मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता
सनातन हिंदू धर्म में भगवान कार्तिकेय को देव सेना का सेनापति, ज्ञान, विवेक, अदम्य पराक्रम और शौर्य का अधिष्ठाता देवता माना जाता है। दक्षिण भारत में इन्हें 'मुरुगन' या 'सुब्रह्मण्य' के रूप में सर्वोच्च आराध्य माना जाता है, जबकि उत्तर भारत में स्कन्द और कार्तिकेय के रूप में इनकी पूजा होती है। 'ॐ शरवणभावाय नमः' यह षडक्षर (छः अक्षरों वाला) महामंत्र भगवान कार्तिकेय के प्राकट्य और उनके दिव्य स्वरूप का द्योतक है। इस मंत्र का उद्गम वेदों और स्कन्द पुराण के अंतर्गत वर्णित कथाओं से जुड़ा है। जब देवताओं की रक्षा के लिए भगवान शिव के तेज से महासेनानी स्कन्द का प्राकट्य हुआ, तो उनका पालन-पोषण कृतिकाओं (कृत्तिकाओं) द्वारा शरवण (सरकंडों के वन) में हुआ। यही कारण है कि उनका एक प्रमुख नाम 'शरवणभव' पड़ा।
वैदिक परंपरा के अनुसार किसी भी मंत्र के जाप से पूर्व उसके ऋषि, छंद और देवता का स्मरण अनिवार्य माना जाता है। कार्तिकेय मूल मंत्र के ऋषि विश्वामित्र या वामदेव माने जाते हैं, इसका छंद 'गायत्री' या 'अनुष्टुप' है, और इसके अधिष्ठाता देवता स्वयं महासेनानी भगवान स्कन्द (कार्तिकेय) हैं। इस मंत्र का प्रत्येक अक्षर अपने आप में एक बीज मंत्र की शक्ति समाहित किए हुए है। साधक जब इस मंत्र का नियमित जप करता है, तो उसके भीतर छिपी हुई मानसिक और शारीरिक ऊर्जा जागृत होती है, जिससे वह जीवन की हर बाधा और शत्रु पर आसानी से विजय प्राप्त कर लेता है.
मूल शुद्ध मंत्र एवं लिपि
भगवान कार्तिकेय का यह षडक्षर मूल मंत्र अत्यंत सरल होने के बावजूद ऊर्जा का असीम स्रोत है। इसका सही उच्चारण और लेखन साधना की सफलता के लिए अत्यंत आवश्यक है।
देवनागरी लिपि में मूल मंत्र:
ॐ शरवणभावाय नमः
अंतर्राष्ट्रीय संस्कृत रोमन लिपि :
Om Śaravaṇabhavāya Namaḥ
इस मंत्र में 'ॐ' प्रणव मंत्र है जो ब्रह्मांड की मूल ध्वनि है। 'शरवणभावाय' शब्द भगवान कार्तिकेय के विशेष प्राकट्य स्थल और उनके स्वरूप को समर्पित है, और 'नमः' उनके चरणों में समर्पण का भाव व्यक्त करता है।
पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ
मंत्र के आंतरिक अर्थ को समझे बिना साधना का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। 'ॐ शरवणभावाय नमः' के प्रत्येक पद का विस्तृत आध्यात्मिक अर्थ निम्नलिखित है:
- ॐ : यह अनाहत नाद है, जो परमात्मा की सर्वव्यापकता, पवित्रता और चेतना का प्रतीक है।
- शरवण : इसका अर्थ है सरकंडे का वन , जहाँ भगवान कार्तिकेय बाल रूप में प्रकट हुए थे।
- भवाय : इसका अर्थ है उत्पन्न होने वाले, प्रकट होने वाले या सृष्टि के कल्याण हेतु अवतरित होने वाले।
- नमः : नमस्कार, प्रणाम या अपने अहंकार का पूर्ण समर्पण।
संपूर्ण भावार्थ: 'हे शरवण वन में प्रकट होने वाले, देवताओं के सेनापति, अज्ञान का नाश करने वाले और परम पराक्रमी भगवान कार्तिकेय! मैं अपने मन, वचन और कर्म से आपको सादर नमन करता हूँ। मेरे जीवन से सभी प्रकार की मानसिक दुर्बलताओं, शत्रुओं और बाधाओं का नाश कीजिए तथा मुझे ज्ञान और पराक्रम का आशीर्वाद दीजिए।'
विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक
साधना को शास्त्रसम्मत बनाने के लिए विनियोग और ध्यान का बड़ा महत्व है। जप से पहले निम्नलिखित प्रक्रिया अपनाई जाती है:
विनियोग
हाथ में जल लेकर संकल्प और विनियोग पढ़ा जाता है:
'अस्यानुष्टुप मंत्रस्य भगवान् स्कन्द ऋषिः, अनुष्टुप छंदः, शरवणभवो देवता, ॐ बीजं, नमः शक्तिः, स्वाहा कीलकं, मम बुद्धि-पराक्रम-शत्रुजय सिद्धये जपे विनियोगः।' (जल को जमीन पर छोड़ दें।)
ध्यान श्लोक
साधक को जप से पूर्व भगवान कार्तिकेय के इस दिव्य ध्यान का मानस दर्शन करना चाहिए:
शक्तिं दधानं द्विपदं त्रिनेत्रं मयूरवाहनमुदारमूर्तिम्।
सुरेन्द्रमुख्यैः परिसेव्यमानं षडाननं स्कन्दमहं भजामि॥
ध्यान का अर्थ: जो अपने हाथों में शक्ति (वेल/भाला) धारण किए हुए हैं, जिनके छह मुख और तीन नेत्र हैं, जो मयूर (मोड़) पर विराजमान हैं और जिनकी उदार मूर्ति की देवताओं द्वारा पूजा की जाती है, उन छह मुखों वाले भगवान स्कन्द का मैं ध्यान करता हूँ।
जप विधि व नियम
किसी भी मंत्र की सिद्धि के लिए उसकी विधि का कठोरता से पालन करना आवश्यक है:
- समय: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4:00 से 6:00 बजे तक) या संध्याकाल का समय सबसे उत्तम माना गया है।
- दिशा: साधक का मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए।
- आसन: कुशा या ऊन का साफ आसन प्रयोग करें। जमीन पर सीधे न बैठें।
- माला: रुद्राक्ष की माला या लाल चंदन की माला पर इस मंत्र का जाप करना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
- जाप संख्या: प्रतिदिन कम से कम 108 बार (एक माला) या अपनी श्रद्धा के अनुसार 3, 5 या 11 माला का जाप करें।
विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति
श्री कार्तिकेय मूल मंत्र के नियमित और निष्ठापूर्ण जाप से साधक को निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- बुद्धि एवं एकाग्रता में वृद्धि: छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए यह मंत्र अत्यंत फलदायी है। इससे स्मरण शक्ति और निर्णय लेने की क्षमता तीव्र होती है।
- पराक्रम एवं आत्मविश्वास: मन का डर, अज्ञात भय और हीन भावना समाप्त होती है तथा व्यक्ति में सिंह के समान साहस व पराक्रम का संचार होता है।
- शत्रुओं पर विजय: गुप्त और प्रकट शत्रुओं, विरोधियों तथा कानूनी या मानसिक बाधाओं पर विजय प्राप्त होती है।
- नेतृत्व क्षमता का विकास: भगवान कार्तिकेय सेनापति हैं, अतः इस मंत्र के प्रभाव से प्रशासनिक क्षमता, नेतृत्व गुण और समाज में मान-प्रतिष्ठा बढ़ती है।
- मंगल दोष शांति: ज्योतिषीय दृष्टि से मंगल ग्रह के नकारात्मक प्रभावों (कुजा दोष, क्रोध, दुर्घटना आदि) को शांत करने में यह मंत्र रामबाण है।
सावधानियां एवं नियम
मंत्र साधना की पवित्रता और प्रभावशीलता बनाए रखने के लिए कुछ विशेष नियमों का पालन करना अनिवार्य है:
- मंत्र जाप के दौरान शुद्धता, स्वच्छता और सात्विकता का विशेष ध्यान रखें।
- मांस, मदिरा, तामसिक भोजन और व्यसनों से दूर रहें।
- क्रोध, अहंकार और ईर्ष्या का त्याग करें, क्योंकि कार्तिकेय साधना अनुशासन और विवेक की मांग करती है।
- जाप का समय और स्थान यथासंभव एक ही रखें, इससे ऊर्जा का संचय तेजी से होता है।
- नियमितता का ध्यान रखें; बीच में माला या दिन का क्रम न तोड़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न: क्या महिलाएं श्री कार्तिकेय मूल मंत्र का जाप कर सकती हैं?
उत्तर: हाँ, महिलाएं इस मंत्र का पूर्ण श्रद्धा और विधि-विधान के साथ जाप कर सकती हैं। दक्षिण भारत में मुरुगन साधना में महिलाओं की भी विशेष सहभागिता होती है।
प्रश्न: इस मंत्र के जाप के लिए सबसे अच्छी माला कौन सी है?
उत्तर: रुद्राक्ष की माला या लाल चंदन की माला इस मंत्र के जाप के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है।
प्रश्न: क्या यह मंत्र हर कोई बिना किसी दीक्षा के जप सकता है?
उत्तर: हाँ, 'ॐ शरवणभावाय नमः' एक महामंत्र है जिसे कोई भी साधारण भक्त गुरु के मार्गदर्शन या बिना दीक्षा के भी नियमपूर्वक जप सकता है।
प्रश्न: यदि जाप संख्या छूट जाए तो क्या करें?
उत्तर: यदि किसी दिन किसी कारणवश जाप छूट जाए, तो अगले दिन अतिरिक्त जाप करके उसकी पूर्ति की जा सकती है, किंतु निरंतरता बनाए रखना सबसे उत्तम है।