१. देववैद्य भगवान धन्वंतरि एवं आरोग्य महामंत्र का स्वरूप
सनातन संस्कृति में 'आरोग्य' (स्वास्थ्य) को समस्त पुरुषार्थों का मूल आधार माना गया है: 'शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्' (कालिदास, कुमारसंभवम् ५.३३) - अर्थात धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की साधना के लिए यह शरीर ही पहला और अनिवार्य साधन है। जब शरीर रोगी हो, तो संसार का कोई भी वैभव आनंद नहीं दे सकता। हिंदू धर्म में भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद के प्रवर्तक, देवताओं के वैद्य और साक्षात् भगवान श्री हरि विष्णु के द्वादश अवतारों में से एक माना गया है। समुद्र मंथन के समय वे अपने हाथों में 'अमृत कलश' लेकर प्रकट हुए थे। 'ॐ नमो भगवते धन्वन्तरये' (संपूर्ण वैदिक स्वरूप: 'ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वन्तरये अमृतकलशहस्ताय सर्वभयविनाशाय सर्वरोगनिवारणाय त्रिलोकपतये त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णुस्वरूपाय श्री धन्वन्तरये नमः') सनातन चिकित्सा विज्ञान और अध्यात्म का सर्वोच्च आरोग्य महामंत्र है।
यह मंत्र केवल एक धार्मिक उच्चारण नहीं है, अपितु यह मानव शरीर की प्रत्येक कोशिका और प्राण-ऊर्जा को पुनर्जीवित करने वाला 'ध्वनि-चिकित्सा महाविज्ञान' है। इसके नियमित संकीर्तन से असाध्य से असाध्य रोग, दीर्घकालिक व्याधियां, मानसिक अवसाद, भय और अकाल मृत्यु का संकट दूर हो जाता है।
भगवान धन्वंतरि ने महर्षि सुश्रुत को शल्य चिकित्सा और आयुर्वेद का ज्ञान दिया था। अतः जब आधुनिक औषधियों और चिकित्सा के साथ इस मंत्र का जप किया जाता है, तो औषधियां 'अमृत' के समान कार्य करने लगती हैं और रोगी का शरीर आश्चर्यजनक गति से स्वस्थ होने लगता है।
२. मूल संस्कृत श्लोक, उच्चारण एवं ध्यान विधि
॥ संपूर्ण श्री धन्वंतरि महामंत्र ॥
ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वन्तरये अमृतकलशहस्ताय सर्वभयविनाशाय सर्वरोगनिवारणाय त्रिलोकपतये त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णुस्वरूपाय श्री धन्वन्तरये नमः॥
॥ लघु धन्वंतरि नाम-मंत्र ॥
ॐ नमो भगवते धन्वन्तरये नमः॥
॥ श्री धन्वंतरि ध्यान श्लोक ॥
शङ्खं चक्रं जलौकां दधदमृतघटं चारुदोर्भिश्चतुर्भिः,
सूक्ष्मस्वच्छातिहृद्यांशुकपरिविलसन्मौलिमम्भोजनेत्रम्।
कालाम्भोदोज्ज्वलाङ्गं कटितटविलसच्चारूपीताम्बराढ्यं,
वन्दे धन्वन्तरिं तं निखिलगदवनप्रौढदावाग्निलीलम्॥
भावार्थ: जो अपने चार सुंदर हाथों में क्रमशः शंख, सुदर्शन चक्र, जोंक (रक्त-शोधक जलौका) और अमृत से भरा दिव्य घट धारण किए हुए हैं, अत्यंत सूक्ष्म और स्वच्छ सुंदर रेशमी वस्त्रों से अलंकृत हैं, जिनके मस्तक पर दिव्य मुकुट जगमगा रहा है, कमल के समान सुंदर जिनके विशाल नेत्र हैं, काले मेघ के समान जिनकी श्याम-उज्ज्वल कांति है, जिनकी कमर पर सुंदर पीतांबर शोभा पा रहा है, और जो समस्त रोगों रूपी वन को भस्म करने के लिए साक्षात् दावानल के समान हैं, उन देववैद्य भगवान धन्वंतरि की मैं वंदना करता हूँ।
॥ धन्वंतरि गायत्री मंत्र ॥
