मुख्य पृष्ठ / मंत्र संग्रह / Mantra / श्री धन्वंतरि मंत्र - ॐ नमो भगवते वासुदेवाय धन्वंतरये अमृतकलशहस्ताय आरोग्य मंत्र
माँ महालक्ष्मी कृपा · भगवान धन्वंतरि Mantra

श्री धन्वंतरि मंत्र - ॐ नमो भगवते वासुदेवाय धन्वंतरये अमृतकलशहस्ताय आरोग्य मंत्र

श्री धन्वंतरि मंत्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय धन्वंतरये) का संपूर्ण विधान, अर्थ, जप विधि, ध्यान और चमत्कारी लाभ हिंदी में पढ़ें।

इष्ट देव भगवान धन्वंतरि
शास्त्र स्रोत वैदिक सनातन धर्मग्रंथ एवं संहिता
उत्तम जप समय ब्रह्म मुहूर्त या प्रातः काल सूर्योदय के समय
अनुशंसित माला स्फटिक या रुद्राक्ष माला

मूल संस्कृत महामंत्र

शुद्ध शास्त्रीय पाठ एवं उच्चारण स्वरूप

॥ ॐ तत्सत् · सिद्ध वैदिक महामंत्र ॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय धन्वंतरये अमृतकलशहस्ताय सर्वव्याधिविनाशाय त्रैलोक्यनाथाय श्री महाविष्णवे स्वाहा
सरल हिंदी भावार्थ:

भगवान वासुदेव स्वरूप धन्वंतरि को नमस्कार है, जो अपने हाथों में अमृत कलश धारण किए हुए हैं, सभी रोगों के नाशक हैं, त्रैलोक्य के नाथ हैं और महाविष्णु के रूप में प्रकट हुए हैं।

विस्तृत आध्यात्मिक व्याख्या एवं शास्त्रीय विवेचन

मंत्र का गूढ़ रहस्य एवं साधना विधि

मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता

भारतीय सनातन संस्कृति में भगवान धन्वंतरि को देवराज इंद्र के चिकित्सक और आयुर्वेद के आदि प्रवर्तक के रूप में पूजा जाता है। समुद्र मंथन के दौरान जब चौदह रत्न प्रकट हुए, उनमें से अंतिम रत्न के रूप में भगवान धन्वंतरि अपने हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। वे भगवान विष्णु के ही अंशावतार माने जाते हैं। पुराणों के अनुसार, पृथ्वी पर चिकित्सा विज्ञान के प्रसार और मानव जाति को सभी प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक रोगों से मुक्त करने के लिए भगवान धन्वंतरि का अवतरण हुआ था।

वैदिक ज्योतिष और तंत्र शास्त्र में श्री धन्वंतरि मंत्र को एक महा-आरोग्य मंत्र माना गया है। इस मंत्र के ऋषि भगवान विष्णु स्वयं हैं, छंद त्रिष्टुप या अनुष्टुप है, और देवता स्वयं भगवान धन्वंतरि हैं। इस मंत्र का नियमित स्मरण करने से साधक को न केवल भौतिक शरीर बल्कि सूक्ष्म शरीर और चेतना स्तर पर भी आरोग्य की प्राप्ति होती है।

मूल शुद्ध मंत्र

भगवान धन्वंतरि का यह महामंत्र अत्यंत शक्तिशाली और चमत्कारी है। इसका उच्चारण पूर्ण शुद्धता के साथ करना चाहिए:

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय धन्वंतरये अमृतकलशहस्ताय सर्वव्याधिविनाशाय त्रैलोक्यनाथाय श्री महाविष्णवे स्वाहा

इस मंत्र का अंग्रेजी लिप्यंतरण इस प्रकार है:

पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ

इस मंत्र का प्रत्येक शब्द गहन आध्यात्मिक और दार्शनिक अर्थ समेटे हुए है। आइए इसका पद-दर-पद विश्लेषण करें:

  • ॐ: ब्रह्मांड की primordial ध्वनि, पराशक्ति और परमात्मा का प्रतीक।
  • नमो: सादर प्रणाम या नमन करना।
  • भगवते: ऐश्वर्य, यश, श्री, ज्ञान, वैराग्य और शक्ति इन छह भगों से युक्त भगवान को।
  • वासुदेवाय: समस्त चराचर जगत में निवास करने वाले भगवान वासुदेव (श्रीकृष्ण/विष्णु) को।
  • धन्वंतरये: आयुर्वेद के देवता और रोगों का नाश करने वाले भगवान धन्वंतरि को।
  • अमृतकलशहस्ताय: जिनके हाथों में अमरता प्रदान करने वाला अमृत से भरा कलश सुशोभित है।
  • सर्वव्याधिविनाशाय: सभी प्रकार की शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक व्याधियों (रोगों) का नाश करने वाले।
  • त्रैलोक्यनाथाय: तीनों लोकों (स्वर्ग, म्र्त्यु और पाताल) के स्वामी को।
  • श्री महाविष्णवे: पालनकर्ता भगवान महाविष्णु के स्वरूप को।
  • स्वाहा: इस आहुति या मंत्र रूपी निवेदन को मैं पूर्ण निष्ठा से समर्पित करता हूँ।

विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक

किसी भी मंत्र के पूर्ण अनुष्ठान से पूर्व विनियोग और ध्यान करना अत्यंत आवश्यक होता है।

विनियोग

अस्य श्री धन्वंतरि मंत्रस्य भगवान विष्णु ऋषिः, अनुष्टुप छन्दः, भगवान धन्वंतरि देवता, औषधिसिद्धये जपे विनियोगः।

ध्यान श्लोक

जप शुरू करने से पहले भगवान धन्वंतरि के इस सुंदर स्वरूप का मानसिक ध्यान करना चाहिए:

शंखं चक्रं जलौकादधतममृतघटं चारुदोर्भिचतुर्भिः,
सूक्ष्मस्वच्छातिहृद्यांशुक परिविलसन्मौलिमालोद्भोज्ज्वलम्।
अम्भोदश्यामलांगं भूतकृदनिधिं बाहुमूलप्रदीप्तम्,
ध्यायेद् धन्वंतरिं तं निखिलमयहरं नींवलं साम्बमीड्यम्॥

इस ध्यान का अर्थ है: जो अपने चार हाथों में शंख, चक्र, जलौका (जोंक जो आयुर्वेद में रक्तशोधन हेतु प्रयुक्त होती है) और अमृत कलश धारण किए हुए हैं, जिनके मस्तक पर सुंदर मुकुट और शरीर पर स्वच्छ वस्त्र शोभायमान हैं, जिनका शरीर जलद (मेघ) के समान श्याम वर्ण का है—ऐसे समस्त रोगों के नाशक भगवान धन्वंतरि का हम ध्यान करते हैं।

जप विधि व नियम

श्री धन्वंतरि मंत्र के जप के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए:

  1. शुभ समय: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4:00 से 6:00 बजे के बीच) या संध्याकाल इस मंत्र के जप के लिएसर्वोत्तम माना गया है।
  2. दिशा: साधक को उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठना चाहिए।
  3. आसन: ऊनी या कुशा का पवित्र आसन उपयोग करें।
  4. माला: स्फटिक माला या रुद्राक्ष की माला से मंत्र का जप करना अत्यंत फलदायी होता है।
  5. संख्या: प्रतिदिन कम से कम एक माला (108 बार) का जप अवश्य करें। विशेष रोगों से मुक्ति के लिए अनुष्ठान के रूप में इसे सवा लाख बार भी जपा जा सकता है।

विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति

श्री धन्वंतरि मंत्र के नियमित जप से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • उत्तम स्वास्थ्य: शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है और दीर्घकालिक रोगों से लड़ने की शक्ति मिलती है।
  • औषधीय सफलता: जो लोग चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े हैं, उनके ज्ञान और हाथों में दिव्यता तथा सफलता आती है।
  • मानसिक शांति: तनाव, डिप्रेशन, और अज्ञात भय से मुक्ति मिलती है।
  • सकारात्मक ऊर्जा: घर और कार्यस्थल की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है तथा सकारात्मक प्राण ऊर्जा का संचार होता है।
  • दीर्घायु: आयु की वृद्धि और अकाल मृत्यु के भय का निवारण होता है।

