मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता
सनातन धर्म की शाक्त परंपरा में दस महाविद्याओं का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इन दस महाविद्याओं में माता धूमावती को सातवीं शक्ति के रूप में पूजा जाता है। देवी धूमावती का स्वरूप अन्य देवियों से सर्वथा भिन्न है। वे वृद्ध, विधवा, खुले केशों वाली, श्वेत वस्त्र धारण करने वाली तथा कौवे के चिह्न वाले रथ पर आरूढ़ हैं। वे संसार के सभी प्रकार के अभाव, दारिद्रय, रोग, शोक, अमंगल और शत्रुओं का शमन करने वाली अधिष्ठात्री शक्ति हैं। तंत्र शास्त्र के ग्रंथों जैसे 'प्राणतोषिणी तंत्र' और 'मंत्रमहोदधि' में माता धूमावती की साधना को अत्यंत तीव्र और फलदायी बताया गया है।
किसी भी तांत्रिक या वैदिक मंत्र के अनुष्ठान से पूर्व उसके ऋषि, छंद, देवता और विनियोग का ज्ञान होना अनिवार्य है। श्री धूमावती महाविद्या मंत्र के ऋषि पिप्पलाद माने जाते हैं, छंद 'पंक्ति' अथवा 'अनुष्टुप' है, और देवता स्वयं भगवती धूमावती हैं। इस महाविद्या की कृपा से साधक के जीवन में आने वाली समस्त गुप्त और दृश्य शत्रु बाधाएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं। माता का धूमावती स्वरूप इस ब्रह्मांड की उस निराकार शून्य अवस्था का प्रतीक है जो प्रलय के समय शेष रहती है। जो साधक इनके इस रहस्य को समझ लेता है, वह जीवन और मरण के भय से मुक्त हो जाता है।
मूल शुद्ध मंत्र एवं लिप्यंतरण
माता धूमावती का मूल बीज मंत्र और महाविद्या मंत्र अत्यंत प्रभावशाली है। साधकों को इसका उच्चारण अत्यधिक सावधानी और शुद्धता के साथ करना चाहिए।
ॐ धूं धूमावत्यै फट्
यह मंत्र अपने आप में पूर्ण चैतन्य और ऊर्जा से भरपूर है। इसमें 'धूं' बीज मंत्र माता के धूसर (धुएँ) वर्ण और आकाश तत्व का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि 'फट' शब्द शत्रु के संहार और अवरोधों को छेदन करने का कार्य करता है।
पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ
इस महाविद्या मंत्र के प्रत्येक अक्षर और शब्द का गहरा आध्यात्मिक और तांत्रिक अर्थ है:
- ॐ : यह प्रणव मंत्र है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड की मूल ध्वनि, परमब्रह्म परमात्मा और चेतना का प्रतीक है।
- धूं : यह माता धूमावती का मूल बीज मंत्र है। 'धूम्र' का अर्थ धुआँ होता है। यह उस अवस्था को दर्शाता है जहाँ भौतिक संसार के जलने के बाद केवल सत्य और चेतना शेष रह जाती है। यह आलस्य, मोह, और अज्ञान के धुएँ को छिन्न-बिफिन्न करता है।
- धूमावत्यै : इसका अर्थ है - 'धूमावती देवी के लिए'। चतुर्थी विभक्ति का यह प्रयोग देवी को सर्वस्व समर्पित करने का भाव प्रकट करता है।
- फट : यह अस्त्र बीज है। इसका मुख्य कार्य साधक के मार्ग में आने वाली नकारात्मक ऊर्जाओं, बुरी नजर, बाधाओं और शत्रुओं का तत्काल उच्चाटन या भेदन करना है।
संपूर्ण भावार्थ: हे परमेश्वरी धूमावती माता! आप संपूर्ण ब्रह्मांड के अज्ञान, दारिद्रय, दरिद्रता और शत्रुओं का नाश करने वाली हैं। मैं आपको बारंबार नमन करता हूँ और आपके इस मंत्र का जाप करते हुए अपने समस्त आंतरिक और बाहरी शत्रुओं का विनाश चाहता हूँ। कृपा करके मेरे जीवन के सभी अभावों को दूर करें।
विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक
साधना को सिद्ध करने के लिए विनियोग और न्यास अनिवार्य अंग हैं। साधना के आरंभ में जल लेकर दाहिने हाथ में विनियोग पढ़ा जाता है और उसे जमीन पर छोड़ दिया जाता है:
विनियोग:
अस्य श्री धूमावती मंत्रस्य पिप्पलाद ऋषिः, पंक्तिः छन्दः, धूमावती देवता, धूं बीजं, फट् शक्तिः, सर्वशत्रुनाशार्थे जपे विनियोगः।
ऋष्यादि न्यास:
सिर पर पिप्पलाद ऋषये नमः, मुख में पंक्ति छंदसे नमः, हृदय में धूमावती देवतायै नमः, गुह्य में धूं बीजाय नमः, पादौ फट् शक्तये नमः।
ध्यान श्लोक:
विवर्णचंचला कृष्णा दीर्घा च मलिम्लुसा,
क्षुत्पिपासार्दिता रुक्षा निर्भया कलिप्रदा।
सूर्पहस्ता च विप्रकीर्णकचोद्वृता,
धूम्रवर्णा रथस्था तु धूमावती हरिप्रिया॥
इस ध्यान श्लोक का अर्थ है कि देवी का वर्ण विवर्ण और श्यामल है, वे लंबे शरीर वाली, मैली कुचैली, भूख-प्यास से आतुर, रुखे स्वभाव वाली, निर्भीक और कलह का नाश करने वाली हैं। उनके हाथ में सूप (अनाज साफ करने का पात्र) है, उनके केश बिखरे हुए हैं, वे धूम्र वर्ण के रथ पर आसीन हैं और भगवान विष्णु को प्रिय हैं।
जप विधि व नियम
श्री धूमावती महाविद्या की साधना अत्यंत गोपनीय और विशेष नियमों के अधीन होती है। सामान्यतः इस महाविद्या की साधना गृहस्थों के लिए विशेष विधि से और तांत्रिकों द्वारा रात्रि काल में की जाती है:
- समय: धूमावती साधना के लिए गोधूलि बेला या रात्रि का समय (विशेषकर प्रदोष काल या अमावस्या की रात्रि) सर्वोत्तम माना जाता है।
- दिशा: साधक को उत्तर या पश्चिम दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए।
- आसन: काले या नीले रंग के ऊनी आसन अथवा कुश के आसन का प्रयोग श्रेष्ठ रहता है।
- माला: रुद्राक्ष की माला अथवा शंख माला से इस मंत्र का जाप करना चाहिए।
- संख्या: प्रतिदिन कम से कम 5 माला (540 बार) या 11 माला (1188 बार) का जाप करना चाहिए। सवा लाख मंत्रों का अनुष्ठान इस मंत्र को सिद्ध करता है।
- नैवेद्य: माता को उड़द की दाल, पकौड़े, तीखी वस्तुएं या हलवे का भोग लगाया जाता है।
विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति
इस महाविद्या के अनुष्ठान और नित्य जप से साधक को अलौकिक फलों की प्राप्ति होती है:
- शत्रु बाधा का नाश: गुप्त और दृश्य शत्रु, जो षड्यंत्र रच रहे हैं, वे स्वतः पराजित हो जाते हैं। कोर्ट-कचहरी और मुकदमों में विजय मिलती है।
- दारिद्रय एवं गरीबी से मुक्ति: घर में व्याप्त लगातार आर्थिक संकट, कर्ज और दरिद्रता का नाश होता है।
- रोग एवं अकाल मृत्यु का निवारण: पुरानी बीमारियां, मानसिक अवसाद, भय और अकाल मृत्यु का संकट टल जाता है।
- आध्यात्मिक सिद्धि: साधक को वैराग्य, उच्च कोटि की अंतर्दृष्टि और तांत्रिक सिद्धियों की प्राप्ति होती है।
सावधानियां एवं नियम
ूमावती महाविद्या तीव्र ऊर्जा वाली देवी हैं, इसलिए नियमों का पालन अत्यंत सख्ती से होना चाहिए:
- साधना काल में पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- सात्विक विचारों और पवित्रता का विशेष ध्यान रखें। क्रोध, अहंकार और ईर्ष्या से दूर रहें।
- यह साधना अत्यंत गुप्त रखी जानी चाहिए। अपनी साधना या अनुभवों का प्रचार-प्रसार कभी नहीं करना चाहिए।
- यदि संभव हो तो किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही इस महाविद्या का अनुष्ठान करें।