मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता
सनातन संस्कृति में 'गुरु' शब्द का अर्थ अत्यंत व्यापक और अलौकिक है। 'गु' का अर्थ अंधकार (अज्ञान) और 'रु' का अर्थ प्रकाश (ज्ञान) है। जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए, वह गुरु है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में वेद, उपनिषद और तंत्र ग्रंथों में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश से भी बढ़कर स्थान दिया गया है। गुरु पादुका मंत्र और गुरु नमस्कार मंत्र ('ॐ गुरुभ्यो नमः') वस्तुतः साधक और परमात्मा के बीच का सबसे मजबूत सेतु है।
वैदिक एवं तांत्रिक अनुष्ठानों में किसी भी मंत्र की सिद्धि और साधना से पूर्व गुरु स्मरण अनिवार्य माना गया है। बिना गुरु कृपा के कोई भी साधना सफल नहीं होती, ठीक उसी प्रकार जैसे बिना बीज के वृक्ष की उत्पत्ति असंभव है। इस मंत्र के ऋषि स्वयंभू ब्रह्मा अथवा वेदव्यास माने जाते हैं, इसका छंद अनुष्टुप या गायत्री हो सकता है, और इसके देवता स्वयं साक्षात् परब्रह्मस्वरूप सद्गुरु हैं।
मूल शुद्ध मंत्र एवं लिप्यंतरण
साधना की दृष्टि से मंत्र का उच्चारण अत्यंत शुद्ध होना चाहिए। निम्नलिखित मंत्र का जप करने से साधक के जीवन के समस्त अवरोध समाप्त हो जाते हैं:
ॐ गुरुभ्यो नमः
फनेटिक इंग्लिश लिप्यंतरण :
Om Gurubhyo Namah
पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ
इस अत्यंत संक्षिप्त किंतु महाशक्तिशाली मंत्र का प्रत्येक पद अपने भीतर अगाध आध्यात्मिक ऊर्जा समेटे हुए है:
- ॐ : यह ब्रह्मांड का मूल नाद और प्रणव मंत्र है, जो परम ब्रह्म का प्रतीक है।
- गुरुभ्यो : इसका अर्थ है 'समस्त गुरुओं के लिए' या 'गुरुओं को'। यह बहुवचन का प्रयोग है जो हमारे वर्तमान गुरु, पूर्व गुरुओं, परंपरा के सभी सिद्ध गुरुओं और जगतगुरु को नमन करता है।
- नमः : प्रणाम, नमस्कार, वंदन अथवा पूर्ण समर्पण भाव।
समग्र भावार्थ: सम्पूर्ण ब्रह्मांड के मूल आधार प्रणव 'ॐ' का उच्चारण करते हुए, मैं अपने वर्तमान सद्गुरु, अपने पारमार्थिक गुरुओं और समस्त गुरु मंडली के चरणों में अपना सर्वस्व समर्पित करते हुए बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे गुरुदेव! मेरे भीतर छिपे अज्ञान रूपी अंधकार का नाश कर अपने दिव्य ज्ञान के प्रकाश से मेरा मार्गदर्शन कीजिए।
विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक
किसी भी प्रामाणिक वैदिक या तांत्रिक मंत्र के अनुष्ठान में विनियोग, न्यास और ध्यान का विशेष महत्व होता है। यह साधक की ऊर्जा को मंत्र के साथ संरेखित करता है।
विनियोग
दाएं हाथ में जल लेकर मंत्र विनियोग का पाठ करें और जल को जमीन पर छोड़ दें:
असत्त्वस्य श्री गुरु मंत्रस्य, ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप छन्दः, सद्गुरुदेवो देवता, गुरुप्रसादसिद्धये जपे विनियोगः।
ध्यान श्लोक
जप से पूर्व सद्गुरु के इस दिव्य रूप का अपने हृदय में ध्यान करना चाहिए:
अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्। तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
जप विधि व नियम
गुरु मंत्र की साधना अत्यंत सरल किंतु अत्यंत प्रभावशाली है। इसके लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए:
- समय: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः काल 4 बजे से 6 बजे के बीच) अथवा संध्याकाल का समय सबसे उत्तम माना जाता है।
- दिशा: साधक का मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए।
- आसन: कुशा या ऊनी आसन पर बैठकर जप करना चाहिए।
- माला: स्फटिक की माला या रुद्राक्ष की माला का उपयोग करना श्रेष्ठ है।
- संख्या: प्रतिदिन कम से कम 108 बार (एक माला) या अपनी श्रद्धा के अनुसार 3, 5 या 11 माला का जप करें।
विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति
श्री गुरु पादुका मंत्र और गुरु नमस्कार मंत्र के नित्य जप से साधक को निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- आत्म साक्षात्कार : मन की वृत्तियां शांत होती हैं और साधक अपनी आंतरिक ऊर्जा का अनुभव करने लगता है।
- मानसिक शांति व स्थिरता: तनाव, चिंता और अवसाद दूर होकर मानसिक सुदृढ़ता प्राप्त होती है।
- नकारात्मक ऊर्जा का नाश: जीवन से सभी प्रकार की बाधाएं, दृष्ट, और बुरी शक्तियां दूर होती हैं।
- कर्तृृत्व शक्ति का विकास: कठिन परिस्थितियों में भी सही निर्णय लेने की क्षमता का विकास होता है।
- मोक्ष मार्ग प्रशस्त होना: जीवन के अंतिम लक्ष्य 'मोक्ष' या मुक्ति की ओर साधक की यात्रा सुगम हो जाती है।
सावधानियां एवं नियम
गुरु मंत्र के जप के दौरान निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए:
- सदाचार, सत्यनिष्ठा और सात्विक जीवन शैली का पालन करें।
- गुरु के प्रति किसी भी प्रकार की शंका या नकारात्मकता मन में न लाएं।
- अशुद्ध अवस्था में या मानसिक रूप से विचलित होने पर जप करने से बचें।
- मंत्र का उच्चारण स्पष्ट और मौन या उपांसु (धीमी आवाज में) होना चाहिए।