मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता
सनातन वैदिक धर्म में भगवान श्री गणेश को 'प्रथमे पूज्य' और 'विघ्नहर्ता' के रूप में स्थान प्राप्त है। समस्त देवी-देवताओं की वंदना से पहले गणेश जी का स्मरण किया जाता है। अथर्वशीर्ष केवल एक साधारण स्तोत्र नहीं है, अपितु यह अथर्ववेद के अंतर्गत आने वाला एक अत्यंत रहस्यमयी और शक्तिशाली उपनिषद है, जिसे 'गणेशोपनिषद' भी कहा जाता है। इसके ऋषि 'गणक' ऋषि हैं, छंद 'निचृद्गायत्री' एवं अन्य छंद हैं, और देवता 'महागणपति' हैं।
इस पवित्र ग्रंथ का उद्गम वेदों के गूढ़ रहस्यों से जुड़ा हुआ है। 'अथर्वशीर्ष' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है - 'अथर्व' (जिसका अर्थ है शांत, स्थिर और वेदों का एक भाग) और 'शीर्ष' (जिसका अर्थ है मस्तक या सर्वोच्च)। इस प्रकार, यह वेदों के मस्तक पर विराजमान सर्वोच्च ज्ञान है जो मनुष्य को अज्ञान के अंधकार से निकालकर ब्रह्म ज्ञान की ओर ले जाता है। प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों ने इस स्तोत्र के माध्यम से गणपति के निराकार और साकार दोनों स्वरूपों का अत्यंत सूक्ष्मता से वर्णन किया है।
मूल शुद्ध मंत्र
श्री गणेश अथर्वशीर्ष का संपूर्ण मूल पाठ संस्कृत में नीचे दिया गया है:
शान्ति पाठ:
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥अथर्वशीर्ष पाठ:
ॐ नमस्ते गणपतये। त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि। त्वमेव केवलं कर्तासि। त्वमेव केवलं धर्तासि। त्वमेव केवलं हर्तासि। त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि। त्वं साक्षादात्मासि नित्यम् ॥ १ ॥
ऋतं वदामि। सत्यं वदामि ॥ २ ॥
अव त्वम् मां। अव वक्तारम्। अव श्रतारम्। अव दातारम्। अव धातारम्। अवानूचानमव शिष्यम्। अव पश्चात्तात्। अव पुरस्तात्। अवोत्तारात्तात्। अव दक्षिणात्तात्। चोर्ध्वात्तादधरात्तात्। सर्वतो मां पाहि पाहि समन्तात् ॥ ३ ॥
त्वं वाङ्मयस्त्वं चिनमयं। त्वं आनन्दमयो ब्रह्मसि। त्वं सच्चिदानन्दद्वितीयोऽसि। त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ॥ ४ ॥
सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते। सर्वं जगदिदं त्वत्तः तिष्ठति। सर्वं जगदिदं त्वयि लयं गमिष्यति। सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति। त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः। त्वं चत्वारि वाक्पदानि ॥ ५ ॥
त्वं गुणत्रयातीतता। त्वं कालत्रयातीतता। त्वं देहत्रयातीतता। त्वं अवस्थात्रयातीतता। त्वं मूलधारस्थितोऽसि नित्यम्। त्वं शक्तिस्त्रयात्मकाः। त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यम्। त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुरस्मि त्वं रुद्रस्त्वं इंद्रस्त्वं अग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चन्द्रमास्त्वं ब्रह्मभूर्भुवःस्वरोम ॥ ६ ॥
गणमादिमुच्चार्य वर्णादिं तदनु। स्वरः परमध्येर्धन्दुयुक्तम्। तदन्तःक्षरं एतत् तव स्वरूपम्। गकारः पूर्वरूपम्। अकारो मध्यरूपम्। अनुस्वारश्चान्त्यरूपम्। बिन्दुरुत्तररूपम्। नादः संधानम्। संहिता सन्धिः। शैसेषा गणेशविद्या। गणक ऋषिः। निचृद्गायत्रीच्छन्दः। महागणपतिर्देवता। ॐ गं गणपतये नमः ॥ ७ ॥
एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्तो दन्ति प्रचोदयात् ॥ ८ ॥
तं एकदन्तं च हस्तिमुखं लंबोदरं च चतुर्भुजम्। पाशं च अंकुशं च अभयं वरदं च दधतं हस्तैर्दशभिर्विभूषितम्। रक्तवर्णं च लम्बोदरं च शूर्पकर्णकम्। रक्तवाससं च रक्तगंधानुलेपितैः रक्तपुष्पैः सुपूजितम्। भक्तानां कम्पिनं देवं जगत्कारणमच्युतम। प्राविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम्। एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः ॥ ९ ॥
नमो व्रातपतये। नमो गणपतये। नमः प्रमथपतये। नमस्तेऽस्तु लम्बोदरायैकदन्ताय विघ्नविनाशिने शिवसुताय श्री गणेशाय नमः ॥ १० ॥
पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ
अथर्वशीर्ष के प्रत्येक श्लोक का अर्थ अत्यंत गहरा और दार्शनिक है:
- नमस्ते गणपतये...: हे गणपतियों के स्वामी! आपको नमस्कार है। आप ही प्रत्यक्ष ब्रह्म तत्व हैं। आप ही ब्रह्मांड के रचयिता, पालक और संहारक हैं।