ॐ वासुदेवाय विद्महे सुधाहस्ताय धीमहि। तन्नो धन्वन्तरिः प्रचोदयात्॥
भावार्थ: हम सर्वव्यापक वासुदेव को जानते हैं, हाथ में अमृत कलश धारण करने वाले उन धन्वंतरि देव का ध्यान करते हैं; वे भगवान धन्वंतरि हमारी बुद्धि और स्वास्थ्य को आरोग्य की ओर प्रेरित करें।
शुद्ध उच्चारण निर्देश: 'ॐ' का उच्चारण नाभि से ओंकार नाद के साथ करें। 'नमो भगवते' में 'ते' पर कोमल विश्राम लें। 'धन्वन्तरये' में 'न्व' और 'न्त' संयुक्त अक्षरों का उच्चारण नासिका से स्पष्ट हो (धन्-वन्-त-र-ये)। 'अमृतकलशहस्ताय' में 'मृ' ऋकार स्वर है। 'सर्वभयविनाशाय सर्वरोगनिवारणाय' को अत्यंत स्पष्ट एवं शांत भाव से बोलें। अंत में 'नमः' में विसर्ग का उच्चारण एक कृतज्ञतापूर्ण समर्पण के साथ करें। मंत्र का जप रोगी के सम्मुख अथवा स्वयं के स्वास्थ्य हेतु अत्यंत शांत चित्त से करें।
३. पद-च्छेद एवं विस्तृत शब्दार्थ
धन्वंतरि महामंत्र के प्रत्येक पद का गहरा आध्यात्मिक और चिकित्सीय अर्थ निम्नलिखित है:
- १. ॐ (प्रणव नाद): ब्रह्मांड का मूल अनाहत स्पंदन, जो समस्त कोशिकाओं में प्राण-शक्ति का संचार करता है।
- २. नमो भगवते (भगवान के निमित्त नमन): 'भग' अर्थात छह ऐश्वर्यों (ज्ञान, शक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य, तेज) से युक्त परमेश्वर को मेरा नमन।
- ३. महासुदर्शनाय (परम सुदर्शन चक्रधारी): सुदर्शन चक्र नकारात्मक विषाणुओं, जीवाणुओं और सूक्ष्म व्याधियों को नष्ट करने वाला दिव्य अस्त्र है।
- ४. वासुदेवाय (सर्वव्यापी प्रभु हेतु): जो समस्त शरीरों के भीतर प्राण रूप में वास करते हैं, उन वासुदेव के लिए।
- ५. धन्वन्तरये (देववैद्य धन्वंतरि हेतु): 'धन्वन्' अर्थात शल्य या व्याधि के मार्ग को जो पार करा दे, वे धन्वंतरि।
- ६. अमृतकलशहस्ताय (हाथ में अमृत कलश धारण करने वाले): जो समस्त असाध्य रोगों को दूर करने वाला और अमरत्व देने वाला अमृत कलश अपने करकमलों में लिए हुए हैं।
- ७. सर्वभयविनाशाय (समस्त भयों का नाश करने वाले): जो मृत्यु, रोग और पीड़ा के समस्त मानसिक भयों को समूल नष्ट करते हैं।
- ८. सर्वरोगनिवारणाय (समस्त रोगों का निवारण करने वाले): शारीरिक, मानसिक और आत्मिक (आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक) तीनों प्रकार के रोगों का शमन करने वाले।
- ९. त्रिलोकपतये त्रिलोकनाथाय: जो तीनों लोकों के स्वामी और रक्षक हैं।
- १०. श्री महाविष्णुस्वरूपाय: जो साक्षात् भगवान महाविष्णु के ही पावन आरोग्य अवतार हैं।
- ११. नमः (प्रणाम): मैं अपने स्वास्थ्य और जीवन को आपके पावन चरणों में समर्पित करता हूँ।
४. विस्तृत दार्शनिक भावार्थ एवं आयुर्वेद का आध्यात्मिक विज्ञान
आयुर्वेद कोई साधारण चिकित्सा पद्धति नहीं है, यह वेदों का उपवेद (अथर्ववेद का उपांग) है। आयुर्वेद के अनुसार स्वास्थ्य केवल रोग का अभाव नहीं है, अपितु:
"समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः। प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते॥"
- सुश्रुत संहिता, सूत्रस्थान १५.४१
