मुख्य पृष्ठ / मंत्र संग्रह / Mantra / श्री त्रिपुरसुन्दरी मंत्र - ॐ ऐं क्लीं सौंः सौंः क्लीं ऐं श्री त्रिपुरसुन्दरी ऐश्वर्य प्राप्ति महामंत्र
माँ भगवती शक्ति कृपा · माँ त्रिपुरसुन्दरी (षोडशी राजराजेश्वरी) Mantra

श्री त्रिपुरसुन्दरी मंत्र - ॐ ऐं क्लीं सौंः सौंः क्लीं ऐं श्री त्रिपुरसुन्दरी ऐश्वर्य प्राप्ति महामंत्र

श्री त्रिपुरसुन्दरी महामंत्र (ॐ ऐं क्लीं सौंः सौंः क्लीं ऐं श्री त्रिपुरसुन्दरी) की विधि, अर्थ, विनियोग, न्यास और साधना के संपूर्ण नियम जानें।

इष्ट देव माँ त्रिपुरसुन्दरी (षोडशी राजराजेश्वरी)
शास्त्र स्रोत वैदिक सनातन धर्मग्रंथ एवं संहिता
उत्तम जप समय प्रदोष काल या ब्रह्म मुहूर्त
अनुशंसित माला स्फटिक माला या लाल चंदन माला

मूल संस्कृत महामंत्र

शुद्ध शास्त्रीय पाठ एवं उच्चारण स्वरूप

॥ ॐ तत्सत् · सिद्ध वैदिक महामंत्र ॥
ॐ ऐं क्लीं सौंः सौंः क्लीं ऐं श्री त्रिपुरसुन्दरी ऐश्वर्य प्राप्ति महामंत्र
सरल हिंदी भावार्थ:

माता त्रिपुरसुन्दरी जो वाग्भव, कामराज और शक्ति बीज से युक्त होकर साधक को समस्त ऐश्वर्य, ज्ञान और आनंद प्रदान करती हैं, उन्हें बारंबार प्रणाम है।

विस्तृत आध्यात्मिक व्याख्या एवं शास्त्रीय विवेचन

मंत्र का गूढ़ रहस्य एवं साधना विधि

मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता

सनातन धर्म और शाक्त परंपरा में श्री विद्या साधना को सर्वोपरि स्थान प्राप्त है। भगवती त्रिपुरसुन्दरी, जिन्हें ललिता महात्रिपुरसुन्दरी, राजराजेश्वरी और षोडशी भी कहा जाता है, ब्रह्मांड की सर्वोच्च आद्याशक्ति हैं। वे इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्ति की अधिष्ठात्री हैं। श्री त्रिपुरसुन्दरी मंत्र केवल धन या भौतिक समृद्धि का साधन नहीं है, बल्कि यह भोग और मोक्ष दोनों का एक साथ प्रदाता महामंत्र है।

वैदिक तथा तांत्रिक ग्रंथों के अनुसार, इस महामंत्र के ऋषि भगवान ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र हैं, छंद 'गायत्री' या 'बृहती' है, तथा इसकी अधिष्ठात्री देवता स्वयं साक्षात् परब्रह्मस्वरूपिणी श्री त्रिपुरसुन्दरी हैं। इस मंत्र का स्मरण करते ही साधक के भीतर कुंडलिनी शक्ति का जागरण स्वतः होने लगता है। भगवती त्रिपुरसुन्दरी का निवास श्रीचक्र के केंद्रबिंदु यानी बिंदुस्थान में माना गया है।

मूल शुद्ध मंत्र एवं लिप्यंतरण

यहाँ श्री त्रिपुरसुन्दरी के विशिष्ट ऐश्वर्य प्रदायक महामंत्र का देवनागरी और रोमन लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

देवनागरी मंत्र:
ॐ ऐं क्लीं सौंः सौंः क्लीं ऐं श्री त्रिपुरसुन्दरी ऐश्वर्य प्राप्ति महामंत्र

रोमन लिप्यंतरण :
Om Aim Kleem Sauh Sauh Kleem Aim Shree Tripurasundari Aishwarya Prapti Mahamantra

पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ

इस महामंत्र का प्रत्येक अक्षर (बीजाक्षर) एक महाशक्ति का प्रतीक है। आइए इसके पदों को विस्तार से समझें:

  • ॐ : यह प्रणव मंत्र है, जो ब्रह्मांड की मूल ध्वनि और परब्रह्म परमात्मा का द्योतक है।
  • ऐं : यह वाग्भव बीज है, जो माता सरस्वती का बीज मंत्र माना जाता है। इससे साधक को तीक्ष्ण बुद्धि, विवेक, स्मरण शक्ति और वाक्पटुता की प्राप्ति होती है।
  • क्लीं : यह कामराज बीज है, जो भगवान कामदेव और माता महाकाली-महालक्ष्मी का संयुक्त बीज है। यह आकर्षण, प्रेम, चुंबकीय व्यक्तित्व और भौतिक सुख-समृद्धि (ऐश्वर्य) प्रदान करता है।
  • सौंः : यह पराशक्ति का हृदय बीज है, जिसे शक्ति बीज या लज्जा बीज भी कहा जाता है। यह साधक को आत्मसाक्षात्कार, परम चेतना और कुंडलिनी जागरण की ओर अग्रसर करता है। मंत्र में इसकी आवृत्ति (सौंः सौंः) शक्ति के द्वैत और अद्वैत संतुलन को दर्शाती है।
  • श्री त्रिपुरसुन्दरी : तीनों लोकों में जो परम सुंदर, कल्याणकारी और ऐश्वर्य की स्वामिनी हैं, उन माँ त्रिपुरसुन्दरी को हमारा कोटि-कोटि नमन है।

विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक

किसी भी शाक्त मंत्र के अनुष्ठान से पूर्व विनियोग और न्यास करना अनिवार्य होता है ताकि मंत्र की ऊर्जा को शरीर और मन में स्थापित किया जा सके।

विनियोग

अस्य श्री त्रिपुरसुन्दरी महामंत्रस्य, ब्रह्मा-विष्णु-रुद्रा ऋषयः, निचृद्गायत्री छंदः, श्री त्रिपुरसुन्दरी देवता, ऐं बीजं, क्लीं शक्तिः, सौंः कीलकं, मम सर्वाभीष्टसिद्धये जपे विनियोगः।

षडङ्ग न्यास

  • ॐ ऐं हृदयाय नमः
  • ॐ क्लीं शिरसे स्वाहा
  • ॐ सौंः शिखायै वषट्
  • ॐ सौंः कवचाय हुं
  • ॐ क्लीं नेत्रत्रयाय वौषट्
  • ॐ ऐं अस्त्राय फट्

ध्यान श्लोक

रक्ताभां नवचन्द्रचूडामणिं कुचोन्नतस्फीतां त्रिनेत्रां सस्मिताम्।
पाशाङ्कुशं कुशपुष्पचापबाणान् दधानां हस्तैः स्मरामि त्रिपुरसुन्दरीम्॥

भावार्थ: उदय होते हुए सूर्य के समान लाल कांति वाली, मस्तक पर अर्धचंद्र रूपी चूड़ामणि धारण करने वाली, उन्नत कुचों से शोभित, तीन नेत्रों वाली और मंद-मन्द मुसकान से सुसज्जित, जिनके हाथों में पाश, अंकुश, इक्षुदंड (गन्ने का धनुष) और पुष्पबाण शोभायमान हैं, ऐसी भगवती त्रिपुरसुन्दरी का मैं ध्यान करता हूँ।

जप विधि व नियम

श्री त्रिपुरसुन्दरी महामंत्र की साधना अत्यंत गोपनीय और पवित्र मानी जाती है। इसके जप के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए:

  • समय: इस मंत्र का जप ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4 बजे से 6 बजे के मध्य) या प्रदोष काल (संध्या के समय) में करना सर्वोत्तम फलदायी होता है।
  • माला: स्फटिक की माला या लाल चंदन की माला का प्रयोग करना चाहिए। रुद्राक्ष की माला से भी जप किया जा सकता है।
  • संख्या: नित्य कम से कम 108 बार (एक माला) या अपनी क्षमतानुसार 3, 5 या 11 माला का जप करना चाहिए।
  • दिशा: साधक का मुख उत्तर दिशा या पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए।
  • आसन: लाल रंग के ऊनी आसन या कुछ और उच्चकोटि के पवित्र आसन पर बैठकर जप करना चाहिए।

विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति

इस महामंत्र की नियमित और विधि-विधान से की गई साधना से साधक को निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • ऐश्वर्य एवं समृद्धि: जीवन में कभी भी धन, धान्य, वाहन, भूमि और भौतिक सुखों की कमी नहीं रहती। राजयोग जैसे सुखों की प्राप्ति होती है।
  • आकर्षण एवं तेज: साधक के मुखमंडल पर एक अलौकिक तेज (ब्रह्मतेज) उत्पन्न होता है, जिससे समाज में उसका मान-सम्मान और प्रभाव बढ़ता है।
  • वाक् सिद्धि: 'ऐं' बीज के प्रभाव से साधक की वाणी में गजब का आकर्षण और सत्यता आ जाती है, जो बोलता है वह सिद्ध होने लगता है।
  • मानसिक शांति: तनाव, भय, अवसाद और अज्ञात शत्रुओं के भय से मुक्ति मिलती है। मन शांत और एकाग्र हो जाता है।
  • आध्यात्मिक उन्नति: भोग के साथ-साथ मोक्ष के द्वार भी खुलते हैं और अंततः साधक को देवी के सायुज्य पद की प्राप्ति होती है।

