मुख्य पृष्ठ / मंत्र संग्रह / Mantra / श्री प्रत्यंगिरा देवी मंत्र - ॐ अपराजितायै विद्महे शत्रु निषूदिल्यै धीमहि तन्नो शक्तिः प्रचोदयात् घोर शत्रु बाधा व तंत्र दोष निवारण
माँ भगवती शक्ति कृपा · माँ प्रत्यंगिरा Mantra

श्री प्रत्यंगिरा देवी मंत्र - ॐ अपराजितायै विद्महे शत्रु निषूदिल्यै धीमहि तन्नो शक्तिः प्रचोदयात् घोर शत्रु बाधा व तंत्र दोष निवारण

श्री प्रत्यंगिरा देवी मंत्र के विधि-विधान, विनियोग, न्यास, ध्यान और संपूर्ण पाठ के साथ घोर शत्रु बाधा व तंत्र दोष निवारण का विस्तृत मार्गदर्शक।

इष्ट देव माँ प्रत्यंगिरा
शास्त्र स्रोत वैदिक सनातन धर्मग्रंथ एवं संहिता
उत्तम जप समय मध्य रात्रि या ब्रह्म मुहूर्त
अनुशंसित माला रुद्राक्ष अथवा स्फटिक माला

मूल संस्कृत महामंत्र

शुद्ध शास्त्रीय पाठ एवं उच्चारण स्वरूप

॥ ॐ तत्सत् · सिद्ध वैदिक महामंत्र ॥
ॐ अपराजितायै विद्महे शत्रु निषूदिल्यै धीमहि तन्नो शक्तिः प्रचोदयात्
सरल हिंदी भावार्थ:

हम अपराजिता स्वरूपा माँ प्रत्यंगिरा को जानते हैं, शत्रुओं का नाश करने वाली देवी का ध्यान करते हैं। वह शक्ति स्वरूपा हमें प्रेरणा और बल प्रदान करें।

विज्ञापन · प्रायोजित सामग्री
Google AdSense / प्रायोजित विज्ञापन स्थान (Responsive Display Unit)

विस्तृत आध्यात्मिक व्याख्या एवं शास्त्रीय विवेचन

मंत्र का गूढ़ रहस्य एवं साधना विधि

मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता

सनातन धर्म और शाक्त परंपरा में माँ प्रत्यंगिरा को अत्यंत उग्र, प्रचंड और परम शक्तिशाली महाविद्या के रूप में पूजा जाता है। इन्हें नरसिंह-प्रिया और प्रत्यंगिरा देवी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान नरसिंह ने हिरण्यकशिपु का वध करने के बाद भी उनका क्रोध शांत नहीं हुआ और ब्रह्मांड में प्रलय की स्थिति उत्पन्न होने लगी, तब भगवान शिव ने शरभांग रूप धारण किया। इसके बावजूद जब क्रोध शांत नहीं हुआ, तब दिव्य शक्ति ने 'प्रत्यंगिरा' रूप में प्रकट होकर भगवान नरसिंह के उग्र तेज को शांत किया।

प्रत्यंगिरा साधना मूल रूप से तांत्रिक, वैदिक और शाक्त परंपराओं का एक अत्यंत गोपनीय और शक्तिशाली अंग है। जो साधक घोर शत्रु बाधा, ब्लैक मैजिक (काला जादू), तंत्र दोष, बुरी नजर, या अदृश्य नकारात्मक ताकतों से पीड़ित होते हैं, उनके लिए माँ प्रत्यंगिरा की साधना अचूक औषधि का कार्य करती है। इस मंत्र के ऋषि, छंद और देवता का स्मरण करने से साधना में सिद्धि और सुरक्षा कवच प्राप्त होता है।

कंप्लीट संस्कृत मंत्र एवं फोनेटिक ट्रांसलिटेरेशन

यहाँ माँ प्रत्यंगिरा का अत्यंत पावन और वेदोक्त गायत्री मंत्र प्रस्तुत है, जो साधक को सभी प्रकार के भय से मुक्त करता है:

