मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता
सनातन वैदिक परंपरा में भगवान धन्वंतरि को देवों के चिकित्सक और आयुर्वेद के आदि प्रणेता के रूप में पूजा जाता है। समुद्र मंथन के दौरान कार्तिक मास की त्रयोदशी (धनतेरस) के दिन भगवान धन्वंतरि अपने हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। वे भगवान विष्णु के ही अंशावतार माने जाते हैं। जब सृष्टि में आधि, व्याधि और रोगों का प्रादुर्भाव हुआ, तब प्राणियों के कल्याणार्थ भगवान विष्णु ने धन्वंतरि के रूप में अवतार लेकर संपूर्ण आयुर्वेद ज्ञान का प्रसार किया।
किसी भी वैदिक मंत्र के यथार्थ अनुष्ठान और उसकी ऊर्जा को जाग्रत करने के लिए उसके ऋषि, छंद, देवता और बीज मंत्र का ज्ञान होना अनिवार्य माना गया है। श्री धन्वंतरि मंत्र के ऋषि भगवान धन्वंतरि स्वयं हैं, इसका छंद 'अनुष्टुप' या 'त्रिष्टुप' है और इसके आराध्य देव भगवान महाविष्णु के स्वरूप धन्वंतरि हैं। इस मंत्र के निरंतर जप से शरीर की नाड़ियों में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और प्राणशक्ति मजबूत होती है।
मूल शुद्ध मंत्र
श्री धन्वंतरि जी का यह महामंत्र वेदों और पुराणों के संकलन से प्राप्त अत्यंत प्रभावशाली आरोग्य मंत्र है। इसका शुद्ध उच्चारण साधक को शारीरिक और मानसिक दोनों स्तरों पर आरोग्यता प्रदान करता है:
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय धन्वंतरये अमृतकलशहस्ताय सर्वव्याधि विनाशाय त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णवे स्वाहा॥
इस मंत्र का अंग्रेजी लिप्यंतरण इस प्रकार है:
पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ
इस मंत्र का प्रत्येक शब्द गहन आध्यात्मिक और चिकित्सा विज्ञान से जुड़ा हुआ है। आइए इसके प्रत्येक पद का विस्तृत अर्थ समझें:
- ॐ: ब्रह्मांड की primordial ध्वनि, पराशक्ति और परब्रह्म का प्रतीक।
- नमो: मैं आदरपूर्वक नमन करता हूँ या प्रणाम करता हूँ।
- भगवते: ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य इन छह गुणों से युक्त भगवान को।
- वासुदेवाय: वसुदेव के पुत्र अथवा संपूर्ण चराचर जगत में निवास करने वाले भगवान विष्णु को।
- धन्वंतरये: आयुर्वेद के देवता और चिकित्सा के जनक भगवान धन्वंतरि को।
- अमृतकलशहस्ताय: जिनके हाथों (हस्त) में अमरता प्रदान करने वाला अमृत का कलश सुशोभित है।
- सर्वव्याधि: सभी प्रकार के शारीरिक, मानसिक और आधिभौतिक रोगों और कष्टों का।
- विनाशाय: नाश करने वाले, हरने वाले या समाप्त करने वाले को।
- त्रिलोकनाथाय: स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल - तीनों लोकों के स्वामी को।
- श्री महाविष्णवे: महाविष्णु स्वरूप को।
- स्वाहा: मैं अपनी आहुति या समर्पण पूर्ण रूप से अर्पित करता हूँ।
समग्र भावार्थ: हे त्रिलोक के नाथ, भगवान वासुदेव के स्वरूप धन्वंतरि! आपके हाथों में अमृत का कलश सुशोभित है। आप समस्त व्याधियों और रोगों का नाश करने वाले हैं। हे महाविष्णु रूप भगवान धन्वंतरि, आपको मेरा कोटि-कोटि नमन है। मैं आपकी शरण में हूँ, मेरे शरीर और मन के समस्त रोगों का हरण कीजिए।
विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक
मंत्र साधना को सिद्ध करने के लिए विनियोग और न्यास का अत्यधिक महत्व है। जप करने से पूर्व दाहिने हाथ में जल लेकर विनियोग पढ़ा जाता है:
विनियोग
अस्यानुष्टुप मन्त्रस्य भगवान धन्वंतरि ऋषिः, अनुष्टुप छन्दः, धन्वंतरिर्देवता, औषधसिद्धये जपे विनियोगः॥
करन्यास एवं हृदयादि न्यास
अंगुष्ठादि स्फुरण के लिए साधक को अपने हाथों की उंगलियों से हृदय, सिर, शिखा और नेत्रों का स्पर्श करते हुए न्यास करना चाहिए। इससे शरीर के भीतर सूक्ष्म ऊर्जा चक्र जाग्रत होते हैं और मंत्र का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।
ध्यान श्लोक
जप शुरू करने से पहले भगवान धन्वंतरि के इस दिव्य स्वरूप का मानसिक ध्यान करना अत्यंत आवश्यक है:
शंखं चक्रं जलौकां दधतममृतघटं चारुगोभीर्विमूर्च्छम्।
सूक्ष्मस्वच्छांशुकल्युं परिविलसदलं मौलिमंभोजनेत्रम्॥
