मुख्य पृष्ठ / मंत्र संग्रह / Mantra / श्री छिन्नमस्ता महाविद्या मंत्र - ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं वज्र वैरोचण्ये हुं हुं फट् स्वाहा गुप्त शत्रुओं का नाश एवं कुण्डलिनी जागरण महामंत्र
माँ महालक्ष्मी कृपा · माँ छिन्नमस्ता Mantra

श्री छिन्नमस्ता महाविद्या मंत्र - ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं वज्र वैरोचण्ये हुं हुं फट् स्वाहा गुप्त शत्रुओं का नाश एवं कुण्डलिनी जागरण महामंत्र

श्री छिन्नमस्ता महाविद्या महामंत्र (ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं वज्र वैरोचण्ये...) की संपूर्ण विधि, अर्थ, विनियोग, ध्यान और लाभ हिंदी में पढ़ें।

इष्ट देव माँ छिन्नमस्ता
शास्त्र स्रोत वैदिक सनातन धर्मग्रंथ एवं संहिता
उत्तम जप समय रात्रि काल या ब्रह्म मुहूर्त
अनुशंसित माला रुद्राक्ष या रक्त चन्दन माला

मूल संस्कृत महामंत्र

शुद्ध शास्त्रीय पाठ एवं उच्चारण स्वरूप

॥ ॐ तत्सत् · सिद्ध वैदिक महामंत्र ॥
ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं वज्र वैरोचण्ये हुं हुं फट् स्वाहा
सरल हिंदी भावार्थ:

वज्र वैरोचणी स्वरूपा माँ छिन्नमस्ता को नमस्कार, जो हमारे भीतर के शत्रुओं का नाश कर दिव्य चेतना जाग्रत करती हैं।

विस्तृत आध्यात्मिक व्याख्या एवं शास्त्रीय विवेचन

मंत्र का गूढ़ रहस्य एवं साधना विधि

मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता

सनातन धर्म की शाक्त परंपरा में दशमहाविद्याओं का अत्यंत विशिष्ट और रहस्यमयी स्थान है। इन दस महाविद्याओं में माँ छिन्नमस्ता को प्रलयंकारी, ऊर्जावान और साधक के आंतरिक भय व बंधनों को काटने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। छिन्नमस्ता महाविद्या का यह महामंत्र न केवल भौतिक और गुप्त शत्रुओं का नाश करता है, बल्कि साधक के शरीर में सुप्त बैठी कुण्डलिनी शक्ति को मूलाधार से सहस्रार तक उर्ध्वगामी बनाने की अद्भुत क्षमता रखता है। पौराणिक ग्रंथों और तांत्रिक ग्रंथों जैसे छिन्नमस्ता तंत्र, नारद पंचरात्र और रुद्रयामलय में इस महाविद्या के अमोघ प्रभाव का विस्तार से वर्णन मिलता है।

इस दिव्य मंत्र के ऋषि भगवान नारद अथवा महर्षि भैरव माने गए हैं, छंद अनुष्टुप या विराट है, और इसकी अधिष्ठात्री देवी स्वयं प्रचंड चंडिका छिन्नमस्ता (वज्र वैरोचणी) हैं। इस महाविद्या की साधना अत्यंत तीव्र और उग्र मानी जाती है, इसलिए इसे 'प्रचंड चंडिका साधना' भी कहा जाता है। साधक जब इस मंत्र का अनुष्ठान पूर्ण निष्ठा और नियमों के साथ करता है, तो उसके जीवन के समस्त अदृश्य और दृश्य शत्रु स्वतः परास्त हो जाते हैं।

मूल शुद्ध मंत्र एवं लिपि

देवनागरी लिपि में श्री छिन्नमस्ता महाविद्या का मूल बीजयुक्त और शक्तिशाली मंत्र इस प्रकार है:

ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं वज्र वैरोचण्ये हुं हुं फट् स्वाहा