अर्थात: "जिसके वात, पित्त और कफ - तीनों दोष सम (संतुलित) हों, जठराग्नि सम हो, सातों धातुएं (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र) और मल-मूत्र की क्रियाएं संतुलित हों, तथा जिसकी आत्मा, समस्त इंद्रियां और मन प्रसन्न हों, वही सच्चा स्वस्थ पुरुष कहलाता है।"
जब साधक धन्वंतरि मंत्र का जप करता है, तो मंत्र की ध्वनि-तरंगें सीधे मस्तिष्क के 'हाइपोथैलेमस' और 'वेगस नर्व' को उत्तेजित करती हैं। इससे शरीर में पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम सक्रिय होता है, कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) का स्तर गिरता है, और शरीर की प्राकृतिक स्व-उपचार क्षमता तीव्र हो जाती है। यह मंत्र रोगी के भीतर 'रोग से लड़ने का आत्म-बल' और जीने की अदम्य इच्छा जाग्रत करता है।
५. वैदिक एवं पौराणिक उद्भव, शास्त्र प्रमाण
भगवान धन्वंतरि के प्राकट्य का विस्तृत आख्यान श्रीमद्भागवत महापुराण (स्कन्ध ८, अध्याय ८, श्लोक ३१-३५) में मिलता है:
"ततोऽमृतं समुत्पाद्य धन्वन्तरिरुदतिष्ठत। कम्बुकण्ठो विशालाक्षो नीलजीमूतसंनिभः॥"
- श्रीमद्भागवत महापुराण, ८.८.३१
अर्थात: "तत्पश्चात समुद्र से अमृत लेकर भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए। उनका कंठ शंख के समान सुघड़ था, नेत्र विशाल थे और शरीर नील मेघ के समान कांतिमान था।"
अग्नि पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में भगवान धन्वंतरि को 'आयुर्वेद का जनक' कहा गया है। सुश्रुत संहिता के प्रथम अध्याय में भगवान धन्वंतरि ने काशीराज दिवोदास के रूप में अवतार लेकर मुनियों को शल्य चिकित्सा और अष्टांग आयुर्वेद का उपदेश दिया था। धनतेरस (कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी) को भगवान धन्वंतरि का प्राकट्योत्सव 'धन्वंतरि जयंती' एवं 'राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस' के रूप में संपूर्ण भारत में मनाया जाता है।
६. संपूर्ण जप विधि, मुहूर्त, माला, दिशा व संकल्प
धन्वंतरि महामंत्र के जप की प्रामाणिक एवं सात्विक विधि निम्नलिखित है:
शुभ दिन एवं मुहूर्त
धनतेरस (धन्वंतरि त्रयोदशी), प्रत्येक मास की त्रयोदशी तिथि (प्रदोष), गुरुवार अथवा रविवार इस साधना का शुभारंभ करने हेतु सर्वोत्तम है। समय के लिए प्रातःकाल सूर्योदय की वेला उत्तम है। यदि कोई अत्यंत बीमार हो, तो किसी भी दिन तुरंत जप आरंभ किया जा सकता है।
दिशा, आसन एवं वस्त्र
जप के समय साधक का मुख उत्तर अथवा पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। उत्तर दिशा आरोग्य और धन्वंतरि की दिशा है। आसन पीले अथवा श्वेत रंग के ऊन या कुश का होना चाहिए। साधक को पीले अथवा श्वेत स्वच्छ वस्त्र पहनने चाहिए।
जप माला का चयन
धन्वंतरि मंत्र जप के लिए तुलसी की माला अथवा मूल रुद्राक्ष की माला सर्वोत्तम मानी गई है। इसके अतिरिक्त पीले चंदन की माला पर भी जप किया जा सकता है। माला को सदैव गोमुखी के भीतर रखकर ही जपें।
अभिमंत्रित जल प्रयोग (औषध अर्पण)