ॐ अपराजितायै विद्महे शत्रु निषूदिल्यै धीमहि तन्नो शक्तिः प्रचोदयात्

फोनेटिक अंग्रेजी रूपांतरण :
Om Aparajitayai Vidmahe Shatru Nishudilyai Dhimahi Tanno Shaktih Prachodayat

पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ

इस दिव्य मंत्र का प्रत्येक शब्द गहन आध्यात्मिक और दार्शनिक अर्थ समेटे हुए है:

  • ॐ: प्रणव मंत्र, ब्रह्मांड की आद्य ध्वनि और परमात्मा का प्रतीक।
  • अपराजितायै: जिसे कभी पराजित न किया जा सके, जो सर्वजयी और अजेय हैं।
  • विद्महे: हम जानते हैं या जिनका हम साक्षात्कार करते हैं।
  • शत्रु: आंतरिक (काम, क्रोध, लोभ, मोह) और बाह्य (विरोधी, गुप्त शत्रु) शत्रु।
  • निषूदिल्यै: शत्रुओं का पूरी तरह से नाश करने वाली, उनका मर्दन करने वाली।
  • धीमहि: हम ध्यान करते हैं, अपनी बुद्धि को उनकी ओर केंद्रित करते हैं।
  • तन्नो: वे हमारी।
  • शक्तिः: आदिशक्ति, महामाया, ब्रह्मांडीय ऊर्जा।
  • प्रचोदयात्: हमें प्रेरित करें, हमारी बुद्धि और चेतना को जागृत करें।

समग्र भावार्थ: हम अजेय स्वरूपा माँ अपराजिता (प्रत्यंगिरा) को जानते हैं। उन शत्रुओं का समूल नाश करने वाली देवी का हम ध्यान करते हैं। वह महाशक्ति हमें सही बुद्धि और शक्ति प्रदान करें ताकि हम हर प्रकार की बाधा पर विजय प्राप्त कर सकें।

विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक

किसी भी मंत्र के अनुष्ठान से पहले विनियोग और न्यास करना अनिवार्य माना जाता है जिससे ऊर्जा का सही प्रवाह होता है।

विनियोग

अस्य श्री प्रत्यंगिरा गायत्री मंत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, गायत्री छंदः, प्रत्यंगिरा देवता, शत्रु-बाधा-निवारणार्थे जपे विनियोगः।

ऋषि-छंद-देवता स्मरण

  • ऋषि: ब्रह्मा
  • छंद: गायत्री
  • देवता: श्री प्रत्यंगिरा देवी

ध्यान श्लोक

सिंहासनगतां दिव्यां श्यामाङ्गीं घोररूपिणीम्।
खङ्गं च त्रिशूलं च डमरुं च दधतीम् कराः॥
प्रेतासनस्थितां घोरां मुण्डमाला-विभूषिताम्।
प्रत्यंगिरां महाशक्तिं भजे शत्रु-विनाशनीम्॥

ध्यान का अर्थ: जो सिंह पर आसीन हैं, जिनकी कांति श्याम वर्ण की है और जिनका रूप अत्यंत घोर और प्रचंड है, जो हाथों में खंग, त्रिशूल और डमरू धारण करती हैं, जो प्रेतासन पर विराजमान हैं और मुण्डमाला से विभूषित हैं, ऐसी महाशक्ति माँ प्रत्यंगिरा का हम शत्रुओं का नाश करने के लिए भजन करते हैं।

जप विधि व नियम

प्रत्यंगिरा साधना अत्यंत संवेदनशीलता और अनुशासन की मांग करती है। इसके लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए:

  • जप संख्या: प्रतिदिन कम से कम 1 माला (108 बार) या विशेष अनुष्ठान में 11 माला का जप करना चाहिए।
  • माला का चयन: रुद्राक्ष या स्फटिक की पवित्र माला का उपयोग करें।
  • शुभ समय: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 3 बजे से 5 बजे के बीच) अथवा मध्य रात्रि का समय इस मंत्र के लिए सबसे उत्तम माना जाता है।
  • दिशा: साधना के समय उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए।
  • आसन: ऊनी या कुशा का पवित्र आसन प्रयोग करें।

विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति

माँ प्रत्यंगिरा के इस मंत्र के निरंतर जप और अनुष्ठान से साधक को निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • शत्रु बाधा का शमन: ज्ञात और अज्ञात शत्रुओं द्वारा रचे गए सभी षड्यंत्र निष्फल हो जाते हैं।
  • तंत्र दोष निवारण: काला जादू, बुरी नजर, प्रेत बाधा, और किसी भी प्रकार की तांत्रिक क्रिया का प्रभाव तुरंत समाप्त होता है।
  • नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा: घर और शरीर के चारों ओर एक शक्तिशाली सुरक्षा कवच का निर्माण होता है।
  • मानसिक दृढ़ता: भय, अवसाद और हीन भावना दूर होकर अदम्य साहस और आत्मविश्वास की वृद्धि होती है।

सावधानियां एवं नियम

यह उग्र देवी का मंत्र है, इसलिए पूरी सतर्कता बरतना आवश्यक है:

  • साधना काल में पूर्ण ब्रह्मचर्य और सात्विक आहार (प्याज-लहसुन रहित भोजन) का पालन करें।
  • मन में किसी के प्रति प्रतिशोध की दुर्भावना न रखें, केवल अपनी आत्म-रक्षा और कल्याण का भाव रखें।
  • मंत्र का उच्चारण स्पष्ट और शुद्ध होना चाहिए। यदि संभव हो तो किसी योग्य गुरु के सानिध्य में ही इसका बड़ा अनुष्ठान करें।
  • महिलाएं मासिक धर्म के दौरान इस उग्र मंत्र का जप मानसिक रूप से कर सकती हैं, बाह्य अनुष्ठान से बचें।
विज्ञापन · प्रायोजित सामग्री
Google AdSense / इन-आर्टिकल उत्तरदायी विज्ञापन स्थान (In-Article Unit)

जाप के सिद्ध फल व सावधानियां

पुण्य लाभ एवं साधना के महत्वपूर्ण नियम

प्राप्त होने वाले पुण्य लाभ
शत्रु विजय, तंत्र बाधा निवारण, बुरी नजर व नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा
साधना में ध्यान रखने योग्य नियम
सात्विक आहार, पूर्ण पवित्रता, और गुरु के मार्गदर्शन में जप

मंत्र से जुड़े मुख्य प्रश्न व समाधान (FAQs)

श्रद्धालुओं द्वारा पूछे जाने वाले सामान्य प्रश्न

इस पावन मंत्र का जप मध्य रात्रि या ब्रह्म मुहूर्त में रुद्राक्ष अथवा स्फटिक माला से १०८ बार करना सबसे शुभ व फलदायी माना गया है।
हाँ, मानसिक जप (मानस जप) को शास्त्रों में वाचिक जप से भी अधिक प्रभावशाली और फलदायी माना गया है। इसे आप शांत चित्त होकर कभी भी कर सकते हैं।
नियमित जप से अकाल मृत्यु व नकारात्मकता का भय समाप्त होता है, मानसिक शांति व सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और इष्टदेव की असीम कृपा प्राप्त होती है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख वेदों, उपनिषदों एवं सनातन धर्मग्रंथों के उपलब्ध संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा श्रद्धालुओं के मार्गदर्शन हेतु तैयार किया गया है।

मंत्र जप के ५ स्वर्णिम नियम
शुद्धता: स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण कर पवित्र आसन पर बैठें।
दिशा: पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके जप करना सर्वोत्तम है।
माला का नियम: जप करते समय माला पर तर्जनी उंगली का स्पर्श न होने दें।
एकाग्रता: मंत्र के शब्दों के भावार्थ का हृदय में निरंतर ध्यान करें।
नियमितता: प्रतिदिन निश्चित समय और संख्या में जप करने से सिद्धि मिलती है।
विज्ञापन · प्रायोजित
Google AdSense / प्रायोजित विज्ञापन (300x250)