मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता
सनातन सनातन धर्म में श्री राधा और कृष्ण का युगल स्वरूप केवल दो अलग-अलग दिव्य विग्रहों का नाम नहीं है, बल्कि यह पराशक्ति और पराब्रह्म का अभिन्न एवं रसराज स्वरूप है। वेद, उपनिषद, पुराण और विशेषकर नारद पंचरात्र, गर्ग संहिता तथा ब्रह्मवैवर्त पुराण में श्री राधा-कृष्ण की युगल उपासना को मोक्ष से भी परे 'पंचम पुरुषार्थ' अर्थात 'प्रेम भक्ति' या 'महाभाव' की संज्ञा दी गई है।
जब हम श्री राधा कृष्ण युगल मंत्र की बात करते हैं, तो इसमें 'ॐ' primordial sound (प्रणव) के साथ महालक्ष्मी बीज 'श्रीं' और राधारानी के अहोभाव का अर्पण 'स्वाहा' मंत्र को एक महाविद्यै रूप प्रदान करता है। इस मंत्र के ऋषि श्री शुकदेव जी अथवा नारद मुनि माने जाते हैं। इसका छंद गायत्री या अनुष्टुप कोटि का है और इसके आराध्य देव स्वयं निकुंजेश्वर श्री राधा-कृष्ण हैं। इस मंत्र के माध्यम से साधक अपने हृदय में वृंदावन के नित्य विहार का अनुभव करता है।
मूल शुद्ध मंत्र एवं लिप्यंतरण
साधना मार्ग में मंत्र की शुद्धि का अत्यंत महत्व है। उच्चारण की एक छोटी सी त्रुटि भी साधना के फल को प्रभावित कर सकती है। अतः नीचे इस दिव्य मंत्र का देवनागरी और रोमन लिप्यंतरण दिया जा रहा है:
देवनागरी मूल मंत्र: ॐ श्रीं राधायै स्वाहा
रोमन लिप्यंतरण : Om Shrim Radhayai Svaha
यह मंत्र अत्यंत तीव्र प्रभाव वाला बीज मंत्रात्मक युगल मंत्र है, जो साधक के अंतःकरण के समस्त कषाय-कल्मष को धोकर वहां प्रेम रस की धारा प्रवाहित कर देता है।
पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ
इस मंत्र के प्रत्येक शब्द का अपने आप में विशाल दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थ है:
- ॐ : यह ब्रह्मांड का अनाहत नाद है, जो परमात्मा के निराकार और साकार दोनों रूपों को जोड़ता है। यह चेतना का सर्वोच्च शिखर है।
- श्रीं : यह महालक्ष्मी और महाशक्ति का बीज मंत्र है। यहाँ 'श्रीं' का तात्पर्य श्री राधारानी से है, जो समस्त ऐश्वर्य, सौंदर्य, माधुर्य और भगवत्प्रेम की अधिष्ठात्री देवी हैं।
- राधायै : चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग यह दर्शाता है कि यह समर्पण का भाव है। 'राधा के लिए' अर्थात् अपना सर्वस्व श्री राधा चरणों में समर्पित करना।
- स्वाहा : हविष्य की तरह अपनी अहंकार, वासना और वृत्तियों को आराध्य के चरणों में आहुति देना तथा पूर्ण आत्म-समर्पण करना।
समग्र भावार्थ: हे महालक्ष्मी स्वरूपा, निखिल ब्रह्मांड की आराध्य, श्री कृष्ण की प्राणप्रिया श्री राधारानी! मैं अपनी समस्त वृत्तियों, अहंकार और मन को आपके चरणों में समर्पित करता हूँ। कृपया मुझे अपनी अहैतुरी कृपा और युगल प्रेम रस का अधिकारी बनाएं।
विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक
किसी भी सात्विक मंत्र के अनुष्ठान से पूर्व विनियोग और न्यास करना अनिवार्य माना जाता है ताकि साधना ऊर्जा संतुलित रहे।
विनियोग
स्य मन्त्रस्य श्रीब्रह्मा ऋषिः, गायत्री छन्दः, श्रीराधा-कृष्णो देवता, श्रीं बीजम्, स्वाहा शक्तिः, मम समस्त-मनोरथ-सिद्धये जपे विनियोगः।
ध्यान श्लोक
ध्यायेत् वृंदारण्याम सुरतरुतले स्थूलहीरप्रभाभां,
श्यामेन प्रेमासक्तं करकिसलयितं वेणुवाद्यप्रवीणम्।
राधावक्षःस्थलीस्थं मणिगणभूषितं पीतवासं नमामि,
युग्मं रूपं मुरारेः प्रमदसुखकरं नित्यलीलाविलासम्॥