इस मंत्र का अंग्रेजी फोनेटिक रूपांतरण नीचे दिया गया है ताकि उच्चारण में पूर्ण शुद्धता बनी रहे:

Om Shreem Hreem Aim Kleem Vajra Vairochanye Hum Hum Phat Swaha

पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ

इस महाविद्या मंत्र का प्रत्येक अक्षर एक शक्तिशाली बीज मंत्र और चेतना का द्योतक है:

  • ॐ : यह ब्रह्मांडीय मूल नाद है, जो संपूर्ण सृष्टि के कंपन और परमात्मा का प्रतीक है।
  • श्रीं : महालक्ष्मी का बीज मंत्र है, जो साधक को भोग, ऐश्वर्य, स्थिरता और भौतिक समृद्धि प्रदान करता है।
  • ह्रीं : महामाया भुवनेश्वरी का बीज है, जो सृजन, स्थिति और संहार की शक्ति के साथ माया के आवरण को हटाता है।
  • ऐं : महासरस्वती का बीज मंत्र है, जो ज्ञान, वाक् सिद्धि, बुद्धि और उच्च चेतना को जाग्रत करता है।
  • क्लीं : कामराज बीज है, जो आकर्षण, प्रेम, संकल्प शक्ति और पराकाष्ठा की ऊर्जा का संचार करता है।
  • वज्र वैरोचण्ये : इसका अर्थ है - वज्र जैसी अटूट और अजेय बुद्धि व तेज को धारण करने वाली, सूर्य (विरोचन) के समान प्रकाशमान माँ छिन्नमस्ता।
  • हुं हुं : यह क्रोध, तीव्रता और आघात का बीज मंत्र है, जो शत्रुओं के अहंकार, नकारात्मक ऊर्जा और बाधाओं को विदीर्ण करता है।
  • फट् : अस्त्र बीज है, जिसका उच्चारण शत्रुओं के संहार और दिशा बंधन के लिए किया जाता है।
  • स्वाहा : हविष्य या अपनी समस्त ऊर्जा को ईश्वरीय चरणों में पूर्ण समर्पण करने का सूचक है।

विनियोग, न्यास एवं ध्यान विधि

किसी भी महाविद्या के जप से पूर्व विनियोग और न्यास करना अनिवार्य है ताकि साधना की ऊर्जा सुरक्षित और केंद्रित रहे।

विनियोग

हाथ में जल लेकर संकल्प के साथ बोलें:
'असुरु मन्त्रस्य महर्षिर्विराच्छन्दः छिन्नमस्ता देवता श्रीं बीजं ह्रीं शक्तिः क्लीं कीलकं मम शत्रुनाशार्थं कुण्डलिनी जागरणार्थे जपे विनियोगः।'

ध्यान श्लोक

साधक को मंत्र जप से पूर्व माँ छिन्नमस्ता के इस दिव्य ध्यान रूप का मानसिक दर्शन करना चाहिए:

प्रत्युत्पन्नगलां स्वकन्नतुरितां रक्तप्रवाहैस्त्रिभिः पिबन्तीं निजधारया विकसितां सव्ये करे खड्गकम्। हस्तोद्यत्कपालिकां त्रिनयनां दिग्गन्धनालाकुलां बद्ध्वा नागमयप्रवालमुकुटां सेवे वरोचेश्वरीम्॥
भावार्थ: जो अपने ही कटे हुए कंठ से निकलती हुई रक्त की तीन धाराओं में से दो धाराओं को अपने दोनों योगिनियों (डाकिनी और राकिनी) को पान कराती हैं और तीसरी धारा को स्वयं पान करती हैं, जिनके बाएं हाथ में कटा हुआ मस्तक और दाहिने हाथ में खड्ग है, जो नागों के मुकुट से सुसज्जित हैं, ऐसी त्रिनेत्ररूपा माता छिन्नमस्ता का मैं ध्यान करता हूँ।

