- आचरण की पवित्रता: परनिंदा (दूसरों की बुराई करना), असत्य भाषण, और परस्त्री/परपुरुष के प्रति कामुक विचारों से बचें। मन की पवित्रता जप का मूल आधार है।
- माला की गोपनीयता: जप करते समय जपमाला गोमुखी के अंदर होनी चाहिए। जप की माला को किसी अन्य व्यक्ति को न दें और न ही उसे नग्न अवस्था में दिखाएं।
- निरंतरता: यदि आपने प्रतिदिन निश्चित संख्या में जप का संकल्प लिया है, तो स्थान और समय को यथासंभव निश्चित रखें। अनुष्ठान के दौरान नियम खंडित न होने दें।