जप के समय सामने एक तांबे या कांसे के पात्र में शुद्ध जल रखें। तुलसी दल और गंगाजल मिलाएं। मंत्र जप पूर्ण होने पर उस जल में तीन बार फूंक मारें। यह जल 'अमृत तुल्य' हो जाता है। इस अभिमंत्रित जल को रोगी को पिलाने से और दवाइयां देते समय इस जल का उपयोग करने से रोग शीघ्र शांत होता है।
संकल्प मंत्र: हाथ में जल, तुलसी पत्र और अक्षत लेकर कहें: "हे अमृतकलशहस्त देवाधिदेव भगवान धन्वंतरि! मैं (अपना नाम) गोत्र (अपना गोत्र) अपने अथवा (रोगी का नाम) के समस्त शारीरिक, मानसिक रोगों के समूल नाश, दीर्घायु, निरोगी काया और आरोग्य की प्राप्ति हेतु आपके पावन महामंत्र का (१, ३ या ११ माला) जप करने का संकल्प लेता हूँ। मुझ पर अथवा इस रोगी पर कृपा कर रोगमुक्त करें।" जल भूमि पर छोड़ दें।
७. आध्यात्मिक, मानसिक, शारीरिक एवं ज्योतिषीय लाभ
धन्वंतरि महामंत्र के नियमित अनुष्ठान से साधक को निम्नलिखित अमूल्य लाभ प्राप्त होते हैं:
१. असाध्य रोगों एवं दीर्घकालिक व्याधियों में चमत्कारिक सुधार
कैंसर, हृदय रोग, पक्षाघात, मधुमेह, श्वास रोग, उच्च रक्तचाप अथवा अज्ञात कारणों से चलने वाली पुरानी बीमारियों में जब कोई उपाय काम न कर रहा हो, तब यह मंत्र शरीर में जीवनी-शक्ति का संचार कर रोग को शांत करता है।
२. औषधियों की प्रभावशीलता में वृद्धि
कई बार देखा जाता है कि रोगी को अच्छी से अच्छी दवा भी लाभ नहीं करती। इस मंत्र से अभिमंत्रित करके जब दवा दी जाती है, तो दवा का दुष्प्रभाव न्यूनतम हो जाता है और वह अमृत के समान त्वरित लाभ पहुंचाती है।
३. मानसिक अवसाद, भय एवं अकाल मृत्यु से रक्षा
रोग के कारण होने वाली घबराहट, मृत्यु का भय, अनिद्रा और गहरी निराशा को यह मंत्र जड़ से मिटा देता है। साधक के मन में आशा, सकारात्मकता और जीवन के प्रति नव-उमंग का संचार होता है।
४. सूर्य, राहु एवं षष्ठ भाव (रोग भाव) की शांति
जन्मकुंडली में छठा भाव (रोग भाव), अष्टम भाव (दीर्घकालिक व्याधि) और बारहवां भाव (अस्पताल व्यय) जब पीड़ित हों, तब भगवान धन्वंतरि की उपासना ग्रहों के क्रूर प्रभाव को शांत कर अस्पताल के चक्कर और अनावश्यक खर्चों से मुक्ति दिलाती है।
८. साधना के नियम एवं सावधानियां (Rules & Discipline)
धन्वंतरि साधना में शुचिता और चिकित्सा के प्रति आदर अनिवार्य है:
- चिकित्सा का त्याग कभी न करें: मंत्र जप चिकित्सा का पूरक है, उसका विकल्प नहीं। डॉक्टर द्वारा दी गई दवाओं और चिकित्सा परामर्श को कभी बंद न करें। मंत्र और दवा का संयुक्त प्रयोग ही पूर्ण आरोग्य देता है।
- सात्विक एवं पथ्य आहार: रोगी और साधक दोनों को बासी, गरिष्ठ, अत्यधिक तीखा, तला हुआ और मांसाहारी भोजन सर्वथा त्यागना चाहिए। सुपाच्य, ताजा और सात्विक आहार ही ग्रहण करें।
- स्वच्छता और वायु संचार: रोगी के कक्ष में पर्याप्त सूर्य का प्रकाश और शुद्ध वायु का संचार होना चाहिए। गंगाजल और गुग्गुल की धूप से वातावरण को शुद्ध रखें।
- वैद्यों और चिकित्सकों का सम्मान: आयुर्वेद में चिकित्सक को भगवान धन्वंतरि का प्रतिनिधि माना गया है। अतः डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के प्रति कृतज्ञता और आदर का भाव रखें।