ध्यान का भाव: साधक को मानसिक रूप से यह ध्यान करना चाहिए कि वृंदावन के कल्पवृक्ष के नीचे रत्नजड़ित सिंहासन पर श्री राधा और कृष्ण विराजमान हैं। श्यामसुंदर वंशी बजा रहे हैं और राधारानी उनके प्रेम में तल्लीन हैं। दोनों के अंगों की कांति विद्युत और नीलमणि के समान आलोकित है।
जप विधि व नियम
इस मंत्र की सिद्धि और साधना के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना परम आवश्यक है:
- समय: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4:00 से 6:00 बजे तक) या संध्याकाल (गोधूलि बेला) में यह जप सर्वाधिक फलदायी होता है।
- माला: श्री राधा-कृष्ण की उपासना में केवल और केवल **तुलसी की माला** का ही प्रयोग करना चाहिए। रुद्राक्ष या स्फटिक माला इस विशेष युगल मंत्र के लिए निषेध मानी गई है।
- दिशा: साधक का मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। आसन ऊनी या कुशा का होना चाहिए।
- संख्या: नित्य कम से कम 108 बार (एक माला) या 5 माला का जप करना चाहिए। अनुष्ठान काल में सवा लाख मंत्रों का पुरश्चरण किया जाता है।
विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति
इस युगल मंत्र की साधना करने वाले साधक को अलौकिक फलों की प्राप्ति होती है:
- मानसिक शांति व आनंद: सांसारिक दुखों, चिंताओं और अवसाद से मुक्ति मिलती है और चित्त सदा आनंदित रहता है।
- भक्ति रस की प्राप्ति: हृदय में निष्काम और अनन्य प्रेम का उदय होता है। भक्त को मीरा, सूरदास और चैतन्य महाप्रभु जैसी भक्ति की झलक मिलने लगती है।
- पारिवारिक सुख व दाम्पत्य सौहार्द: घर में कलह समाप्त होती है, पति-पत्नी के संबंध मधुर होते हैं और परिवार में प्रेम का वातावरण बनता है।
- अंतिम गति: जीवन के अंत में साधक को गोलोक धाम में श्री राधा-कृष्ण के नित्य निकुंज की प्राप्ति होती है।
सावधानियां एवं नियम
साधना मार्ग में शुद्धि और नियमों का पालन रीढ़ की हड्डी के समान है:
- साधक को साधना काल में पूर्णतः सात्विक (प्याज, लहसुन, तामसिक भोजन का त्याग) रहना चाहिए।
- ब्रह्मचर्य का कठोरता से पालन करना आवश्यक है।
- किसी के प्रति द्वेष, ईर्ष्या या कटु वचन बोलने से बचना चाहिए, क्योंकि राधारानी करुणा की मूर्ति हैं और क्रूर हृदयों में उनका वास नहीं होता।
- माला को हमेशा गोमुखी (गौमुखी थैली) के अंदर रखकर ही जप करें, माला को खुले में जमीन पर न रखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस मंत्र का जाप कौन कर सकता है?
यह मंत्र सार्वभौमिक है। स्त्री, पुरुष, गृहस्थ, वानप्रस्थी या संन्यासी कोई भी श्रद्धावान व्यक्ति गुरु के मार्गदर्शन में या सात्विक भाव से इस मंत्र का जाप कर सकता है।
क्या इस मंत्र के लिए दीक्षा लेना अनिवार्य है?
यदि आप इसे लोक-कल्याण, मानसिक शांति और नित्य भक्ति के रूप में जप रहे हैं तो दीक्षा अनिवार्य नहीं है, किंतु यदि आप सिद्ध करना चाहते हैं तो किसी योग्य गुरु से मंत्र दीक्षा लेना श्रेष्ठ रहता है।
तुलसी माला के अलावा क्या अन्य माला का उपयोग हो सकता है?
नहीं, श्री राधा-कृष्ण और विष्णु अवतारों की उपासना में तुलसी माला ही सर्वश्रेष्ठ और एकमात्र प्रामाणिक मानी गई है।
जप के समय मन भटकने पर क्या करें?
मन का स्वभाव चंचल है। ऐसे में जप की गति धीमी करके अपना ध्यान श्री राधा-कृष्ण के विग्रह या उनके चरणों पर केंद्रित करें। ॐ श्रीं राधायै स्वाहा का मानसिक जप भी अत्यंत प्रभावी होता है।