- ऋतं वदामि सत्यं वदामि: मैं वेदों के अनुकूल सत्य और ब्रह्मांडीय नियम की बात कह रहा हूँ, इसमें कोई संशय नहीं है।
- अव त्वम् मां...: हे प्रभु! आप मेरी रक्षा करें। वक्ता की रक्षा करें, श्रोता की रक्षा करें, दाता की रक्षा करें, और सभी दिशाओं से मेरी हर प्रकार से रक्षा करें।
- त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः...: आप वाणी के रूप, चेतना के रूप, आनंद के रूप और साक्षात् ब्रह्म हैं। आप ही सच्चिदानंद रूप और ज्ञान-विज्ञान के भंडार हैं।
- त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः...: आप ही पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हैं। आप ही चारों वेदों और वाणियों के स्रोत हैं।
- एकदन्ताय विद्महे...: यह प्रसिद्ध गणेश गायत्री मंत्र है, जिसके जप से बुद्धि और विवेक की प्राप्ति होती है।
विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक
किसी भी वैदिक मंत्र या स्तोत्र के पाठ से पूर्व उसका विनियोग और न्यास करना आवश्यक माना जाता है जिससे ऊर्जा का सही संचरण हो सके।
विनियोग:
अस्य श्रीगणपतिअथर्वशीर्षस्तोत्रमन्त्रस्य भगवान् गणक ऋषिः, निचृद्गायत्री छन्दः, महागणपतिर्देवता, ॐ गं गणपतये नमः बीजम्, शक्तिः, कीलकम्, मम सकलविघ्नशान्त्यर्थं सर्वसिद्ध्यर्थे च जपे विनियोगः।
ध्यान श्लोक:
गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलसारभक्षितम्। उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघनेश्वरपादपंकजम्॥
जप विधि व नियम
श्री गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करने के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए:
- समय: प्रातःकाल स्नान के पश्चात ब्रह्म मुहूर्त में या संध्या बेला में पाठ करना सर्वश्रेष्ठ है।
- स्थान: पूजा घर में ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) की ओर मुख करके आसन पर बैठें।
- प्रतिमा या चित्र: भगवान गणेश की शुद्ध प्रतिमा या चित्र के समक्ष घी का दीपक और धूप प्रज्वलित करें।
- संख्या: नित्य 1, 3, 5 या 11 बार पाठ करना उत्तम फलदायी होता है। संकट निवारण हेतु 108 पाठ (लघु अनुष्ठान) का विधान है।
- संकल्प: पाठ शुरू करने से पहले मन में अपनी मनोकामना का स्मरण करते हुए संकल्प लें।
विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति
अथर्वशीर्ष के अंत में इसकी फलश्रुति का वर्णन मिलता है जो इसके अचूक प्रभावों को दर्शाती है:
- जो व्यक्ति प्रतिदिन इस अथर्वशीर्ष का पाठ करता है, वह अग्नि, वायु, सूर्य और चंद्रमा के समान पवित्र और तेजस्वी हो जाता है।
- उसे किसी भी प्रकार के विघ्न, बाधा, और भय का सामना नहीं करना पड़ता।
- छात्रों को तीव्र बुद्धि, स्मरण शक्ति और विद्या की प्राप्ति होती है।
- व्यापारियों और गृहस्थों के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और ऐश्वर्य का आगमन होता है।
- अंत समय में उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
सावधानियां एवं नियम
अथर्वशीर्ष का पाठ करते समय निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखें:
- उच्चारण की स्पष्टता और शुद्धता का विशेष ध्यान रखें।
- पाठ के दौरान मन को शांत और एकाग्र रखें, इधर-उधर के विचारों से बचें।
- सात्विक आहार (प्याज-लहसुन रहित) और आचार-विचार की पवित्रता बनाए रखें।
- मांस, मदिरा और तामसिक प्रवृत्तियों से दूर रहें।
| प्रश्न | उत्तर |
|---|---|
| क्या महिलाएं गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ कर सकती हैं? | हाँ, माताएँ और बहनें श्रद्धा और पवित्रता के साथ गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ कर सकती हैं। भगवान गणेश सबकी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। |
| अथर्वशीर्ष का पाठ कितनी बार करना चाहिए? | नियमित रूप से 1 से 11 बार पाठ करना सर्वोत्तम है। विशेष सिद्धि या मनोकामना के लिए 108 पाठ का अनुष्ठान किया जाता है। |
| क्या इसके पाठ के लिए दीक्षा लेना अनिवार्य है? | नहीं, गणेश अथर्वशीर्ष एक वैदिक स्तोत्र है। इसे कोई भी सच्चे मन और श्रद्धा के साथ पढ़ सकता है। |
| किस दिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करना सबसे फलदायी है? | संकष्टी चतुर्थी, बुधवार और गणेश चतुर्थी के दिन इसका पाठ करना अत्यंत शुभ और चमत्कारिक फल देता है। |