कालाम्भोदोज्ज्वलांगं कटितटविलसत्पीतवस्त्राढ्यमीडे,
वन्दे धन्वन्तरिं तं निखिलमयहरं नींवलं विष्णुमीशम्॥
इस ध्यान श्लोक का अर्थ है कि चतुर्बाहु भगवान धन्वंतरि अपने हाथों में शंख, चक्र, जलौका (जोंक - जो चिकित्सीय कार्य में प्रयुक्त होती है) और अमृत से भरा कलश धारण किए हुए हैं। उनके नेत्र कमल के समान सुंदर हैं, वे पीत वस्त्र धारण किए हुए हैं और समस्त रोगों का नाश करने वाले हैं। ऐसे आदिदेव धन्वंतरि की मैं वंदना करता हूँ।
जप विधि व नियम
श्री धन्वंतरि मंत्र का अनुष्ठान करते समय निम्नलिखित नियमों का पालन करना अनिवार्य है:
- समय: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) या संध्याकाल का समय इस मंत्र के जप के लिएसर्वोत्तम माना गया है।
- स्थान: पूजा घर को स्वच्छ कर, उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठें।
- माला: स्फटिक की माला (जो शीतलता और स्वास्थ्य प्रदान करती है) अथवा रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करें।
- संख्या: प्रतिदिन कम से कम 108 बार (एक माला) इस मंत्र का जप करें। विशेष स्वास्थ्य लाभ के लिए 11,000 मंत्रों का पुरश्चरण भी किया जा सकता है।
- प्रसाद: भगवान को ताजे फल, तुलसी दल और शुद्ध जल का भोग लगाएं। यदि रोगी व्यक्ति के लिए जप किया जा रहा है, तो जल को अभिमंत्रित कर उसे पिलाया जा सकता है।
विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति
धन्वंतरि महामंत्र के नियमित और श्रद्धापूर्वक जप से साधक को अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- उत्तम स्वास्थ्य और आरोग्यता: जिद्दी और लंबे समय से चले आ रहे रोगों से मुक्ति मिलने की संभावना बढ़ती है। प्राणशक्ति मजबूत होती है।
- मानसिक शांति: तनाव, अवसाद , अनिद्रा और भय से मुक्ति मिलती है, क्योंकि यह मन को शांति प्रदान करता है।
- औषधि की प्रभावशीलता: जो लोग चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े हैं, उनके हाथों में यश और सफलता आती है तथा उनके द्वारा दी गई दवाइयां रोगियों पर शीघ्र प्रभाव डालती हैं।
- दीर्घायु और जीवन रक्षा: अकाल मृत्यु के भय का नाश होता है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
सावधानियां एवं नियम
मंत्र साधना की पूर्णता के लिए पवित्रता और अनुशासन का ध्यान रखना आवश्यक है:
- मंत्र जप के दौरान सात्विक आहार (शुद्ध शाकाहारी भोजन) का सेवन करें। लहसुन, प्याज, तामसिक भोजन और नशीले पदार्थों का पूर्ण त्याग करें।
- जप करते समय मन एकाग्र रखें और किसी प्रकार के नकारात्मक विचार मन में न लाएं।
- उच्चारण की शुद्धता का विशेष ध्यान रखें। यदि उच्चारण में संशय हो, तो गुरु या किसी योग्य विद्वान से सीखकर ही जप करें।
- महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान मानसिक रूप से मंत्र का स्मरण करना चाहिए, बाह्य अनुष्ठान से बचना चाहिए।
- प्रश्न: श्री धन्वंतरि मंत्र का जप किस दिन से शुरू करना चाहिए?
उत्तर: इस मंत्र के जप को किसी भी शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, गुरुवार, रविवार अथवा धनतेरस के दिन से शुरू करना सबसे उत्तम माना जाता है। - प्रश्न: क्या इस मंत्र का जप कोई भी सामान्य व्यक्ति कर सकता है?
उत्तर: हाँ, यह एक अत्यंत कल्याणकारी सात्विक मंत्र है। इसे कोई भी स्वस्थ या अस्वस्थ व्यक्ति अपने उत्तम स्वास्थ्य और परिवार की रक्षा के लिए कर सकता है। - प्रश्न: क्या रोगी व्यक्ति स्वयं यह मंत्र जप सकता है या कोई अन्य उसके लिए जप कर सकता है?
उत्तर: यदि रोगी व्यक्ति शारीरिक रूप से सक्षम है, तो वह स्वयं जप कर सकता है। यदि वह असमर्थ है, तो उसके परिवार का कोई सदस्य या योग्य पुरोहित उसके निमित्त संकल्प लेकर यह जप कर सकता है और जल अभिमंत्रित कर सकता है। - प्रश्न: धन्वंतरि मंत्र जप के समय किस माला का प्रयोग करना चाहिए?
उत्तर: स्वास्थ्य और शीतलता के लिए 'स्फटिक माला' सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। इसके अलावा रुद्राक्ष की माला का उपयोग भी किया जा सकता है।