जप विधि व नियम

  • माला: रुद्राक्ष, स्फटिक अथवा रक्त चन्दन की माला का प्रयोग उत्तम माना जाता है।
  • जप संख्या: प्रतिदिन कम से कम 11 माला (1108 बार) या विशेष अनुष्ठान में 1 लाख जप का विधान है।
  • समय: मध्य रात्रि (निशीथ काल) या ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 3 से 5 बजे के बीच) इस मंत्र के लिए सर्वोत्तम है।
  • दिशा: साधक का मुख उत्तर या पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। आसन लाल ऊनी या कुशा का होना चाहिए।

विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति

  • गुप्त शत्रुओं का नाश: यह मंत्र अदृश्य षड्यंत्रकारियों, कोर्ट-कचहरी के मुकदमों और गुप्त शत्रुओं के हर प्रहार को नष्ट कर देता है।
  • कुण्डलिनी जागरण: मूलाधार चक्र से उठने वाली प्राण ऊर्जा को सुषुम्ना मार्ग से होते हुए सहस्रार तक पहुँचाने में यह अचूक साधना है।
  • निर्भयता और तेज: साधक के भीतर से मृत्यु का भय और हर प्रकार की हीन भावना समाप्त हो जाती है, उसके चेहरे पर ब्रह्मतेज प्रकट होता है।
  • वाक् सिद्धि और आकर्षण: साधक की वाणी में सचाई और प्रभाव उत्पन्न होता है, समाज में उसका प्रभाव बढ़ता है।

सावधानियां एवं नियम

  1. यह एक अत्यंत उग्र तांत्रिक महाविद्या है, अतः इसका जप हमेशा किसी योग्य और सिद्ध गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए।
  2. साधना के दौरान ब्रह्मचर्य का कठोर पालन अनिवार्य है।
  3. भोजन सात्विक होना चाहिए, लहसुन-प्याज और तामसिक आहार का पूर्ण त्याग करें।
  4. मंत्र जप की गोपनीयता बनाए रखें, अपनी साधना का प्रसार दूसरों के सामने न करें।

जाप के सिद्ध फल व सावधानियां

पुण्य लाभ एवं साधना के महत्वपूर्ण नियम

प्राप्त होने वाले पुण्य लाभ
गुप्त शत्रुओं का पूर्ण नाश, कुण्डलिनी शक्ति का जागरण और वाक् सिद्धि।
साधना में ध्यान रखने योग्य नियम
दीक्षा प्राप्त गुरु के मार्गदर्शन में ही गोपनीय रूप से अनुष्ठान करें।

मंत्र से जुड़े मुख्य प्रश्न व समाधान (FAQs)

श्रद्धालुओं द्वारा पूछे जाने वाले सामान्य प्रश्न

इस पावन मंत्र का जप रात्रि काल या ब्रह्म मुहूर्त में रुद्राक्ष या रक्त चन्दन माला से १०८ बार करना सबसे शुभ व फलदायी माना गया है।
हाँ, मानसिक जप (मानस जप) को शास्त्रों में वाचिक जप से भी अधिक प्रभावशाली और फलदायी माना गया है। इसे आप शांत चित्त होकर कभी भी कर सकते हैं।
नियमित जप से अकाल मृत्यु व नकारात्मकता का भय समाप्त होता है, मानसिक शांति व सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और इष्टदेव की असीम कृपा प्राप्त होती है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख वेदों, उपनिषदों एवं सनातन धर्मग्रंथों के उपलब्ध संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा श्रद्धालुओं के मार्गदर्शन हेतु तैयार किया गया है।

मंत्र जप के ५ स्वर्णिम नियम
शुद्धता: स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण कर पवित्र आसन पर बैठें।
दिशा: पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके जप करना सर्वोत्तम है।
माला का नियम: जप करते समय माला पर तर्जनी उंगली का स्पर्श न होने दें।
एकाग्रता: मंत्र के शब्दों के भावार्थ का हृदय में निरंतर ध्यान करें।
नियमितता: प्रतिदिन निश्चित समय और संख्या में जप करने से सिद्धि मिलती है।
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