मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता
दस महाविद्याओं में माँ तारा का स्थान द्वितीय है। इन्हें 'तारिणी' कहा जाता है, जिसका अर्थ है जो भवसागर से पार लगाने वाली हैं। तंत्र शास्त्र में माँ तारा को नील सरस्वती के रूप में भी पूजा जाता है। इनका उद्गम स्थल मेरु पर्वत के पश्चिम भाग में स्थित चोलना नदी के तट पर माना गया है। ऋषि अक्षोभ्य इनके मुख्य ऋषि हैं। तारा महाविद्या की साधना अत्यंत उग्र और तीव्र फल देने वाली मानी गई है। यह मंत्र साधक के जीवन में आने वाले सभी प्रकार के भौतिक और आध्यात्मिक अवरोधों को नष्ट करने में सक्षम है।
मूल शुद्ध मंत्र
ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट्
उच्चारण: Om Hreem Streem Hum Phat
पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ
इस मंत्र के प्रत्येक अक्षर का अपना विशिष्ट अर्थ है:
- ॐ: यह प्रणव है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक है।
- ह्रीं: यह माया बीज है, जो माँ भुवनेश्वरी और तारा की शक्ति को जागृत करता है।
- स्त्रीं: यह तारा बीज है, जो आकर्षण और शक्ति का प्रतीक है।
- हुं: यह कवच बीज है, जो साधक की रक्षा करता है।
- फट्: यह अस्त्र बीज है, जो विघ्नों का नाश करता है।
विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक
विनियोग: अस्य श्री तारा मंत्रस्य अक्षोभ्य ऋषिः, अनुष्टुप छन्दः, तारा देवता, ह्रीं बीजं, स्त्रीं शक्तिः, हुं कीलकं, मम अभीष्ट सिद्धये जपे विनियोगः। ध्यान: प्रत्युढ़पादां समलोलजिह्वां विभीषणाम् तारां स्मरेत्।
साधक के लिए नियम
तारा साधना में शुद्धता का विशेष महत्व है। साधना के समय नीले वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है। उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। साधना काल में पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें।
विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति
माँ तारा की साधना से साधक को वाक सिद्धि प्राप्त होती है। आर्थिक संकट दूर होते हैं और व्यापार में उन्नति होती है। यह मंत्र अकाल मृत्यु के भय को समाप्त करता है।
सावधानियां
यह एक उग्र साधना है, अतः इसे किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए। साधना के दौरान तामसिक भोजन का त्याग करें।