मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता
सनातन संस्कृति और वैदिक अनुष्ठान परंपरा में श्री हनुमान जी को कलियुग के प्रत्यक्ष जाग्रत देवता के रूप में पूजा जाता है। हनुमान जी रुद्रावतार हैं और अष्टसिद्धि नौ निधि के दाता हैं। जब भी जीवन में घोर संकट, अस्वाभाविक भय, मानसिक अशांति या शत्रुओं का प्रकोप बढ़ता है, तब वेद और तंत्र शास्त्रों ने श्री हनुमान के मूल मंत्र की शरण लेने का निर्देश दिया है।
श्री हनुमान मूल मंत्र 'ॐ हं हनुमते नमः' एक बीज मंत्र आधारित महामंत्र है। इस मंत्र का उद्गम वैदिक ऋचाओं और सनातन तांत्रिक ग्रंथों से हुआ है। किसी भी मंत्र की पूर्ण सिद्धि के लिए उसके ऋषि, छंद, देवता और बीज का ज्ञान होना अनिवार्य माना गया है।
- ऋषि: इस मंत्र के द्रष्टा ऋषि श्रीराम भक्त हनुमान के परम उपासक ऋषिगण हैं।
- छंद: अनुष्टुप या विशिष्ट गायत्री छंद जो मंत्र में ऊर्जा का संचरण करते हैं।
- देवता: स्वयं संकटमोचन पवनसुत श्री हनुमान जी।
- बीज: 'हं' बीज मंत्र जो आकाश तत्व और अग्नि तत्व का अद्भुत संतुलन प्रदान करता है।
- शक्ति: मारुतिनंदन की महाप्राण शक्ति।
- कीलकम: मंत्र को जाग्रत करने वाली प्राण चेतना।
मूल शुद्ध मंत्र एवं लिपि
साधना के मार्ग में मंत्र का उच्चारण और उसकी वर्तनी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। एक छोटी सी अशुद्धि मंत्र के प्रभाव को क्षीण कर सकती है। अतः साधकों को देवनागरी लिपि के शुद्ध स्वरूप का ही उच्चारण करना चाहिए।