सावधानियां एवं नियम

मंत्र साधना की पवित्रता बनाए रखने के लिए इन बातों का विशेष ध्यान रखें:

  • मंत्र जप के दौरान सात्विक आहार (शुद्ध शाकाहारी भोजन) का पालन करें।
  • नशा, तामसिक वृत्तियों और क्रोध से दूर रहें।
  • जप का समय और स्थान प्रतिदिन यथासंभव एक ही रखें।
  • यदि संभव हो तो भगवान धन्वंतरि के चित्र या विग्रह के समक्ष शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
प्रश्नउत्तर
क्या इस मंत्र का जप कोई भी कर सकता है?हाँ, यह एक सार्वभौमिक आरोग्य मंत्र है। इसे कोई भी व्यक्ति अपने अच्छे स्वास्थ्य और मानसिक शांति के लिए जप सकता है।
किस माला का उपयोग करना सबसे उत्तम है?स्फटिक की माला या रुद्राक्ष की माला इस मंत्र के लिए सबसे श्रेष्ठ मानी जाती है।
क्या इस मंत्र के जप के लिए किसी विशेष दीक्षा की आवश्यकता है?सामान्य जप और आरोग्य प्राप्ति के लिए किसी गुरु दीक्षा की अनिवार्यता नहीं है, परंतु श्रद्धा और पवित्रता आवश्यक है।
क्या यह मंत्र गंभीर बीमारियों को ठीक कर सकता है?यह मंत्र आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति प्रदान करता है तथा चिकित्सा के साथ-साथ ईश्वरीय कृपा प्राप्त करने का माध्यम है। यह पारंपरिक चिकित्सा का पूरक है।

जाप के सिद्ध फल व सावधानियां

पुण्य लाभ एवं साधना के महत्वपूर्ण नियम

प्राप्त होने वाले पुण्य लाभ
उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, मानसिक शांति, औषधीय सफलता और नकारात्मक ऊर्जा का नाश
साधना में ध्यान रखने योग्य नियम
सात्विक आहार का पालन करें, जप के दौरान पवित्रता बनाए रखें और एकाग्रचित्त रहें।

मंत्र से जुड़े मुख्य प्रश्न व समाधान (FAQs)

श्रद्धालुओं द्वारा पूछे जाने वाले सामान्य प्रश्न

इस पावन मंत्र का जप ब्रह्म मुहूर्त या प्रातः काल सूर्योदय के समय में स्फटिक या रुद्राक्ष माला से १०८ बार करना सबसे शुभ व फलदायी माना गया है।
हाँ, मानसिक जप (मानस जप) को शास्त्रों में वाचिक जप से भी अधिक प्रभावशाली और फलदायी माना गया है। इसे आप शांत चित्त होकर कभी भी कर सकते हैं।
नियमित जप से अकाल मृत्यु व नकारात्मकता का भय समाप्त होता है, मानसिक शांति व सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और इष्टदेव की असीम कृपा प्राप्त होती है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख वेदों, उपनिषदों एवं सनातन धर्मग्रंथों के उपलब्ध संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा श्रद्धालुओं के मार्गदर्शन हेतु तैयार किया गया है।

मंत्र जप के ५ स्वर्णिम नियम
शुद्धता: स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण कर पवित्र आसन पर बैठें।
दिशा: पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके जप करना सर्वोत्तम है।
माला का नियम: जप करते समय माला पर तर्जनी उंगली का स्पर्श न होने दें।
एकाग्रता: मंत्र के शब्दों के भावार्थ का हृदय में निरंतर ध्यान करें।
नियमितता: प्रतिदिन निश्चित समय और संख्या में जप करने से सिद्धि मिलती है।
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!