मुख्य पृष्ठ / मंत्र संग्रह / Mantra / श्री कालभैरव मंत्र - ॐ भ्रं भैरवाय नमः सम्पूर्ण शत्रु नाशन व भय मुक्ति विधान
भगवान शिव कृपा · भगवान श्री कालभैरव Mantra

श्री कालभैरव मंत्र - ॐ भ्रं भैरवाय नमः सम्पूर्ण शत्रु नाशन व भय मुक्ति विधान

श्री कालभैरव मंत्र (ॐ भ्रं भैरवाय नमः) की संपूर्ण विधि, अर्थ, विनियोग, न्यास, जाप नियम और शत्रु नाश व भय मुक्ति के अचूक उपाय जानें Bhaktilok.in पर।

इष्ट देव भगवान श्री कालभैरव
शास्त्र स्रोत वैदिक सनातन धर्मग्रंथ एवं संहिता
उत्तम जप समय मध्यरात्रि (निशिथ काल) या ब्रह्म मुहूर्त
अनुशंसित माला रुद्राक्ष माला या स्फटिक माला

मूल संस्कृत महामंत्र

शुद्ध शास्त्रीय पाठ एवं उच्चारण स्वरूप

॥ ॐ तत्सत् · सिद्ध वैदिक महामंत्र ॥
ॐ भ्रं भैरवाय नमः
सरल हिंदी भावार्थ:

हे भैरव देव! आपको मेरा बारंबार प्रणाम है। मेरे जीवन के सभी शत्रुओं, बाधाओं और भयों का नाश करें।

विस्तृत आध्यात्मिक व्याख्या एवं शास्त्रीय विवेचन

मंत्र का गूढ़ रहस्य एवं साधना विधि

मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता

सनातन हिंदू धर्म में भगवान श्री कालभैरव को भगवान शिव का रौद्र, जाग्रत और अत्यंत प्रभावशाली स्वरूप माना गया है। कालभैरव की साधना और उपासना अत्यंत तीव्र फलदायी होती है। इन्हें तंत्र शास्त्र और मंत्र शास्त्र में 'काल के अधिपति' यानी समय के नियंत्रक के रूप में पूजा जाता है। कालभैरव का यह बीज मंत्र 'ॐ भ्रं भैरवाय नमः' एक अत्यंत शक्तिशाली तांत्रिक एवं वैदिक मंत्र है, जिसके निरंतर स्मरण और जप मात्र से साधक के जीवन के समस्त भय, संकट, बाधाएं और शत्रु स्वतः ही समाप्त होने लगते हैं।

कालभैरव का उद्गम पुराणों के अनुसार भगवान शिव के क्रोध से हुआ है। जब अहंकार के वशीभूत होकर ब्रह्मा जी ने शिव जी का अपमान किया, तब भगवान शिव के भ्रकुटी के मध्य भाग से महाकाल भैरव प्रकट हुए। भैरव शब्द के तीन अक्षरों में महान शक्तियों का वास है - 'भै' का अर्थ है 'भरण-पोषण', 'रव' का अर्थ है 'दुखों का नाश करने वाला', और 'व' का अर्थ है 'नई ऊर्जा और सृष्टि का संचार करने वाला'। यह मंत्र साधक को न केवल भौतिक शत्रुओं से बचाता है, बल्कि उसके भीतर छिपे आंतरिक शत्रुओं जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार का भी पूर्ण नाश करता है।

मूल शुद्ध मंत्र एवं लिप्यंतरण

सनातन परंपरा में मंत्रों की शुद्धता का विशेष महत्व है। किसी भी मंत्र का सही उच्चारण और उसकी ध्वनि तरंगें ही ब्रह्मांडीय ऊर्जा से संपर्क स्थापित करती हैं। श्री कालभैरव का यह मूल बीज मंत्र नीचे दिया गया है:

ॐ भ्रं भैरवाय नमः

अंग्रेजी लिप्यंतरण : Om Bhram Bhairavaya Namah

इस मंत्र में 'भ्रं' बीज मंत्र है, जो भैरव तत्व को जागृत करने की कुंजी है। यह बीज मंत्र साधक के मूलाधार चक्र और स्वाधिष्ठान चक्र को सक्रिय करता है, जिससे आत्मबल, निर्भीकता और मानसिक दृढ़ता की प्राप्ति होती है।

पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ

मंत्र के प्रत्येक शब्द का गहरा आध्यात्मिक और दार्शनिक महत्व होता है। आइए इस मंत्र के एक-एक शब्द का अर्थ समझें:

  • ॐ : यह ब्रह्मांड की मूल ध्वनि, प्रणव मंत्र और परब्रह्म परमात्मा का प्रतीक है। इसके उच्चारण से शरीर और मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
  • भ्रं : यह भगवान कालभैरव का मूल बीज मंत्र है। 'भ्र' ध्वनि विनाशक और सृजनकर्ता ऊर्जा का संतुलन बनाती है, जो शत्रुओं और नकारात्मक शक्तियों का शमन करती है।
  • भैरवाय : यह चतुर्थी विभक्ति का रूप है, जिसका अर्थ है 'भैरव के लिए' या 'भगवान भैरव को समर्पित'। भैरव वे हैं जो ब्रह्मांड के भरण-पोषण और भयानक संकटों से रक्षा करने में समर्थ हैं।
  • नमः : इसका अर्थ है 'नमस्कार' या 'समर्पण'। साधक अपने अहंकार को त्यागकर पूर्ण शरणागति भाव से भगवान कालभैरव के चरणों में नतमस्तक होता है।

संपूर्ण भावार्थ: हे ब्रह्मांड के संचालक, संकटमोचन और महाकाल के स्वरूप भगवान भैरव! मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। मेरे जीवन में आने वाली समस्त बाधाओं, अदृश्य शत्रुओं, भय और चिंताओं का पूर्ण रूप से नाश कीजिए और मेरी रक्षा कीजिए।

विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक

किसी भी मंत्र के अनुष्ठान को प्रारंभ करने से पहले विनियोग और न्यास करना अनिवार्य माना जाता है ताकि मंत्र की ऊर्जा सही दिशा में प्रवाहित हो सके।

विनियोग

हाथ में जल लेकर निम्नलिखित मंत्र बोलते हुए जमीन पर छोड़ दें:

असस्य श्री कालभैरव मंत्रस्य बड़वा ऋषिः, पंक्तिः छन्दः, श्री कालभैरव देवता, भ्रं बीजं, स्वाहा शक्तिः, मम सर्वापत्ति निवृत्त्यर्थे शत्रु नाशार्थे च जपे विनियोगः।

करन्यास

  • ॐ भ्रं अंगुष्ठाभ्याम् नमः
  • ॐ भैरवाय तर्जनीभ्याम् नमः
  • ॐ नमः मध्यमाभ्याम् नमः
  • ॐ भ्रं अनामिकाभ्याम् नमः
  • ॐ भैरवाय कनिष्ठिकाभ्याम् नमः
  • ॐ नमः करतलकरपृष्ठाभ्याम् नमः

ध्यान श्लोक

मंत्र जप से पूर्व भगवान कालभैरव के इस दिव्य स्वरूप का मानसिक ध्यान करना चाहिए:

नीलाम्बुज भास्वरमुग्ररूपं, त्रिनेत्रयुक्तं खड्गत्रिशूलहस्तम्।
कपालयुक्तं च दिगंबरेशं, वन्दे महाकालमजं भैरवम्॥

अर्थात: जो नील कमल के समान कांति वाले हैं, जिनका रूप अत्यंत उग्र है, जिनके तीन नेत्र हैं, जो हाथ में खड्ग और त्रिशूल धारण किए हुए हैं, जो हाथ में कपाल धारण करते हैं और दिगंबर (दिशाएं ही जिनके वस्त्र हैं) हैं, ऐसे अजन्मा महाकाल भैरव की मैं वंदना करता हूँ।

जप विधि, माला एवं सर्वोत्तम समय

श्री कालभैरव मंत्र की सिद्धि और उसके पूर्ण फल की प्राप्ति के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना अति आवश्यक है:

  • सर्वोत्तम समय: कालभैरव की साधना के लिए रात्रि का समय (विशेषकर निशीथ काल यानी रात्रि 10 बजे से लेकर मध्यरात्रि 2 बजे तक) सबसे उत्तम माना जाता है। इसके अलावा, अष्टमी तिथि (विशेषकर कालाष्टमी) और मंगलवार या रविवार का दिन इस मंत्र के जप के लिए अत्यंत फलदायी है। ब्रह्म मुहूर्त में भी इसका जप किया जा सकता है।
  • दिशा: साधना के समय साधक का मुख दक्षिण दिशा या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।
  • आसन: काले रंग का ऊनी आसन या कुशा का आसन सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
  • माला: इस मंत्र के जप के लिए रुद्राक्ष की माला या स्फटिक की माला का प्रयोग करना चाहिए। माला अभिमंत्रित होनी चाहिए।
  • जप संख्या: प्रतिदिन नित्य नियम के रूप में 108 बार (1 माला) का जप करें। किसी विशेष शत्रु बाधा या संकट निवारण के लिए 11,000 या 21,000 मंत्रों का अनुष्ठान भी किया जा सकता है।

विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति

नियमित और निष्ठापूर्वक इस मंत्र का जप करने से साधक को निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • शत्रु नाश: ज्ञात और अज्ञात शत्रुओं, विरोधियों तथा षड्यंत्रकारियों की हर चाल विफल हो जाती है और वे स्वतः शांत हो जाते हैं।
  • भय मुक्ति: मन से हर प्रकार का अज्ञात भय, भूत-प्रेत बाधा, नकारात्मक ऊर्जा और मानसिक तनाव समाप्त हो जाता है।
  • अकाल मृत्यु से रक्षा: 'मृत्युंजय' रूप में कालभैरव साधक की अकाल मृत्यु और दुर्घटनाओं से रक्षा करते हैं।
  • ग्रह दोष शांति: राहु, केतु और शनि के दुष्प्रभावों, महादशा और साढ़ेसाती के कष्टों से राहत मिलती है।
  • समृद्धि और सुरक्षा: साधक के घर-परिवार पर एक अदृश्य आध्यात्मिक सुरक्षा चक्र (कवच) बन जाता है, जिससे दरिद्रता और संकट दूर रहते हैं।

सावधानियां एवं नियम

तांत्रिक और वैदिक कालभैरव साधना करते समय कुछ विशेष नियमों का पालन करना अनिवार्य है:

  • साधना काल में पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें।
  • खान-पान में सात्विकता रखें। मांस, मदिरा, तामसिक भोजन और लहसुन-प्याज का सेवन पूर्णतः वर्जित है।
  • मन में किसी के प्रति ईर्ष्या, द्वेष या दुर्भावना रखकर यह मंत्र न जपें, अन्यथा विपरीत परिणाम मिल सकते हैं।
  • मंत्र जप की संख्या और समय की निरंतरता (नियमितता) बनाए रखें।
  • पूजा के दौरान काले या नीले रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है, जो भैरव ऊर्जा के अनुकूल होते हैं।

जाप के सिद्ध फल व सावधानियां

पुण्य लाभ एवं साधना के महत्वपूर्ण नियम

प्राप्त होने वाले पुण्य लाभ
शत्रु बाधा का नाश, अकाल मृत्यु से रक्षा, भय मुक्ति और शनि-राहु के दोषों की शांति
साधना में ध्यान रखने योग्य नियम
सात्विकता, ब्रह्मचर्य का पालन, मांस-मदिरा का पूर्ण त्याग और पवित्रता।

मंत्र से जुड़े मुख्य प्रश्न व समाधान (FAQs)

श्रद्धालुओं द्वारा पूछे जाने वाले सामान्य प्रश्न

इस पावन मंत्र का जप मध्यरात्रि (निशिथ काल) या ब्रह्म मुहूर्त में रुद्राक्ष माला या स्फटिक माला से १०८ बार करना सबसे शुभ व फलदायी माना गया है।
हाँ, मानसिक जप (मानस जप) को शास्त्रों में वाचिक जप से भी अधिक प्रभावशाली और फलदायी माना गया है। इसे आप शांत चित्त होकर कभी भी कर सकते हैं।
नियमित जप से अकाल मृत्यु व नकारात्मकता का भय समाप्त होता है, मानसिक शांति व सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और इष्टदेव की असीम कृपा प्राप्त होती है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख वेदों, उपनिषदों एवं सनातन धर्मग्रंथों के उपलब्ध संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा श्रद्धालुओं के मार्गदर्शन हेतु तैयार किया गया है।

मंत्र जप के ५ स्वर्णिम नियम
शुद्धता: स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण कर पवित्र आसन पर बैठें।
दिशा: पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके जप करना सर्वोत्तम है।
माला का नियम: जप करते समय माला पर तर्जनी उंगली का स्पर्श न होने दें।
एकाग्रता: मंत्र के शब्दों के भावार्थ का हृदय में निरंतर ध्यान करें।
नियमितता: प्रतिदिन निश्चित समय और संख्या में जप करने से सिद्धि मिलती है।
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!