१. उपनिषदिक शांति मंत्र 'ॐ सह नाववतु' का स्वरूप एवं वैश्विक महत्व
सनातन वैदिक संस्कृति का सर्वोच्च लक्ष्य केवल व्यक्तिगत मोक्ष नहीं, अपितु संपूर्ण चराचर जगत में शांति, सामंजस्य, परस्पर सद्भाव और ज्ञान का विस्तार है। वेदों और उपनिषदों की प्रत्येक शाखा किसी न किसी पावन 'शांति पाठ' से प्रारंभ और संपन्न होती है। कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा और कठोपनिषद्, तैत्तिरीयोपनिषद् तथा श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह सार्वभौमिक शांति मंत्र - 'ॐ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु...' संपूर्ण विश्व वांग्मय में गुरु-शिष्य संबंध, सामूहिक अध्ययन, सह-अस्तित्व और वैश्विक शांति का सबसे उदात्त और अमर घोषणापत्र है।
इस मंत्र का मूल उद्घोष है: 'सह' - अर्थात साथ-साथ। हम साथ-साथ चलें, साथ-साथ ज्ञान का उपभोग करें, साथ-साथ पराक्रम और पुरुषार्थ का संपादन करें, हमारा अर्जित ज्ञान तेजस्वी और प्रकाशमान हो, और हमारे बीच कभी भी किसी प्रकार का द्वेष, ईर्ष्या या वैमनस्य उत्पन्न न हो। अंत में तीन बार उच्चारित 'शान्तिः शान्तिः शान्तिः' मनुष्य के जीवन को त्रस्त करने वाले तीनों प्रकार के संतापों - आध्यात्मिक (शारीरिक व मानसिक रोग), आधिभौतिक (शत्रु, हिंसक पशु व बाह्य उपद्रव), और आधिदैविक (भूकंप, बाढ़, आकाशीय आपदाएं व ग्रह दोष) को शांत करने का दिव्य सूत्र है।
यह मंत्र किसी विशिष्ट संप्रदाय, पंथ या भौगोलिक सीमा में बंधा हुआ नहीं है। यह आधुनिक युग में शिक्षा संस्थानों, विश्वविद्यालयों, कॉरपोरेट टीम-वर्क, पारिवारिक जीवन और अंतरराष्ट्रीय शांति सम्मेलनों के लिए एक अत्यंत प्रेरणादायक आदर्श सूत्र है।
२. मूल संस्कृत श्लोक, उच्चारण एवं ध्यान विधि
॥ उपनिषदिक शांति महामंत्र ॥
ॐ सह नाववतु।
सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
॥ वैदिक भावार्थ ॥
भावार्थ: परमात्मा हम दोनों (गुरु और शिष्य) की साथ-साथ रक्षा करें। वे हम दोनों का साथ-साथ पालन-पोषण करें। हम दोनों मिलकर महान शक्ति और पराक्रम का उपार्जन करें। हम दोनों द्वारा पढ़ा हुआ ज्ञान तेजस्वी और ओजस्वी बने। हम दोनों कभी भी परस्पर एक-दूसरे से द्वेष न करें। हे परमेश्वर! त्रिविध तापों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) की पूर्ण शांति हो, शांति हो, परम शांति हो!