सावधानियां एवं नियम

इस उच्च कोटि के महामंत्र की साधना में कुछ विशेष सावधानियों का पालन करना अति आवश्यक है:

  • साधना काल में पूर्ण ब्रह्मचर्य और सात्विक आहार (शुद्ध शाकाहारी, लहसुन-प्याज रहित भोजन) का पालन करें।
  • क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या और परनिंदा से दूर रहें।
  • मंत्र का उच्चारण स्पष्ट और शुद्ध होना चाहिए। मानसिक जप को सर्वोच्च माना गया है।
  • महिलाएं अपने मासिक धर्म के दिनों में इस महामंत्र के बाह्य जप से बचें, उस दौरान मानसिक स्मरण कर सकती हैं।
  • यदि संभव हो तो किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही इस महाविद्या का अनुष्ठान करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

  1. क्या गृहस्थ जीवन जीने वाले लोग इस त्रिपुरसुन्दरी मंत्र का जप कर सकते हैं?
    हाँ, गृहस्थों के लिए यह मंत्र अत्यंत कल्याणकारी है क्योंकि यह भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करता है। इससे घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
  2. इस मंत्र के जप के लिए कौन सी माला सबसे उत्तम है?
    स्फटिक की माला या लाल चंदन की माला इस मंत्र की साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है।
  3. क्या इस मंत्र के जप के लिए दीक्षा लेना अनिवार्य है?
    यद्यपि गुरु दीक्षा होने पर साधना का फल शीघ्र और सुरक्षित रूप से मिलता है, फिर भी सामान्य स्तोत्र और नाम जप के रूप में इसे श्रद्धापूर्वक किया जा सकता है। तीव्र साधना के लिए गुरु सान्निध्य उत्तम है।
  4. इस मंत्र का जप किस समय करना सबसे अधिक प्रभावशाली होता है?
    ब्रह्म मुहूर्त (प्रातःकाल) अथवा प्रदोष काल (संध्या के समय) में शांत चित्त से किया गया जप सर्वाधिक फलदायी होता है।

जाप के सिद्ध फल व सावधानियां

पुण्य लाभ एवं साधना के महत्वपूर्ण नियम

प्राप्त होने वाले पुण्य लाभ
समस्त ऐश्वर्य, राजयोग, वाक्पटुता, आकर्षण, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति
साधना में ध्यान रखने योग्य नियम
दीक्षा प्राप्त साधक ही पूर्ण गुरु-निर्देश में इसका अनुष्ठान करें, शुद्धता और पवित्रता अनिवार्य है।

मंत्र से जुड़े मुख्य प्रश्न व समाधान (FAQs)

श्रद्धालुओं द्वारा पूछे जाने वाले सामान्य प्रश्न

इस पावन मंत्र का जप प्रदोष काल या ब्रह्म मुहूर्त में स्फटिक माला या लाल चंदन माला से १०८ बार करना सबसे शुभ व फलदायी माना गया है।
हाँ, मानसिक जप (मानस जप) को शास्त्रों में वाचिक जप से भी अधिक प्रभावशाली और फलदायी माना गया है। इसे आप शांत चित्त होकर कभी भी कर सकते हैं।
नियमित जप से अकाल मृत्यु व नकारात्मकता का भय समाप्त होता है, मानसिक शांति व सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और इष्टदेव की असीम कृपा प्राप्त होती है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख वेदों, उपनिषदों एवं सनातन धर्मग्रंथों के उपलब्ध संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा श्रद्धालुओं के मार्गदर्शन हेतु तैयार किया गया है।

मंत्र जप के ५ स्वर्णिम नियम
शुद्धता: स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण कर पवित्र आसन पर बैठें।
दिशा: पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके जप करना सर्वोत्तम है।
माला का नियम: जप करते समय माला पर तर्जनी उंगली का स्पर्श न होने दें।
एकाग्रता: मंत्र के शब्दों के भावार्थ का हृदय में निरंतर ध्यान करें।
नियमितता: प्रतिदिन निश्चित समय और संख्या में जप करने से सिद्धि मिलती है।
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!