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माँ महालक्ष्मी कृपा · अश्विनी कुमार Mantra

श्री अश्विनी कुमार आरोग्य मंत्र: ॐ अश्विनीकुमाराभ्यां नमः - असाध्य रोगों से मुक्ति और कायाकल्प साधना

अश्विनी कुमार आरोग्य मंत्र के माध्यम से असाध्य रोगों से मुक्ति और कायाकल्प की पूर्ण विधि। जानिए मंत्र, विनियोग, न्यास और जप के नियम।

इष्ट देव अश्विनी कुमार
शास्त्र स्रोत वैदिक सनातन धर्मग्रंथ एवं संहिता
उत्तम जप समय ब्रह्म मुहूर्त
अनुशंसित माला रुद्राक्ष या स्फटिक माला

मूल संस्कृत महामंत्र

शुद्ध शास्त्रीय पाठ एवं उच्चारण स्वरूप

॥ ॐ तत्सत् · सिद्ध वैदिक महामंत्र ॥
ॐ अश्विनीकुमाराभ्यां नमः
सरल हिंदी भावार्थ:

हे अश्विनी कुमारों! आपको मेरा नमन है।

विस्तृत आध्यात्मिक व्याख्या एवं शास्त्रीय विवेचन

मंत्र का गूढ़ रहस्य एवं साधना विधि

मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता

वैदिक परंपरा में अश्विनी कुमारों को देवताओं का चिकित्सक माना गया है। ऋग्वेद में इनका वर्णन अत्यंत तेजस्वी, युवा और कल्याणकारी शक्तियों के रूप में मिलता है। अश्विनी कुमार सूर्य देव और संज्ञा के पुत्र हैं। वे न केवल शारीरिक रोगों को दूर करते हैं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक व्याधियों का भी निवारण करने में सक्षम हैं। 'अश्विनी' शब्द का अर्थ है 'प्रकाश लाने वाला'। ये मंत्र साधक के भीतर प्राण ऊर्जा का संचार करते हैं।

मूल शुद्ध मंत्र

ॐ अश्विनीकुमाराभ्यां नमः

उच्चारण: Om Ashwini-Kumarabhyam Namah

पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ

ॐ: यह ब्रह्मांड का मूल नाद है। अश्विनीकुमाराभ्यां: दोनों अश्विनी कुमारों को (द्विवचन)। नमः: मेरा नमन या नमस्कार है। भावार्थ यह है कि हे देव वैद्य अश्विनी कुमार, मैं आपकी शरण में हूँ, मेरे शरीर और मन के समस्त विकारों को दूर कर मुझे आरोग्य प्रदान करें।

विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक

विनियोग: अस्य श्री अश्विनी कुमार मंत्रस्य, अश्विनी कुमार ऋषिः, अनुष्टुप छन्दः, अश्विनी कुमारौ देवता, आरोग्य सिद्धये जपे विनियोगः। ध्यान: 'स्वर्ण कांति वाले, अश्व पर सवार, हाथों में अमृत कलश लिए हुए देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमारों का मैं ध्यान करता हूँ।'

जप विधि व नियम

इस मंत्र का जप प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में करना सर्वोत्तम है। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। रुद्राक्ष या स्फटिक की माला का प्रयोग करें। जप के समय मन में पूर्ण विश्वास रखें कि अश्विनी कुमार आपकी चिकित्सा कर रहे हैं।

विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति

यह मंत्र असाध्य रोगों के उपचार में सहायक है। यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है और कायाकल्प में मदद करता है। नियमित जप से मानसिक तनाव दूर होता है और ओज-तेज की वृद्धि होती है।

सावधानियां एवं नियम

साधना काल में सात्विक भोजन करें। मांस-मदिरा का पूर्ण त्याग करें। मन में किसी के प्रति द्वेष न रखें। ब्रह्मचर्य का पालन करना इस साधना की सफलता के लिए अनिवार्य है।

जाप के सिद्ध फल व सावधानियां

पुण्य लाभ एवं साधना के महत्वपूर्ण नियम

प्राप्त होने वाले पुण्य लाभ
आरोग्य, दीर्घायु, असाध्य रोगों से मुक्ति, कायाकल्प
साधना में ध्यान रखने योग्य नियम
सात्विक आहार, ब्रह्मचर्य का पालन, पूर्ण श्रद्धा

मंत्र से जुड़े मुख्य प्रश्न व समाधान (FAQs)

श्रद्धालुओं द्वारा पूछे जाने वाले सामान्य प्रश्न

इस पावन मंत्र का जप ब्रह्म मुहूर्त में रुद्राक्ष या स्फटिक माला से १०८ बार करना सबसे शुभ व फलदायी माना गया है।
हाँ, मानसिक जप (मानस जप) को शास्त्रों में वाचिक जप से भी अधिक प्रभावशाली और फलदायी माना गया है। इसे आप शांत चित्त होकर कभी भी कर सकते हैं।
नियमित जप से अकाल मृत्यु व नकारात्मकता का भय समाप्त होता है, मानसिक शांति व सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और इष्टदेव की असीम कृपा प्राप्त होती है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख वेदों, उपनिषदों एवं सनातन धर्मग्रंथों के उपलब्ध संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा श्रद्धालुओं के मार्गदर्शन हेतु तैयार किया गया है।

मंत्र जप के ५ स्वर्णिम नियम
शुद्धता: स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण कर पवित्र आसन पर बैठें।
दिशा: पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके जप करना सर्वोत्तम है।
माला का नियम: जप करते समय माला पर तर्जनी उंगली का स्पर्श न होने दें।
एकाग्रता: मंत्र के शब्दों के भावार्थ का हृदय में निरंतर ध्यान करें।
नियमितता: प्रतिदिन निश्चित समय और संख्या में जप करने से सिद्धि मिलती है।
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