॥ गुरु-शिष्य ध्यान श्लोक ॥
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
भावार्थ: गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही देवाधिदेव महेश्वर शिव हैं, और गुरु ही साक्षात् परमब्रह्म हैं; उन श्री गुरुदेव के पावन चरणों में मेरा सादर प्रणाम है।
शुद्ध उच्चारण निर्देश: 'सह नाववतु' (स-ह ना-व-व-तु) में 'नौ' और 'अवतु' का संधि रूप 'नाववतु' है। 'सह नौ भुनक्तु' में 'क्तु' का संयुक्त उच्चारण स्पष्ट हो। 'सह वीर्यं करवावहै' में 'करवावहै' के अंत में ऐकार की ध्वनि स्पष्ट गूंजे। 'तेजस्वि नावधीतमस्तु' (तेजस्वि नौ अधीतम् अस्तु) को अत्यंत धीर-गंभीर भाव से उच्चारित करें। 'मा विद्विषावहै' में 'द्वि' और 'षा' का उच्चारण निर्दोष हो। अंत में 'ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः' बोलते समय प्रत्येक 'शान्तिः' के उपरांत कुछ क्षणों का मौन विश्राम लें।
३. पद-च्छेद एवं विस्तृत शब्दार्थ
इस पावन शांति मंत्र के प्रत्येक पद का गहरा व्याकरणिक और दार्शनिक विश्लेषण निम्नलिखित है:
- १. ॐ (प्रणव नाद): सच्चिदानंद परब्रह्म का शाश्वत नाम।
- २. सह (साथ-साथ): गुरु और शिष्य, शिक्षक और शिक्षार्थी, अथवा संपूर्ण समाज एक साथ मिलकर चले।
- ३. नौ (हम दोनों की): संस्कृत व्याकरण में 'नौ' असमद् शब्द का द्वितीया और चतुर्थी द्विवचन रूप है, जिसका अर्थ है 'हम दोनों (गुरु और शिष्य) की'।
- ४. अवतु (रक्षा करें): 'अव्' धातु (रक्षा करना)। परमात्मा अज्ञान, प्रमाद और भय से हम दोनों की रक्षा करें।
- ५. भुनक्तु (पालन-पोषण करें): 'भुज्' धातु (पालन करना / उपभोग करना)। परमात्मा ज्ञान के अमृत फल से हम दोनों का पोषण करें।
- ६. वीर्यं करवावहै (पराक्रम उपार्जित करें): हम दोनों मिलकर ज्ञान और आत्मबल का सामर्थ्य (वीर्य) संपादित करें।
- ७. तेजस्वि (ओजस्वी / प्रकाशमान): हमारा ज्ञान केवल पुस्तकीय न रहे, वह आचरण में उतरकर तेजस्वी बने।
- ८. अधीतम् अस्तु (पढ़ा हुआ बने): हमारे द्वारा ग्रहण किया गया अध्ययन समाज और आत्मा को आलोकित करने वाला बने।
- ९. मा विद्विषावहै (द्वेष न करें): 'मा' (मत), 'विद्विषावहै' (द्वेष करें)। विचारभेद होने पर भी हमारे मन में कभी एक-दूसरे के प्रति ईर्ष्या, कटुता या द्वेष न हो।
- १०. शान्तिः शान्तिः शान्तिः (त्रिविध शांति): कायिक, वाचिक, मानसिक - तीनों ताप शांत हों।
४. विस्तृत दार्शनिक भावार्थ एवं त्रिविध ताप का उपशमन
भारतीय दर्शन में मनुष्य के समस्त कष्टों को 'त्रिविध ताप' कहा गया है। इस मंत्र के अंत में तीन बार 'शान्तिः' बोलने का शास्त्रीय रहस्य यही है:
- १. आधिदैविक ताप: प्राकृतिक आपदाएं (भूकंप, तूफान, बाढ़, आकाशीय बिजली, उल्कापात) तथा ग्रहों और अदृश्य शक्तियों द्वारा दिए गए कष्ट। प्रथम 'शान्तिः' इन दैविक प्रकोपों को शांत करती है।
- २. आधिभौतिक ताप: संसार के अन्य प्राणियों, शत्रुओं, हिंसक पशुओं, चोरों, षड्यंत्रकारियों द्वारा दिए जाने वाले कष्ट। द्वितीय 'शान्तिः' इन भौतिक उपद्रवों से रक्षा करती है।
- ३. आध्यात्मिक ताप: मनुष्य के अपने शरीर और मन से उत्पन्न कष्ट - शारीरिक रोग (वात, पित्त, कफ जनित व्याधियां) और मानसिक विकार (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अवसाद, चिंता)। तृतीय 'शान्तिः' अंतःकरण को शांत और निरोगी बनाती है।
इसके अतिरिक्त, यह मंत्र शिक्षा के क्षेत्र में 'प्रतिस्पर्धा' के स्थान पर 'सहयोग' की स्थापना करता है। जब गुरु और शिष्य के बीच अहंकार समाप्त हो जाता है, तभी ज्ञान का वास्तविक संचरण संभव होता है।
॥ अद्वैत वेदान्त के चार महावाक्य एवं सह-अस्तित्व का दर्शन ॥
उपनिषदों की ज्ञान-परंपरा में यह शांति मंत्र साधक को वेदों के चार परम महावाक्यों के साक्षात्कार के लिए योग्य बनाता है: 'प्रज्ञानं ब्रह्म' (ऋग्वेद - विशुद्ध चेतना ही ब्रह्म है), 'तत्त्वमसि' (सामवेद - वह ब्रह्म तुम्हीं हो), 'अहं ब्रह्मास्मि' (यजुर्वेद - मैं ही ब्रह्म हूँ), और 'अयमात्मा ब्रह्म' (अथर्ववेद - यह अंतरात्मा साक्षात् ब्रह्म है)।
जब गुरु और शिष्य 'मा विद्विषावहै' (हम परस्पर कभी द्वेष न करें) का संकल्प लेते हैं, तो उनके मध्य का द्वैत भाव (अहंकार और भेद-दृष्टि) विगलित हो जाता है। ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिटकर विशुद्ध अद्वैत चेतना का प्राकट्य होता है, जो मोक्ष का साक्षात् द्वार है।
५. वैदिक एवं उपनिषदिक उद्भव, शास्त्र प्रमाण
यह महामंत्र कृष्ण यजुर्वेद के अंतर्गत तैत्तिरीयोपनिषद् (ब्रह्मवल्ली एवं भृगुवल्ली) के प्रारंभ और अंत में शांति पाठ के रूप में स्थित है। इसके अतिरिक्त कठोपनिषद् (जिसमें नचिकेता और यमराज का अमर संवाद है) तथा श्वेताश्वतरोपनिषद् में भी यह शांति पाठ के रूप में प्रतिष्ठित है:
"ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥"
- कठोपनिषद्, शांतिपाठ / तैत्तिरीयोपनिषद् २.१
श्रीमद् आद्य शंकराचार्य जी ने कठोपनिषद् और तैत्तिरीयोपनिषद् पर अपने अमर 'शांकर भाष्य' में इस मंत्र की व्याख्या करते हुए लिखा है कि बिना शांति और परस्पर द्वेष-मुक्ति के ब्रह्म-ज्ञान की प्राप्ति असंभव है। यह मंत्र अंतःकरण के समस्त दोषों को धोकर साधक को 'अमृत का पात्र' बना देता है।
॥ प्राचीन भारतीय शास्त्रार्थ एवं वाद-कथा परंपरा में शांति पाठ ॥
न्याय दर्शन के अनुसार दार्शनिक विचार-विमर्श तीन प्रकार के होते हैं: वाद, जल्प और वितण्डा। 'जल्प' में केवल अपनी जीत की हठ होती है और 'वितण्डा' में दूसरे के खंडन की कुत्सित भावना होती है। परंतु 'वाद' केवल सत्य की खोज हेतु किया जाने वाला पवित्र संवाद है।
प्राचीन काल में नालंदा, तक्षशिला और काशी के गुरुकुलों में किसी भी शास्त्रार्थ से पूर्व दोनों पक्षों के विद्वान हाथ जोड़कर 'ॐ सह नाववतु' का गान करते थे। यह मंत्र इस बात की गारंटी देता था कि शास्त्रार्थ केवल सत्य के अनुसंधान (वाद) के लिए है, किसी के अहंकार की तुष्टि या पराजय के लिए नहीं।
६. संपूर्ण पाठ विधि, समय, मुद्रा एवं दैनिक उपयोग
इस उपनिषदिक शांति मंत्र के पाठ की शास्त्रीय एवं सात्विक विधि निम्नलिखित है:
पाठ का समय एवं अवसर
प्रातःकाल अध्ययन प्रारंभ करने से पूर्व, किसी भी धार्मिक अनुष्ठान, स्वाध्याय, सभा, ध्यान अथवा योग सत्र के आरंभ और अंत में इसका पाठ अनिवार्य है। भोजन करने से पूर्व भोजन-मंत्र के रूप में भी इसका पाठ किया जाता है।
दिशा, आसन एवं मुद्रा
मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर रखें। सुखासन अथवा पद्मासन में बैठें। दोनों हाथों को हृदय के सम्मुख अंजलि (प्रणाम) मुद्रा में रखें अथवा घुटनों पर ज्ञान मुद्रा धारण करें। आंखें कोमलता से बंद रखें।
सामूहिक सस्वर पाठ विधि
यह मंत्र सामूहिक रूप से एक स्वर में पाठ करने पर सर्वाधिक ऊर्जा उत्पन्न करता है। जब कक्षा के सभी विद्यार्थी, परिवार के सदस्य अथवा साधक एक लय और ताल में इसका संकीर्तन करते हैं, तो वातावरण की समस्त नकारात्मकता समाप्त हो जाती है।
मौन ध्यान एवं अनुभव
मंत्र का पाठ पूर्ण होने के पश्चात कम से कम २ से ५ मिनट तक पूर्ण मौन में बैठें। 'शान्तिः शान्तिः शान्तिः' की गूंज को अपने हृदय, मस्तक और संपूर्ण आभामंडल में अनुभव करें। यह मौन चित्त को समाधिस्थ कर देता है।
दैनिक प्रार्थना संकल्प: "हे सर्वव्यापी परब्रह्म परमेश्वर! हम सब परस्पर प्रेम, सद्भाव और सहयोग के साथ जीवन जिएं। हमारा ज्ञान समाज और राष्ट्र के कल्याण में लगे। हमारे मन से समस्त द्वेष, ईर्ष्या और अहंकार दूर हों, और संपूर्ण विश्व में शांति की स्थापना हो।"
७. आध्यात्मिक, मानसिक, सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक लाभ
'ॐ सह नाववतु' मंत्र के नियमित पाठ से साधक और समाज को निम्नलिखित अमूल्य लाभ प्राप्त होते हैं:
१. मानसिक तनाव एवं अवसाद का पूर्ण शमन
मंत्र के कंपन मस्तिष्क के स्नायु तंत्र को तुरंत शांत करते हैं। क्रोध, चिड़चिड़ापन, भय और भविष्य की चिंताओं से मुक्ति मिलती है और मन में असीम शांति का संचार होता है।
२. अध्ययन में कुशाग्र मेधा एवं एकाग्रता
अध्ययन से पूर्व इस मंत्र का पाठ करने से छात्रों का ध्यान केंद्रित होता है। गुरु और शिक्षक के प्रति आदर भाव बढ़ता है, जिससे पढ़ाया हुआ विषय शीघ्रता से हृदयंगम हो जाता है।
३. पारिवारिक सौहार्द एवं कलह से मुक्ति
घर में प्रतिदिन प्रातः और सायं इस मंत्र का पाठ करने से परिवार के सदस्यों के बीच परस्पर समझ, प्रेम और त्याग की भावना बढ़ती है। सास-बहू, भाई-भाई या पति-पत्नी के कलह समाप्त होते हैं।
४. टीम-वर्क एवं सामाजिक समरसता
कॉरपोरेट कार्यालयों और संस्थाओं में यह मंत्र ईर्ष्या और अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा को समाप्त कर 'सहयोग और सामूहिक पुरुषार्थ' (Synergy & Team Spirit) की अद्भुत भावना जगाता है।
८. पाठ के नियम एवं सावधानियां (Rules & Precautions)
इस पावन शांति मंत्र के पाठ में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना आवश्यक है:
- सद्भाव और क्षमाशीलता: मंत्र में 'मा विद्विषावहै' (हम किसी से द्वेष न करें) की प्रतिज्ञा है। अतः मन में किसी के प्रति कटुता या बदले की भावना रखकर यह पाठ न करें। सभी को हृदय से क्षमा करें।
- सस्वर एवं शांत उच्चारण: मंत्र का पाठ अत्यंत शांत, लयबद्ध और सस्वर होना चाहिए। जल्दबाजी या चिल्लाकर पाठ न करें।
- पवित्रता और आदर: उपनिषदिक मंत्र होने के कारण इसे पवित्र मन और स्वच्छ स्थान पर बैठकर ही पाठ करें। भोजन करते समय भी इसे आदरपूर्वक बोलें।
- तीन बार शांति का भाव: अंत में तीन बार 'शान्तिः' कहते समय तीनों तापों (आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक) के शमन की भावना मन में रखें।